यह ड्रैगन और हाथी की दोस्ती नहीं, हाथी का आत्मसमर्पण है।/Surrender of Indian Elephant before Chinese Dragon

चीन के प्रधानमंत्री वैन जियाबो की भारत सरकार द्वारा बहुप्रचारित यात्रा के बाद भारत के हाथ क्या लगा इसका विचार करने के बाद ध्यान में आता है कि चीन इस यात्रा से जो प्राप्त करना चाहता था वह उसने आसानी से प्राप्त कर लिया और बदले में उसे कुछ भी नहीं देना पडा। “मैत्री के इस नये अध्याय” में चीन के सामने भारत के समर्पण के पुराने इतिहास को केवल दोहराया गया है। जिन मुद्दों पर भारत को चिंताऍ थीं , उन पर हम चीन को वार्ता करने के लिये भी तैय्यार नहीं कर सके। गुलाम काश्मीर में चीन की बढती दखलंदाजी, पाकिस्तान की भारत विरोधी गतिविधियों को चीन का निरंतर मिलने वाला सहयोग, भारत के कई क्षेत्रों में चीन की सेना की निरंतर चल रही घुसपैठ व कब्जे का प्रयास, कई क्षेत्रों पर चीन का दावा, भारत के कई अलगाववादी और आतंकवादी संगठनों को चीन के द्वारा मिलने निरंतर वाला सहयोग व समर्थन, नेपाल में भारत विरोधी गतिविधियों को चीन द्वारा मिलने वाला समर्थन, तिब्बत में मानवाधिकारों का हनन, नदियों के संबंध में स्पष्ट नीति आदि कई मुद्दे हैं जिन पर साफ-साफ बात किये बिना दोस्ती की तो बात ही छोडें, सामान्य संबंधों की कल्पना भी नहीं की जा सकती। सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता के लिये हमारे नेता ज्यादा ललायित हैं। इस पर इनको कुछ ज्यादा ही उम्मीदें थीं। भारत की चिंताओं के इन सब मुद्दों पर हम चीन से कुछ भी प्राप्त नहीं कर सके। जबकि चीन की रूचि सिर्फ भारत के बाजार में ही थी। जिस बाजार पर वह अपने सस्ते उत्पादों द्वारा पहले ही अवैध रूप से कब्जा कर चुका था, अब वह उन पर वैधानिक रूप से पूर्ण कब्जा करना चाहता है। इस प्रयास में वह सफल रहा। चीन विश्व की सबसे बडी आर्थिक महाशक्ति बनना चाहता है और इसके लिये उसे भारत के विशाल बाजार की जरूरत है। वैन नें इस यात्रा में इस बाजार में अपनी पैठ बना ली है और वह भी बिना कुछ दिये। देने की तो बात ही दूर, उसने हमें भारत की चिन्ताओं पर बात तक नहीं करने दी। यह चीन की दिग्विजय यात्रा का एक महत्वपूर्ण पडाव ही था ।

चीन से पहले अमेरिका भी भारत के विशाल बाजार पर कब्जा करने की दिशा में सफलतापूर्वक कदम आगे बढा चुका है। ओबामा की यात्रा का भी विचार करें तो हमें यही ध्यान में आयेगा कि बेवकूफ तो वे भी बना गये परंतु यह हम बाद में महसूस कर सके। जबकि चीन ने तो कोई लाग लपेट भी नहीं की और हमें स्पष्ट रूप से अहसास करा दिया कि विदेश नीति में हम बहुत बौने हैं। हमारे नेतृत्व की रीढ विहीन नीति हमें कहां ले जायेगी? आतंकवाद के मुद्दे पर पहले ही समर्पण कर चुकी यह सरकार अब अमेरिका और चीन के सामने घुटने टेक कर क्या देश को इन महाशक्तियों का पिछलग्गु नहीं बना रही है?

The Chinese Premier, Wen Jiabao, in his much-publicized visit to India ended up getting all that he had intended whereas India has got nothing in return. In this ‘new chapter of friendships’, the old policy of appeasing and surrendering to China has again been followed by India. We could not even bring China on to the discussion table on the issues which have been a cause of constant worry for us. China’s increasing interference in POK, its increasing help to Pakistan for its anti-India activities, insurgency by the Chinese army into many parts of India, its claim to ownership of many parts, China’s constant support to so many terrorist and separatist organisations, human rights violation in Tibet, its support to anti-India activities in Nepal, unclear policies on the water-sharing of rivers are so many issues, these are issues, without whose resolution, we cant even think of having normal relations, leave alone, a ‘friendship treaty.’ Our leaders more concerned about a place in the Security Council. We have not been able to get anything from China on any of these issues. China is only interested in India’s market, which it has already captured illegally. Now, it wants to capture it completely and legally and in this visit, it has been successful to a large extent. China wants to become the biggest economic superpower in the world and it needs to dominate India’s market towards this goal. In this visit, Wen has been successful to a very large extent in making a dent in the Indian market. Leave alone, giving us back something in return, Wen, did not even agree to sit in discussion on any of India’s problems vis-à-vis China. This was an important stop of Wen in its world-conquering tour.

Prior to China, USA, too has successfully cornered a large chunk of India’s market. If we think about the Obama visit, one understands that even Obama made a fool of us, we came to know about it only later. In the case of China, Wen did not even mince his words and let us know in straight terms that we were minnows in comparison to China when it came to foreign policy. The spineless policies of our leaders will take us nowhere. Our country, which has already surrendered on the issue of terrorism, will now end up becoming a lackey of these two superpowers-America and China.