याकूब की फांसी से उपजे सवाल

आखिरकार दुर्दांत आतंकवादी याकूब की फांसी शांतिपूर्वक हो गयी। भारत की केंद्र सरकार और महाराष्ट्र की सरकार की सजगता के कारण कोई अप्रिय परिस्थिति सामने नहीं आयी। इसके लिएभारत का मुस्लिम समाज भी बधाई का पात्र है जिसने सब प्रकार की भड़काऊ परिस्थिति के बावजूद संयम रखा। पिछले कुछ दिनों से औवेसी ,अबू और आजमी की तिगड़ी मुस्लिम समाज कोभड़काकर भारत को दंगों की आग में झोंकना चाहते थे। भारत में आतंकियों के कुछ संरक्षक ,४० का गिरोह,इस आग को हवा देने के लिए अपने तर्कों का ईंधन झोंक रहे थे। २९-३० जुलाई की मध्य रात्रि को मा. सर्वोच्च न्यायालय और देश की नींद हरामकर ये भविष्य का संकेत दे रहे थे। भविष्य में वे पूरे देश की नींद हराम करना चाहते थे। अपने षड्यंत्रों की विफलता की बौखलाहट इनके चेहरों पर साफ देखी जा सकती है। देश की जनता ने अभी चैन की साँस ली है परन्तु इन लोगों की भड़काई चिंगारी दबी है , बुझी नहीं। यह कभी न कभी शोले का रूप धारण कर सकती है। जिन्ना के नव अवतार और सैक्युलरी गैंग इसी दिन का इंतजार कर रही है। इन्हें एक और मौका मिलेगा भारत की न्यायपालिका ,केंद्र सरकार और हिन्दू संगठनों की लानत -मलानत करने का। वे अपने आकाओं को खुश करने के लिए इस मौके को जल्दी लेन का भरपूर प्रयास कर रहे हैं। जिन्ना के नव संस्करणों का घृणात्मक प्रचार सबकी समझ में आता है इस्लामिक जगत का अलगाववाद इनके अस्तित्व का आधार है। वे अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं। परन्तु इस सैक्युलर गैंग के प्रेरणा स्त्रोत क्या हैं ?क्या केवल प्रगतिशील दिखाने के लिए वे यह उठा पटक कर रहे हैं ? रॉ के कुछ अधिकारी बार- बार कहते हैं कि भारत के कुछ पत्रकार ,वकील व कथित मानवाधिकारी आई एस आई की भुगतान सूची में हैं। इनको स्पष्ट करना होगा कि क्यों ये अभी तक कश्मीरी हिन्दुओं यापाकिस्तानी और बांग्लादेशी हिन्दुओं पर हो रहे अत्याचारों को रोकने के लिए दिन रात एक नहीं कर रहे।
याकूब के प्रसंग में एक अनोखी बात देखने को मिली। सामान्यत: मुस्लिम अलगाववादी की मांग को ये सैक्युलरी गैंग वैचारिक आधार प्रदान करता है। परन्तु इस बार तो जो तर्क औवेसी या आजमी दे रहे थे ,ये केवल उन्हीं तर्कों को भौंडे ढंग से दोहरा रहे थे। क्रिया की प्रतिक्रिया का तर्क जिस तरह से दिया जा रहा था उससे इनकी विचार शून्यता ही रही थी। यह कहा गया की मुंबई बम्ब ब्लास्ट मुंबई दंगों और बाबरी विध्वंस की प्रतिक्रिया में था। इसलिए वे पहले इन दोनों घटनाओं के मुजरिमों को फांसी दें ,बाद में याकूब को। वे यह क्यों भूल जाते हैं कि मुंबई दंगे मुस्लिम समाज ने ही शुरू किये थे। यह बात अलग है कि जब हिन्दू समाज सड़कों पर उतरा तो यह दंगा उलटा पड़ गया. क्या इन्होने यह तय कर रखा है कि इनके द्वारा भड़काए दंगों में हिन्दू को ही पिटना चाहिए ?
