“ऑनर किलिंग”-मानवता के माथे पर कलंक

ऑनर किलिंग के नाम पर होने वाली हत्याऍ मानवता के माथे पर एक बदनुमा दाग हैं। हत्या किसी भी कारण से हो, निंदनीय होती है। ह्त्यारों को दंड मिलना ही चाहिये। उनका समर्थन करने वालों को सभ्य समाज का भाग नहीं माना जा सकता। सम्मान की रक्षा के नाम पर अगर कोई अपनों को ही मारता है तो यह और भी जघन्य पाप बन जाता है। यह कैसा सम्मान है जो उस परिवार की लडकी के अंतर्जातीय विवाह करने, सगोत्रीय विवाह करने, परपुरुष से बात करने या अकेले बाहर जाने से समाप्त हो जाता है? यह कैसे सम्मान की रक्षा है कि उस महिला को जन्म देने वाले माता पिता और उसके सम्मान की रक्षा का वचन देने वाले भाई ही उसे अपने हाथों से निर्ममतापूर्वक मौत के घाट उतार देते हैं? परन्तु जैसे ही इस प्रकार का कोई पाप सामने आता है तुरंत ही मीडिया का एक वर्ग कुछ स्वनामधन्य बुद्धिजीवियों को लेकर पहले हिंदू आस्थाओं पर आक्रमण करता है,”आस्था बनाम कानून” जैसी शब्दावली का गठन कर वे हिंदू आस्थाओं पर कोडे बरसाता है जैसे कि हिंदू आस्थाएं मानो बर्बरता की वाहक हैं और विश्व का सबसे वैज्ञानिक धर्म सबसे अधिक पौंगापंथी बन गया है। उसके बाद उनके आक्रमण का निशाना हरियाणा की खाप पंचायतें बनती हैं और जब इससे भी मन नहीं भरता तो वे सम्पूर्ण हरियाणवी समाज को कोसने लग जाते हैं। ऐसे में यह आवश्यक बन जाता है कि कुछ विषयों पर गम्भीर चर्चा अवश्य होनी चाहिये। ऑनर किलिंग कौन करता है, क्यों करता है, इसको कैसे रोका जा सकता है, इनमें खापों का क्या हाथ है,आदि विषयों पर विचार किये बिना इसकी जडों को नहीं समझा जा सकता।

ऑनर किलिंग का सबसे पहला वर्णन बाइबल में मिलता है जब जूडा ने अपनी पुत्रवधू को मारने का आदेश दिया था। १०७५ ईसापूर्व में असीरिया में तथा १७९० ईसापूर्व में बेबीलोनिया में इसका वर्णन मिलता है। इसका सदियों पुराना इतिहास है। परन्तु आज भी इस जघन्य पाप के उदाहरण विश्व में सब जगह दिखाई देते हैं। अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन आदि विकसित देशों मे इस प्रकार की घटनायें आज भी दिखाई दे जाती हैं। परन्तु मुस्लिम देशों में ये घटनायें सबसे अधिक होती हैं। किसी -किसी मुस्लिम देश में तो इसको कानूनी स्वीकृति मिली हुई है। जोर्डन, अफगानिस्तान में यह कानून सम्मत है। पाकिस्तान में इसके पक्ष में कानून तो नहीं है परंतु इसकी सामाजिक मान्यता इतनी प्रबल है कि कोई इसका विरोध करने का साहस नहीं कर सकता। पाकिस्तान में एक महिला को उसके भाईयों तथा पिता ने मार दिया क्योंकि उसने अपने शौहर से तलाक की अर्जी दाखिल की थी। पाकिस्तान की संसद में इस जघन्य कांड की निंदा करने की जगह उसके वकील को ही फांसी की मांग की गई। सऊदी अरब में एक लड्की को उसके अब्बा ने सिर्फ इसलिये मार दिया कि वह एक परपुरूष के साथ इंटरनैट पर चैटिंग कर रही थी। भारत में भी ऑनर किलिंग की जितनी घटनायें हैदराबाद, बिहार,उत्तर-प्रदेश आदि प्रदेशों के मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में हो जाती हैं , उतनी हरियाणा या उत्तर प्रदेश के हिंदू बहुल क्षेत्रों में नहीं होती हैं। हरियाणा को बदनाम किया गया परन्तु भागलपुर में एक साल में १० घटनायें ऑनर किलिंग की हो जाती हैं। हैदराबाद में तो ऍसी महिलाऑ के लिये आश्रय स्थल बनाया गया है जिनको उनके घरवालों ने अंग-भंग कर विकृत कर दिया है। ये सब घटनायें निंदनीय हैं परंतु इसका साम्प्रदायीकरण नहीं होना चाहिये। केवल हिंदू बहुल क्षेत्रों की कुछ घटनाओं की चर्चा करके ये लोग इसके लिये जिम्मेदार लोगों की हिम्मत बढा कर एक जघन्य पाप कर रहे हैं।

