गुजरात में सैक्युलरवादी फिर बेनकाब

पिछले कुछ दिनो से गुजरात फिर चर्चा में है ।हिन्दुओं के रक्तपिपासू सैक्युलरवादी गुजरात सरकार, गुजरात विश्व हिन्दू परिषद और गुजरात के हिंदू समाज पर निशाना लगाने के लिये किसी न किसी बहाने की तलाश मे रहते हैं। कुछ दिन पूर्व गुजरात सरकार ने बाबू बजरंगी और बहन माया कोडनानी की को मृत्यु दंड दिलवाने की अपील पर गुजरात के महाधिवक्ता की राय लेने का निर्णय लिया । इस निर्णय के आते ही देश के सैक्युलरिस्टों ने हमेशा की तरह हाय तौबा शुरू कर दिया । एक टी.वी. चैनल तो इस विषय पर सारे दिन इस प्रकार का प्रचार करता रहा मानो कोई नयी राष्ट्रीय आपदा आ गई हो। इतनी चिंता इस चैनल को उस समय भी नही हुई थी जब चीन ने भारत की सीमा मे घुसपैठ की थी । अफजल गुरू की फांसी का मानवता के आधार पर विरोध करने वाले इस अवसर पर इतना शोर मचा रहे थे मानो इन दोनो को फांसी देने के बाद ही मानवाधिकार सुरक्षित रह सकेंगे। कोई तो कह रहा था कि गुजरत सरकार ने” यू टर्न” किया है तो कोई इसे “अबाउट टर्न” कह रहा था। कुछ दिन पहले गुजरात सरकार ने SIT को इन दोनो के मामले में अपील करने की अनुमति दे दी थी। उस समय गुजरात सरकार ने न तो कोई कानूनी राय ली और न ही इस बात पर कोई विचार किया कि क्या SITको अपील करने का कोई अधिकार है भी या नही । जब गुजरात मे इसका विरोध हुआ तो वहा की सरकार ने अपनी गलती को ठीक करते हुए इस मामले पर महधिवक्ता की राय मांगी। यह अपनी गलती को सुधारने की एक स्वाभाविक प्रक्रिया थी। अब भी सरकार ने यह नही कहा था कि वे अपील नही करने जा रहे । परन्तु इस हाय तौबा से कुछ प्रश्न अवश्य सामने आये है ।

महाधिवक्ता की राय लेने का निर्णय अपील के निर्णय से पीछे हटना नही है। हद से हद यह इस निर्णय को कुछ दिन के लिये टालना कहा जा सकता है। यह उनकी सजा माफ करना तो बिल्कुल ही नही कहा जा सकता । इसके बावजूद इस विषय पर शोर मचाने वाले उस समय क्यो चुप रह जाते है जब उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री मुस्लिम युवको के मुकदमे वापस लेने की घोषणा करते हैं। वे केवल घोषणा तक नही रुकते, इस को अमल करने के लिये कानूनी कार्यवाही शुरू कर दी जाती है। आतंकवाद के गंभीर मामलों के अपराधियो को भी छोडने का निर्णय लिया जाता है। इस देशघाती कार्यवाही पर तभी रोक लगती है जब मा. न्यायपालिका इसका विरोध करती है। यह चैनल और ये सैक्युलरिस्ट उस समय एक शब्द भी नही बोले। जब अफजल गुरू के मामले मे जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री और उनके वालिद साहिब, जो केन्द्रीय मंत्री भी है ,ने जब विद्रोह की भाषा बोली तथा देश के कई तथाकथित मानवाधिकारवादियो ने उनके सुर में सुर मिलाया, तब इन सब सैक्युलस्टो की जुबान को लकवा मार गया था। ऐसे और भी पचासो उदाहरण दिये जा सकते है जिनमे इनकी जबान तभी खुलती है जब किसी हिंदू को कटघरे मे खडा करने का अवसर ढूंढ निकाला जाता है। ऐसा लगता है ये लोग हिन्दू द्रोह करने के लिये राष्ट्र द्रोह की सीमा का अतिक्रमण करने मे भी संकोच नही करते।

गुजरात सरकार के पहले के निर्णय ने SIT के कार्यक्षेत्र पर विचार करने के लिये अवसर प्रदान किया है।SIT का गठन मा. सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के अन्तर्गत हुआ है। उसी आदेश मे इसका कार्यक्षेत्र भी निर्धारित किया गया है। इस निर्णय मे बहुत स्पष्ट रूप से लिखा गया है,” Therefore the SIT shall continue to function until the completion of trial.” SIT को तभी तक काम करना है जब तक ट्रायल चलता है। अपील करना उसके कार्यक्षेत्र मे नही आता। इनका कार्य एक मौलवी की तरह है जो केवल निकाह को सही ढंग से कराने के लिये अधिकृत है। वह निकाह के बाद यह कहकर दुल्हन पर कब्जा नही कर सकता कि अभी तक का काम उसने किया है तो आगे का काम भी वही करेगा। गुजरात सरकार अगर उस समय इनको अपील की अनुमति नही देती तो इस विवाद का प्रश्न ही नही होता था। अपील के अधिकार के मामले में भारत की दंड प्रक्रिया संहिता बहुत स्पष्ट रूप से कहती है कि अपील करने का अधिकार केवल राज्य सरकार का है। इस विवाद को निर्माण करने के लिये गुजरात सरकार का वह विवेकशून्य निर्णय भी जिम्मेदार है। आज यह स्पष्ट है कि हिन्दू द्रोही सैक्युलरिस्टो की जमात गिद्ध दृष्टी के साथ हिन्दू हितो पर हमला करने के मौके ढूंढती रहती है और गुजरात पर इनकी विशेष कृपा रहती है। इस परिस्थिती मे ऐसे किसी भी निर्णय को लेने से पहले गुजरात सरकार को दस बार सोचना चाहिये।

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