जम्मु-कश्मीर में एकता यात्रा का दमनः अयोध्या के इतिहास की पुनरावृत्ति/The Trampling of Ekata Yatra in Jammu-kashmir: A Repeat History of the Ayodhya Movement

भारतीय जनता युवा मोर्चा की एकता (तिरंगा ) यात्रा को असफल बनाने के लिये जम्मु कश्मीर के मुख्यमंत्री श्री उमर अब्दुल्ला ने जो तानाशाहीपूर्ण कदम उठाये हैं, वे अयोध्या के इतिहास के उस काले पृष्ट की याद दिलाते हैं जो राम जन्म भूमि आन्दोलन को विफल करने के लिये तत्कालीन मुख्यमंत्री के कारनामों से भरा पडा है। उस समय एक विदेशी बर्बर आक्रांता बाबर की जेहादी परम्परा का अनुसरण करने वाले कुछ लोगों को खुश करने के लिये देशभक्त कारसेवकों को अयोध्या पहुंचने से रोकने के लिये सम्पूर्ण उत्तर प्रदेश की सीमाएं सील कर दी गई थीं और देश की रामभक्त हिंदू जनता व नेताओं को न केवल गिरफ्तार किया था अपितु उन पर अमानवीय अत्याचार भी किये थे। उत्तर प्रदेश आने वाली रेलगाडियां रोक दी गई थीं, कारसेवकों को गाडियों से उतार कर गिरफ्तार किया गया था, वहां की हिंदू जनता पर अवर्णनीय अत्याचार किये गये थे और निहत्थे कारसेवकों पर गोलियां चलाकर मारने का महापाप किया था। दुर्भाग्यसे इस महापाप में उस समय की केंद्र सरकार भी बराबर की हिस्सेदार थी। ३० सितंबर के उच्च न्यायालय के निर्णय ने यह स्पष्ट कर दिया कि वह आन्दोलन गुलामी के एक बदनुमा दाग को हटाने का महान आन्दोलन था। उस दाग को हटाने का जो कार्य भारत की सरकारों को करना चाहिये था, वह सरकारों के विफल रहने के कारण इस देश की महान देशभक्त जनता ने करने का संकल्प लिया था। वह जनता गोलियों और उत्पीडन की नहीं , अभिनंदन की हकदार थी। आज उसी इतिहास की पुनरावृत्ति जम्मू कश्मीर में हो रही है। भारत के हर हिस्से में तिरंगा लहराना चाहिये,२६ जनवरी और १५ अगस्त को तो निश्चित तौर पर। यह सुनिश्चित करना सभी राज्य सरकारों और केंद्र सरकार का प्राथमिक दायित्व है। परन्तु जम्मु काश्मीर की राजधानी श्रीनगर में पाकिस्तान का झंडा खुले आम लहराया जाता है, उनको दंडित करना तो दूर ,उनको रोकने का भी साहस वहां की नपुंसक राज्य सरकार में नहीं है। वहां का कोई राजनेता घाटी में तिरंगा नहीं लहरा सकता। सेना के जांबाज अधिकारी ही इस कार्य राष्ट्रीय कार्य को सम्पन्न करते हैं। पिछले वर्ष यह भी नहीं हो पाया। इसका अर्थ बहुत स्पष्ट है कि वहां पर पाकिस्तान का झंडा तो लग सकता है, तिरंगा नहीं। क्या लाल चौक भारत का हिस्सा नहीं? ऐसा लगता है कि वहां पर भारत का नहीं पाकिस्तान का राज्य हो। इससे आतंकवादियों के हौंसले बढ रहे हैं। जब केंद्र सरकार और वहां की राज्य सरकार ने अलगाववादियों के सामने समर्पण कर दिया तो क्या इस देश की देशभक्त जनता मौन रह कर भारत की अखंडता के साथ खिलवाड होते देखती रहे?

