एक बेबस प्रधानमंत्री

लाखों भारतीयों के बलिदान के बाद प्राप्त स्वतंत्रता की ६४वीं वर्षगांठ के अवसर पर लालकिले के प्राचीर से भारत के प्रधानमंत्री का भाषण निराशाजनक और दिशाहीन था। इस समय भारत जिन चुनौतियों से जूझ रहा है, उनसे मुकाबला करने की कोई रणनीति घोषित की जायेगी, ऐसी अपेक्षा हर देशवासी को थी। परन्तु आज भारत को एक लाचार और कमजोर नेता की लचर दलीलें सुनने के लिये मजबूर होना पडा। इस समय भ्रष्टाचार और आतंकवाद से सम्पूर्ण देश त्रस्त है। आज मनमोहन सिंह के तेवर उनसे लडने वाले सेनापति के नहीं थे। वे उनके विरुद्ध लडने वालों को चेतावनी देकर इन समस्याओं के पोषक के रू प में दिखाई दे रहे थे।

भाषण के प्रारम्भ में ही उन्होंने कहा कि देश में कुछ लोग गडबडी फैलाना चाहते हैं। ये कौन हैं , इसकी पहचान वे नही कराना चाहते थे। यदि उनका संकेत जेहादी और वामपंथी आतंकवादियों की ओर था, तो उनके लिये वे किसको जिम्मेदार ठहराना चाहते हैं? पूरी दुनिया जानती है कि आज ये दोनों प्रकार के आतंकवाद केन्द्र सरकार के संरक्षण में ही चलते हैं। एक ओर वे मुस्लिम वोट बैंक के कारण जेहादियों का पोषण करते हैं तो दूसरी ओर अपनी वैचारिक मजबूरियों के चलते वे वामपंथी आतंकियों को संरक्षण देते हैं। इस तरह गडबडी फैलाने वाले वे स्वयं ही हैं। यदि उनका इशारा अन्ना हजारे और स्वामी रामदेव की ओर है तो यह बात बहुत खतरनाक है क्योंकि यह १९७५ की पुनरावृत्ति होगी। उस समय भी तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमति इन्दिरा गांधी ने भ्रष्टाचार के विरुद्ध आन्दोलन करने वाले लोकनायक जयप्रकाश नारायण व उनके साथियों के विरुद्ध इसी प्रकार के आरोप लगाकर उनके आन्दोलन को कुचलने की कोशिश की थी और देश में आपातकाल लगाया था। दोनों ही परिस्थितियों में ऐसा लगता है कि वे देश को तानाशाही की ओर ले जाना चाहते हैं।

आज देश भ्रष्टाचार के विरुद्ध लामबंद हो गया है। ऐसे में उन्हें भ्रष्टाचार के विरुद्ध बोलना ही था। उन्होंने कहा कि इसके विरुद्ध तभी लडाई लडी जा सकती है,जब हर नागरिक इसमें सहयोग करे। वे क्या सहयोग चाहते हैं? आवाज उठाने वालों पर ये झूठे आरोप लगाकर उनका दमन करने की कोशिश करते हैं। रामदेव के साथ यही किया गया। शान्तिपूर्ण प्रदर्शन करने वालों पर रात के अन्धेरे में दमनचक्र चलाना कैसा सहयोग है? अब अन्ना हजारे के विरुद्ध एक दिन पूर्व ही जिस प्रकार का चरित्र हनन अभियान कान्ग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने चलाया, वह किसी भी लोकतंत्र में नही देखा जा सकता। पद्म विभूषण और पद्मश्री से समानित वरिष्ठ और समाननीय अन्ना हजारे के विरुद्ध जिस प्रकार की अशोभनीय भाषा का प्रयोग किया जा रहा था, वह किस प्रकार का सहयोग था? झुठे और अमर्यादित आरोप लगाकर वे भष्टाचार का पोषण कर रहे हैं या उसके विरुद्ध लडाई कर रहे हैं? एक नेता बाजारू भाषा प्रयोग कर अन्ना को माफिया सिद्ध कर रहे थे तो एक अन्य शकुनि की कुटिल मुस्कान के साथ उन पर गम्भीर परन्तु असत्य आरोप लगाते हुए उन्हें चेतावनी दे रहे थे। इससे पूर्व भी जिस किसी संवैधानिक संस्था नें भ्रष्टाचार के विरुद्ध आवाज बुलंद की , इन्होंने उसे इसी प्रकार कुचलने की कोशिश की। जब मा० सर्वोच्च न्यायालय ने इस विषय पर कुछ सख्त टिप्पणियां की थीं, तब इन्हीं मनमोहन सिंह नें उनको अपनी मर्यादा में रहने का पाठ पढाया था। इन लोगों ने कैग हो या पी ऍ सी, सब की प्रतिष्ठा को धूल धूसरित करने का प्रयास किया। क्या इनकी नजरों में चुप रहकर देश को भ्रष्ट लोगों के हाथ मे लुटते हुए देखते रहना ही सहयोग है?

