राहुल जी, वोट बॅंक के लिये इतने अन्धे मत बनो

भारत के “युवराज” ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की तुलना सिमी से करके यह सिद्ध कर दिया हॅ कि वे अभी देश को सम्हालने के लिये परिपक्व नहीं हॅं। वे न केवल देश के इतिहास से अनभिज्ञ हॅं अपितु अपने श्ब्दों के अर्थ भी नहीं समझते हॅं। यह तो निश्चित हॅ कि इन्होने यह वक्तव्य आगामी चुनावों में मुसलमानों के वोटों को आकर्षित करने के लिये दिया हॅ। वे संघ का विरोध करते तो कुछ नया नहीं था, परन्तु सिमी जॅसे देशद्रोही तथा प्रतिबन्धित संगठन की तुलना संघ जॅसे देशभक्त संगठन से करके इन्होंने दो पाप किये हॅं। देशभक्ति को लान्छित करना बहुत बडा पाप हॅ ही परन्तु देश के मुस्लिम समाज को सिमी भक्त मानकर वे उनको सिमी के साथ जोडने का जो महापाप कर रहे हॅं उसका दुष्परिणाम देश को लम्बे समय तक भोगना पडेगा। इनसे पहले की सॅक्युलर पीढी ने राममन्दिर के निर्माण का विरोध कर देश के मुस्लिम समाज को बाबर जॅसे बर्बर विदेशी हमलावर के साथ जोडा था जबकि पहले भारत का मुस्लिम समाज न तो बाबर को अपना महापुरुष मानता था ऑर न ही उसकी बाबरी ढांचे के प्रति कोई आस्था थी। मन्दिरनिर्माण के विरोध में रचे गये सॅक्युलरिस्ट षडयन्त्रों ने एक वर्ग को बाबर के साथ जुडने के लिये मजबूर कर दिया जिसका परिणाम देश अभी तक भुगत रहा हॅ। इनके वोटों के लिये राहुल-सोनिया ब्रिगेड और कितना गिरेंगे? इनकी राजनॅतिक हवस की देश कब तक कीमत चुकाता रहेगा? अयोध्या मामले में ये सुप्रीम कोर्ट की बात कर रहे हॅं परन्तु मुस्लिम वोटों के लिये ये मा० स० न्यायालय की अवहेलना कर अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय और जामिया विश्वविद्यालय को अल्पसन्ख्यक दर्जा देने का षडयन्त्र कर रहे हॅं। जबकि इन दोनों जगह चल रही आपत्तिजनक गतिविधियों से ये भली भांति परिचित होंगे। अयोध्या निर्णय से एक वर्ग की तथाकथित नाराजगी को दूर कर उनका वोट लेने के लिये इस तरह के कांग्रेसी हथकन्डों से देश परिचित हॅ।

जहां तक संघ का प्रश्न हॅ, विश्व के सबसे बडे सामाजिक संगठन को राहुल जॅसे अपरिपक्व राजनीतिज्ञ से किसी प्रमाणपत्र की जरूरत नहीं हॅ। भारत में संघ की देशभक्ती के उदाहरण दिये जाते हॅं। भारत के एक पूर्व प्रधानमन्त्री ने तो यह तक कहा था कि” अगर संघ के लोगों को विश्वास दिला दो कि यह काम देशहित में हॅ तो ये कुछ भी कर सकते हॅं।” १९४८ में अगर संघ के कार्येकर्ता बलिदान देकर श्रीनगर का हवाई अड्डा तॅयार न करते तो शायद आज का कश्मीर भी भारत के पास नहीं बचता। १९४७,१९६५,१९७१ तथा अन्य राष्ट्रीय सन्कटों के समय संघ की भूमिका के संबंध में बहुत कुछ लिखा जा चुका हॅ। अब कुछ और लिखना उचित नहीं हॅ, लिखें भी क्यों। हमॅं इनसे किसी प्रमाणपत्र की जरूरत नहीं हॅ। सत्ता के अन्धों को कुछ दिखाया नहीं जा सकता । परन्तू अब बहुत हो चुका। राहुल जी, कभी राजनीति से उठकर देश का भी सोचा करो।

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