अमरनाथ यात्रा की अवधि कम करने के राष्ट्रविरोधी षडयन्त्र को विफल करने मे विश्व हिन्दू परिषद की भूमिका

अनादिकाल से चली आ रही बाबा अमरनाथ यात्रा का हमेशा से ही राष्ट्रीय महत्त्व रहा है | इस यात्रा को बंद करने के लिए मुस्लिम आक्रमणकारियों ने हमेशा ही भरपूर प्रयास किया है परन्तु राष्ट्र के संकल्प के सामने उन्हें हमेशा ही मुंह की खानी पड़ी | अफगानों के समय के कुछ दशको को छोड़कर वे कभी इस पावन यात्रा को बंद करने में सफल नहीं हो पाए | जेहादी आतंकियों ने भी हिंसा के आधार पर इस यात्रा को बंद करने का हरसंभव प्रयास किया | परन्तु अमर कथा की साक्षी इस पावन गुफा के दर्शन करने से वे हिन्दू समाज को रोक नहीं पाए | ऐसा लगता है कि अमरता के प्रतीक बाबा अमरनाथ की यह पावन यात्रा भी उन्ही की भांति मृत्युंजय बन गई है | किसी भी प्रकार का अत्याचार या मृत्यु का भय भी इस पावन यात्रा को अवरुद्ध नहीं कर पाया | लेकिन जेहादियों को अपने लक्ष्यों को पूरा करने में यह यात्रा बहुत बड़ी बाधा लग रही है | उन्हें ध्यान में आ गया कि जब तक यह यात्रा चलेगी हिन्दू समाज घाटी में आता रहेगा और जब तक वह आता रहेगा घाटी को दारुल इस्लाम बनाने का उनका संकल्प पूरा नहीं हो पायेगा | इसलिए अब उन्होंने “मुस्लिम वोट बैंक की ताकत के भ्रम” का प्रयोग कर अपने इस एजेंडे को लागू करने का प्रयास शुरू कर दिया | सबसे पहले उन्होंने २००८ में बाबा की जमीन का अनावश्यक विवाद निर्माण किया परन्तु जम्मू के शिवभक्तो के अतुलनीय पुरुषार्थ के सामने उन्हें परास्त होना पड़ा | इसके बाद उनकी अगली चाल बहुत ही चतुराई के साथ चली गई | २००९ में कुछ अलगाववादी नेताओं ने कहना शुरू कर दिया कि अब वे इस यात्रा को तीस दिन से अधिक नहीं चलने देगे और उसके बाद घाटी के अलगाववादियों के स्वर में साथ देने के लिए केवल वहा के मुस्लिम नेता ही नहीं जम्मू कश्मीर के वर्त्तमान राज्यपाल भी आगे आ गए | वहा के राज्यपाल अमरनाथ श्राइन बोर्ड के पदेन अध्यक्ष होते है परन्तु इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या होगा कि जिनको यात्रा के विकास का काम दिया गया था वे अब यात्रा के विनाश के काम में लग गए | यात्रा की अवधि कम करते-करते उसे बंद करने के अलगाववादी एजेंडे को पूरा करने के लिए अब वे पूरी तन्मयता के साथ उनके सेवक की भांति काम करने लगे | २०१० में ५५ दिन ,२०११ में ४५ दिन और अब २०१२ में ३९ दिन करके इन्होने अपने इरादे स्पष्ट कर दिए है |
इस पावन यात्रा की रक्षा के लिए विश्व हिन्दू परिषद् हमेशा ही सन्नद्ध रही है | १९९५ में जब आतंकवाद के कारण यह स्थिति आ गई थी कि पावन छड़ी को भी हैलिकोप्टर से ले जाने पर सोचा गया था तब विश्व हिन्दू परिषद् ने बजरंग दल को इस चुनौती का उत्तर देने के लिए कहा था और बजरंग दल ने इस चुनौती को स्वीकार किया था | १९९६ में बजरंग दल ने ५१००० बजरंगियों को इस यात्रा पर जाने का आह्वान किया था | तब बजरंग दल के आह्वान का समाज ने भी उत्तर दिया और १००००० से भी अधिक