सकल जगत में खालसा पंथ गाजे-जगे धर्म हिन्दू तुरक भंड भागे

सबको वैसाखी की हार्दिक शुभकामनाएं। आज का दिन कई दृष्टी से महत्वपूर्ण है। आज ही के दिन जलियां वाला बाग में जालिम अन्ग्रेजों नें शान्तिपूर्ण ढंग से सभा कर रहे भारतीयों पर गोलियों की बौछार कर हजारों निरपराध भारतीयों का नरसंहार किया था। इसके परिणामस्वरूप पूरे देश में जबर्दस्त आक्रोश जागा था और अन्ग्रेजों को भारत छोड कर जाना पडा था।

आज ही के दिन १६९९ में गुरू गोबिंद सिंह नें खालसा पंथ की स्थापना की थी। मुगलों के अत्याचार से जब पूरा देश त्राहि-त्राहि कर रहा था और सब प्रकार के प्रतिकारों के बावजूद उन पर लगाम नहीं लग पा रही थी तब दशम गुरु, गोबिन्द सिंह जी ने विचार किया कि जब तक इन अत्याचारों के विरुद्ध समाज को नहीं खडा करेंगे तब तक इन अत्याचारों का स्थायी समाधान नहीं हो सकेगा। यही विचार सामने रख कर उन्होंनें वैसाखी के पवित्र दिन पर आनन्दपुर साहिब में एक धर्मसभा का आयोजन किया। वहां पर उपस्थित समाज का आह्वान करते हुए उन्होंनें कहा कि धर्म की रक्षा के लिये बलिदान की आवश्यक्ता है। तब दयाराम नामक नामक एक भक्त ने अपने आपको बलिदान के लिये अर्पित किया। उसको पर्दे के पीछे ले जाया गया और वहां से ताजे रक्त की धार बह निकली। इसके बाद गुरू गोबिंद सिंह बाहर आये और बोले कि अभी और बलिदान चाहियें। रक्त की धार देखने के बावजूद एक-एक करके चार अन्य भक्तों नें अपने आपको बलिदान के लिये अर्पित किया। इन चारों के नाम थे, धरम दास,हिम्मत राय,मोहकम चन्दऔर साहिब चन्द। बाद में इन पांचों को सबके सामने लाया गया और इनको पंच प्यारों का नाम दिया गया । पहले इन सबको अमृत छकाया गया और बाद में इन सबके हाथ से स्वयं गुरु जी ने अमृत छका। अमृत छकने का मतलब था कि अब वे सब प्रकार के भोग विलास से मुक्त रहेंगे और समाज की रक्षा के लिये निरन्तर संघर्ष करते रहेंगे। इसीलिये उन्होंनें सिक्खों के लिये पांच” कक्के” अनिवार्य किये। केश, कडा, कंघी, कच्छा और कृपाण प्रतीक थे सादे और पवित्र जीवन के तथा अनथक संघर्ष के। खालसा पंथ का अर्थ भी उन्होंनें स्पष्ट किया था कि पवित्र विचारों वाले ऐसे लोग जो समा्ज की सेवा और सुरक्षा के लिये हमेशा तत्पर रहें । इसीलिये उन्होंनें लक्ष्य दिया,”सकल जगत में खालसा पंथ गाजे- जगे धर्म हिन्दु तुरक भंड भागे।” दुर्भाग्य से बाद में निहित स्वार्थों के कारण कुछ लोगों नें खालसा का अर्थ केवल केशों तक सीमित कर दिया और जो समाज को जोडने के लिये था उसको अलगाववाद तक ले जाकर ख्डा कर दिया। उस समय मुगल दरबार में गुरू गोबिन्द सिंह को खतरनाक बताते हुए गुप्तचरों ने यह सूचना दी थी कि इनके कारण जातिवाद, पाखंड, अन्धविश्वास और भेदभाव समाप्त हो गया है तथा हिंदू संगठित हो गया है। यही गुरू गोबिन्द सिन्ह का संकल्प भी था और खालसा पंथ की स्थापना का लक्ष्य भी था।

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