ऑनर किलिंग जैसी घटनाऍ इन समाजों के दोगलेपन को उजागर करती हैं। एक ओर तो वे महिलाओं को कमजोर समझते हैं और उनकी सुरक्षा की बात करते हैं। दूसरी ओर वे महिला को उस “अनैतिक कृत्य” के लिये दोषी मानते हैं जिसमे पुरूष भी बराबर का सहयोगी है। नैतिकता- अनैतिकता की इनकी अपनी परिभाषा है। ये महिलाऑ को परिवार की सम्पत्ति और “सम्मान” का प्रतीक मानते हैं। उनकी अपनी कोई भावना नहीं होती। उन्हें केवल शोभा की वस्तु माना जाता है और अगर उनके हिसाब से उनके कारण परिवार की शोभा पर कोई आंच आती है तो उनको जीने का कोई अधिकार नहीं होता। यह मध्ययुगीन वहशी और बर्बर चिंतन है जिसको किसी भी सभ्य समाज में स्वीकार नहीं किया जा सकता है।

इसके कारणों पर अवश्य ध्यान देना चाहिये। प्रकट रूप से इस मानसिकता के निम्न कारण दिखाई देते हैं-

१.मजहब,जाति, परिवार की मध्ययुगीन परम्पराओं की श्रेष्ठता का झूठा अभिमान तथा इनकी रक्षा करना ही परिवार के सम्मान की रक्षा करना माना जाता है।

२.महिलाऍ इस सम्मान की प्रतीक हैं।

३. इस सम्मान की रक्षा का दायित्व भी उनका ही है और अगर इस दायित्व के निर्वहन में कमी आती है तो इस अपराध की सजा निर्धारित करने का काम पुरूष समाज का है जिस को लागू करने में उस परिवार की अन्य महिलाऍ भी अपना योगदान देती हैं।

मध्ययुगीन परम्परा में जीने वाले समाज ही इस अभिशाप को ढो रहे हैं। जिन समाजों का विकास हो रहा है वे इन परम्पराऑ को छोडते जा रहे हैं। वे महिलाओं का वास्तविक सम्मान करने लगे हैं तथा उनको बराबरी का स्थान देने लगे हैं। अब उनके लिये महिलाएं पुरुष के मनोरंजन का साधन नहीं हैं। उनकी भावनाओं का सम्मान करना वे सीख रहे हैं । पश्चिम का समाज इस वहशीपन को छोड चुका है। परंतु इन बर्बर परम्पराऑ को अपनी आन समझने वाला मुस्लिम समाज अभी इनको ढोने में ही अपनी शान समझ रहा है और दुर्भाग्य से भारत का सैक्युलर जगत इनको शीशा दिखाने की जगह इनकी ओर किसी ्को उंगली भी नहीं उठाने देने में अपने पुरूषार्थ का उपयोग कर रहा है। इस कोशिश में ये न केवल मुस्लिम समाज का अहित कर रहे हैं अपितु मानवता के प्रति एक अक्षम्य अपराध भी कर रहे हैं। हिंदू समाज में अभी भी कुछ घटनाऍ हो रही हैं। अधिकांश घटनाओं के पीछे जातिगत श्रेष्ठता का अभिमान ही मुख्य कारण दिखाई देता है। अंतर्जातीय विवाह इन कांडों के मूल में दिखाई देते हैं। हिंदू समाज को जातिवाद पर विचार करना होगा। जातिगत श्रेष्ठता का अभिमान अब समाप्त करना ही होगा। हिंदू ने कभी जाति को जन्मना नहीं माना है। किन कारणों से यह जन्मना बन गई इस पर भी विचार करना होगा। परन्तु अपने प्रियतम व्यक्ति के शव को भी जलाने में संकोच नहीं करने वाला हिंदू क्यों अभी तक इस अभिशाप को ढो रहा है? विवाह और चुनाव के समय क्यों वह जाति के खोल में घुस जाता है? इस दुर्दशा के पीछे वे सैक्युलर राजनीतिक दल ही जिम्मेदार दिखाई देते हैं जो चुनाव जीतने के लिये समाज को बार-बार जातीय संघर्षों की आग को भडकाते रहते हैं। इस सबके बावजूद हिंदू को बदलना होगा अन्यथा वह कालबाह्य हो जायेगा क्योंकि परिवर्तन ही जीवन है और जडता मौत का प्रतीक है।