यात्री दर्शन के लिए आये | इससे बड़ा उत्तर और क्या हो सकता था ? तब से यात्रियों की संख्या लाखो में होने लगी | सन २००० में आतंकियों ने पहलगाम के आधार शिविर पर भीषण हमला किया था | तब विहिप ने भारत बंद का सफल आयोजन किया था और देश के आक्रोश के कारण ही श्राइन बोर्ड का गठन किया गया था और मुखर्जी कमेटी की स्थापना की गई थी | इन प्रयासों के परिणामस्वरूप ही यात्रा के स्वरूप में क्रांतिकारी परिवर्तन हुए | तत्कालीन राज्यपाल के दृढ़ निश्चय के कारण ही यात्रा का खोया हुआ वैभव लौटाने में सफलता मिल रही थी | परन्तु अलगाववादियों को यह कैसे हजम हो पाता | २००८ में जब मंत्रिपरिषद के एक आदेश के द्वारा अमरनाथ पर्वत की कुछ जमीन को यात्रा की व्यवस्था के लिए कुछ जमीन को अस्थायी तौर देने का निश्चय किया गया और विधानसभा तथा न्यायपालिका की स्वीकृति के
बावजूद अलगाववादियों ने इस निर्णय का विरोध किया तब भी विहिप और अन्य सहधर्मी संगठनो के प्रयासों के कारण ही एक अद्वितीय आन्दोलन हुआ | इस आन्दोलन के परिणाम स्वरूप जम्मू ६३ दिन बंद रहा और सरकार को पहली बार हिन्दू समाज की भावनाओं का सम्मान करते हुए बाबा की धरती वापस करनी पड़ी थी | इस आन्दोलन का वर्णन हिन्दू नवजागरण के इतिहास में स्वर्णाक्षरो में लिखा जाएगा | जब २००९ से अवधि के छेड़खानी का षडयंत्र प्रारम्भ हुआ तो विहिप कैसे चुप बैठ सकता था | इसलिए तब से ही विहिप ने इस षडयंत्र को धराशायी करने का संकल्प लेकर इस दिशा में सार्थक कदम उठाने शुरू कर दिए |
वर्त्तमान राज्यपाल और श्राइन बोर्ड तो २००९ में ही यात्रा को ५५ दिन की करना चाहता था परन्तु विहिप के द्वारा चेतावनी देने पर वे उस समय तो नहीं कर पाए | परन्तु २०१० में बोर्ड के द्वारा अचानक ही ५५ दिन की घोषणा करने पर सभी हतप्रभ रह गए | विहिप के विरोध पर राज्यपाल ने अपनी गलती मानी और २०११ में वापस ६० दिन की करने का आश्वासन दिया | २०११ आते ही बिना किसी को विश्वास में लिए राज्यपाल ने यात्रा को और भी घटाकर ४५ दिन की कर दिया | अब तक यह स्पष्ट हो चुका था कि राज्यपाल एक निश्चित योजना से अवधि को निरंतर कम करने के लिए प्रतिबद्ध है | वे निश्चित रूप से अलगाववादियों के अधूरे एजेंडे को पूरा करने के लिए यात्रा को कम करते करते समाप्त करना चाहते है | उस समय संघर्ष की घोषणा की गई परन्तु समाज व प्रशासन के कुछ वरिष्ठ लोगो के हस्तक्षेप और आश्वासन के बाद कुछ समझौते किये गए परन्तु राज्यपाल द्वारा धोखा देने के बाद यह समझ में आ गया कि राज्यपाल वार्ताओं में उलझाकर संघर्ष की धार को कम करने की शकुनी चाल में निपुण है और आश्वासनों के बावजूद वे अपने एजेंडे पर ही चलेगे तो २०१२ में इस स्थिति की पुनरावृत्ति रोकने के लिए २०११ से ही प्रयास प्रारम्भ करने का निश्चय किया गया | विहिप के केन्द्रीय नेतृत्व ने एक निश्चित कार्ययोजना बना कर इसको सिरे पर चढाने के लिए एक टोली का निर्माण किया जो पूरे वर्ष ही इस दिशा में कार्यशील रही | विहिप का केन्द्रीय नेतृत्व जानता था कि