धार्मिक असहिष्णुता और धार्मिक कट्टरता-एक सिक्के के दो पहलू

कोई भी सभ्य समाज दूसरों की धार्मिक आस्थाओं पर आघात नही किया करता। असहमति होने के बावजूद वह उनकी आस्थाओं का अपमान नही करता। यदि कभी टकराव की स्थिती आती है तो वह परस्पर वार्तालाप के माध्यम से इन विवादो को सुलझाना चाहता है। “एकः सत विप्रः बहुधा वदन्ति” या “स्यादवाद” के आधार पर हमेशा इन समस्याओं का समाधान होता रहा है । यही उदार दृष्टिकोण एव सहिष्णुता किसी भी समाज के शान्तिपूर्ण सहअस्तित्व की आवश्यक बुनियाद होती है। परन्तु दुर्भाग्य से कुछ मजहबों ने दूसरों की आस्थाओ का अपमान करना ही शायद अपनी आस्थाओं की बुनियादी आवश्यकता बना लिया। धर्मान्तरण करने वाले मजहबों के लिये यह उनकी मजबूरी बन गया है । परन्तु जब कोई और उसी सिक्के में उनका जवाब देना चाहता है तो वे तिलमिला उठते हैं। इसका परिणाम हमेशा हिंसक संघर्ष के रूप मे ही देखने को मिलता है। विश्व इतिहास मे हुए” धार्मिक युद्ध”(crusades) इसी मानसिकता के कारण हुए हैं। इसी धार्मिक असहिष्णुता के कारण मानव सभ्यता को न केवल करोडों मानवो का रक्तपात देखना पडा अपितु कई महत्वपूर्ण सभ्यताओं से भी वंचित होना पडा।

हरियाणा के रोहतक जिले के करौंथा गांव में इसी मानसिकता के चलते जो संघर्ष हुआ उसकी भी हिंसक परिणति ही हुई। यहां पर एक पूर्व सरकारी कर्मचारी बाबा रामपाल ने अपना एक आश्रम बनाकर एक पंथ का प्रचार करना शुरू कर दिया । आश्रम को नाम दिया गया “सतलोक आश्रम” और अपने पंथ को ” बन्दी छोड भक्ति मुक्ति पंथ” नाम दिया गया । बाबा रामपाल किसी भी देवी देवता या किसी भी अन्य धार्मिक आस्थाओं की आलोचना कर केवल अपने मार्ग को सत्य बताता था । उसके भाषण कई बार आपत्तिजनक लगते थे और कुछ स्थानीय लोगो ने इसका विरोध भी किया। वहीं इनके अनुयायियों की संख्या भी बढती जा रही थी । समाज के कई प्रबुद्ध लोग इनके अनुयायी बनते जा रहे थे। विरोध और समर्थन साथ-साथ चलते जा रहे थे। तभी इन्होंने स्वामी दयानन्द और आर्य समाज के ऊपर अप्रिय टिप्पणियां कर दी। इसका आर्यसमाज के नेताओं ने विरोध किया और उससे माफी मांगने के लिये कहा। माफी की बात तो दूर उसकी टिप्पणिया और भी तीखी होती गयीं। इसके परिणामस्वरूप संघर्ष की स्थिती निर्माण हो गई। इस सम्पूर्ण क्षेत्र में आर्यसमाज का प्रभुत्व है और जाट समाज प्रमुखता के साथ आर्य समाज के साथ है। पहले तो बयान दिये गये, जब इससे भी बात नही बनी तो धरने प्रदर्शन प्रारम्भ हो गये। इसके बाद तो दोनो तरफ से तलवारें खिंच गयीं। २००६ मे यह संघर्ष इतना बढ गया कि आर्य समाज के हजारों अनुयायी सतलोक आश्रम के बाहर जमा हो गये और उसको तोडने का प्रयास करने लगे। उधर आश्रम के अंदर बाबा के हजारों अनुयायी थे जिनके पास भी हथियार थे । प्रशासन कुछ भी करने की मानसिकता मे नही था। इस खूनी संघर्ष के परिणामस्वरूप एक व्यक्ति को जान से हाथ धोना पडा और सैकडों लोग घायल हो गये। बाबा रामपाल पर हत्या का केस दर्ज हुआ और पुलिस बल ने आश्रम को खाली करके बाबा तथा उसके अनुयायियो को गिरफ्तार कर लिया। आश्रम को सील कर दिया गया। इस प्रकार एक अप्रिय अध्याय का पटाक्षेप हो गया।

