विश्व हिन्दू परिषद – आंदोलन एवं परिणाम

विश्व हिन्दू परिषद एक जनसंगठन है । राष्ट्रीय ,सामाजिक और धार्मिक मुद्दों पर जनमत निर्माण करने के लिए विहिप ने कई प्रकार के आंदोलन किये हैं । आंदोलनों के माध्यम से विहिप ने अपना संदेश जन -जन तक पहुंचाया है और समाज को जोड़कर सरकार एवं हिंदूविरोधियों पर बनाकर वांछित परिणाम प्राप्त किये हैं । किसी भी लोकतंत्र में अपनी मांगे मनवाने यही साधन होता है । विहिप का जन्म भारत की सभी आध्यात्मिक परम्पराओं के प्रमुख संतों के मंथन के परिणामस्वरूप हुआ है । इसलिए इसके सभी आंदोलन भारत की संतशक्ति के मार्गदर्शन ,आदेश और प्रेरणा द्वारा प्रारम्भ हुए हैं । उनके आशीर्वाद से विहिप अपने अधिकांश आंदोलनों में वांछित परिणाम प्राप्त किये हैं और समाज जागरण की दिशा में अदभुत और चमत्कारिक आयाम स्थापित किये हैं । विहिप की स्थापना के समय पूज्य संतों और पूज्य गुरु जी ने विहिप के सामने लक्ष्य रखा था ,”हिन्दू समाज की नवचेतना और नवजागरण करते हुए गौरव को प्राप्त करना ।” स्वर्णजयंती वर्ष के अवसर गत ५० वर्षों का अवलोकन करते हुए यह विश्वास होता है की विहिप अपने लक्ष्य को साकार रूप देने में सफल हो रहा है । इस सफलता में उसके द्वारा किये गए आंदोलनों का प्रमुख योगदान रहा है । इस अवसर पर कुछ प्रमुख आंदोलनों व् उनकी उपलब्धियों की चर्चा बहुत आवश्यक है ।