बोर्ड का चरित्र हिन्दू विरोधी है और उनसे हिन्दू समाज की भावनाओं के सामान की अपेक्षा नहीं की जा सकती | लेकिन हम उन्हें हटा नहीं सकते थे इसलिए उनसे मिलकर अपना पक्ष उनके सामने रखने का प्रयास किया गया | इसमे आंशिक सफलता मिल रही थी कि बोर्ड ने एक ऐसी चाल चली जो न केवल अनैतिक थी अपितु यात्रा के भविष्य के लिए खतरनाक भी थी | उन्होंने कुछ लंगरवालो से यह लिखवा लिया कि यात्रा एक माह से अधिक की नहीं होनी चाहिए | यात्रा की अवधि और मुहूर्त तय करने का काम साधू संतो का है जो परम्पराओं का ध्यान रखते हुए इस विषय में निर्णय ले सकते है | इसमे लंगर वाले कही भी नहीं आ सकते| इसके बावजूद उन्होंने अपने इस घृणित खेल में लंगरवालो को भी मोहरा बंनने में कोई संकोच नहीं किया | वर्ष २०१२ के लिए यात्रा का मुहूर्त २५ जून वे अक्तूबर में ही तय कर चुके थे | इसकी चर्चा वे अनजाने में विहिप के एक प्रतिनिधिमंडल के सामने कर चुके थे | इस षडयंत्र का खुलासा उसी समय इस प्रतिनिधिमंडल ने जम्मू में प्रैस के सामने किया और बाद में एक उपसमिति के सदस्य स्वामी ज्ञानानंद जी ने भी किया | यह तर्क किसी को भी समझ में नहीं आ रहा था कि ८ महीने बाद की घोषणा अभी कैसे की जा सकती है | इस तरह के अनेको छल कपट किये जा सकते है , यह अनुमान पहले था | इसलिए हम पूरे वर्ष की कार्ययोजना बना कर उसे भी कार्यान्वित कर रहे थे | उसी का परिणाम था कि उनके षडयंत्र लागू होने से पहले ही उनका साक्ष्यो के साथ भंडाफोड़ किया जा सका |
विहिप की टोली को ध्यान में था कि यह लड़ाई लम्बी चलनी है | हम इस लड़ाई से कई मुद्दे हमेशा के लिए सुलझाना चाहते है | यात्रा की अवधि व मुहूर्त का विषय हमेशा नहीं उठना चाहिए | इससे अनिश्चितता का वातावरण बनाता है जो यात्रा के लिए ठीक नहीं है | इसकी एक प्रक्रिया हमेशा के लिए तय हो जानी चाहिए | यात्रा का संचालन करने में बोर्ड के अलावा सामाजिक संगठनो की भूमिका , यात्रा के विस्तार की संभावना, यात्रियों के लिय सुविधाओं का विस्तार के अलावा यात्रा की एतिहासिकता और इसके संचालन में बोर्ड के दायित्व और अधिकारों पर भी विस्तृत अध्ययन की आवश्यकता थी | इसके लिए जम्मू में केवल अमरनाथ के विषय पर एक कार्यशाला का आयोजन नवम्बर २०११ में किया गया किया गया | इस विषय के कई जानकार सामने आये और कई महत्वपूर्ण तथ्यों को उजागर किया गया | इस यात्रा की एतिहासिकता के प्रमाणों को सामने लाया गया | अनादिकाल से चली आरही इस यात्रा के कम से कम पाच हजार वर्ष पुराने अकाट्य साक्ष्यो के सामने आने पर बूटा मालिक के नाम से रचा गया भ्रम दूर हो गया | इस कहानी को केवल यात्रा की एतिहासिकता पर प्रश्न चिन्ह लगाने के रचा गया था | इसके अतिरिक्त यात्रा पर जाने के लिए कभी प्रयोग में आने वाले ६ मार्गो की भी जानकारी मिली जिन पर काम करके भविष्य में यात्रा का विस्तार किया जा सकता है | यात्रा की अवधि के बारे में यह तथ्य सामने आये कि बाबा के दर्शन के लिए तो यात्री हमेशा ही पूरे वर्ष जाते रहते थे | मौसम खराब होने पर रुकते थे , ठीक होने पर चल देते थे | केवल आदि शंकराचार्य द्वारा प्रारम्भ की गई पावन छड़ी यात्रा की अवधि तय थी, यात्रियों के लिए समय का कोई बंधन नहीं था | इस यात्रा में कभी व्यवधान नहीं पड़ा | केवल आतंकवाद के दिनों में ही यात्रा की अवधि को सीमित किया गया | यात्रियों की संख्या बढते जाने कारण ही तत्कालीन राज्यपाल द्वारा ६० दिन का प्रस्ताव आया जिस पर न्यायपालिका ने अपने आदेश की मोहर लगा दी |इसी निर्णय में राज्य सरकार की भूमिका भी सीमित कर दी गई व बोर्ड को ही संचालन के अधिकार दिए गए परन्तु उनको भी यात्रा के आतंरिक विषय जैसे अवधि, मुहूर्त आदि के विषय में दूर रहने के संकेत किये गए | इसलिए बोर्ड द्वारा किये जा रहे अतिक्रमणों का भी विस्तार से अध्ययन किया गया | छड़ी यात्रा का समापन श्रावण पूर्णिमा को होता है | इसलिए साठ दिन पूर्व यदि यात्रा प्रारम्भ करनी है तो यह ज्येष्ठ पूर्णिमा को ही हो सकती है | इसलिए २००४ से २००९ तक यह यात्रा ज्येष्ठ पूर्णिमा ही शुरू हुई | इस यात्रा में परम्पराए विकसित होती रही है | मा उच्च न्यायालय और मुखर्जी कमेटी की बात मानकर ६० दिन यात्रा चलानी ही पड़ेगी और उसके लिए ज्येष्ठ पूर्णिमा को ही यात्रा शुरू हो सकती है | यह विषय भी विचार में आया | ऐसे और भी अनेक मुद्दों पर इस कार्यशाला में स्पष्टता निर्माण हुई जो यात्रा सम्बन्धी भावी आन्दोलन और प्रयासों के लिए आवश्यक थी |
जब यह ध्यान में आ गया कि अब बोर्ड २५ जून को ही यात्रा प्रारम्भ करने की हठधर्मिता कर रहा है और उसके लिए तरह तरह के कुतर्को का सहारा ले रहा है तो यह स्पष्ट हो गया था कि आन्दोलन के अतिरिक्त अन्य कोई मार्ग नहीं बचा है | ४ मार्च को जम्मू में प्रैस वार्ता लेकर विहिप के अंतर्राष्ट्रीय कार्याध्यक्ष डा प्रवीन भाई तोगड़िया ने इस आन्दोलन की घोषणा कर दी | उसके बाद यह निर्णय लिया गया कि महामहिम राष्ट्रपति ,मा.प्रधानमंत्री और गृह मंत्री से मिलकर जम्मू कश्मीर के राज्यपाल द्वारा यात्रा के सम्बन्ध में लिए गए अनाधिकृत निर्णय और अन्य अनियमितताओं के सम्बन्ध में एक प्रतिवेदन दिया जाए | राज्यपाल इनके निर्देशों पर ही काम करते है ,इसलिए इस विषय में उनकी भूमिका भी देश के सामने स्पष्ट हो जानी चाहिए | मा. अशोक जी को इस प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व करना था , परन्तु दुर्भाग्य से उनमे से किसी से भी जब समय नहीं मिला तो यह प्रतिवेदन प्रैस के माध्यम से सार्वजनिक करना पड़ा | सांसदों से मिलकर हिन्दू आस्थाओं के साथ हो रहे इस खिलवाड़ के सभी दस्तावेज उन्हें दिए गए | लोकसभा में पूज्य योगी आदित्यनाथ जी और राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष श्री अरुण जेतली ने बहुत प्रभावी ढंग से यह विषय उठाया| परन्तु हिन्दू भावनाओं की हमेशा से ही उपेक्षा करने वाली इस केन्द्रीय सरकार ने न तो संसद में इन प्रश्नों का कोई उत्तर दिया और न ही कोई कार्यवाही की |
