सौ चूहे खाकर बिल्ली हज को चली

कांग्रेस की अध्यक्षा सोनिया जी ने १९ नवम्बर को अपने एक भाषण में कहा कि,” भारत में नैतिक मूल्यों का पतन हो रहा है….देश में भ्रष्टाचार तूफान पर है….भारत में अब मजबूत सरकार की जरूरत है।” सोनिया जी के ये उदगार न केवल उपरोक्त कहावत को सिद्ध करते हैं अपितु उनकी बेशर्मी को भी स्पष्ट करते हैं। क्वात्रोची मामले में सोनिया जी की भूमिका सबको याद होगी। परंतु

सोनिया जी के भाषण का समय बहुत महत्वपूर्ण है। आज कांग्रेस भ्रष्टाचार के मामलों में बुरी तरह फंस चुकी है। २जी स्पैक्ट्रम, कांमनवैल्थ खेल घोटाला,आदर्श सोसाइटी आदि घोटालों में आकंठ डूबी कांग्रेस अपने प्रधानमंत्री का बचाव नहीं कर पा रही है। क्या सोनिया जी इन आदर्शवादी बातों के माध्यम से अपने आप को इन मामलों से अलग दिखाना चाहती हैं? क्या वे अब मनमोहनसिंह जी को बलि का बकरा बनाकर अपने युवराज का मार्ग प्रशस्त करना चाहती हैं? क्या जनता उनके इस ढकोसले पर विश्वास करेगी?

सोनिया जी! भारत की जनता को आसानी से बेवकूफ नहीं बनाया जा सकता है। भारत को आजाद हुए ६३ वर्ष हो चुके हैं। इन ६३ वर्षों में से ५३ वर्ष कांग्रेस का ही राज रहा है और इनमें भी अधिकांश समय इनके परिवार का ही शासन था। जिस भ्रष्टाचार की वे चिंता कर रहीं हैं , उसके लिये अगर कोइ जिम्मेदार है तो केवल और केवल उनका परिवार और उनकी पार्टी ही जिम्मेदार है। यदि भ्रष्टाचार पर वे वाकई चिंतित हैं तो उनको देश से इस अपराध के लिये क्षमा मांग कर राजनीति से हमेशा के लिये संयास ले लेना चाहिये। परंतु वे ऐसा कुछ कर नहीं सकेंगी क्योंकि फिर राहुल बाबा को घर चलाने के लिये कुछ करना पडेगा । वे कुछ और कर नहीं सकेंगे क्योंकि पैसा कमाने के लिये उनके पास राजनीति से बेहतर, सरल और उत्पादक माध्यम कुछ और नहीं हो सकता है। शायद अब उनको इस भ्रष्टाचार के मूल कारण की समझ हो गई होगी। जब तक इस देश के राजनीतिज्ञ जीविकोपार्जन के लिये राजनीति को आधार बनाते रहेंगे, भ्रष्टाचार को समाप्त नहीं किया जा सकता है। यह तथ्य इस देश के उन सब लोगों को भी समझना होगा जो वास्तव में इस महामारी को समाप्त करना चाहते हैं।

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