अडवानी जी!अब तो राष्ट्रीय गौरव के क्षणों पर दुखी होना बन्द कर दो। Advani ji: Stop expressing grief on the days of national pride

भाजपा के वरिष्ठ नेता श्री लालकृष्ण अडवानी ने अपने एक ब्लॉग में ६ दिस.,१९९२ की घटना का वर्णन करते हुए लिखा है कि इस घटना नें भाजपा की विश्वसनीयता को आघात पहुंचाया है। कभी उन्होंनें इस दिन को अपने जीवन का सबसे दुःखद क्षण बतायाथा। इसी ब्लॉग में उन्होंनें अपने उसी विवादास्पद वाक्य को फिर दोहराया है। उन्होंनें यह भी लिखा है कि कार सेवकों की अधीरता का अनुमान संगठन नहीं लगा सके। जिस नेता ने कभी रामरथ यात्रा का नेतृत्व किया था और देश की जनता नें उन्हें सिर माथे पर बिठाया था, उसके द्वारा बार-बार इस प्रकार के प्रलाप न केवल जनता को असमंजस में डालते हैं अपितु राम जन्मभूमि आन्दोलन के साथ जुडे करोडों रामभक्तों की भावनाओं पर ठेस पहुंचाते हैं।

पाठकों को स्मरण होगा कि ६ दिस. १९९२ को देशभर से लाखों रामभक्त कारसेवक अयोध्या में पहुंचे थे जिनका लक्ष्य श्रीरामजन्मभूमि न्यास की जमीन पर कारसेवा करना था। वे वहां पर बाबरी ढांचा तोडने नही गये थे। परन्तु तत्कालीन प्रधानमन्त्री श्री नरसिन्हाराव की धोखाधडी और अपनी उसी जमीन के सम्बंध में निर्णय सुनाने के स्थानीय अदालत द्वारा अपनाये गये टालू रवैय्ये के कारण वे कार सेवक अब किसी धोखाधडी का शिकार बनने के लिये तैय्यार नहीं थे। आजादी के बाद से ही वे निरन्तर धैर्य रखते हुए इन सैक्युलवादियों के छल- प्रपंचों और अत्याचारों का सामना कर रहे थे। उन्होनें बाबरी मस्जिद एक्शन कमिटी की धमकियों और मुस्लिम समाज के हमलों का भी सामना किया। तत्कालीन केंद्र सरकार के दलालों द्वारा पैसे की थैलियां लेकर संतों कॉ खरीदने के असफल प्रयासों और कुत्सित षडयंत्रों को भी हिन्दू समाज धैर्य से देखता रहा। १९९० में उत्तरप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमन्त्री द्वारा कारसेवकों और हिंदू समाज पर किये उन अमानवीय अत्याचारों को भी झेला जिनके सामने चंगेज खान, नादिरशाह और औरंगजेब भी शरमा जायें। न्यायपालिका का दुरूपयोग करते हुए सैक्युलरिष्टों के उन षडयन्त्रों को वह धैर्य से देखता रहा जिनके माध्यम से वे राममन्दिर निर्माण के पावन कार्य में बाधा डालते थे। सीमाएं तब पार हो गयीं जब अपनी ही जमीन के अधिग्रहण की वैधता पर तैय्यार रखे गये निर्णय को सिर्फ इसलिये नहीं सुनाया जा रहा था जिससे कारसेवा का समय निकल जाये और अयोध्या में एकत्रित लाखों कारसेवक हाथ मलते हुए निराशा का भाव लेकर अपने घरों पर वापस चले जायें। नरसिंहा राव द्वारा पूज्य संतों को निरन्तर झूठे आश्वासन देने की घटनाओं नें आग पर घी डालने का काम किया। मा. अडवानी जी, जिन्दा कौमें ज्यादा इन्तजार नहीं कर सकतीं। आपको उन कारसेवकों पर गर्व होना चाहिये था जो अपने ऊपर हो रहे अत्याचारों और देश के साथ हो रहे छल कपट को एक नपुंसक समाज की तरह झेलने के लिये तैय्यार नहीं थे। उन्होंनें एक गौरवशाली और स्वाभिमानी समाज की तरह वही किया जो करना चाहिये था। यदि वे उस दिन अपने “हाथ को मलते हुए” वापस आ जाते तो यह उनका धैर्य नहीं कायरता होती और देश का इतिहास उन्हें कभी क्षमा नहीं करता। सम्पूर्ण विश्व के प्रबुद्ध वर्ग ने इस घटना को भारत के लिये गौरवशाली दिन कहा था। यदि वे ऐसे ही वापस आ जाते तो ये लोग उसे धैर्य नहीं,” राष्ट्रीय शर्म” का नाम देते और शर्म से डूबा समाज फिर कभी अयोध्या की ओर शायद मूंह भी नहीं कर पाता। बाबरी ढांचे का हटना और राममन्दिर का निर्माण तो कल्पनालोक का ही विषय बन जाता।