इस बीच अमरनाथ यात्रा के इतिहास का एक बहुत महत्वपूर्ण घटनाक्रम हो गया | २० मई को जम्मू में शिवभक्तो का एक सम्मलेन आयोजित किया गया | इस सम्मलेन में ज्योतिष पीठाधीश
पूज्य जगदगुरु शंकराचार्य जी ने स्वयं उपस्थित होकर कई महत्वपूर्ण तथ्यों को उजागर किया | जिस पावन छड़ी यात्रा को आदि शंकराचार्य जी ने शुरू किया था ,उसे ४०० साल तक यही पीठ संचालित करती रही है | बाद में इनकी पीठ ने ही यह काम रामानंदी अखाड़े को सौंपा था | इसके अतिरिक्त शैव परम्परा के अनुसार अमरनाथ का क्षेत्र उनकी पीठ के अंतर्गत ही आता है इसलिए
उनका ही निर्णय इस विषय में सर्वोपरि है | संतो के बीच में और सार्वजनिक सभा में उन्होंने बहुत स्पष्ट घोषणा की ,” यह यात्रा पहले भी पूरे वर्ष चलती थी , अब भी चलनी चाहिए |इस यात्रा में जितना महत्त्व पवित्र बर्फानी शिवलिंग का है ,उतना ही महत्त्व पवित्र गुफा का भी है क्योकि यह गुफा अमरकथा की साक्षी है |वर्तमान परिस्थिति के अनुसार इस यात्रा को कम से कम दो माह चलाना चाहिए और इसका मुहूर्त ज्येष्ठ पूर्णिमा ही होना चाहिए |” इस स्पष्ट व अधिकृत घोषणा के बाद अब किसी उपसमिति या बोर्ड के निर्णय का कोई अर्थ नहीं रह जाता | अब किसी को इस विषय में दखल देने का कोई अधिकार नहीं रह जाता | लेकिन इसके बावजूद बोर्ड अपनी पुरानी रट लगाए रटता रहा |
विश्व हिन्दू परिषद् के संकल्प और जगदगुरु के आदेशानुसार यात्रा ज्येष्ठ पूर्णिमा(४ जून ) को ही शुरू होनी थी | इसके लिए देशभर के शिवभक्तो का जमावड़ा १ जून को ही जम्मू में लगना शुरू हो गया | प्रशासन ने शिवभक्तो को लखनपुर की सीमा पर ही रोकना शुरू कर दिया | परन्तु स्थानीय समाज और शिवभक्तो के दबाव के सामने वे उन्हें रोकने में अक्षम रहे | उन्हें ध्यान में आ गया कि ये लोग लखनपुर में ही भाषण देकर वापस जाने वाले नहीं है | प्रशासन के इस रुख की पहले से कल्पना होने के कारण यह तय किया गया था कि इस बार यात्रा ६ स्थानों से शुरू की जायेगी | इस योजना के कारण प्रशासन भयभीत था | उन्हें बार-बार २००८ का भय सताता था | वे बार बार शांत रहने के लिए निवेदन कर रहे थे | कुछ शिवभक्तो को हर परिस्थिति में गुफा तक पहुचने के लिए भी तैयार किया गया था | वह टोली बालटाल तक पहुच गई और शिवभक्तो के संकल्प की ताकत का लोहा प्रशासन को मानने के लिए मजबूर कर दिया | ३ जून को ही विभिन्न स्थानों से लगभग १०००० शिवभक्तो ने बाबा के दर्शन के लिए प्रस्थान किया | इनमे से ५००० लोगो को गिरफ्तार किया गया |यह क्रम पूर्वनिर्धारित योजना के अनुसार तीन दिनतक चला | इस बीच प्रशासन व बोर्ड ने इस आन्दोलन को बदनाम करने व समाज और संतो को तोड़ने के लिए कई हथकंडे भी चले लेकिन इस बार ये सब प्रयास उन पर ही भारी पड़े | वे प्रतिदिन बर्फ से ढंकी चोटियों के चित्र यह दिखाने के लिए प्रसारित करते थे कि अभी मार्ग उपयुक्त नहीं है | यह सिद्ध करने पर कि वे चित्र पुराने है और अलग अलग कैमरों से तथा अलग अलग समय पर लिए गए है,उनके विरोध में स्थानीय मीडिया और समाज में एक वातावरण बन गया | अप्रैल २०११ में वहा कुछ यात्री गए थे और उनके चित्र तथा समाचार पत्रों की कटिंग सामने लाने पर वे यह स्पष्ट नहीं कर पाए कि जो मार्ग अप्रैल में ठीक था वह अब कैसे खराब हो सकता है | जिन लंगर वालो से लिखवाया गया था ,उनके विरोध में वातावरण बनने के कारण अब वे भी सुरक्षात्मक स्थिति में आ गए थे | जब एक अधिकारी ने जम्मू के कुछ लोगो से कहा कि यह विहिप का नैशनल एजेंडा है और इसको लखनपुर से बाहर रखो , तब उन प्रतिनिधियों ने कहा कि आप अलगाववादियों का एंटी नैशनल एजेंडे को अनुमति दे सकते हो नैशनल को नहीं , समस्त प्रशासन को मानो लकवा मार गया हो | उसके बाद वे आन्दोलन के विरुद्ध कुछ भी कहने का साहस नहीं कर पाए | इसके लिए वहा का स्थानीय मीडिया भी उतना ही बधाई का पात्र है जितना वहा का समाज।
इस आन्दोलन को करते समय ही यह सभी को स्पष्ट था कि इस दिशा में यह अंतिम आन्दोलन नहीं होगा | फिर भी इस आन्दोलन की कुछ उपलब्धिया है जिनका वर्णन उपयुक्त रहेगा | आन्दोलन के इस चरण के बाद अब यह तय हो गया है कि अब कोई भी ज्येष्ठ पूर्णिमा की उपेक्षा नहीं कर सकता | इस तिथि पर अब हर परिस्थिति में प्रथम पूजन होगा ही | इसका सीधा सा अर्थ है कि अब यात्रा दो महीने की ही होगी | अभी तक बोर्ड न्यास व विहिप की भूमिका को नकारने की कोशिश करता था ,अब कोई भी निर्णय लेने से पहले इनको विश्वास में लेना ही पडेगा | जगद गुरु शंकराचार्य जी की घोषणा के कारण वे सभी तत्व जो बोर्ड के षडयन्त्रो में साथ देते थे अब महत्वहीन हो गए है | विहिप जम्मू कश्मीर के पदाधिकारी इतने लम्बे आन्दोलन के बाद आराम करने के लिए शांत नहीं बैठ गए |इस आन्दोलन के बाद अगला लक्ष्य घोषित करने के लिए उन्होंने ५ जून को ही थकाने वाला एक और अभियान प्रारम्भ कर दिया | राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री व गृह मंत्री से मिलने का समय माँगा गया और समय न मिलने पर भी उन्होंने तय किया कि वे सड़क मार्ग से दिल्ली जायेगे और मार्ग में कही प्रैस वार्ता या सभा के माध्यम से अपनी बात समाज तक पहुचायेगे | दिल्ली पहुचने पर जैसा हिन्दू भावनाओं के प्रति संवेदन शून्य अधिकारियों से अपेक्षित था , वे नहीं मिले परन्तु इस प्रतिनिधिमंडल ने अपना विषय उन तक पहुचा दिया| अब आगे के जिन विषयो पर कभी आन्दोलन और कभी जनदबाव के माध्यम से निर्णय करवाना है वे है :
१. जम्मू कश्मीर के वर्त्तमान राज्यपाल जिनके कारण ही २००८ में भी आन्दोलन करना पड़ा था, उनको वापस बुलाया जाए |
२.वर्त्तमान श्राइन बोर्ड का चरित्र पूर्णत हिन्दू विरोधी है | इस बोर्ड का पुनर्गठन हो |
३.जिस काम के लिए बोर्ड बना है ,वह अपने को उन कामो तक सीमित रखकर कुछ परिणाम दिखाए | जैसे मार्गो को चौड़ा करना ,नए अस्पताल और यात्री निवास बनाना आदि |
४. जिन विषयो पर वर्त्तमान आन्दोलन के माध्यम से निर्णय कराया जा चुका है ,उनको लिपिबद्ध कराना जिससे इन विषयो पर भविष्य में कोई विवाद न खड़ा किया जा सके |

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