अमरनाथ यात्रा – राष्ट्रीयता के वर्तमान आन्दोलन का प्रतीक

कश्मीर में स्थित अमरनाथ तीर्थ हिंदू समाज का एक महत्वपूर्ण तीर्थ तो है ही , अब यह राष्ट्रीयता का भी प्रतीक बन गयी है। वहां पर सम्पूर्ण देश का हिन्दू समाज उपस्थित होकर लघु भारत का दृश्य निर्माण कर देता है। शायद इसी कारण वहां के अलगाववादी इस तीर्थ को समाप्त करना चाहते हैं । उन्हें मालूम है कि जब तक बाबा अमरनाथ वहां उपस्थित हैं , इस क्षेत्र को हिंदू शून्य बनाने का उनका स्वप्न पूरा नहीं हो सकता । पहले उन्होंने यात्रियों पर हमले किये । जब मौत का खौफ भी शिवभक्तों को नहीं रोक पाया तो उन्होंने सरकार व धर्मनिरपेक्ष दलों में अपने शुभचिंतकों के द्वारा इस पावन यात्रा को रोकने के प्रयास शुरू कर दिये। इन सब लोगों नें दासत्व भाव से उनके अधूरे एजेंडे को पूरा करने में अपना पूरा सामर्थ्य लगा दिया। इस प्रयास में राज्यपाल जैसे संवैधानिक पद पर बैठा व्यक्ति भी अपने पद की मर्यादा को भूलकर उनके षडयंत्रों को लागू करने में उनकी सहायता करता है। वर्तमान राज्यपाल श्री वोहरा नें ही २००८ में अमरनाथ की जमीन सरकार को वापस देकर शिवभक्तों व देश के संविधान का अनादर किया था। उस समय सम्पूर्ण देश के शिवभक्तों नें इसको अपने लिये चुनौती माना था और सारा देश जम्मू के समाज के साथ खडा हो गया था। अमरनाथ के विरोधी हाथ में पाकिस्तान का झंडा लेकर “भारत मुर्दाबाद” के नारे लगा रहे थे। भारतीय सेना के जवानों को देखते ही वे उन्हें हिंदुस्तानी कुत्ते कहकर संबोधित करते थे। इसके विपरीत बाबा के समर्थक भारत का राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा हाथ में लेकर भारत माता की जय के नारे लगाकर पुलिस की लाठी -गोली खाते थे परन्तु देश के प्रति उनका समर्पण उनको पीछे नहीं हटने देता था। देश के कथित राष्ट्रीय मीडिया में कौन कितना” राष्ट्रीय” है, इसका परिक्षण भी उस समय हो गया था। राष्ट्रीयता की इस लडाई में अन्ततोगत्वा राष्ट्रभक्ति की विजय हुई और पूरे देश में एक आत्मविश्वास की लहर दौड गई कि जब तक अमरता के प्रतीक बाबा अमरनाथ हैं, यह देश अमर रहेगा चाहे अलगाववा्दी और उनके समर्थक कितना ही जोर लगा लें ।

