धर्म पर आधारित आरक्षण-युवराज के राज्याभिषेक की जल्दी में देश को और कितना बांटोगे?

वर्तमान केन्द्र सरकार नें पहले साम्प्रदायिक एवं लक्षित हिंसा अधिनियम के माध्यम से साम्प्रदायिक हिंसा को बढावा दिया। उसके बाद प्रस्तावित लोकपाल बिल में अल्पसंख्यकों के लिये ५०% आरक्षण का असंवैधानिक एवं देशघाती प्रावधान करके पूरे देश को स्तब्ध कर दिया। अब सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में अन्य पिछडे वर्गों के लिये उपलब्ध २७% आरक्षण में से अल्पसंख्यकों के लिये ४.५% आरक्षण करके केंद्र सरकार ने भारत में एक और विभाजन की नींव डाल दी है। देश की न्यायपालिका कई मामलों में यह निर्णय दे चुकी है कि धर्म पर आधारित आरक्षण असंवैधानिक है । अब यह मामला सर्वोच्च न्यायालय की संवैधानिक पीठ के सामने विचाराधीन है। सरकार को ऐसी क्या जल्दी थी कि सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय की प्रतीक्षा किये बिना ही उसने यह संविधान विरोधी और देश विरोधी कदम उठा लिया? आज पूरे देश के सामने इस प्रश्न का उत्तर स्पष्ट हो गया है। पांच राज्यों में चुनाव हो रहे हैं और उत्तर-प्रदेश के चुनावों में” देश के युवराज” ने अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया है। अगर वे वहां सफल नहीं होते हैं तो उनके राजतिलक पर प्रश्नचिंह लग सकते हैं। वहां के चुनावों में विजय प्राप्त करने के लिये मुस्लिम वोट महत्वपूर्ण हैं।” उनको लुभाने के लिये कुछ भी करेगा” की तर्ज पर चुनावों की अधिसूचना होने से पूर्व ही उन्होंने इस गैरकानूनी कदम को उठाया है। उन्हें यह भी स्पष्ट है कि यह निर्णय न्यायपालिका के समक्ष असंवैधानिक सिद्ध हो जायेगा लेकिन ये चुनाव पूरे हो जायेंगे और उनका उल्लू सीधा हो जायेगा। परन्तु तब तक वे देश का बहुत नुकसान कर चुके होंगे। अपने स्वार्थों की पूर्ती के लिये कान्ग्रेस के देशघाती कदमों की सूची में एक और काला अध्याय जुड गया है। २२ दिस. की रात को भारत का इतिहास एक काली रात के रूप में याद करेगा जब ये कार्यकारी आदेश जारी किया गया।

इस आदेश के माध्यम से कान्ग्रेस ने न केवल पिछडी जाति की रोजी- रोटी को छीना है अपितु शिक्षण संस्थानों में उनके प्रवेश के अवसरों को सीमित किया है। मंडल कमीशन द्वारा चिंहित की गयी पिछडी मुस्लिम जातियों के आधार पर उन्हें लगभग ३% आरक्षण पहले ही मिल रहा था। अब यह ४.५% नहीं कुल मिलाकर ७.५% से भी ज्यादा हो जायेगा जिसके कारण पिछडे वर्ग के युवकों को नौकरियों के लिये दर-दर की ठोकरें खानी पडेंगी। भारत की सभी संस्थाओं में पिछडे वर्ग को मिलने वाला आरक्षण मुस्लिम संस्थाओं में नहीं मिलता तो पिछडे वर्ग के लिये आरक्षित नौकरियों को उनसे छीनकर मुसलमानों को कैसे दिया जा सकता है? यह भेदभाव पिछडे वर्ग गहरा असंतोष निर्माण करेगा जिसके परिणाम स्वरूप उन्हें सडकों पर उतरने के लिये मजबूर होना पडेगा।

धर्म पर आधारित आरक्षण के सम्बंध में उन महापुरुषों के विचार जानना बहुत आवश्यक हैं जिनके नामों को कान्ग्रेस के नेता बार-बार जपते हैं। जब अन्ग्रेजों नें “कम्युनल अवार्ड” की घोषणा की थी तब महात्मा गांधी ने उसे देश की एकता के लिये खतरनाक बताते हुए इसका विरोध किया था। भारत की संविधान सभा में जब धर्म पर आधारित आरक्षण का विषय विचार के लिये आया था तब जवाहर लाल नेहरू नें यह कहते हुए इसका विरोध किया था कि यह देश को एक महा विनाश की ओर ले जायेगा। उनका स्पष्ट मत था कि इसके कारण अल्पसंख्यक समाज शेष समाज से कट जायेगा। संविधान निर्माता डा. भीम राव अम्बेडकर ने इस विचार को विभाजनकारी प्रवृत्तियों को बढावा देने वाला बताया था संविधान सभा की सलाहकार समिति, जिसमें अब्दुल कलाम आजाद के अतिरिक्त इसाई सदस्य भी थे, ने सर्वसम्मति से इस देशघातक विचार का विरोध किया था। अब दुर्भाग्य से” गांधी” के उपनाम का प्रयोग करने वाली तथा नेहरु जी की नातिन बहु सोनिया गांधी नें इन महापुरुषों की चेतावनी को दरकिनार कर पांच राज्यों में होने वाले चुनावों विजय प्राप्त करने की लालसा में इस विध्वंसक कदम को उठाया है।

लोकपाल बिल के मामले में संसद के सम्मान के प्रति संवेदनशीलता दिखाने वाली इस सरकार ने संसद चलने के समय कार्यकारी आदेश जारी कर संसद की अवमानना भी की है। कान्ग्रेस के नेताओं ने इस आरक्षण के लिये राजेन्द्र सच्चर की अनुशंसाओं का हवाला दिया है। आज यह सर्वविदित है कि राजेन्द्र सच्चर भी आइ. एस. आइ के कुख्यात एजेंट डा. फाई से सुविधाएं प्राप्त कर उनके स्वरों को आवाज देते थे। राजेन्द्र सच्चर नें ही सेना में भी धर्म के आधार पर गणना करने देशघातक सुझाव दिया था जिसे तत्कालीन सेना अध्यक्ष के दृढ विरोध के कारण लागू नहीं किया जा सका था। अब यह बात पूरे देश को समझ में आ रही है कि सच्चर नें किन दुश्मनों के इशारे पर मुसलमानों को पिछडा बता कर उनको आरक्षण देने का सुझाव दिया होगा। इस आदेश के बाद अब सेना और न्यायपालिका में भी मुस्लिम समाज को आरक्षण की मांग बलवती होगी जिसको सोनिया जी तत्परता से स्वीकार कर लेंगी।

साम्प्रदायिक एवं लक्षित हिंसा अधिनियम के बाद मुस्लिम समाज के लिये आरक्षण देश की एकता, अखंडता और संप्रभुता के लिये खतरा निर्माण करेंगे। इन देशघाती कदमों को कोई भी देशभक्त नागरिक स्वीकार नहीं कर सकेगा। सभी समाचार पत्रों द्वारा किये “ओपिनीयन पोल्स” भारी बहुमत से इन देशघाती षडयंत्रों का विरोध कर रहे हैं। सरकार को अभी भी संभल जाना चाहिये और इन दोनों षडयंत्रों को वापस लेकर जनता से क्षमा मांगें अन्यथा देश की जनता का आक्रोश भारी पड सकता है।