भारतीय जनता युवा मोर्चा अभिनंदन का पात्र है कि उसने इस चुनौती को स्वीकार किया और लाल चौक पर तिरन्गा लहरा कर दुनिया को यह दिखाने का संकल्प लिया कि जम्मु कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है। परन्तु वहां की राज्य सरकार और केन्द्र सरकार ने अलगाववादियों के संरक्षक की तरह काम करते हुए इसको अपने लिये चुनौती माना और पहले तो प्रचार तंत्र का उपयोग करते हुए इस यात्रा को बदनाम करते हुए इसको राष्ट्रीय अखंडता के लिये खतरा बताया। परंतु देश की जनता को समझ में नहीं आया कि कैसे भारत के किसी भाग में तिरंगा फहराना देश की अखंडता के लिये खतरा है परन्तु पाकिस्तान के झंडे को फहराने देना नहीं। सम्पूर्ण देश देख रहा है कि घाटी में तिरंगे का खुले आम अपमान होता है। वहां पर तिरंगा हाथ में लेकर चलना अपराध बन गया है परन्तु तिरन्गे का अपमान करने वालों को सरकारी संरक्षण मिलता है। उमर अब्दुल्ला ने अपने दादा का अनुसरण करते हुए देशभक्त भारतीयों पर अत्याचार करने की तैय्यारी कर ली है।शेख अब्दुल्ला नें भी डा० श्यामा प्रसाद मुखर्जी के आन्दोलन को कुचलने के लिये इसी प्रकार का दमन चक्र चलाया था। अब उमर देशभक्त भारतीयों को रोकने के लिये सारे राज्य को छावनी में बदल चुके हैं। राज्य की सीमाएं सील की जा चुकी हैं, श्रीनगर जाने के सब रास्ते बंद किये जा चुके हैं, ट्रेनों को रोका जा रहा है, देश के सम्मानित नेताओं को अपमानित कर वापस भेजा जा रहा है, सारे राज्य में धारा १४४ लगा दी गई है, बी०जे०पी० के कार्यकर्ताओं की धर पकड जारी है। ये सब गैरकानूनी काम केंद्र सरकार के संरक्षण में किये जा रहे हैं। अगर इतनी तैय्यारी अलगाववादियों को रोकने के लिये की जाये तो आतंकवाद को १५ दिन में ही समाप्त किय जा सकता है। इससे साफ दिखाई देता है कि वहां पर आतंकवाद राज्य सरकार के संरक्षण में चलता है और केंद्र सरकार अपने राजनीतिक लाभ हानि के आधार पर इस षडयंत्र को समर्थन देती है। इस समय जम्मु कश्मीर में भारत का नहीं, आतंकवादियों का राज्य चल रहा है।

इस परिस्थिति में मनमोहन सिंह जी की अपील बहुत निराशाजनक है। उन्होंने गणतंत्र दिवस की गरिमा बनाये रखने के लिये इस यात्रा को रोकने की अपील की है। यह किसी को नहीं समझ में आ रहा है कि गणतंत्र दिवस की गरिमा तिरंगा फहराने में है या तिरंगे के अपमान को होते रहने देने में है । क्या उन्हें अपने पद की गरिमा का तनिक भी ध्यान था जब उन्होने देश के संसाधनों पर मुसलमानों का पहला अधिकार बताते हुए संविधान की उपेक्षा कर उनको आरक्षण देने के लिये सच्चर कमीशन या रंगनाथ कमीशन की स्थापना की थी; जब उनके सहयोगी देशद्रोही सिमी के साथ खडे होते हैं या आतंकियों की पैरवी करते हुए इंस्पैक्टर शर्मा या करकरे की शहादत को अपमानित करते हैं;जब झूठे आरोपों में उनकी पार्टी की सरकारें संतों को गिरफ्तार कर भगवा आतंक का हौव्वा खडा करने का महापाप करती हैं। वे देश के संविधान और देश की रक्षा करने के अपने संकल्प का ध्यान रखें। गैरजिम्मेदारीपूर्ण बयान व हरकतें उन के पद की गरिमा को नुकसान पहुंचा रहीं है।

जहां तक तिरंगा यात्रा का प्रश्न है उनकी नासमझ सरकार और उमर को समझ लेना चाहिये कि वे इस यात्रा को रोककर लालचौक पर तिरंगा फहराने के संकल्प को पूरा होने से नहीं रोक पायेंगे। यह संकल्प केवल भाजपा का नहीं , हर देशभक्त नागरिक का है जिसको रोकने का सामर्थ्य किसी सरकार में नहीं है। अमरनाथ यात्रा मामले में उनको पहले ही घुटने टेकने पडे थे। अब भी यही होने वाला है।

