अब तो ड्रैगन के खतरे को पहचानो(भाग-२)

तिब्बत पर चीन के कब्जा करने के कारणः तिब्बत पर चीन के कब्जे का इतिहास और उसके कारण पर चर्चा करना चीन के मूल चरित्र को समझने के लिये बहुत आवश्यक है। वास्तव में तिब्बत कभी चीन का हिस्सा नहीं रहा। तिब्बत एक स्वतंत्र एवं स्वायत्त देश रहा है। ७वीं शताब्दी में चीन में तिब्बत के राजदूत को भेजने के उदाहरण इतिहास में मिलते हैं। तिब्बत का साम्राज्य मंगोलिया तक रहा है। तिब्बत को” धरती की छत” कहा जाता है। इसलिये एशिया पर कब्जा करने के लिये उसकी भौगोलिक स्थिती महत्वपूर्ण है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए चीन की निगाहें तिब्बत पर रहीं हैं। यह कारण तो सब जानते ही हैं। परन्तु एक अन्य कारण ध्यान में आने पर सारी दुनिया चकित रह गयी है। तिब्बत को विश्व की जल सम्पदा का सबसे बडा स्त्रोत कहा जाता है। चीन इस जल सम्पदा का एक बहुत प्रभावशाली शस्त्र के रूप में उपयोग कर सकता है, यह किसी ने भी विचार नहीं किया होगा। तिब्बत से सतलुज, सिन्ध,ब्रह्मपुत्र,अरुणा,मैकांग, यांगजी, नूजियांग,मित्सोन आदि नदियों उदगम है। ये सब नदियां भारत, बंगला देश, म्यांनमार,थाईलैंड,वियतनाम जैसे देशों से न केवल गुजरती हैं, ये उनकी जीवन रेखा भी हैं। चीन इन नदियों पर बांध बनाकर इन सब देशों पर नियन्त्रण करना चाहता है। वह इन नदियों के प्रवाह को रोककर सूखे की स्थिती बना सकता है और पानी अधिक होने पर इन बांधों से पानी छोड कर वहां पर बाढ की स्थिति भी ला सकता है। बाढ के हथियार का उपयोग वह भारत में सतलुज में बाढ लाकर कर ही चुका है। वह बाढ प्रकृतिप्रदत्त नहीं, चीनप्रदत्त थी , यह तथ्य जब दुनिया के सामने आया वह स्तम्भित रह गई। मैकांग व यांगजी पर वह कई बांध बना चुका है जिसके परिणाम स्वरूप वियतनाम, थाईलैंड व म्यांनमार में सूखे की स्थिति निर्माण हो चुकी है। वहां जलस्तर नीचे जा चुका है। यह काम वह भारत के साथ भी कर रहा है। अरुणांचल व आसाम की जीवन रेखा ब्रह्मपुत्र नदी पर बांध बनाकर वह भारत के साथ भी यही करना चाहता है। वह इस नदी पर कई बांध बना चुका है। भारत के आपत्ति करने उसने कहा है कि वह इन बांधों पर जल-संग्रहण नहीं करेगा और भारत सरकार इस आश्वासन पर खुश हो गई। यह कितना हास्यास्पद है। इस नदी पर दो तालाब बन चुके हैं। चीन कहता है कि ये भुस्खलन के कारण बने हैं। इस नदी पर ४ सुरंगें भी बन चुकी हैं। ८००० मेगावाट बिजली के उत्पादन की परियोजना स्थापित हो चुकी है। इसकी सुरक्षा के लिये सेनाओं की तैनाती हो चुकी है। नासा के द्वारा उपलब्ध चित्रों से यह स्पष्ट होता है कि ये तालाब मानव निर्मित हैं। अब पम्पिंग के द्वारा इसका जल चीन के उत्तरीक्षेत्र में भेजा जायेगा। सिंधु और सतलुज पर भी पानी को नियंत्रित करने की योजनाएं बन रही हैं। २०१५ तक ये परियोजनाएं पूरी हो जायेगीं। इनके पूरा होने के बाद भारत को केवल २०% पानी मिलेगा। इसका क्या परिणाम होगा, इसका अनुमान सहजता के साथ लगाया जा सकता है। चीन कहता है कि इनका पानी नहीं रोका जायेगा। क्या चीन के आश्वासन पर भरोसा किया जा सकता है? क्या चीन नें इन परियोजनाओं की जानकारी दी थी? जब तक इनकी सैटेलाइट इमैजिज नहीं मिली, हम भी अनजान थे। ये बांध अणु बम से भी ज्यादा खतरनाक हथियार के रूप में इस्तेमाल किये जायेंगे। भारत अभी भी इस खतरे से परिचित नहीं है। अब भारत को अपनी कुम्भकर्णी नींद से जागना चाहिये।

