सॅक्युलरवादियों के मातम से प्रभावित हुए बिना सरकार अपने सन्कल्प को पूरा करे

इलाहाबाद उच्च न्यायालय का निर्णय आने के बाद भारत की सॅक्युलर बिरादरी में मातम छा गया। ३० सितम्बर के इस ऍतिहासिक निर्णय के सार्वजनिक होने से पहले वे शाम ४ बजे तक ताल ठोक कर कोर्ट के निर्णय को मानने के लिये ललकार रहे थे तथा न्यायपालिका के सम्मान में सब तरह के तर्क दे रहे थे। परन्तु जॅसे ही निर्णय सार्वजनिक हुआ, इन सब के चेहरे लटक गये। जो न्यायपालिका के सम्मान में तर्क दे रहे थे , अब वे न्यायपालिका को कोसने लगे।किसी ने कहा कि मुसलमानों के साथ अन्याय हुआ हॅ और उनमें मायूसी छा गइ हॅ तो किसी ने कहा कि अदालत नें तथ्यों पर नहीं आस्था पर ध्यान दिया हॅ। कोई इसे भारत के “बहुलतावादी” चेहरे पर दाग के रूप में देख रहा था, तो कोई इस निर्णय को भारत के भविष्य के लिये एक खतरे के रूप में देख रहा था। कुछ लोग तो इसे पन्चायती निर्णय बताने की हिमाकत भी कर रहे थे। इतिहास के नाम पर दुकानदारी करने वाले कुछ ‘स्वनामधन्य इतिहासकार’ अपने नमक के हक को अदा करते हुए, इस निर्णय को ऍतिहासिक तथ्यों की अवहेलना बता रहे थे। इस बिरादरी में आश्चर्यजनक रूप से कुछ ऍसे पूर्व न्यायाधीश भी थे जो मुस्लिम तुष्टीकरण के लिये पहले से ही ख्यातिप्राप्त हॅं और ऍसे अवसर का उपयोग कर हिन्दू समाज को कटघरे में खडा करने के लिये हमेशा तॅयार रहते हॅं। अधिकान्श चॅनल अपनी वार्ताओं में इन्हीं सब चीजों को प्रमुखता देते हुए, हिन्दू संगठनों को अपना पक्ष रखने का अवसर भी नहीं दे रहे थे तथा उनका ,विशेष तौर पर विहिप का जो इस लडाई को सन्तों के आदेश पर यहां तक लायी हॅ और जो मन्दिर निर्माण के लिय सन्कल्पबद्ध हॅ, बहिष्कार जॅसा कर रखा था। उस दिन चार चॅनल्स ने जबर्दस्त आग्रह के साथ मेरा समय ले रखा था परन्तु निर्णय सार्वजनिक होते ही एक को छोडकर बाकी सब ने बहानेबाजी करते हुए मुझे न आने के लिये कह दिया। इन में वे भी थे जो अपने आप को “न० एक” कहते हॅं। वे शायद ऍसे ही मामलों में नम्बर १ हॅं।

ऍक चॅनल के प्रतिनिधी के मुख से निकल गया कि ऍसा करने के लिये सरकार का निर्देश हॅ। इससे मीडिया की विश्वसनीयता पर तो प्रश्नचिन्ह लगता ही , सरकार की नीयत पर भी सवाल खडे हो जाते हॅं। केंद्र सरकार को अपना वह सन्कल्प याद रखना चाहिये जो उसने माननीय सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष १९९४ में किया था। मा० राष्ट्रपति ने १९९९३ में मा० सर्वोच्च न्यायालय को यह मामला सौंपा था और उनकी राय मांगी थी कि “क्या बाबरी ढांचे को मन्दिर के स्थान पर बनाया गया?” मा० न्यायालय द्वारा सरकार का उद्देश्य पूछने पर भारत के महान्यायवादी ने कहा था,”यह विषय स्पष्ट होने के बाद वे वार्ता के माध्यम से इस निर्णय को लागू करवायेंगे। अगर वार्ता से सम्भव न हो सका तो वे इस निर्णय को कानून द्वारा लागू करवायेंगे।” अब मा० उच्च न्यायालय के निर्णय के बाद यह असन्दिग्ध रूप से यह सिद्ध हो गया हॅ कि वह ढांचा मन्दिर को तोड कर ही बनाया गया था और उस ढांचे को मस्जिद भी नहीं कहा जा सकता क्योंकि उस का निर्माण इस्लामिक नियमों के अनुसार नहीं किया गया। यह निर्णय मा० सर्वोच्च न्यायालय के आदेशानुसार ही दिया गया हॅ। अब केन्द्र सरकार की बारी हॅ कि वे कोर्ट में दिये गये अपने सन्कल्प को पूरा करें । अब राजनीतिक बिसात बिछाने का समय नहीं ,अब उन्हें अपने संकल्प के अनुसार मन्दिर निर्माण के काम में आनी वाली हर बाधा को दूर कर मन्दिर निर्माण में सहयोग करना चाहिये। यदि सरकार इस दायित्व को पूरा नहीं करती हॅ तो यह न केवल न्यायालय की अवमानना होगी अपितु देश की जनता के साथ विश्वासघात भी होगा।

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