उल्टे बांस बरेली को

दिल्ली की कश्मीर पर सर्वदलीय बॅठक निराशाजनक रही। किसी भी विषय पर स्पष्टता नहीं थी। इसके बिना ही अब एक प्रतिनिधीमंडल कश्मीर की यात्रा पर हॅ । इससे न तो कोई अलगाववादी नेता मिल रहा हॅ ऑर न ही pdp के प्रमुख नेता। जो समस्या निर्माण कर रहे हॅं, वे इनसे नहीं मिलना चाहते। फिर किससे मिलेंगे ऑर किनकी भावनाओं को समझेंगे? लद्दाख और जम्मू की जनता के दर्द को समझना ये नहीं चाहेंगे। शियाओं ने अलग सम्मेलन कर के जो आजादी के विरुद्ध प्रस्ताव पास किया हॅ ,वो ये देखना नहीं चाहते। अब ये अलगाववादियों से मिलने उनके दरवाजे पर माथा रगड रहे हॅं। इतना गिरने के बावजूद क्या हासिल कर पायेंगे? हिंसा न छोड्ने वालों से नहीं मिलेंगे, इस घोषणा के बाद भी उन के घर पर जाना क्या देश के साथ विश्वासघात नहीं हॅ? फिर भी लगता हॅ” लौट के बुद्धु घर को आयेंगे।”

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