क्या भारत को चीन से ये खतरे अनायास उपस्थित हो गये? क्या भारत में कोई भी ऐसा नहीं था जो चीन की नीयत को समझने की क्षमता रखता हो? क्या वास्तव में चीन हम पर अनायास ही आक्रामक हो गया? इन यक्ष प्रश्नों का यदि हम उत्तर ढूंढते हैं तो हमें आश्चर्य होगा कि ऐसा नहीं था। भारत के दो महापुरुषों ने बार-बार नेहरू जी को चीन के खतरों के बारे में चेताया था। नेहरू जी ने न केवल इन चेतावनियों की अपराधिक उपेक्षा की अपितु इन महापुरूषों का उपहास भी उडाया। ये महापुरुष थे, सरदार वल्लभभाई पटेल और रा. स्व. सं. के द्वितीय सरसंघचालक श्री माधवराव सदाशिवराव गोलवरकर। सरदार वल्लभभाई पटेल ने तो नेहरू जी को ७ नव.,१९५० को एक विस्तृत पत्र भी लिखा जिसमें उन्होंनें न केवल चीन के खतरों के सम्बंध में चेतावनी दी थी अपितु उसका सामना करने का तरीका भी बताया था। इस पत्र के कुछ महत्वपूर्ण बिंदुओं की चर्चा आज के समय में बहुत सान्दर्भित रहेगी। उसके कुछ महत्वपूर्ण बिंदू निम्नलिखित हैंः

१.तिब्बत के लोगों ने हम पर विश्वास किया और हम उनके विश्वास पर खरे नहीं उतरे।

२.चीन नें हमसे बातचीत के समय का उपयोग तिब्बत में सैन्य अभियान की तैयारी में लगाया।

३.हम चीन को अपना मित्र समझते हैं, परन्तु वह हमको मित्र नहीं समझता। चीन की वामपंथी नीति है,”जो हमारे साथ नहीं है,वह हमारा दुश्मन है।”

४.परिस्थितियां बता रही हैं कि तिब्बत पर चीन का कब्जा होगा और चीन हमारे सिर पर खडा हो जायेगा। चीन्में हम एक सम्भावित दुश्मन को देख रहे हैं।

५. चीन की महत्वाकांक्षा न केवल हिमालय के पठारों पर कब्जे की हैअपितु असम पर भी उसकी निगाहें हैं। बर्मा उसके निशाने पर है।

इन सब बिंदुओं पर खतरा होने के कारण, इन पर गम्भीरता के साथ विचार करना चाहिये। सरदार पटेल नें इस पत्र में नेहरू जी को कुछ सुझाव भी दिये। वे निम्न प्रकार हैंः

१.विवादित बताये जा रहे स्थानों पर सेना की नियुक्ति करनी चाहिये। नये खतरों को ध्यान में रखकर अपनी सैन्य क्षमता का आकलन करना चाहिये। इसके बाद दीर्घकालिक योजना बना कर सैन्य आवश्यक्ताओं की पूर्ति करनी चाहिये। विशेषकर उत्तर,पश्चिम,पूर्व व पूर्वोत्तर से खतरों का ध्यान करना चाहिये।

२.संयुक्त राष्ट्र संघ में चीन की स्थिति मजबूत नहीं होने देनी चाहिये क्योंकि जिस तरह वह हमें धमका रहा है और तिब्बत पर कब्जा कर रहा है, स्थिति खतरनाक होती जा रही है।

३. सीमाओं की मजबूती के लिये प्रशासनिक और राजनीतिक कदम उठाने चाहियें। उत्तर-प्रदेश,बिहार,बंगाल,आसाम के सीमांत क्षेत्रों की आन्तरिक सुरक्षा पर विचर करना चाहिये।.. इन क्षेत्रों में संचार,मार्ग,रेल,हवाई मार्ग आदि का सुधार अविलम्ब होना चाहिये।

४.मैक्मोहन रेखा के सम्बंध में अपनी नीति स्पष्ट होनी चाहिये। ..तिब्बत के साथ अपने व्यापारिक मार्गों की सुरक्षा पर ध्यान देना चाहिये।..बर्मा पर ध्यान देकर चीन पर रोक लगाई जा सकती है।

