क्या मनमोहन सिंह इस्लामिक बैंक लाकर दूसरे जिन्ना बनना चाहते हैं?

मलेशिया दौरे के दौरान भारत के प्रधान्मंत्री मनमोहन सिंह जी ने भारत में इस्लामिक बैंकों की स्थापना का अश्वासन दिया है जबकि केरल उच्च नयायालय ने इसकी अनुमति के लिये स्पष्ट मना कर दिया है। ऐसा लगता है कि मुस्लिम वोटों के लिये ये न तो देश की चिन्ता करते हैं और न देश के कानून की। धर्माधारित आरक्षण से लेकर अ मु वि के अल्पसंख्यक स्वरूप तक, पचासों मामले हैं जिन पर मा० न्यायालय साफ मना कर चुके हैं परन्तु ये चोर दरवाजों से इन निर्णयों को निष्प्रभावी बना रहे हैं। इस्लामिक बैंकों की घोषणा इस मामले में एक नयी कडी है। घोषणा करने से पहले इन्होंने न तो इनके अनुभव जानने की कोशिश की है और न ही अपने आइ० बी० विभाग से `पूछने की। अगर कोइ निष्पक्ष व्यक्ति इनकी सामान्य जानकारी भी हासिल करले और वह अपने देश से प्यार करता हो तो वह इसके बारे में सोचना भी पसन्द नहीं करेगा।

इस्लामिक बैंक शरीयत के अनुसार चलते हैं। शरीयत के अनुसार ब्याज लेना व देना, दोनों हराम हैं। इसलिये कट्टरपंथी अपना पॅसा सामान्य बैंकों में जमा नहीं करते। उनका पैसा भारत में लाने के लिये और मुसलमानों को खुश करने के लिये ही भारत में इनको लाने क षडयन्त्र किया जारहा है। भारत के मुस्लिम नेता कानून को भी शरीयत की तराजू में तोलते हैं ,अब बैंक भी शरीयत के अनुसार चलेंगे तो उनकी कट्टरता कितनी बढेगी? क्या यह एक और विभाजन की मांग का आधार नहीं बनेगी?

इस दिशा में केरल सरकार की पहल पर उच्च न्यायालय रोक लगा दी। किसी भी धर्म निरपेक्ष देश में इसकी अनुमति नहीं दी। रिजर्व बैंक ने भी कहा कि इसके लिये संविधान में संशोधन करना पडेगा। जिन देशों में ये चल रहें हैं वहां ये आतंकवादी गतिविधियों को पैसा देते हुए पाये गये हैं। भारत जैसा देश जो पहले ही आतंकवाद से बुरी तरह त्रस्त है क्या इसको बर्दाश्त कर पायेगा? जहां शरिया कोर्ट चल रहीं हों वहां एक और असंवैधानिक संस्था को खडा करना क्या देश के हित में होगा?

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