ऑनर किलिंग का व्यापक और विकृत स्वरूप देखने के बावजूद बार बार खापों का नाम सामने लाया जाता है। हरियाणा व उत्तर प्रदेश के कुछ क्षेत्रों में इन खापों का प्रभाव दिखाई देता है। इनका इतिहास राजा विक्रमादित्य के समय तक पहुंचता हुआ दिखाई देता है। पंचायती राज की संकल्पना को साकार करने के लिये ही उन्होंने खापों को प्रोत्साहन दिया था। ये न केवल अपने क्षेत्रों का विकास करती थीं अपितु सामाजिक विवादों को सुलझाने का काम भी करती थीं। छोटे मोटे विवाद आपस में ही सुलटाने के कारण आपसी भाई चारा भी बना रहता था और अदालतों के अंतहीन चक्कर काटने से ये लोग बचे रहते थे। स्वतंत्रता संग्राम में भी इनका जबर्दस्त योगदान रहा है। समाज में दहेज, नशाखोरी जैसी बुराइयों के खिलाफ इनके सफल आंदोलनों के इतिहास से लोग परिचित होने लगे हैं। जो बुराइयां कानून से नहीं दूर हो सकीं, उनको समाज कैसे दूर कर सकता है, यह खापों के इतिहास से समझा जा सकता है। जहां कानून की सीमा समाप्त हो जाती है वहां खापों की उपयोगिता प्रारम्भ होती है यह कई बार सिद्ध हो चुका है। ये सत्ता के विकेन्द्रियकरण के अप्रतिम उदाहरण हैं। आज जब कि पंचायतों के महत्व को स्थापित करने का प्रयास हो रहा है, खापों को दानव के रूप में दिखाना उचित नहीं है। क्या ओनर किलिंग के लिये खापों का एक भी आदेश जारी हुआ है? यदि नहीं तो क्यों इनके माथे पर इस पाप का ठीकरा फोडा जा रहा है? चर्चा में आसानी से बने रहने की चाह में कुछ खबरबाजों की इस कोशिश में क्या कुछ ऐसे राजनीतिज्ञ शामिल नहीं हो गये जो इन पर अपना अधिकार जमाना चाहते हैं? कारण कुछ भी हो, ये एक प्रभावी सामाजिक तंत्र को समाप्त करने के इस षडयंत्र में सहभागी होने का महापाप कर रहे हैं। यह निश्चित है कि खापों की व्यापकता को देखते हुए ये इनका कुछ नहीं बिगाड पायेंगे। इनमे सुधार की गुंजाइश है जो परस्पर चर्चा से लाये जा सकते हैं। इनका दानवीकरण करके ये लोग समाज का हित नहीं ऐसा अहित कर रहे हैं जिसकी भरपाई आसानी से नहीं हो सकेगी।

Honour Killings-A blot on humanity

Honour killings are a blot on humanity. Murder, of any kind, is always condemnable. Punishment must be meted out to all killers. Anyone, who supports murderers, cannot be a part of the civilized society. If this killing is done in the name of honour and it involves the killing of one’s own, then it becomes even more dastardly. What kind of false honour is this, which is decimated simply because the girl of the family gets into an inter-caste or same-gotra marriage or talks to another male or merely ventures out of her home? What is this honour that does not stop the mother and father who have given birth to that woman from going ahead and killing her? What is this honour that compels the brother who has vowed to save his sister’s honour at all costs, to so cruelly kill her with his own hands. But, the tragedy is that, whenever we hear about the sin of honour killing having been committed, some self-appointed intellectuals of the country aided by a section of the media, create a hue and cry about the hindu faith. They coin fancy terms like, ‘faith vs law’ and then beat the hindu faith to pulp as if Hinduism was the repository of all that is barbaric. They leave no stone unturned to prove that the most-scientific religion of the world is nothing but ‘’’pongapanthi’’(fundamentalist). Subsequently, the Khap Panchayats of Haryana become a soft target for them and then the whole society of Haryana becomes an object of ridicule for them. Therefore, it becomes imperative that such serious topics can be seriously dissected. Who commits honour killings, why does he do it and how can this be stopped, what is the role of the khaps in this, etc, one will have to discuss this in order to understand the roots of this problem.