The dictatorial steps taken by the Omar Abdullah govt to to put an end to the Bharatiya Janta Yuva Morcha’s Ekta (Tiranga) Yatra reminds one of the black phase of Ayodhya’s history wherein the erstwhile Chief Minister of UP threw caution to the winds in trying to throttle the Raam-Janmabhoomi movement. Then, the borders of UP had been sealed so that the patriotic Kar-sevaks could not reach Ayodhya, this was done merely to please a section of India’s population, that takes pride in following in the footsteps of the alien, barbaric, jehadi Babar. Not only were the Raam-bhakta Hindus and their leaders arrested, but they were also subjected to inhuman torture. Trains entering UP were stopped, the Kar-sevaks were arrested, the hindu populace was subjected to indescribable torture and the unpardonable sin of shooting unarmed Hindus was resorted to. Unfortunately, the erstwhile central government, too, was hand in glove with the state government. The judgement of September 30 has proved that the Raam-Janmabhoomi movement was a great movement which resulted in removing the darkest spot in our history of slavery. The great people of the country had to take it upon itself to remove this dark spot, as successive governments, whose responsibility it was to remove this spot, had failed to do so. The people who were a part of this movement should have been felicitated and not sprayed with bullets. Today, the same history is being repeated in Jammu & Kashmir. The tricolour must be hoisted in all parts of India, especially on the 26th January and 15th of August. This is the primary responsibility of all state governments and the central government. On the contrary, in Srinagar, the capital of J & K, the flag of Pakistan is hoisted blatantly, however the state government, impotent to the core, cannot even stop them from doing so, leave alone, taking nay sort of punitive action. No political leader can unfurl the tricolour in J & K. The courageous army officers only have been carrying out this national honour. But, even this could not be done last year. One thing is crystal clear, that the Pakistani flag can be hoisted there but not the Indian tricolour. Isn’t Lal Chowk a part of India? But, it seems Pakistan rules here and not India. This encourages the terrorists. When the state government and the central government has capitulated before the separatists there, then should the country’s people remain mute spectators to India’s impending disintegration?

Bharatiya Janta Yuva Morcha deserves accolades for it accepted the challenge and by hoisting the tricolour on Lal Chowk showed the world that J & K is an inseparable part of India. But the state government and also the central government, in their effort to side with the separatists, took this up as a challenge, and by misusing the state propaganda machinery, termed this great yatra, a threat to India’s integrity. However, it was beyond every sane man in the country, how the unfurling of the tricolour in any part of India is a threat to the nation’ integrity and the unfurling of the Pakistani flag is not. The whole nation can see that the tricolour is being blatantly disrespected in the valley. Even carrying the tricolour has become a crime, whereas the ones who disrespect the tricolour are provided amnesty by the state government. Like grandfather, like grandson, Omar Abdullah is following the footsteps of his grandfather and is all prepared to commit atrocities against the Indians. His grandfather, Sheikh Abdullah, too had organised the same kind of atrocities in retaliation to Shyama Prasad Mukerjee’s movement. Now, Omar has converted the whole state into an army cantonment to stop the patriotic Indians from entering the state. The borders of the state have been sealed, all rods leading to Shrinagar have been blocked, trains are being stopped, the respectable leaders of the country are being insulted and asked to go back, section 144 has been imposed all over the state, BJP workers are being arrested. All these unlawful activities are being carried under the over lordship of the central government. Terrorism in the state won’t last for more than 15 days, if all this effort was directed against them. This makes it apparent that the central government, depending on what it gains or loses, supports the conspiracy and terrorism in the state is definitely sponsored by the state government. It is the terrorists who are ruling the valley at the moment and not the Indian state.

Manmohan Singh’s appeal at this point of time is really disheartening. He has asked the yatra to be stopped in order to save the dignity of the Republic Day. One is at a loss to understand if the dignity of the Day in hoisting the tricolor or letting it be insulted. Did he have the dignity of the nation in mind, when he talked of the Muslims have the first right on all the resources of the country, when he appointed the Sachar Committee and Ranganath committee for providing Muslim reservations, in complete violation of the constitutional provisions; when his partners stand in support of SIMI, when they go to the extent of insulting Inspector Sharma and Karkares’ sacrifice, when it arrests Hindu saints under false charges under the pretext of saffron terrorism. He should keep in mind his oath to defend the country and its constitution. Irresponsible comments are harming the dignity of his chair.

As far as the hoisting of the flag at Lal Chowk is concerned, Manmohan’s stupid government and Omar must understand that they will not be able to dent the resolve to hoist the tricolour at Lal Chowk merely by stopping the Yatra. This is not only the BJP’s resolve, it is the resolve of each and every patriotic citizen of the country and no government can undermine this resolve. They had to surrender in the Amarnath Yatra episode; they will have to surrender to the resolve of this yatra too.

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