इस पत्र के केवल उपरोक्त भागों पर ही ध्यान देने से समझ में आता है कि सरदार पटेल कितने दूरदर्शी थे। आने वाले घटनाक्रम का कितना सूक्ष्म आकलन किया गया था। नेहरू जी ने उनकी चेतावनी की उपेक्षा की। उसका परिणाम देश को भुगतना पड रहा है। ऐसा लगता है कि अन्य समस्याओं की तरह चीन और तिब्बत की समस्याएं भी नेहरू जी की ही देन है। अब भी दुर्भाग्य से उनके ही वंशज देश के कर्णधार हैं। उनकी तरह ही ये भी देश की समस्याओं से अनजान हैं और देश को समस्याओं की भंवर में फंसाते जा रहे हैं। इनको कुम्भकर्णी नींद से जगाने का काम समाज को ही करना होगा। चीन से मुकाबले के लिये परिस्थितियां अनुकूल बन रहीं हैं। इनका लाभ लिया जा सकता हैः

१. चीन के कुल उत्पाद का १५% भवन निर्माण से सम्बंधित है। दुनिया का आधा सीमेंट व स्टील चीन में खप रहा है। आज विश्व का सबसे महंगा सम्पदा बाजर चीन का है। जनता ने महंगे दरों पर बैन्क कर्ज लिये हैं परन्तु अब इसके दाम गिर रहे हैं। यदि यह बाजार डूबा तो चीन भी डूबेगा। अमेरिका का अनुभव चीन में दोहराया जा सकता है। चीन इस समस्या से चिन्तित है। इस अवसर का उपयोग कर चीन पर दबाव बढाया जा सकता है।

२.चीन की आर्थिक स्थिति उसके प्रतिकूल बनने की सम्भावना है। १०० करोड डालर से अधिक के अमेरिकी ऋण पर आधारित भवन उद्योग बैठने वाला है। कम मजदूरी की अनुकूलता खत्म होने वाली है। इससे उसके निर्यात में कमी आ सकती है। इस स्थिति लाभ भारत उठा सकता है।

३.चीन में आन्तरिक असंतोष बढ रहा है। मंगोलिया, जिन्जियांग आदि में हिंसा बढ रही है। तिब्बत की नई पीढी दलाइ लामाअ से ज्यादा अशांत और उग्र हो रही है। उनको अंतर्राष्ट्रीय समर्थन भी बढ रहा है। इसका लाभ लेकर तिब्बत के प्रति समर्थन को दृढ किया जा सकता है। भारत ने अभी इस सम्बंध में दृढता दिखाई भी है जिसके शुभ परिणाम दिखाई दे रहे हैं।

४.अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां चीन के प्रतिकूल हो रही हैं। भारत ने अभी अंत. निगरानी समिति के चुनाव में चीन को पटखनी दी है। एक अन्य चुनाव में वह चीन को हरा चुका है। सम्पूर्ण विश्व चीन को भावी खतरे के रूप में देख रहा है।

५.अमेरिका चीन के खतरे को महसूस कर हिंद महासागर में अपनी उपस्थिती बढा रहा है। वह पाकिस्तान से भी परेशान है और चीन-पाक मैत्री को अपने लिय भी उचित नहीं मान रहा है। वह चीन को नियंत्रित करने के लिये भारत की ओर दोस्ती का हाथ बढा रहा है।

६.भारत को Go East की नीति का मजबूती के साथ अनुसरण करना चाहिये। ये सभी देश चीन की जकड से बाहर निकलना चाहते हैं। भारत से अच्छे सम्बंध उन्हें यह मौका दे सकते हैं। वियतनाम,ब्रुनेई, फिलिपींस, म्यानमार, नेपाल जैसे देशों के साथ सम्बंधों पर हमें पुनर्विचार करना चाहिये।

७. अपनी सैन्य क्षमता का नये खतरों के हिसाब से पुनरावलोकन बहुत आवश्यक है। सेना को हर क्षेत्र में चीन के साथ मुकाबले के लिये सन्नद्ध करना होगा।

आज आवश्यक्ता है कि चीन के खतरे को् महसूस कर उससे मुकाबले के लिये सभी क्षेत्रों का विचार कर एक व्यापक एवं समग्र नीति अपनानी होगी। चीन का मुकाबला तदर्थ आधार पर नहीं किया जा सकता। आज परिस्थितियां भारत के अनुकूल है और भारत की क्षमता चीन को परास्त करने की है।

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