कुछ दिन के बाद बाबा की जमानत हो गई । उसने एक अन्य स्थान ,बरवाला, मे अपना एक और आश्रम बनाकर अपने पंथ का काम शुरू कर दिया। अब उन्होंने करौंथा के मूल आश्रम को वापस लेने के लिये कानूनी संघर्ष शुरू कर दिया। इस संघर्ष मे बाबा की विजय हुई और मा. सर्वोच्च न्यायालय ने सतलोक आश्रम पर बाबा का ही अधिकार जायज करार दिया और प्रशासन को आदेश दिया कि आश्रम का कब्जा बाबा रामपाल को दिया जाये। यह बात आर्यसमाजियो को नागवार गुजरी और उन्होंने प्रशासन पर इस बात का दबाव बनाना शुरू कर दिया कि इस आश्रम का कब्जा बाबा को न दिया जाये। कानूनी मजबूरी के कारण प्रशासन को यह आश्रम बाबा के अनुयायियो को देना ही पडा। इसके बाद वहां पर आर्यसमाजियो ने अपना जमावडा शुरू कर दिया । अब उन्होंने धमकी दे दी कि अगर आश्रम खाली नही कराया गया तो “ईंट से ईंट बजा दी जायेगी।” प्रशासन के दिमाग मे शायद कुछ और था । इसीलिये उन्होंने पर्याप्त इन्तजाम नही किये और वही हुआ जिसकी अपेक्षा किसी भी आम नागरिक को थी। १२ मई,२०१३ को करौंथा एक रणक्षेत्र के रूप मे परिवर्तित हो गया। हजारों आर्यसमाजी आश्रम को तोडने के लिये आगे बढे, प्रशासन ने रोका तो उन पर हमला हुआ। गोलियां चली, अश्रु गैस और लाठिया चलीं। एक बार तो पुलिस के लोगों को जान बचाने के लिये भागना भी पडा। परिणाम वही हुआ जो ७ साल पहले हुआ था। तीन मरे, सैंकडो घायल हुए। फर्क इतना था कि इस बार संघर्ष पुलिस और आर्यसमाजियो के बीच मे था जबकि ७ साल पहले यह संघर्ष आर्यसमाजियो और बाबा के अनुयायियों के बीच में था। प्रशासन ने अपनी नाकामी को छिपाने के लिये कानूनी दांव खेला और आश्रम को खाली करवा कर फिलहाल शांति स्थापित करने का दावा कर दिया।

इस खूनी खेल से कुछ प्रश्न सामने आते हैं। क्या दूसरो की आस्थाओं पर आघात किये बिना बाबा रामपाल अपने मजहब का प्रचार नही कर सकते? दूसरों की आस्थाओं पर आघात करने का अधिकार उन्हें किसने दिया? दूसरे पंथों के अनुयायियों की भावनाओं पर चोट पहुंचाकर वे कौन से ईश्वर को खुश करना चाहते हैं? यदि सभी लोग एक दूसरे की आस्थाओं पर हमले करने लगें तो क्या हम जानवरो से भी बदतर स्थिती मे जाने की तैय्यारी नही करने लगे है? अब सारा विश्व धार्मिक सहिष्णुता के मार्ग पर आना चाहता है। क्या बाबा धार्मिक युद्धों की आदिम स्थिती मे समाज को ले जाना चाहते हैं? कुछ विषय आर्यसमाजियो को भी विचार करने पडेंगे। वे भी दूसरो की आस्थाओं पर बहुत ही क्रूरता के साथ आघात करते रहे हैं। अब उनको समझ मे आना चाहिये कि जब किसी की आस्था पर आघात होता है तो उसे कैसा लगता है। अब उन्हें अपने धर्मप्रचारको से कहना चाहिये कि वे अब दूसरो की कटू आलोचना से बचें। दूसरे जब मा. सर्वोच्च न्यायालय ने उनकी जमीन पर उनका कब्जा दिला दिया है तो उन्हे इस विषय को इतना आगे नहीं ले जाना चाहिये। जब उनकी आलोचनाओं से अब तक बाकी पंथों के अनुयायी कम नही हुए तो बाबा की आलोचना से उन पर क्या फर्क पड जायेगा? इनकी आलोचना का जवाब अगर वे तार्किक आधार देंगे तो सारा समाज उनके साथ खडा होगा और शान्तिपूर्ण सहअस्तित्व की दिशा में हम सार्थक कदम उठा सकेंगे।

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