रामजन्मभूमि मंदिर निर्माण आंदोलन
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रामजन्मभूमि मंदिर निर्माण आंदोलन इतना प्रबल और परिणामकारी रहा की आज भी यह आंदोलन विहिप की पहचान गया है । इस आंदोलन के इतिहास बहुत कुछ लिखा जा चुका है । १५२८ में बाबर के सेनापति के द्वारा इस पावन मंदिर को तोड़ने के बाद इसको पुनः प्राप्त करने के लिए हिंदू समाज ने ७६ लड़ाइयाँ लड़ी । इससे यह स्पष्ट हो जाता है की इस पावन स्थल पर मंदिर का निर्माण हिन्दू समाज का संकल्प है । ७ अप्रैल , १९८४ को दिल्ली के विज्ञान भवन में आयोजित धर्मसंसद ने इस पावन मंदिर के निर्माण का संकल्प लिया और देशभर में ” रामजानकी रथयात्राओं ” के माध्यम से जनजागरण के एक कार्यक्रम की घोषणा की । इस कार्यक्रम का इतना प्रभाव था कि तत्कालीन केंद्र सरकार को विवश होकर १ फरबरी ,१९८६ में रामजन्मभूमि का ताला खोलना पड़ गया । १९८९ में ३ लाख स्थानों पर हुए शिलापूजन के अद्वितीय कार्यक्रमों ने हिंदू समाज के आंदोलित स्वर को इतना सशक्त और संगठित रूप दिया की रामविरोधियों के हौसले पास्ट होते चले गए तथा मंदिर निर्माण की दिशा में मार्ग प्रशस्त होते चले गए । जिस भूखंड को सरकार विवादास्पद मानती थी , जनआंदोलन के दबाव के कारण सरकार ने उसे रातों -रात गैरविवादित घोषित कर दिया । उसी स्थल पर १० नवम्बर , १९८९ को एक अनुसूचित जाति के कार्यकर्ता ,श्री कामेश्वर चौपाल द्वारा मंदिर का शिलान्यास हो गया । ३० अक्टूबर ,१९९० को पहली कारसेवा की घोषणा होते ही तत्कालीन राज्यसरकार द्वारा हिन्दू समाज पर बर्बर दमन चक्र चलाने के बावजूद वह कार सेवा पूर्ण हुई । हिन्दू समाज के इस साहसपूर्ण सफल संघर्ष ने सम्पूर्ण विश्व को अचंभित कर दिया । २ नवम्बर , १९९० की बलिदान गाथा अभी भी मानस – पटल पर अंकित है । केंद्र सरकार व् सभी सेक्युलरिष्टो द्वारा चलाये गए षडयंत्र भी हिन्दू समाज को भ्रमित नहीं कर पाये और ६ दिसंबर ,१९९२ को बाबरी ढांचे का अस्तित्व ही इस पावन धारा से उडा दिया गया । २०१० में मा. उच्च न्यायालय के निर्णय ,” बाबर नाम के एक विदेशी हमलावर ने राम मंदिर को तोडा था और उसके स्थान पर जो ढांचा बनाया गया , वह कोई मस्जिद भी नहीं था ” ने हिन्दू समाज के दावे को पुष्ट किया ।
इस आंदोलन का एक चरण पूर्ण हुआ । अब वहाँ राममंदिर है जिसको हटाने के बारे में रामविरोधी भी सोच नहीं सकते । भव्य मंदिर बनाना शेष है , जो निकट भविष्य में कभी भी बन सकता है । पिछले ३० वर्षों से चल रहे आंदोलन इस चरण के प्रभाव इतने दूरगामी और व्यापक है कि वहाँ अब राम मंदिर ही नहीं , राष्ट्र मंदिर बन गया है । करोड़ों हिन्दुओं की संकल्पबद्ध सहभागिता ने न केवल हिन्दू समाज को संगठित कर दिया है अपितु हिन्दू विरोधियों के हौंसले पस्त कर दिए हैं । यह हिन्दुनवजागरण का ऐसा आंदोलन बन गया है जिसकी तुलना में विश्व के सभी आंदोलन बहुत छोटे दिखाई देते हैं ।

अमरनाथ यात्रा आंदोलन
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कश्मीर घाटी के विहंगम पहाडों पर स्थित अमरत्व का प्रतीक यह पावन तीर्थस्थल हमेशा से हिन्दू समाज की आस्था का केंद्र रहा है । मुस्लिम आक्रमणकारियों के निरंतर हमलों के बावजूद यह यात्रा कभी रुक नहीं पायी । आतंकियों ने इस यात्रा को रोकने के लिए इस पर बार – बार आक्रमण किये जिससे हिन्दू घाटी में जाना बंद कर दे और वे दारुल इस्लाम का सपना पूरा कर सकें । जब इन हमलो के कारण यात्रा का आयोजन मुश्किल हो गया था, तब पूज्य संतों और विहिप ने बजरंग दल को आदेश दिया की वे इस चुनौती का सामना करें । बजरंग दल ने यह संकल्प लिया कि वे ५०००० युवाओं के साथ १९९६ में इस यात्रा पर जाएंगे । बजरंग दल के विश्वास पर हजारों हिन्दू उमड़ पड़े और जो यात्रा शांतिकाल काल में भी १५-२० हजार तक सीमित रहती थी ,अब लाखो की हो गई । १९९६ में १ लाख से अधिक यात्री पहुंचे और आतंकियों के हौसले पस्त हो गये । जो काम मुस्लिम आक्रमणकारी नहीं कर सके , अब उस काम को करने का बीड़ा अलगावादियों के इशारे पर जम्मू -कश्मीर के मुस्लिम और सैक्यूलरिष्टो ने उठाया । यात्रियों की व्यवस्था के लिए दी गई जमीन को वापस ले लिया गया । २००८ के इस आंदोलन ने हिन्दू समाज का मस्तक गर्व सर उँचा कर दिया । बलिदानो और संघर्षो की गाथा विजय गाथा के रूप में परिवर्तित हो गई । सरकार को विवश होकर बाबा की जमीन वापस पड़ी । अब वे यात्रा की अवधि काम करने का षडयंत्र कर रहे है । परन्तु सजग विहिप उनके षडयंत्रो को नाकाम कर रही है और संकल्पबद्ध है कि ऐसी व्यवस्थाएं की जाए ताकि यह यात्रा पूरे सके वर्ष चल सके तथा हिन्दू कश्मीर घाटी में निर्बाध रूप से आ -जा सके । अमरनाथ यात्रा की यह सफलता ही घाटी में हिन्दू समाज को बसाने को सुनिश्चित कर सकेगी ।

