अब तो ड्रैगन के खतरे को पहचानो(भाग-१)

भारत के विदेश सचिव श्री रंजन मथाई ने २२ नवम्बर को दिल्ली में चीन के खतरे से आगाह करते हुए कहा था कि चीन के साथ सम्बंधों को बनाना सबसे अधिक जटिल है। नैशनल डिफेंस कॉलेज ,दिल्ली में बोलते हुए उन्होंनें भारत के सामने चीन की चुनौतियों का खुलासा करते हुए स्पष्ट कहा कि भारत को अपने राष्ट्रीय हितों का ध्यान करते हुए चीन के चीन के साथ अपनी विदेश, सुरक्षा, वित्तीय तथा सामरिक नीतियां बनाना आज सबसे अधिक जटिल काम हो गया है। पाकिस्तान और चीन के बीच सैन्य तथा वित्तीय विषयों पर बढती हुई नजदीकियां भारत के लिये कई प्रकार की चुनौतियां प्रस्तुत कर रही हैं । नवम्बर में पकिस्तान और चीन का संयुक्त सैन्य अभ्यास, चीन की सहायता से पाकिस्तान में परमाणु हथियारों तथा मिसाइलों की नियुक्तियां, नये परमाणु संयत्रों की स्थापनाएं, भारत में काम करने वाले आतंकियों के साथ दोनों देशों के सम्बंध और नये- नये व्यापारिक समझौते भारत के लिये चिंता का विषय बन चुके हैं। दक्षिण चीन सागर में चीन द्वारा अपना एकाधिकार प्रस्तुत करना और भारत के वियतनाम जैसे देशों के साथ विशुद्ध व्यापारिक समझौतों पर भी आपत्ति करना उसकी मानसिकता के बारे में स्पष्ट संकेत करता है। संयुक्त राष्ट्र की संधि पर हस्ताक्षर करके भी मुकर जाना और इस क्षेत्र में काम करने वाले भारतीय जहाजों पर आक्रमण करना उसकी साम्राज्यवादी मानसिकता को स्पष्ट करता है जिसका सामना भारत को करना है।१६ सित.,२०११ को भारत के सुरक्षा सलाहकार ने भी चीन से खतरों के बारे में रिपोर्ट देते हुए चेतावनी दी थी कि भारतीय अर्थव्यस्था में कई वर्षों से चीन की चली आ रही घुसपैठ भारत की सुरक्षा और अर्थव्यवस्था के लिये खतरा बन चुकी है। २५ नवम्बर,२०११ को भारत के थलसेना अध्यक्ष ने भिवानी(हरियाणा )में चीन के खतरों को स्वीकार करते हुए बहुत साफ शब्दों में कहा था कि भारत की सेनाएं चीन की चुनौतियों का जवाब देने में सक्षम हैं। केवल उपरोक्त अधिकारी ही नहीं, भारत के कई राजनेता , विश्लेषक और चिंतक चीन के खतरों के बारे में बार- बार आगाह करते रहे हैं। परन्तु ऐसा लगता है कि भारत की केन्द्र सरकार की प्राथमिकता में देश की सुरक्षा नहीं अपितु उनके निहित स्वार्थ हैं जिनके लिये वे देश के हितों की बली देने में बिल्कुल भी संकोच नहीं करते।