इस आंदोलन में विफलता के बाद भी अलगाववादी चुप नहीं बैठे। २००९ में उन्होंनें धमकी दी कि वे अमरनाथ यात्रा को ३० दिन से अधिक नहीं चलने देंगे। उस समय तक यात्रा ६० दिन की होती थी। ज्येष्ठ पूर्णिमा से शुरू करके श्रावण पूर्णिमा तक चलाने की परम्परा भी थी और सभी यात्रियों को सुविधा और सुरक्षा के साथ दर्शन कराने के लिये इसको आवश्यक समझकर मा. उच्च न्यायालय नें यह आदेश भी दिया था। इस यात्रा को सफल बनाने के मुखर्जी कमेटी की स्थापना की गई थी । उनकी अनुशंसा भी इसी प्रकार की रही है। इसके बावजूद २०१० में इसी राज्यपाल नें यात्रा की अवधि अपने आप घटाकर ५५ दिन कर दिया था। यात्रा के संचालन के लिये न्यायालय के आदेश से श्रीअमरनाथ श्राईन बोर्ड की स्थापना हुई थी और राज्यपाल इसके पदेन अध्यक्ष हैं। इस बोर्ड का संविधान, मा. उच्च न्यायालय का निर्णय और मुखर्जी कमेटी की रिपोर्ट बोर्ड के अधिकार और कर्तव्यों को स्पष्ट रूप से परिभाषित करता है। बोर्ड का दायित्व यात्रा के लिये उचित व्यवस्था जुटाना है जिससे सभी यात्री सुरक्षा और सुविधा से दर्शन कर सकें। यात्रा के आन्तरिक मामलों में दखल देने का बोर्ड का अधिकार नहीं है। यात्रा की तिथी , मुहुर्रत या अवधि तय करना उनका काम नहीं है।यह संविधान की धारा २५ और २६ का स्पष्ट उल्लंघन भी है।इसके लिये हिंदू संत और परम्परा ही महत्वपूर्ण है। इसके बावजूद बोर्ड इस मामले दखल देने की कोशिश करता रहा है। २०१० में समाज नें इस निर्णय का विरोध किया। तब राज्यपाल नें कहा कि यह गलती २०११ में नहीं दोहराई जायेगी। परन्तु २०११ में इसको और घटाकर ४५ दिन की कर दी। उस समय हिंदू समाज के विरोध करने पर एक उपसमिति के निर्माण का ढोंग रचकर हिंदू समाज को धोखा दिया गया। इस उपसमिति के अध्यक्ष को स्पष्ट रूप से कहा गया कि यदि अवधि बढाई गई तो अलगाववादी नाराज हो जायेंगे और २००८ दोहराया जायेगा। इसी दिशा में तर्क गढे गये । कभी कहा गया कि पर्यावरण की समस्या आयेगी । जब यह तर्क भोथरा होगया तो कहा गया कि इस बार ज्येष्ठ पूर्णिमा जल्दी आ गई है और बर्फ साफ नहीं हो पायेगी। यह कुतर्क भी अलगाववादियों के अधूरे एजेंडे को पूरा करने के लिये ही दिया गया। जब श्रीनगर-जम्मू हाईवे की बर्फ ७ दिन में साफ हो सकती है, रोहतांग मार्ग पर जमी १५-१६ फीट की बर्फ की दीवार ६ दिन में साफ हो सकती है ,तो अमरनाथ के १३ कि.मी. मार्ग की बर्फ क्यों नहीं साफ हो सकती? राज्य का प्रशासन कह चुका था कि अगर बोर्ड कहे तो हम मार्ग साफ करा सकते हैं। इसके बावजूद अगर बोर्ड यात्रा को कम करने पर अडा, तो इसका मतलब स्पष्ट है कि उनका इरादा यात्रा कराने का नहीं, धीरे- धीरे उसको छोटा करते हुए उसे समाप्त करने का है। २०१२ में अब उन्होंनें इसे मात्र ३९ दिन का कर दिया है। बोर्ड का यह आदेश पूर्ण रूप से देश विरोधी, संविधान विरोधी, यात्रा विरोधी तो है ही, यह आदेश न्यायपालिका की अवमानना भी है।

इस निर्णय को देश के शिवभक्तों ने अपने लिये चुनौती माना। इस निर्णय का विरोध करने जब विश्व हिंदू परिषद के कार्यकारी अध्यक्ष डा. प्रवीण तोगडिया वहां पहुंचे तो अलगावादियों नें उनके पुतले जलाये । इसके तुरंत बाद प्रवीण भाई पर झूठा केस दर्ज कर दिया गया जैसे मानों राज्यपाल इसी के इंतजार में बैठे थे। अब स्पष्ट हो गया है कि यह सारा षडयंत्र अलगाववादियों को खुश करने के लिये ही केंद्र सरकार के इशारे पर रचा गया है। अब विरोधियों का मुंह बंद करने के लिये जगह -जगह कर्फ्यू लगाकर शिवभक्तों पर अत्याचार किये जा रहे हैं। उनके दुख में शामिल होने के लिये जा रहे नेताओं को भी गिरफ्तार किया जा रहा है। ऐसा लग रहा है कि २००८ दोहराया जा रहा है। अलगाववादी शक्तियां बाबा अमरनाथ के खिलाफ खडी हैं , तथाकथित धर्मनिरपेक्ष दल इनके साथ मिलकर षडयंत्र कर रहे हैं और समस्त देश की राष्ट्रीय शक्तियां बाबा के साथ खडी होकर इस चुनौती का जवाब देने के लिये तैय्यार हो रही हैं। शिवभक्तों नें तय कर लिया है कि यात्रा २ महीने की ही निकलेगी। यात्रा का मुहुर्रत ज्येष्ठ पूर्णिमा (४ जून ) का ही रहेगा और लाखों यात्री उस दिन यात्रा में शामिल होने के लिये पहुंचेंगे। इस बार भी यह चुनौती देश की राष्ट्रभक्त जनता को है। इसके बाद ही यह सिद्ध होगा कि अब देश में अलगाववादियों की चलेगी या देशभक्तों की। देश की जनता को यह चुनौती स्वीकार करनी चाहिये और बढचढकर इस आन्दोलन में भाग लेना चाहिये।