बूढ़ा अमरनाथ यात्रा
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कश्मीर घाटी के बाद जम्मू संभाग भी आतंकियों के निशाने पर है । जिलो में हिन्दू अल्पसंख्या में हैं ,वहा आतंकी गतिविधियों के कारण हिन्दुओ का पलायन बढ़ रहा था । उन जिलो में से एक पुंछ जिला भी है जहा हिन्दू केवल ७% है । बजरंग दाल ने २००५ से वहा बूढ़ा अमरनाथ की यात्रा पुनः प्रारम्भ की । अनादि काल से चल रही यह यात्रा आतंकियों के कारण बंद हो गई थी । बजरंग दाल द्वारा शुरू करने पर इस यात्रा पर कई बार हमले हुए । परन्तु अब इस यात्रा के कारण पलायन रुक गया है । स्थानीय लोगो की सहभागिता के कारण आर्थिक पक्ष भी मजबूत हुआ है । ऐसी और भी कई बंद यात्राऍ पुनर्जीवित करने की योजना है ।
गौरक्षा आंदोलन
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विश्व हिन्दू परिषद प्रारम्भ से ही गौरक्षा के लिए संकल्पबद्ध है । २५-२६ मार्च ,१९८७ को दिल्ली में गौरक्षा सम्मलेन हुआ । २४-२५ नवम्बर ,१९८८ को कोलकाता में पू. डोंगरे जी महाराज की प्रेरणा से गौरक्षा सम्मलेन हुआ जिसमे इस कार्य को प्रभावी रूप देने के लिए “भारतीय गौवंश रक्षण संवर्धन परिषद ” का गठन किया गया । इस बीच आंध्र प्रदेश में भारत के यांत्रिक कत्लखाने ,अल -कबीर का निर्माण हो गया जिसमें गौवंश की ह्त्या भी हो रही थी । इसको बंद करने के लिए एक बड़े जनआंदोलन का निर्णय किया गया । देशभर के साधु -संतों ने प्रवास कर इसके विरोध में वातावरण बनाया । अनेक ग्रामों में पशु-रक्षा यज्ञों का आयोजन किया गया । यज्ञों के अंतिम दिन देशभर से ३० हजार गौभक्त वहाँ पहुंच गए । १८००० गौभक्तों को गिरफ्तार किया गया । एक बार तो यह कत्लखाना बंद हो गया । परन्तु न्यायपालिका के हस्तक्षेप पर कुछ प्रतिबंधों के साथ इसको शुरू किया गया । यही स्थिति “डेरा बस्सी ,पंजाब ” में हुई । दोनों ने गौहत्या न करने का शपथपत्र भी दिया । इसके पश्चात २० -२१ जनवरी ,१९९६ को प्रयाग में बजरंग दल द्वारा आहूत गौरक्षा सम्मेलन हुआ । पूरे देश से १ लाख से अधिक बजरंगी “गाय नहीं कटने देंगे -देश नहीं बटने देंगे “के संकल्प के साथ इस सम्मलेन में सम्मिलित हुए । वर्ष १९९६ -९७ को गौरक्षा वर्ष घोषित किया गया जिसमें ६५० चौकियों के माध्यम से १,५०,००० गौवंश कसाइयो के चंगुल से मुक्त कराया गया । अब देश को यह विश्वास हो गया कि देश में उपयुक्त संख्या में गौशालाओं का निर्माण होने के बाद फिर गौरक्षा का संकल्प लिया जाएगा और युवाशक्ति के पराक्रम से गौहत्या का कलंक पूरी तरह साफ़ हो सकेगा ।