भारत के लिये चीन का खतरा कोई नया नहीं है। जब से चीन में माओ के नेतृत्व में वामपंथी सरकार बनी , उसकी साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षाएं पूरे विश्व के लिये खतरा रहीं हैं।शायद यह साम्यवादियों का मूल चरित्र है। सत्ता सम्हालते ही १९५० पहले तिब्बत पर दावा किया गया, उसके दावे को भारत द्वारा आन्शिक रूप में स्वीकार करते ही चीन नें भारत के ९०००० कि. मी. क्षेत्र पर दावा करना शुरू कर दिया। पंचशील की खुमारी में डूबे तत्कालीन प्रधान्मंत्री की नींद तब खुली जब १९६२ में चीन नें भारत पर हमला कर दिया और भारत के कई क्षेत्रों पर कब्जा जमा कर बैठ गया। उस समय के युद्ध विराम के बावजूद उसने भारत के क्षेत्रों पर अपना दावा करना बंद नहीं किया। उसने नीति बदल ली। अब उसकी नीति है,” युद्ध लडे बिना युद्ध को जीतो।” पिछले ३० सालों में उसने एक भी गोली नहीं चलाई है। इसके बावजूद उसने भारत की सीमा में घुसपैठ कर कब्जा करना जारी रखा है। चीन तथा उसका मीकी नीति हैडिया हमेशा ही भारत के ९०००० कि.मी. क्षेत्र को अपना ही हिस्सा दिखाते रहे हैं।अरुणांचल प्रदेश व लद्दाख पर तो वह दावा ठोकता ही है अब उसने उत्तरान्चल में भी घुसना शुरू कर दिया है। जोशी मठ के होटी गढ में भी चीन की सेनाएं चुपचाप घुस गई। अब वह धीरे -बिना किसी शोर के आगे बढता जाता है। शोर मचने पर वह एक कदम पीछे हट जाता है जबकि वह चार कदम पहले ही आगे बढ चुका होता है । अब तो हद हो गई जब गुजरात में व्यापार करने आई एक चीनी क. ने भी चीन के नक्शे में भारत के कई क्षेत्रों को दिखाया और एक पत्रकार के ध्यान दिलाने पर चीनी राजदूत नें “शट अप” कह दिया। अब चीन नें घुसपैठ के साथ-साथ भारत को चारों ओर से घेरना शुरु कर दिया है। पाकिस्तान के साथ उसके सैन्य व आर्थिक सम्बंधों के बारे में सब लोग जानते हैं। परन्तु अब वह खतरनाक मुकाम पर आ चुका है। उसने पी. ओ. के. तो मानो चीन के हवाले कर दिया है। वहां पर १२००० से अधिक चीनी सैनिक उपस्थित हैं। चीन ने वहां पर ३००० कि.मी. से भी अधिक दूरी पर मार करने वाली मिसाइलें तैनात कर दी हैं। नयी सैनिक हवाई पट्टियां बन रही हैं, रडारों को लगाया जा चुका है। बहुत अधिक शोर मचने पर उसने ६ दिस., २००११ को एक श्वेत पत्र जारी किया है जिसमें उसने लिखा है कि वह ये सब अपनी आत्म रक्षा में कर रहा है। किसी ने उससे यह नहीं पूछा कि वह किससे खतरा महसूस कर रहा है। वह लिखता है कि वह कि पडोसी देशों के साथ मिलकर वह क्षेत्रीय विकास करना चाहता है परन्तु अस्लियत इसके विपरीत है। वह पडोसी देशों पर कब्जा भी कर रहा है और उनको आधार बना कर भारत को घेर भी रहा है। नेपाल में वह माओवादी नेताओं के माध्यम से भारत विरोधी वातावरण बनाने में सफल रहा है। वहां पर वह खुल कर भारतविरोधी गतिविधियों का संचालन करता है। म्यानमार पर ड्रैगन का शिकंजा पूरी तरह जकडा जा चुका है। वहां के मांडले व रंगून जैसे बडे शहर चीनियों से भरे पडे हैं। वहां पर भारत के आतंकियों को चीनी सैनिक अधिकारी खुलकर प्रशिक्षण देते हैं। थाईलैंड का हाथ वह मरोडता रहता है। दक्षिण चीन समुद्र में वह अपनी दादागिरी दिखाता रहता है। १९८२ की अंतरराष्ट्रीय संधि पर हस्ताक्षर करने के बावजूद वह उसपर अपना एकाधिकार जमाता है। जगह-जगह उसने सैन्य अड्डे बना चुका है। परन्तु किसी अन्य को वह अपनी सीमा में भी व्यवसायिक गतिविधियां नहीं करने देता। वह उसको अपनी सम्प्रभुता में दखल की धमकी देकर चुप बैठने के लिये मजबूर कर देता है। दक्षिण चीन क्षेत्र में पोलीमैटेलिक सल्फाइड जैसे महत्वपूर्ण खनिज हैं वह उन पर तो एकाधिकार करना ही चाहता है, उस क्षेत्र को घेरकर वह भारत को भी धमका कर रखना चाहता है। कोको , हमटोंटा जैसे द्वीपों पर वह अड्डॅ बना चुका है। लंका में उसकी उपस्थिती से भारत की केन्द्र सरकार को छोडकर सभी परिचित हैं। भारत – वियतनाम के शांतिपूर्ण व्यापारिक समझौते को वह अपने आन्तरिक क्षेत्र में दखल कहकर जिस तरह भारत को धमका रहा है ,बहुत अधिक आश्चर्जनक है। कुल मिलाकर ऐसा लगता है कि सम्पूर्ण दक्षिण एशिया क्षेत्र पर कब्जा करना चाहता है। भारत जैसा कोई भी देश उसके कब्जे से बाहर रहे, यह उसको मंजूर नहीं है।