लोकपाल बिल के बारे में उनका कहना है कि यह किस तरह का होगा यह संसद तय करेगी। संसद में विचार उस” सरकारपाल बिल” पर होगा जो सरकार नें भ्रष्ट लोगों के संरक्षण के लिये बनाया है। विपक्ष के सुझावों पर मतदान होगा जिनके ये लोग अपने बहुमत के सहारे पास नहीं होनें देंगे। जैसा हाल पी ए सी की बैठक का हुआ वैसा ही संसद का होगा। इसके अलावा उनका विपक्ष के प्रति क्या रवैय्या होगा, यह तभी स्पष्ट हो जाता है जब उनके नेता विपक्षी नेताओं पर जहर उगलते हैं। इसका मतलब है कि सं सद वही बिल पास करेगी जो यह सरकार चाहती है। इस बहाने उन्होंने अन्ना को अनशन व धरने के लिये चेतावनी भी दे दी। क्या वे किसी नागरिक के संविधान प्रदत्त विरोध प्रकट करने के अधिकार को भी छीनना चाहते हैं? क्या उनके एक बडबोले मंत्री इसी आधार पर अन्ना को संविधान की समझ बनाने की सीख दे रहे हैं?

भाषण के बीच में उन्होंने आतंकवाद के विरुद्ध लडाई की बात भी कही। उन्होंने कहा कि इस लडाई को तभी जीता जा सकता है जब इसमें सभी सहयोग करें। वे हिन्दू समाज को “भगवा आतंक” शब्द का प्रयोग कर अपमानित करना चाहते हैं, साम्प्रदायिक हिंसा निवारण बिल के माध्यम से वे हिंदू समाज को दंगों के लिये जिम्मेदार ठहरा रहे हैं जबकि वास्तविकता इसके ठीक विपरीत है। वे हिन्दू संतों को बार-बार अपमानित कर झूठे मामलों में फंसाते हैं और उनका सहयोग भी चाहते हैं, यह उनकी कौन सी नीति है। नक्सलवाद का जिक्र करते हुए उन्होनें कहा कि इसको जन्म देने वाले कारणों को दूर करना होगा। इनके एक नेता जिन पर देशद्रोह का मामला अभी विचाराधीन है, डा० विनायक सेन को वे क्यों आर्थिक मामलों की समिती में एक विशेषज्ञ के रूप में रखते हैं? क्या वे ऐसे तत्वों को संरक्षण देकर नक्सलवाद को बढावा नहीं दे रहे हैं? क्या उन्होंने जेहादी आतंकवाद और नक्सली आतंकवाद के कारणों पर कभी खुली चर्चा की है? उन्हें मालूम होना चाहिये कि जब तक इनको विरुद्ध वैचारिक लडाई नहीं लडी जायेगी, इनको परास्त नहीं किया जा सकता। ये कैसी लडाई है जिसमें न हाथ में खंजर है , न दिल में लडने का इरादा?

ऐसा लगता है कि वे न तो भ्रष्टाचार से लडना चाहते हैं और न आतंकवाद से। ये दोनों इनको अच्छे लगते हैं क्योंकि इनसे उनका स्वार्थ सिद्ध होता है। वे अगर लडना चाहते हैं तो इनका विरोध करने वालों से। प्रधानमंत्री जी लालकिले से इनके संरक्षण का संदेश दे कर गये हैं। ऐसे प्रधानमंत्री और उनकी सरकार को एक क्षण के लिये भी सत्ता में बने रहने देना देश के लिये सबसे बडा अभिशाप होगा। इसलिये अन्ना जैसों का साथ देकर हमें सीधा संदेश देना होगा, ” या तो बदल जाओ, नहीं तो हम तुम्हें बदल देंगे।”

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