जेहादी आतंकवाद से ज्यादा खतरनाक बनता जा रहा मुस्लिम वोट बैंक का आतंक

भारत पिछले १३०० वर्षों से जेहादी आतंकवाद का सामना करता आया है। इसके कारण भारत में अब तक करोडो हिन्दुओं का नरसंहार हुआ है और करोडों का ही जबरन धर्मान्तरण हुआ है ।इसी आतंकवाद के कारण भारत का विभाजन भी हुआ है ।स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी लगातार खतरनाक होते जा रहे इस आतंकवाद के कारण ७०००० से अधिक भारतीयों को मौत के मूंह मे समाना पडा है और लगभग ५०००० महिलाएं विधवा बनी हैं ।कश्मीर से केरल तक और असम से गुजरात तक हर प्रांत में इन्होने अपनी पकड कई बार सिद्ध की है ।आज भारत ही नहीं विश्व के ४२ देशों इस्लामिक जेहादी आतंकवाद से त्रस्त हैं।परन्तु जिस भी राष्ट्र ने संकल्प के साथ इनका मुकाबला किया है, इनको धराशायी करने में सफलता भी पायी है ।भारत इस आतंकवाद से सबसे अधिक त्रस्त है इसके बावजूद इसको परास्त करने की संकल्प शक्ति को लगातार कमजोर किया जा रहा है, जिसके कारण न केवल इसका स्वरूप विकराल होता जा रहा है अपितु इसको समाप्त करने का दायित्व जिनके पास है वे ही इसके पोषक बने हुए हैं। यदि कोई व्यक्ति या समूह इस अपवित्र व राष्ट्रघाती गठबंधन के विरुद्ध आवाज उठाता है तो ये सब मिलकर उनको कुचलने की भरपूर कोशिश करते हैं। मुस्लिम वोट बैंक को समस्त सैक्युलर बिरादरी ने अपने निहित स्वार्थों की पूर्ती के लिये इतना अपरिहार्य मान लिया है कि ये सभी उससे भयभीत रहते है और उसको खुश करने के लिये कुछ भी करने के लिये तत्पर रहते हैं। उसको खुश करनेके लिये ये न केवल इनसेपीडित हिन्दू समाज को ही दोषी ठहराते है अपितु देश के सीमित संसाधनो को उन पर बेदर्दी से लुटाने का कोई मौका नही छोडते। यदि कोई भी इनके इस काम मे बाधा डालता है तो ये सभी मिलकर उनको इस कदर धमकाते और बदनाम करते है कि वह सहम कर चुप रहने के लिये मजबूर हो जाताहै|देश की न्यायपालिका से लेकर चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्थाएंभीइनके निशाने पर आती रहती है और सब प्रकार की मर्यादाओं की धज्जी इनकी खुशी के लिये उडाई जाती है।

पिछले दिनों कुछ राज्यो के चुनावो मे मुस्लिम वोटों को हथियाने के लिये जिस तरह का नंगा नाच किया गया, वह सम्पूर्ण देश को शर्मिंदा करने के लिये पर्याप्त था। इन चुनावो की पूर्व संध्या मे साम्प्रदायिक एवं लक्षित हिंसा अधिनियम जिस ढंग से लाया गया उससे यह संदेश स्पष्ट रूप से दिया गया कि “अगर तुम वोट देते हो तो तुम्हारे को दंगों की छूट रहेगी और दंगों के शिकार हिन्दू समाज को ही हम अपराधी घोषित करने कर देंगे।” इसके बाद जिस जल्दबाजी मे मुस्लिम आरक्षण का आदेश दिया गया वह तो देश की जडे हिलाने और भारत के एक और विभाजन की आधारशिला रखने की तैय्यारी का स्पष्ट संदेश था । इसके बाद तो उत्तर प्रदेश मानो तुष्टिकरण का खुला अखाडा बन गया था। मुस्लिम आरक्षण की सीमा बढाने की होड मे ऐसा लग रहा था मानो अब भारत मे हिन्दू के लिये न कोई नौकरी बचेगी और न कोई शिक्षा का अवसर। इसके बाद कोई बटला एन्काउन्टर पर प्रश्न चिंह लगाने लगा तो कोई इस घटना के बाद सोनिया जी की आंखों मे आंसू दिखाने लगा। मुस्लिम आतंकियों की मृत्यु पर आने वाले ये आंसू हिन्दुओं की हत्याओं पर क्यों सूख जाते हैं, यह किसी को समझ मे नही आता । जब चुनाव आयोग ने विहिप के निवेदन पर मुस्लिम आरक्षण पर अस्थायी रोक लगायी तो चुनाव आयोग को जिस तरह की चुनौतिया दी गई वह बहुत ही शर्मनाक था । इन दंगाइयो को देश के कानून मन्त्री नेतृत्व प्रदान कर रहे थे। १९४७ के भारत विभाजन की नींव उत्तर प्रदेश मे ही रखी गई थी। ऐसा लग रहा था कि मुस्लिम वोटो के लिये एक और विभाजन की नींव इसी प्रदेश मे फिर से रखने की पूरी तैय्यारी हो रही थी।

मुस्लिम आरक्षण के असंवैधानिक एवं अनैतिक आदेश को जिस प्रकार न्यायपालिका द्वारा ठुकराया गया, वह एक अवसर था इस देश के सैक्युलर नेताओ के आत्मनिरीक्षण का। परन्तु इस अवसर पर जिस प्रकार की टिप्पणियां इन नेताओ की तरफ से आयी वह काफी चिंता का विषय था। इसी प्रकार की चुनौतियां मा. सर्वोच्च न्यायालय को तब भी दी गई थी जब सरकारी अनुदान पर चलने वाले अलिगढ मुस्लिम वि.वि. को अल्पसंख्यक दर्जा देने के सरकारी आदेश को न्यायपालिका ने अवैध घोषित किया था । अब राष्ट्रपति चुनावो की पूर्व संध्या पर जिस प्रकार हिंदूवादी प्रधानमन्त्री को ठुकराने की आनावश्यक चर्चा चलाई गई, उससे यह ध्यान मे आता है कि मुस्लिम तुष्टिकरण के लिये ये लोग किसी भी अवसर को भुनाने मे कोई कसर नहीं रखना चाहते

मुस्लिम समाज को खुश करने के लिये खिलाफत आन्दोलन से शुरू हुआ मुस्लिमतुष्टीकरण का यह जलजला भारत के विभाजन के बाद भी शांत नहीं हुआ। अब इसकी भीषणता और भी भयावह रूप धारण करती जा रही है। अब ये देश के कई और टुकडे कराने के बाद भी शान्त होगा ऐसा नही लगता। इसको रोकने का दायित्व हिन्दू समाज को ही स्वीकार करना पडेगा ।