भारत के आतंकी संगठनो का संचालनः चीन नें भारत सरकार को नियंत्रित और आतंकित करने के लिये भारत के आतंकी संगठ्नों को न केवल संगठित करना शुरू कर दिया है अपितु वह उनको प्रशिक्षित करने का काम भी कर रहा है। आइ.एस.आइ. इस कार्य में उसकी पुरानी सहयोगी है। NSCN, National Liberation Front of Bodoland, UNLF(manipur),PLA,PRA व माओवादियों के साथ चीन व पाक के सम्बंध जगजाहिर हैं। ये दोनों देश न केवल इनको आर्थिक व सैन्य प्रशिक्षण में सहायता करते हैं ये इनको हथियार भी प्रदान करते हैं। जेहादी संगठन भी इस नापक गठबंधन के हिस्सा हैं। म्यानमार में चल रहे आतंकी प्रशिक्षण केन्द्र चीन के सैन्य अधिकारी चलाते हैं। नागालैन्ड के आतंकी संगठन चीन से ही हथियार लेते हैं। चीन की सबसे बडी हथियार बनाने वाली क. नोरिन्को के अधिकारी इन संगठनों के साथ भेंट करते रहते हैं। पहले चीन यह काम छुप कर करता था , अब वह खुलकर करता है। चर्च द्वारा नियंत्रित आतंकी संगठन व माओवादी इस नापाक गठबंधन में पहले से शामिल थे। ये सब मिलकर भारत की आन्तरिक सुरक्षा के लिये अभूतपूर्व खतरा निर्माण कर चुके हैं।

भारतीय अर्थव्यवस्था पर चीन का नियंत्रणः चीन कई वर्षों से भारतीय अर्थव्यवस्था में घुसपैठ कर रहा है। पहले वह सस्ते व घटिया माल भारत में धकेलता था। जबसे चीन नें साम्यवादी मॉडल छोडा है, उसने एक आर्थिक महाशक्ति बनने का संकल्प किया है। जनसंख्या जैसी कमियों को उसने अपनी ताकत रूप में प्रयोग किया है। सस्ती मजदूरी, सब्सिडी,व अन्य सरकारी प्राथमिकताओं के आधार पर न केवल वहां के उद्योग बढ रहे हैं अपितु विश्व के कई उद्योगपति वहां जाकर अपनी ईकाइयां स्थापित कर रहे हैं। इन उत्पादों को खपाने के लिये चीन का अपना विशाल बाजार भी कम पडता है। इस काम के लिये उसको भारत का विशाल परन्तु अनियंत्रित बाजार उपलब्ध हो गया है। अब वह खुलकर भारत के बाजार में अपना माल फेंक रहा है। कई संवेदशील क्षेत्रों में चीनी ड्रैगन की पैठ भारतीय अर्थव्यवस्था के लिये ही नहीं भारत की सुरक्षा के लिये भी खतरा बन चुकी है। भ्रष्टाचार में लिप्त नेता और नौकरशाह अपनी जेबें भरने में लगे हैं, उनको देश की चिन्ता नहीं है। भारत के औद्योगिक उत्पादन का२६% चीन के आयात पर निर्भर करता है। आगामी ५ सालों में यह निर्भरता ७५% हो सकती है। कई क्षेत्रों में चीन का यह कब्जा भारत की सुरक्षा के लिये भी खतरा बन चुका है।