अगर दांव उल्टा पड़ा तो ये मुस्लिम समाज को पीड़ित कैसे कह सकते हैं? बाबरी विध्वंस ही सब दंगों का कारण है , यह कुतर्क अब नहीं चल सकता | उच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट कह दिया है की वहां पर उपस्थित राम मंदिर को बाबर नाम के विदेशी आक्रमणकारी ने तोडा था | अब बाबरी का विलाप करने वाले बाबर के ही अनुयायी हो सकते हैं,भारत के पुत्र नहीं | १९८५ से प्रारंभ हुआ कश्मीरी पंडितों का नरसंहार किसकी प्रतिक्रिया थी ? १९९२ से पहले भारत में १ लाख से अधिक दंगे किसकी प्रतिक्रिया थे ? १९४७ में डायरेक्ट एक्शन के नाम पर किया गया नरसंहार किसकी प्रतिक्रिया में थे ? इसी आधारपर अगर हिन्दू समाज प्रतिक्रिया करेगा तो गजनी ,गौरी ,बाबर औरंगजेब आदिके अत्याचारों व् आजादी के बाद के दंगों का हिसाब करने का क्या चित्र होगा ?
दूसरा तर्क दिया गया की मुस्लिम था इसलिए इसको फांसी हुई | आजाद भारत में जितने भी अपराधियों को फांसी हुई ,उनमे मुसलमानों का प्रतिशत १०% भी नहीं है | फांसी की सजा धर्म देखकर नहीं अपराध देखकर दी जाती है |शायद ये लोग चाहते हैं कि मुसलमान को फांसी नहीं होनी चाहिए चाहे वह कितना भी बड़ा अपराधी क्यों न हो | यह भी कहा गया किउसने आत्मसमर्पण किया था ,इसलिए वह नर्मीका हक़दार था | यह मामला २२ साल से विभिन्न अदालतों में चल रहा है | क्या इन लोगों का किसी भी न्यायालय में विश्वास नहीं है ? इस आधार पर तो कोई भी जघन्य अपराध करे और आत्मसमर्पण करे | वह छूट जायेगा | जिस पूर्व अधिकारी के लेख का हवाला दिया जा रहा है उनके सजाअथी कह रहे हैं कि उन्होंने ऐसाकोई लेख नहीं लिखा | यह जालसाजी कौन कर रहा है ? जेहादियों के पुराने संरक्षक दिग्विजय सिंह ने एक तर्क गढ़ा की जितनीतत्परता इस मामले में दिखाई गई ,वह किसी और मामले में नहीं दिखती | सेक्युलर गैंग ने वास्तव में ऐसी तत्परता किसी और मामले में नहीं दिखाई | रातके १२ बजे मुख्यन्यायाधीश के घर पर धरना देने का कोई और उदहारण नहीं मिलेगा | २००७ में टाडाअदालत के फैसले के बाद मा.सर्वोच्च न्यायालय , महामहिम राष्ट्रपति ,राज्यपाल आदि के पास जाने के जितने अवसर इस मामले में दिए गए , वे अद्वितीय हैं | रात के ३ बजे सर्वोच्च न्यायालय की बैंच सुनवाई करती है | क्या ऐसा और कोई उदहारण सम्पूर्ण विश्व में है ? इसके बावजूद अगर वे न्यायपालिका को कोसते हैं तो यह उनके गलत इरादे ही बताता है | इसका तो एक ही मतलब है कि २७० मासूमों के हत्यारे याकूब को बरी कर दिया जाता तो ही वे यह कहते की न्यायपालिका निष्पक्ष है | अबू आजमी, जो स्वयं मुंबई बम्ब ब्लास्ट का आरोपी था , को न्यायपालिका ने सबूतों के आधार पर बरी किया था | वे इस इतिहास पर चर्चा नहीं करना चाहते | अब वे एक नए तर्क के साथ सामने अ रहे है की असली मुजरिम तो छूट गया , याकूब निरपराध है | इसका मतलब है की वे अपराधी को बचा रहे हैं | अपराधी को बचाना अपराध है | वास्तव में अब अबू पर इस बयान के आधार पर नया मुक़दमा चलाना चाहिए |
कहाँ तक बखान करें इन जेहादियों और सेक्युलर गैंग के षड्यंत्रों का | ये तर्कातीत हैं | बेशर्मी की मोटी चादर ओढ़े हैं | अपने स्वार्थो के लिए ये किसी भी सीमा तक जा सकते हैं | वे जेहादी दानव की भूख मिटाना चाहते हैं | इस जेहादी दानव का पेट कभी नहीं भर सकता | इसकी भूख अंतहीन है | पहले यह काफिरों को खायेगा , फिर अपनों को भी नहीं छोड़ेगा | यह सबको ध्यान रखना चाहिए |