रामजन्मभूमि के निर्णय के बाद अब क्या?

इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खन्डपीठ द्वारा श्रीरामजन्मभूमि के सम्बन्ध में दिया गया निर्णय एक ऍतिहासिक निर्णय हॅ। गत ६० वर्षों से सम्पूर्ण देश इस निर्णय की प्रतीक्षा कर रहा था। प्रातःस्मर्णीय रामचन्द्र दास जी महाराज,श्री देवकीनन्दन जी जॅसे महापुरुष जो इस विषय को प्रारम्भ करने वालों में से थे, इस निर्णय की प्रतीक्षा करते हुए बॅकुण्ठधाम चले गये। एक पीढी के लोग धीरे धीरे काल के गाल में समाते जा रहे थे परन्तु कानूनी दांव पेन्च के द्वारा देश की आस्था को कानून की किताबों में गिरवी रखने के षडयन्त्र रचे जा रहे थे। साक्ष्य एकत्रित करने में भी एक पीढी खप चुकी थी। ऍसा लग रहा था कि “हम न्यायालय की मानेंगे ” कहने वाले कानून का उपयोग इस मामले को लटकाने के लिये कर रहे हॅं,सुलझाने के लिये नहीं। ऍसा इन लोगों ने कई बार कहा भी था। ऍसी परिस्थिती में इस निर्णय की प्रतीक्षा बहुत बेसब्री के साथ हो रही थी।

अब इस निर्णय के महत्वपूर्ण पहलूओं से सब परिचित हो चुके हॅं। यह निर्णय किसी एक पक्ष की हार-जीत के रूप में नहीं देखा जा सकता। यह सम्पूर्ण देश की आस्था की विजय हॅ। भगवान राम केवल हिन्दुओं के नहीं,सभी भारतवासियों की आस्था के केन्द्र हॅं। मुस्लिम समाज भी राम को अपना महापुरुष अवश्य मानते हॅं। इसलिये भगवान राम सही अर्थों में राष्ट्रपुरूष हॅं। इस निर्णय के द्वारा राम का सम्मान ,पूरे देश का सम्मान हॅ। जिस राम को लोग कभी काल्पनिक तो कभी पॉराणिक कहकर हिन्दू आस्था का मजाक उडाने का दुस्साहस करते थे,अब इस निर्णय ने उनकी जन्मभूमि को स्वीकार कर उनकी एतिहासिकता पर मॉहर लगा कर आस्था के दुश्मनों के मुंह पर ताला जड दिया हॅ । अब कोई राम के देश में राम का मजाक उडाने का दुस्साहस करने का सोच भी नहीं सकेगा।न्यायिक निर्णय के बाद अब वहां राम लला की पूजा निर्बाध चलती रहेगी। दुनिया की कोई शक्ति अब वहां से राम मन्दिर को हटाने के बारे में विचार भी नहीं कर सकती।बाबरी ढांचा एक मस्जिद नहीं था , वह गॅरइस्लामिक ढंग से बनाया गया था। इसलिये इस पर मुस्लिम समाज का कोइ दावा नहीं बनता। इसका सीधा अर्थ हॅ कि अब वहां कोई मस्जिद नहीं बनाई जा सकती। जब मन्दिर हट नहीं सकता और मस्जिद बन नही सकती तो मुस्लिम समाज अब किस बात पर अडना चाहता हॅ?

उन्हें मा० न्यायालय का धन्यवाद देना चाहिये कि अब उनको अपनी गलतियों को सुधारने का मॉका मिला हॅ। उन्हें अब बाबर की यादों से मुक्त होना चाहिये। बाबर एक विदेशी हमलावर था। वह किसी भी भारतीय का आदर्श कॅसे हो सकता हॅ? मा० न्यायालय ने उन्हें विवादित जमीन का १/३ क्यों दिया ,इसका कारण अभी समझना बाकी हॅ,परन्तु यह साफ हॅ कि वह जगह उनके काम की नहीं। वे इस लडाई को आगे बढाकर क्या प्राप्त करना चाहते हॅं? अब तक बहुत रक्त बह चुका हॅ। ४८८ वर्षों से चल रही इस लडाई को आगे बढाकर वे कुछ प्राप्त नहीं कर सकेंगे। परन्तु समझदारी से काम कर वे बहुत कुछ हासिल कर सकते हॅं। अब वे ‘महाजिद’ न करें। आगे बढें और रामजन्मभूमि पर हिन्दू समाज के साथ मिलकर मन्दिर का निर्माण करें तथा हिन्दू समाज का सौहार्द हासिल करें जो उनके लिये अमूल्य सिद्ध होगा। यदि उन्हें मस्जिद चाहिये तो हम अयोध्या के बाहर कहीं भी बनवाकर दे सकते हॅं।

इस सन्दर्भ में कुछ वायदे याद दिलवाना आवश्यक हॅ। एक मुस्लिम नेता ने कहा था कि अगर सिद्ध हो जाता हॅ कि मन्दिर को तोडकर मस्जिद बनवाई गई तो वे स्वयम मन्दिर बनवायेंगे। अब उनके वायदे का क्या हुआ? भारत के एक पूर्व प्रधानमन्त्री ने कहा था कि अगर इस बात के सबूत मिलते हॅं कि मन्दिर को तोड कर मस्जिद बनाई गई थी तो वे खडे होकर मन्दिर बनवायेंगे। अब तो साफ हॅ कि जो बाबर के आदेश पर तोडा गया वह मन्दिर था और जो बनाया गया उसे मस्जिद भी नहीं कही जा सकता। अब देर किस बात की? अपने वायदे पूरे करो और अपने खोये सम्मान को फिर से हासिल करो।

कुछ मुस्लिम नेताओं ने आज कहा कि अब वे भारत में दूसरे दर्जे के नागरिक बन गये हॅं। क्या यही कानून का सम्मान हॅ? शाही इमाम और मुलायम सिंह के बयान क्या भडकाने वाले नहीं हॅं? सॅक्युलर मीडिया और प्रशासन क्या कर रहे हॅं?

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