रामसेतू रक्षा आंदोलन
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भारत में अपने निहित स्वार्थों के लिए कुछ राजनीतिज्ञ न केवल हिन्दू आस्थाओं का अपमान करते हैं अपितु देशहित की भी उपेक्षा करते रहते है । इसका ज्वलंत उदाहरण “सेतु समुद्रम परियोजना “थी जिसको पूरा करने के लिए भगवान राम द्वारा बनवाए गए रामसेतु को तोड़ने का दुष्कृत्य करने की कोशिश की गई । इसको पूरा करने की जिद में केन्द्रीय सरकार ने न्यायालय में यह शपथ -पत्र दे दिया जिसमे लिखा कि ,”राम के जन्म का कोई प्रमाण उनके पास नहीं है ।” हिन्दू आस्थाओ के इस अपमान को पूरे देश ने चुनौती के रूप में स्वीकार किया । सबसे पहले २६ -२७- अगस्त ,२००४ को रामेश्वरम में एक विशाल हिन्दू सम्मलेन का आयोजन किया गया । जब राज्य व् केंद्र सरकार ने वहाँ की जनभावनाओं की परवाह नहीं की तब १२ सितम्बर ,२००७ को राष्ट्रव्यापी चक्का जाम किया गया । ३ घंटे का यह चक्का जाम अभूतपूर्व था । पूरा देश मानों इन तीन घंटो के लिए थम गया था । उसके बाद भारत के ९७००० गांवों में पानी पर तैरती हुई राम शिलाओं की यात्राओं का आयोजन किया गया । इसके पश्चात ३० दिस ,२००७ को दिल्ली में एक अभूतपूर्व रैली का आयोजन किया गया जिसमें १० लाख रामभक्तों ने सहभागिता की । इस तार्किक जनाक्रोश का सम्मान न राज्य सरकार ने किया और न केंद्र सरकार ने परन्तु मा. न्यायपालिका ने पर्यावरण , देशहित व् आस्थाओ का सम्मान रखा । अब यह निश्चित हो गया है कि भगवान राम द्वारा निर्मित सेतु तोड़ा नहीं जा सकता ।

विहिप ने गत ५० वर्षों में स्थानीय ,राज्यस्तर एवं राष्ट्रस्तर पर अनेकौ आंदोलन किये हैं । कर्नाटक में दत्तपीठ मुक्ति आंदोलन ,ईसाई मिशनरियाँ का पोल खोलो अभियान ,मकबूल फ़िदा हुसैन द्वारा भारतमाता व् हिन्दू देवताओं के अपमान का विरोध ,आतंकवाद विरोधी सप्ताह ,सरकार द्वारा हिन्दू मंदिरो के अधिग्रहण का विरोध आदि अनेको आंदोलन इस स्वर्ण जयंती वर्ष में हुए । इनमे से अधिकांश आंदोलन अपनी पूर्णता तक पहुंचे । इन सब आंदोलनों का संयुक्त परिणाम है कि अब हिन्दू समाज जागृत हो गया है । अब वह न केवल अपने ऊपर होने वाले अत्याचारों का प्रतिरोध करता है अपितु ऐसी प्रतिरोधक क्षमता का निर्माण कर रहा है कि कोई उसकी भावनाओं की उपेक्षा न कर सके ।

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