“शहीदी जोड” मेला- बलिदानों की परम्परा का अदभुत उत्सव/”Shahidi Jod Melaa”-A unique tradition of celebrating sacrifices

हनुमत शक्ति जागरण के कार्यक्रम के निमित्त जैसे ही मैनें पंजाब की सीमा में प्रवेश किया, एक अदभुत दृश्य देखने को मिला। सडक पर ट्रैफिक रूका हुआ था। मुझे लगा कि सीमा होने के कारण चैकिंग हो रही होगी। परंतु जब वाहनों ने गति नहीं पकडी तो साथ चल रहे कार्यकर्त्ताओं से जानकारी लेने के लिये कहा। उन्होंने कहा कि आज सारे पंजाब में ऐसा ही हो रहा है, शहीदी जोड मेला होने के कारण सब जगह लंगर लगे हैं और लोगों को रोककर प्रसाद लेने के लिये आग्रह किया जा रहा है। श्रद्धा होने के कारण लोग रुक रहे हैं और धैर्य से प्रसाद लेने के बाद ही आगे बढ रहे हैं।

इस मेले का इतिहास निश्चित रुप से उत्साहवर्धक है। दशम गुरु, गुरु गोबिंद सिह के नाम से समस्त जगत परिचित है। वे एक महान योद्धा, सेनानायक, धर्मरक्षक,चिंतक, कवि एवं साहित्यकार थे, यह सब लोग जानते हैं। परंतु उनकी बलिदानी परम्परा का उदाहरण बेजोड है। उन्होनें अपने पिता, गुरू तेग बहादुर को बलिदान के लिये प्रेरित किया । उस समय उनकी आयु मात्र १० वर्ष थी। इसके पश्चात उनके दो पुत्रों ने चमकौर के युद्ध में अपने देश और धर्म की रक्षा के लिये मुगलों के खिलाफ लड्ते हुए अपने प्राण न्यौछावर कर दिये। उनके शेष दो पुत्रों, फतेह सिंह और जोरावर सिंह, को भी मुगलों ने सरहिंद में पकड लिया। उनके सामने दो विकल्प रखे गये, या तो इस्लाम स्वीकार कर वैभवपूर्ण जीवन अपनाओ अन्यथा जिंदे दीवार में चुन कर पीडादायक मृत्यु को स्वीकार करो। परन्तु धन्य हैं वे सिंह शावक जिन्होंने वैभवपूर्ण जीवन की अपेक्षा मृत्यु को स्वीकार किया और जिंदा ही दीवार में चिनवा दिये जाना स्वीकार किया। छोटे भाई की नाक पर पहले दीवार आते देख बडे भाई की आंखों में आंसू आ गये। यह देख कर छोटा भाई ललकारा,” क्या मौत से डर गये?” बडे भाई ने जो कहा वह शायद मानवता के इतिहास में किसी भाई ने नहीं कहा होगा। उसने कहा,” तुम मेरे बाद में दुनिया में आयो हो परन्तु देश के लिये जान देने का सौभाग्य मेरे से पहले प्राप्त कर रह हो।” देश और धर्म की रक्षा के लिये बलिदान देने की ऐसी होड दुनिया के इतिहास में कहीं और नहीं देखी गयी होगी। अपने पिता और चारों पुत्रों के बलिदान के बाद भी गुरु गोबिंद सिंह को कोई अफसोस नहीं था , इसके विपरीत उन्होनें अपनी पत्नी को सान्त्वना देते हुए कहा था ,” चार गये तो क्या हुआ, तेरे पुत्त हजार।” सम्पूर्ण हिंदू समाज ही उनके लिये पुत्रवत था जिसकी रक्षा के लिये उन्होनें अपना सर्वस्व बलिदान कर दिया।

उन महान वीरों के बलिदान की स्मृति में सरहिंद में आज भी निरंतर मेला लगता है और सम्पूर्ण पंजाब में इस दिन पग-पग पर लंगरों का आयोजन किया जाता है जिसमें पंजाब के हर समाज के लोग बढ-चढ कर भाग लेते हैं। बलिदानों पर मेला लगाकर उत्सव मनाने की यह परम्परा केवल भारत में ही सम्भव है। यहां पर लोग देश व धर्म की रक्षा के लिये न केवल बलिदान देते हैं अपितु शेष समाज इन बलिदानों को उत्सव का रूप देकर इस संकल्प को जीवित बनाये रखता है।

As I entered the borders of Punjab to attend the ‘Hanumat Shakti Jagran’, I came face to face with an incredible scene. Traffic had come to a standstill on the road. I thought that it was perhaps a border check-post. But, when the traffic refused to budge, I asked our workers to find out what the stoppage was about. They immediately replied that the halt was because of the” langar” at the pious occasion of ‘Shahidi Jod Mela’ and ‘langars’ like these are being organised all over Punjab . People were being offered ‘prasaad.’ Because of the trust and belief, people were waiting patiently to receive the prasaad.

This fair has a very inspiring history behind it. The whole world knows about the the 10th guru of the Sikhs, Guru Gobind Singh. He was a great warrior, commander, religious preacher,Dharma Rakshak, thinker, poet and a litterateur. He was also an outstanding individual when it came to sacrifices in personal life. When he was only 10, he had inspired his father, Guru Tegh Bahadur for sacrifice to save Dharma. Subsequently, two of his sons laid down their lives for the country and religion in the battle of Chamkaur against the Mughals. His other two sons, Jorawar Singh and and Fateh Singh, too, were caught by the Mughals in Sirhind. They were offered a prosperous life under the tutelage of Islam or else being cemented alive in a brick wall. But, the valiant sons of the Guru chose death over an easy, life of prosperity. When the elder brother saw the wall reached his younger brother’s nose, he could not hold back his tears. Seeing this, the younger brother asked, “Are you scared of death?” In reply to this, what the elder brother said has perhaps never been said in the history of mankind. He said, “You came into this world after me, but you are now having the privilege of dying for the country before me.” The indomitable spirit of sacrifice for the country and religion cannot be seen anywhere else in the world. Despite losing his four sons and father at the altar of sacrifice for the country and religion, Guru Gobind Singh had no regrest. Consoling his wife, he said, “What if the four are no more, you have a thousand sons.” The whole Hindu society was for him like his son, for whom, he sacrificed everything.

In commemoration of the feats of these great warriors, fairs are being organised In Sirhind, and langars dot the landscape of Punjab. It is only in India that a fair organised to commemorate the sacrifices of its warriors takes on the hue of a festival. Not only do people of this country lay down their lives for their country and religion, but also transforms these sacrifices into a festival to keep the spirit of sacrifice alive.

You May Also Like