क्या वोट बॅंक का लालच शत्रु मित्र का विवेक भी खत्म कर देता हॅ?

20,अक्तूबर,२०१० को कॅबिनेट ने शत्रू सम्पत्ति बिल को स्वीकृति दे दी हॅ। संसद में पास होने के बाद यह कानून बन जायेगा। इसके बाद वे सब लोग जो भारत के प्रति नफरत करने के कारण पाकिस्तान चले गये थे तथा अपनी सम्पत्ति नहीं बेच सके थे, अब अपने वारिसों के द्वारा इसको पुनः प्राप्त कर सकेंगे। इस कानून से पाकिस्तान के निर्माता जिन्ना के वारिस ही नहीं, वे सब लोग भी अपनी सम्पत्ति को हासिल कर सकेंगे जो १९४७ में भारतियों के नरसंहारों के लिये जिम्मेदार थे। इन “शत्रुओं” की सम्पत्ति पर अगर किसी का अधिकार हॅ तो उन भारतियों का हॅ जिनको अपनी सारी सम्पत्ति पाकिस्तान में छोड कर रातों रात भारत आना पडा। आज वहां पर उनकी सम्पत्ति पर पकिस्तानियों का अधिकार हॅ। क्या उनकी सम्पत्ति वापस प्राप्त की जा सकती हॅ? यदि नहीं तो पाकिस्तानियों की सम्पत्ति उनके वारिसों को देने के लिये भारत के सॅक्युलरिस्ट इतने उतावले क्यों हो रहे हॅं? यह और भी दुखद पहलू हॅ कि इस बिल को लाने के लिये भाजपा को छोड शेष सभी राजनीतिक दलों के मुस्लिम सांसदों ने मिलकर इस के लिये दबाव बनाया था और वोट बॅंक के लालच में इस सरकार नें घुटने टेक दिये। क्या वोट बॅंक का लालच इनको देश के हित अहित का भी विवेक नहीं रहने देता? क्या अब सेक्युलरिस्म देशद्रोह का पर्यायवाची बनता जा रहा हॅ? इसी कारण केरल के दुर्दान्त आतंकवादी मदनी को पहले जेल से छुडाया गया और इसके बाद जब एक अन्य कान्ड में कर्नाटक की पुलिस उसको पकडना चाहती थी तो उनके मार्ग में रोडे अटकाये गये। अब एक अन्य आतन्कवादी,इब्राहिम मोलवी को केरल की सरकार शरण दे रही थी तथा उसको भी कर्नाटक पुलिस ने केरल प्रशासन के सहयोग के बिना ही गिरफ्तार किया। लगता हॅ अब यही लोग इनके मित्र बन गये हॅं । इसलिये इनको कश्मीरी पन्डितों का दर्द नहीं दिखाई देता, ये केवल तिरन्गा जलाकर सेना से लडने वाले “स्टोनजिहादी” युवकों का दर्द समझना चहते हॅं। ये आतन्कियों के मानवाधिकारों की चिन्ता करते हॅं परन्तु इनको देगन्गा, बंगाल के हिन्दुओं के अधिकार की चिन्ता नहीं हॅ जो अपने ही देश में दुर्गापूजा तक नहीं मना सके।

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