६ दिस. की घटना के सम्बंध में मा. अडवानी जी को न्यायपालिका के निर्णय का भी स्मरण करना चाहिये। न्यायपालिका के निर्णय में स्पष्ट लिखा है कि,” बाबर एक विदेशी हमलावर था जिसके आदेश पर रामजन्भूमि के पावन मन्दिर को तोडकर एक ऐसा ढांचा बनाया गया जिसे न तो मस्जिद कहा जा सकता है और जो न ही कोई इस्लामिक इमारत।” इसका अर्थ स्पष्ट है कि बाबरी ढांचा केवल एक बर्बर आक्रमणकारी की विजय का प्रतीक था और भारत के लिये गुलामी का। इस ढांचे का ध्वस्त होना राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक ही हो सकता है। वे कारसेवक जिन्होंने इस शौर्यपूर्ण कार्य को किया है ,सम्मान के हकदार हैं न कि किसी अपमान के। रामजन्मभूमि आन्दोलन भारत की सांस्कृतिक आजादी का आन्दोलन था और वे कारसेवक स्वतंत्रता सेनानी। अडवानी जी को यह भी ध्यान रखना चाहिये कि अगर ६ दिस. ,१९९२को ढांचा न गिरता तो उत्खनन का काम भी नहीं होता और यह न होता तो ३० सित.,२०१० का निर्णय शायद कुछ और ही होता।

मा. अडवानी जी! अब आपको इस शौर्यपूर्ण घट्ना को अपने जीवन का सबसे दुःखद क्षण कहने के लिये सम्पूर्ण राष्ट्र से माफी मांगनी चाहिये। जिन महान कारसेवकों नें इस आन्दोलन में अपने बलिदान दिय हैं आप उनके बलिदानों को लांछित कर रहे हैं। उनकी आत्मा आपके बार-बार दुःख व्यक्त करने के कारण अपमानित हो रही होगी। आपको अपने जीवन में ऐसे बहुत से क्षण याद होंगे जिन पर आपको वास्तव में दुःख व्यक्त करने की आवश्यक्ता है। याद करो १५ अगस्त १९४७ का वह दिन आप जैसे करोडों हिंदुओं को अपनी जन्मभूमि छोड्कर भारत में शरण लेनी पडी थी और लाखों हिंदुओं का रक्त रक्तपिपासू जेहादियों नें बहाया था। ३ लाख से अधिक माताओं बहनों का शील हरण किया गया था। क्या आपको वह दिन अपने जीवन का सबसे दुःखद क्षण नहीं लगता? चीन के सामने भारत सरकार का १९६२ में शर्मनाक समर्पण और अपनी हडपी गई जमीन को वापस न ले पाना क्या आपको शर्मनाक नहीं लगता? १९७१ के युद्ध में ४० हजार पाक युद्धबन्दियों को बिना अपनी जमीन वापस लिये वापस करना क्या आपको दुःखी नहीं करता? कश्मीर घाटी में हिन्दुओं का नरसंहार ,बहनों का पाश्विक शीलहरण और लाखों हिन्दुओं का विस्थापन क्या दुःखी होने का कारण नहीं दिखाई देता? क्या आप पिछले २५ वर्षों से आतन्कवादियॉ के तान्ड्व से दुःखी नहीं हैं? और तो छोडिये, पाकिस्तान में जिन्ना की मजार पर जाकर उसकी शान में कशीदे काढने पर आप क्यों दुःखी नहीं हैं? कृपया जीवन के इस पडाव पर अपना अडियल रवैय्या छोडें। आत्मावलोकन करें। राष्ट्रीय गौरव क्षणों पर दुःखी होने की जगह देश के दुःखों में शामिल होने की कोशिश कीजिये।

मा. अडवानी जी ने अपने ब्लॉग में यह भी लिखा है कि ६ दिस. की घटना से भाजपा की विश्वसनीयता पर चोट लगी है। चोट उस घटना के कारण नहीं, उस पर बार-बार दुःख व्यक्त करने के कारण लगी है। उन्हें स्मरण रखना चाहिये कि उस घटना के बाद ही वे सता में आये थे। सत्ता से हटने के कारणों का विश्लेषण हो चुका है। उन कारणों में वह घटना नहीं , राममन्दिर निर्माण की दिशा में उनकी अकर्मण्यता प्रमुख कारण रही है।

अब बहुत हो चुका है। यदि आपकी स्मृति और विश्लेषणक्षमता आपका साथ छोड रही है तो अब आपको सक्रिय राजनीति छोडकर गोंडा जाकर पू. नानाजी के प्रकल्पों में अपनी सेवाएं देना चाहिये। शायद यही मार्ग आपके सामाजिक जीवन के अभी तक के बचे-खुचे गौरव को सुरक्षित रख सके।

Senior BJP leader Advani ji, in one of his blogs, has remarked that the events of December 6th left the BJP’s credibility in doubt. In the past, he had also described this day as the ‘saddest day of his life.” In this blog, he has again repeated the same unfortunate statement. He has also written that the organisation could not anticipate the “impatience “of the kar sevaks. The leader, who had once led the Rath-yatra, when he indulges in such double-speak, leaves not only the citizens of the country astounded, it also ends up hurting the sentiments of Raam-bhaktas . Advani ji must not forget that it was this Rath-yatra that had made him the darling of the masses.

