वाराणसी का बम विस्फोट- सम्पूर्ण राष्ट्र के लिये मंथन का अवसर Varanasi Bomb Blast: The Time for Introspection for the Nation

७ दिस० की सायंकाल वाराणसी में गंगा के घाट पर गंगा आरती के समय किये गये बम विस्फोट ने पूरे देश को हिला दिया। इस भीषण कांड में एक मासूम बालक को जान से हाथ धोना पडा और लगभग २५ हिंदू भक्त गंभीर रूप से घायल हो गये। इंडियन मुजाहिदीन ने अविलम्ब इस की जिम्मेदारी को स्वीकार करते हुए एक लम्बा ई मेल भी लिख दिया जिसमे उन्होनें स्पष्ट लिखा कि भारत का मुसलमान ६ दिस०,१९९२ को नहीं भूल सकता। भारत के गृह मंत्री चिदम्बरम साहब भी रस्म अदायगी के लिये वाराणसी पहुंच गये और राज्य सरकार तथा केंद्र सरकार के बीच आरोप प्रत्यारोप का सिलसिला शुरू हो गया। इसकी जिम्मेदारी से दोनों सरकारें ही नहीं, भारत के वे सैक्युलरिस्ट भी नहीं बच सकते जो अभी भी बाबरी ढांचे को मस्जिद कहते हैं और भारत के मुसलमानों को बार-बार बाबर जैसे विदेशी हमलावरों के साथ जोड कर उन्हें देश की मुख्य धारा से नहीं जुडने दे रहे हैं। इन सब लोगों के ही कारण इनका एक वर्ग अपने आप को हमलावर की मानसिकता से अलग नहीं कर पा रहा है। इसी कारण कुछ मुस्लिम युवक आतंकी गतिविधियों में संलिप्त रहते हैं तथा हिंदुओं का रक्त बहाने में गौरव का अनुभव करते हैं। गजनी, बाबर, हुमायूं कौन सा आदर्श प्रस्तुत कर सकते हैं, यह इनको अवश्य ध्यान में आना चाहिये।

इंडियन मुजाहिदीन ही नहीं भारत के मुसलमानों का एक वर्ग यह सोचता है कि उन्हें ६ दिस० का बदला लेना चाहिये। यह तर्क वे केवल अपने जेहादी कृत्यों को तार्किक आधार देने के लिये प्रयोग करते हैं। क्या वे दुनिया को बेवकूफ समझते हैं? पिछले १४०० वर्षों से जेहाद के नाम जो भीषण्रक्तपात हुए हैं, उनका ६ दिस० से क्या सम्बंध है? भारत का विभाजन, विभाजन के समय लाखों हिंदुओं की निर्मम हत्या, कश्मीर घाटी से हिंदुओं का सफाया जैसे पचासों उदाहरण दिये जा सकते हैं जो ६ दिस० की घटना से कहीं पहले हो चुके हैं। यदि बाबरी ध्वंस को वे १९९२ के बाद की आतंकी घटनाओं के लिये उचित आधार मानते हैं तो वे स्वयम ही तय कर लें कि हिन्दुओं पर किये गये पैशाचिक अत्याचारों के लिये उन्हें क्या सजा देनी चाहिये? यह समय मुस्लिम समाज के लिये भी मंथन का है। वे जेहाद के मार्ग पर चलकर विध्वंस का मार्ग चुनना चाहते हैं या देश की जडों के साथ जुड कर अपनी आने वाली पीढी के लिये विकास का मार्ग। मैंने स्वयं ५ दिस० को वाराणसी में एक विशाल धर्मसभा को संबोधित करते समय उनसे यह अपील बहुत विस्तृत रूप में की थी। यदि इस अपील का यही जवाब है तो उन्होनें विनाश का मार्ग चुना है।

८ दिस० के सफल वाराणसी बंद से उन्हें ध्यान में आ जाना चाहिये कि हिन्दु समाज गुस्से में है। काशी के इतिहास में यह पहली बार हुआ है कि वहां के विद्वत समाज नें विरोधस्वरूप गंगा आरती को भी तीन दिन के लिये रोक दिया है। यदि इस आक्रोश की दिशा बदल गयी तो इसका क्या परिणाम हो सकता है, इसको आसानी से समझा जा सकता है। चिदम्बरम साहब ने कहा कि विस्फोट के बावजूद लोग अपने स्कूल, कालेजों में बच्चों को भेज रहे हैं तथा अपने काम काज पर इस तरह जा रहे हैं जैसे कुछ हुआ ही नहीं हो। इसके लिये उन्होनें वहां के लोगों को बधाई भी दी। क्या वे समाज को क्या इतना स्वार्थी और आत्म केंद्रित बनाना चाहते हैं कि जब तक उनके घर का कोई नहीं जाये वे चिंता न करें? उन जैसे राजनेता समाज को किस दिशा में ले जाना चाहते हैं? उन्हें वहां के समाज को बधाई तो देनी चाहिये परंतु वह बधाई सफल बंद के लिये होनी चाहिये। इस अवसर पर उन्हें बाबा विश्वनाथ की नगरी में आतंकवाद को निर्मूल करने का संकल्प लेना चाहिये तथा बाबा को आश्वासन देना चाहिये कि वे वोट बैंक या अन्य किसी राजनीतिक स्वार्थ की परवाह किये बिना आतंक को जड मूल से समाप्त कर देंगे। आतंकवाद को समाप्त करने के लिये उन्हें यही तेवर अपनाने होंगे। इंडियन मुजाहिदीन का केंद्र वाराणसी के ही नजदीक आजमगढ में है, यह तथ्य किसी से छुपा नहीं है। इसके बावजूद उन पर कठोर कार्यवाही क्यों नही हो पायी, इसका जवाब राष्ट्र को चाहिये। अभी तक हो रही जांच में शक की सूईयां आजमगढ की ओर ही संकेत कर रही हैं। पहले भी कई आतंकी घटनाओं के कर्णधारों का केन्द्र यही शहर पाया गया था परन्तु दिग्विजय सिंह जैसे नेताओं के उनके साथ खडे होने के कारण उन आतंकियों पर कोई कार्यवाही नहीं हो सकी थी। इसका यह अर्थ स्पष्ट है कि वाराणसी के विस्फोट के लिये कांग्रेस ही जिम्मेदार है।