उर्जा उत्पादन के क्षेत्र की आगामी ११वीं व १२वीं योजना में बिजली संयंत्रों के लिये टर्बाइनों का १/३ हिस्सा चीन से आयात होगा। इनमें से कई परियोजनाएं संवेदशील क्षेत्रों में लगने वाली हैं, जहां किसी भी विदेशी का पहुंचना भारत की सुरक्षा के लिये उचित नहीं होगा। प्रत्यक्ष बिजली के उपकरणों के क्षेत्र में चीन भारतीय उद्योग के लिये खतरा बन चुका है। सी.एफ.एल. में उपयोग होने वाला का ६२% केवल चीन से आता है। सूचना-तकनीकि और दूरसंचार के क्षेत्र में भारत ५०% उपकरण आयात करता है जिसका ६२% केवल चीन से आता है। कुछ लोगों का अनुमान है कि यह अब ८०% तक पहुंच गया है। क्या इससे भारत की सुरक्षा को खतरा नहीं बढ गया है? इससे साइबर जासूसी की सम्भावना बढ जाती है, विशेषकर तब जब चीन का रिकार्ड इस मामले में पहले से ही बहुत खराब है।चीन कभी भी किसी भी विभाग की सूचनाएं प्राप्त कर सकता है और किसी भी विभाग की वेबसाइट पर गलत सूचनाएं डाल सकता है।

फार्मा के क्षेत्र में चीन पर भारत की निर्भरता बढती जा रही है। २५०० करोड रु. सालाना की दवा वहां से आयात की जा रही है। भारत साइकिल उद्योग आज पंगू बन चुका है। अकेले लुधियाना में समस्त पुर्जे चीन से आयात हो रहे हैं। भारत का खिलौना उद्योग,सैनिटरी उद्योग, बिजली उपकरण उद्योग पर चीन पहले से ही कब्जा कर चुका है। केन्द्र सरकार सो रही है। चीन भारत से ४०% सस्ता उत्पादन करता है। भारतीय उद्योग चीन का मुकाबला नहीं कर पा रहे हैं।

अब केन्द्र सरकार नें चीनी मुद्रा युआन में विदेशी कर्ज का निर्णय ले लिया है। इसके बाद आयात की बाढ आने वाली है। आयातक चीन के बैंकों से युआन में कर्ज लेंगे। चीन के कई बैंक अपनी शाखाएं भारत में खोल चुके हैं। ऐसा लगता है कि वित्त मंत्रालय का विदेश और सुरक्षा मंत्रालय से कोई ताल मेल नहीं है। चीन इसका फायदा ले रहा है और भारत के सामने ऐसा संकट उपस्थित करेगा जो कभी अन्ग्रेजों नें भारत पर राज करके भी नहीं किया था। चीनी ड्रैगन पर सवार भारत की अर्थव्यवस्था डूब सकती है। विकीलीक्स नें चीन के उपप्रधानमंत्री की इस सम्बंध में स्वीकारोक्ति प्रकाशित की है। (क्रमशः)

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