Readers will remember that on the 6th of Decemeber, lakhs of Kar-sevaks from all over the country had gathered at Ayodhya with the sole purpose of performing kar-seva at the Raam-Janmobhoomi Nyaas. They were not there to break the Babri structure. The kar-sevaks had earlier faced the betrayal of the erstwhile PM, Narasimha Rao and the dilly-dallying tactics of the local court in delivering a judgment on their ‘own land’, they were not prepared to accept any more betrayals. They had been countering these tactics of the secularists and also their atrocities since independence. They had even faced the threats of the Babri Masjid Action Committee and the attacks of the muslim community. With patience, they had been watching the erstwhile government’s foul attempts to buy out the saints with money-bags and the unholy conspiracies against them. They had braved even the inhuman barbaric acts of the erstwhile CM of UP in 1990 that would have shamed even Nadir Shah, Chengiz Khan and Aurangzeb. Still, he did not lose patience but kept watching the conspiratorial ways by which the secularists would not allow the judiciary to allow the Raam temple construction, the only way the kar-sevak so peacefully wanted it to happen. It reached a point of no-return when the kar-sevaks saw that the judgement on their own land which was already prepared was not being pronounced so that the auspicious time for the kar-seva could elapse and they would then have to go back home without accomplishing the holy task of kar-seva. The false assurances given by Narasimha Rao to the Hindu saints only added fuel to the fire. Honorable Advani ji, awakened societies can’t wait for so long. You should be proud of those kar-sevaks who were not prepared to tolerate the atrocities and the betrayal of their nation and could not have kept watching the hypocrisy of the government from the sidelines as an impotent would. Like any proud race, they did what the times demanded of them. History would never have forgiven what would have been their cowardice and not patience, if they had returned home without accomplishing what they did that day. The intellectuals of the entire world had termed this day as a day of pride for the country. If they had come home empty-handed, then the same day would have been termed a day of national shame and the kar-sevaks could never have again thought of even venturing into Ayodhya. The demolition of the Babri structure and the construction of the Raam-Mandir would have then remained in the realm of a dream-world.

Honorable Advani ji must remember the verdict of the judiciary on the event of December 6,,1992. The judiciary in its pronouncement has very clearly stated that “Babar was a foreigner, on whose orders the holy temple of Raamjanmabhoomi was demolished and in place was built a structure that can neither be called a mosque nor an Islamic monument.” This proves that the Babri structure was only a symbol of the victory of a cruel foreign attacker and a matter of shame and slavery for the nation. Therefore, the demolition of this structure can only be a matter of pride for the nation. The kar-sevaks who achieved this, are worthy of honour and not denigration that you have been handing out to them since 1992 . The Raam-Janmabhoomi movement was a movement for India’s cultural freedom and the kar-sevaks were freedom fighters. Advani ji must also remember that if the structure had not been demolished on the 6th Dec., then there would have been no excavation either and if this had not happened, then the verdict of 30th Sep.,2010 would have been something else.

Honorable Advani ji! Now, you must apologise to the whole nation for calling this valiant day as the saddest day of your life. You are denigrating the sacrifices of the kar-sevaks. The souls of the kar-sevaks must be crying whenever you call this day the saddest in your life. You would remember so many moments in your life on which you need to actually express grief and sorrow. Just remember that day of August 15, 1947, when crores of Hindus like you had to leave their motherland and take refuge in India. This day, lakhs of Hindus were done to death by the blood-thirsty Jehadis. More than 3 lakh mothers and daughters were raped. Don’t you think you should call that day as the ‘saddest day of your life?” Does the shameful surrender of the government in front of China in 1962 not make you sad, add to this the fact that we have not been able to get back the surrendered portion of our land till this day. Does this not make you sad, that in 1971, we decided to leave some 40 000 Pakistani POWs without getting back our surrendered land? The massacre of the Hindus in the Kashmir valley, the dastardly rape of our sisters, the displacement of lakhs of Hindus from the valley, don’t you think these are matters that should make you saddest? Aren’t you sad about the macabre acts committed by the terrorists for the last 25 years? Leave everything aside; just tell us why you are not sad after singing poems in praise of the Jinnah at his tomb? Try and change your recalcitrant attitude at this stage of your life. Look within yourself, do some soul-searching. Rather than grieving on the days of national pride, try and grieve over the days which make India sad, the days that have been listed above.

Honorable Advani ji has also written that the events of December 6th, left the credibility of the BJP in tatters. The credibility became doubtful not because of the events of the December 6th, but because you called it the ‘saddest day of your life.” He must never forget that the he made it to power only because of that day. The reasons for losing power have already been analysed. It was not the event of December that led to his dismissal from power but the fact that he never proceeded a single inch in the direction of the construction of the Raam temple in Ayodhya when in power.

Enough is enough. If your memory and faculties of analysis are not serving you, then you should quit active politics and go to Gonda, where you can offer your services to the projects undertaken by Honorable Nanaji. Perhaps, only this will savour whatever pride you are still left with.

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