हिंदू समाज को भी कुछ बातों पर विचार करना होगा। आतंकवाद की यह जंग हिंदू समाज के खिलाफ है। उन्हें यह लडाई स्वयं लडनी होगी। निहित स्वार्थों से बंधी सरकारें समाज के संकल्प को देख कर ही प्रतिक्रिया करेगीं। जब उनको लगेगा कि हिंदू समाज का आक्रोश उनकी गद्दी के लिये भारी पड जायेगा तो ही वे हिंदूओं के साथ खडे होंगे और देश की रक्षा के लिये उचित कदम उठायेंगे। रामजन्म भूमि पर मंदिर का निर्माण इसी संकल्प को प्रकट करेगा। आज हम सबको इसके लिये प्राणपण से जूटना पडेगा।

 

The bomb blast during the Ganga arti ceremony at the Ganga Ghat on 7th December shook the whole nation. An innocent girl child succumbed to her injuries and some 35 Hindu devotees were seriously injured. The Indian Mujahideen subsequently shot off a long email claiming responsibility for the blasts and asserting the fact that the Muslim community will not forget the demolition of the Babri Masjid. The Home Minister, P Chidambaram made a routine visit to the blast site at Varanasi for the sake of formality and then ensued the blame game between the centre and state on the issue of providing security. However, not only can the two governments absolve themselves from taking responsibility for the blasts, but also the pseudo-secularists of the country cannot be forgiven for they are the ones who are still relentlessly calling the Babri structure, a mosque, not only this, they are the ones who have also been equating India’s Muslims with the alien Babar, thus making it impossible for them to join the mainstream. It is because of this that a certain class of the Indian Muslim still suffers from the mentality of an invader. It is only because of this that some Indian Muslims have taken to terrorism and consequently take pride in shedding Hindu blood. They should ask themselves what great ideal the invaders like Ghazni, Babar and Humayun have enshrined that they are hailing them as their heroes.

Not only the Indian Mujahideen, but there is actually a class of Muslim that thinks that they should avenge December 6. They use it as a tool to provide a logical base to their jehadi tactics. Do they think the world is blind and can’t see through their game? The kind of bloodshed that has taken place in the last 1400 years has no comparison to what happened on December 6. The partition of India on religious grounds, the dastardly killings of Hindus during the partition riots, the extermination of Hindus from the Kashmir valley happened much before December 6. If they have set a cut-off date of December 6 as the base for all their terrorist activities, then what must be the price and punishment that they will have to pay for the atrocities they have perpetrated on the Hindus? Do they want to choose the path to annihilation by jehad or do they want to join the mainstream and secure a good future for their children? On the 5th December, I had myself appealed to them to choose the path of development, but if this is the response to that appeal, then it means that they have chosen the path to destruction.

The successful December 8 bandh should serve as a reminder to them that the Hindu anger is on the boil. This has happened for the first time that even the Vidvat samaaj of Kashi have put a stop to the Arti ceremony for three days in protest. One can very well understand what will happen if this anger were to find some other means of expression. Chidambaram congratulated the people of Varanasi for the resolve they are showing in getting back to the normal routine of daily work, children going to school and colleges as if nothing untoward had happened. Does Chidambaram want the people to become so selfish that he expects them to show grief only when someone from their family dies in a blast? Where do leaders like Chidambaram want this country to head? Chidambaram should have definitely congratulated the people of Varanasi but that should have been for the successful bandh. On this grim occasion, he should have resolved to root-out the scourge of terrorism in the city of Baba Vishwanath and assure Babaji that he would do this without any selfish motive and the lure of vote-bank. He will have to don the mantle of a righteous politician if he is serious about rooting our terrorism from the country.

The Hindu society too, will have to do some brainstorming. The war of terror is a war against Hindusim and the Hindus will have to fight this war against terrorism on their own. Governments will always act only in the direction that the wind flows. They will take steps to save Hinduism only when they are dead sure that the Hindu wrath might overthrow them. The construction of a temple at Ram Janmbhoomi will be go a long way towards fulfilling this resolve. Today, we will all have to get together in mind, body and spirit to make this a reality.