The first instance of honour killing is found in the Bible, when Judas orders the killing of his daughter-in-law. It also finds mention of this in 1075 BC, in Assyria and again in 1790 BC in Babylonia. This has a centuries-old history, but we still find the occurrence of this dastardly event in many parts of the world. Even in developed countries like America, France, Britain have been witnessing such crimes in our times. But the top honour goes to the muslim countries where the occurrence of these killings is the highest. In some muslim countries like Jordan and Afghanistan, these killings even have legal sanction. Despite the fact that is not legally sanctified in Pakistan, the social acceptance of these killings is such that no one dare raise his voice against it. A woman was killed by her brothers and father in Pakistan simply because she had applied for a divorce. Instead of criticizing this barbaric act in the parliament, they demanded the hanging of the woman’s lawyer. A girl in Saudi Arabia was killed by her father simply because she was chatting with a man on the internet. Even in India, the number of incidents of honour-killing that takes place in the muslim-dominated areas of Hyderabad, UP, Bihar etc is more than the ones taking place in Hindu areas of UP and Haryana. Haryana has been maligned but in Bhagalpur alone, there are instances of some 10 honour killings. In Hyderabad, they even have a place where women who have been disfigured by their kith and kin can take refuge. These incidents need to be criticized but what is happening instead is that it is being given a communal tinge. By highlighting the cases that are taking place only in Hindu-majority areas, what these people are doing, is that they are actually encouraging the perpetrators of these heinous crime.

Honour killings have exposed the two-tongued nature of these people. On the one hand, they portray the women as weak and talk about their security. On the other hand, they think that the women are guilty of the ‘unethical conduct’ whereas the male also is an equal accomplice in the crime. They have their own definition on what is ethical and what is not. For them, women are a symbol of property and respect. Women, according to them, have no emotions of their own. They are looked upon only as objects of beauty. According to them, if their actions were to bring any disrepute to the family, then this object of beauty must pay for it through her life. Such mediaeval, barbaric practices can have no place in modern times.

On the face of it, there seems to be two main reasons for the existence of this malaise in the society:

1) The false belief in the greatness of the tradition of denomination, caste, family lineage. The protection of these false beliefs becomes equivalent to the protection of family’s honour.

2) Women are a symbol of this honour

3) The protection of this honour rests solely on the shoulders of the women-folk and if it is found that there has been a neglect in the carrying out of this responsibility, then the men take it upon themselves to take punitive action against the women, in which, they are also aided by the women of the house.

Societies that are carrying the burden of mediaeval traditions are cursed. The ones that are developing are leaving such age-old traditions behind and moving forward. They have started respecting women and accorded them equal status vis-à-vis men. For them, women are no longer, objects of entertainment for men. They have learned to respect the emotions of women. The society in the west has already left this barbarism behind. But, unfortunately the muslim society still finds pride in upholding this inhuman practice and the pseudo-secular in our country, somehow finds in it some sort of greatness in not even pointing an accusing finger at them. In this, not only are these people causing a loss to the muslim society, but also causing a grave loss to humanity as well. We do have instances of some honour killings taking place in the hindu society as well. In most of these cases, it is pride in caste superiority that seems to be the root cause. The basic cause in these cases is inter-caste marriages. The Hindu society will have to do some brainstorming on the caste issue. The pride in caste superiority will have to be stomped out. The Hindu society has never believed that caste is birth-based, the Hindus will have to think it over and over again why this became so. But why is the Hindu, who has always been courageous enough to give fire to the dead body (or cremate) of his beloved without thinking twice, fighting shy of consigning the scourge of casteism to ashes? Why does it get enmeshed in the web of caste during elections and marriages? Aren’t those secular parties here responsible for this turn of events, the ones that play caste politics by making and breaking caste combinations in the name of vote-banks. But, the Hindu must change himself or he will become ‘embedded in time’, so change it must, for ‘change is the way of life’ or else it is doomed.

Despite the fact that we have seen that ‘honour killings are wide-spread and distorted in nature, yet the name of khap panchayats are always trotted out. The khaps have their influence in some areas of UP and Haryana. Their history seems to go back to the days of King Vikramaditya. He had encouraged the khaps to establish the panchayati raj in the country. Not only were these khap panchayats a medium for development, but they would also work towards solving social problems. Petty problems could be solved in the khap panchayats and that would in turn save time and money which would have otherwise gone into the court cases. These panchayats also contributed in the freedom struggle. Evils, like dowry, drug-abuse have been successfully countered by these panchayats. The khap history tells us something, it is that if the evils could not be eliminated even by legislation, then how can they be eliminated by society? It has been seen several times that the khaps come into their act where the law finds it difficult to tread. This is a great example of decentralization. Today, when the panchayats are being extolled for their usefulness, it would be unwise to portray them as monsters. Have the khap panchayats ordered even one honour killing? If not, then why are they being held responsible for this sin? Is it that some politicians who want to dominate these khaps and also want to remain in the news, have used some news-mongerers to denigrate the khaps? Whatever be the reasons, they are certainly hand-in-glove in this conspiracy to finish off this social formation that has shown its efficacy from time to time. One thing is certain, given the spread over a very wide area of these panchayat formations, there is no way, they can cause any harm to the khaps. However, by vilifying the khaps, they are causing the kind of grave injury to society, that it will take some doing before it can be righted.

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