संस्मरण

  • Tribute to Ashokji : Grand Inspiration Personified
  • करोड़ों के प्रेरणास्रोत
  • कर्मयोगी महामानव
  • एक श्रेष्ठ संयोजक
  • अलौकिक प्रतिभा के धनी श्रद्धेय अशोक सिंहल जी
  • मा. अशोक जी और सामाजिक समरसता आयाम
  • अद्वितीय मा. अशोक जी सिंहल
  • अशोक सिंहल एक संस्कृतिक धरोहर

करोड़ों के प्रेरणास्रोत

जब अशोक जी ने मेरे कंधे पर हाथ रखकर कहा, ‘हम सब मिलकर भव्य राम मंदिर बनाएंगे, हम सब मिलकर हिन्दू राष्ट्र का पुनरुत्थान करेंगे,’ तब मैं 36 वर्ष का था। 1992 में अयोध्या, गुजरात से विश्व हिन्दू परिषद के युवाओं के साथ गया था। अशोक जी के हाथ में ताकत थी, आत्मविश्वास उनकी आंखों में झलक रहा था। तब वे 66 वर्ष के थे। इसके कई वर्ष पहले से 10 वर्ष की आयु में ही मैं रा.स्व.संघ से जुड़ गया था। मैं ही नहीं, लाखों युवाओं को प्रेरणा देकर अशोक जी ने मां भारती की, हिन्दुओं की सेवा में तत्पर किया।

भगवान श्रीराम का भव्य मंदिर अयोध्या में रामजी के जन्म स्थान पर ही बने, यह उनका केवल स्वप्न नहीं था, यह उनका अदम्य विश्वास था, उनके जीवन की अटूट प्रतिबद्धता थी। दिन-रात उसी पर अशोक जी कार्य करते रहते थे। संघ के प्रचारक, स्वयंसेवक संगठनात्मक कुशलता सीखते हैं और कार्य, आंदोलन, सेवा इन सभी में नियोजन और अनुशासन ये सभी ऐसे व्यक्तित्व का अविभाज्य अंग होते हैं। अशोक जी भी ऐसे ही थे।  आजकल ही नहीं, तब भी, जब टीवी, इंटरनेट, सोशल मीडिया का चलन नहीं था, यही होता था कि किसी बड़े कार्य करने वाले व्यक्तियों के विषय में संकुचित, अधूरी जानकारी के आधार पर या सरकारी दबाव में सकारात्मक कम और उलटी-पुल्टी खबरें चलाकर उनकी छवि मलिन  करने का काम चलता ही रहता था। अशोक जी इस सबसे कभी प्रभावित नहीं हुए। राम मंदिर के अतिरिक्त अशोक जी ने कई महान कार्य इस देश के लिए किये।

‘धर्म संसद’ की अनोखी संकल्पना अशोक जी ने विकसित की। देश-विदेश के साधु-संतों को राष्ट्र कल्याण और हिन्दू राष्ट्र के एक समर्थ सूत्र में एक करना कोई आसान काम नहीं था।  अशोक जी ने धर्म संसद खड़ी की। आगे उसकी व्याप्ति और महत्व ऐसा बढ़ता गया कि अनेक विषयों पर धर्म संसद का एक शब्द, एक प्रस्ताव आदेशयुक्त दिशा का स्वरूप लेने लगा। अशोक जी ने एक बार मुझे कहा,’इंग्लैंड में प्रधानमंत्री, अमरीका में राष्ट्राध्यक्ष जब शपथ लेते हैं तब ‘गॉड’ के नाम पर लेते हैं और उस समय उनके पेरिस के फादर मंच पर या उनके साथ पोडियम के निकट उपस्थित होते हैं। फिर भी विश्व में ये देश ‘सेकुलर’ कहलाते हैं। कभी हमारे देश में ऐसा होगा कि हमारा धर्म इस देश की राजनीति की दिशा तय करेगा और जब देश के प्रमुख शपथ लेंगे तब हमारे धर्म के प्रमुख  उसी सम्मान से उनके साथ आशीर्वाद देते हुए होंगे? ऐसा होगा ही।’  उनकी यही अदम्य आशा उनके लिए और इस देश के हिन्दुओं के लिए प्रेरणास्रोत थी।

सरकार ने जब रामेश्वरम में रामसेतु तोड़ने का प्रकल्प घोषित किया, तब अशोक जी को धक्का लगा था कि ऐसी दुष्टतापूर्ण योजना कोई बना ही कैसे सकता है! संघ के मार्गदर्शन में तब विश्व हिन्दू परिषद ने रामेश्वरम में रामसेतु बचाने का देशव्यापी आंदोलन चलाया। सरकार को निर्णय बदलना पड़ा। उस शांतिपूर्ण  आंदोलन के दौरान कई राज्य सरकारों ने पुलिस द्वारा कार्यकर्ताओं पर निर्मम लाठियां चलवायीं।  इस कारण अशोक जी सरकारों पर बहुत कुपित हुए थे। अशोक जी अपने विचारों पर कायम रहते थे और मनोबल बढ़ाते रहते थे। एक बुद्धिमान अभियंता का, जो जानेमाने व्यवसायी परिवार से हो, उस समय देश के लिए सब कुछ त्यागकर निकलना, विशेषकर जब वे युवा थे,कोई आसान काम नहीं था। अशोक जी का दृढ़संकल्प उनकी शक्ति थी जो आगे जाकर विश्व हिन्दू परिषद की प्रेरणा बनी। उनके कहने से दो-ढाई दशक पहले जब मैं अपनी अच्छी खासी कैंसर सर्जरी की प्रैक्टिस और परिवार-घर-अस्पताल छोड़कर निकला, तब मेरा पुत्र केवल 7 वर्ष का था। ऐसे अनेक युवाओं को अशोक जी ने प्रेरणा दी थी।

सामाजिक समरसता से ही देश आगे बढ़ेगा यह अशोक जी का विश्वास था। छुआछूत मुक्त भारत का जो स्वप्न गुरु गोलवलकर जी, स्वामी चिन्मयानंद जी, श्री आप्टे जी आदि ने देखकर  विश्व हिन्दू परिषद की स्थापना 1964 में की थी, उस स्वप्न को पूर्ण करने हेतु अशोक जी ने कई मंदिरों में सभी जातियों के प्रवेश का अभियान चलाया। उस समय यह बहुत कठिन था, लेकिन अनेक गांवों में जाकर अनेक लोगों से मिलना, बात करना ऐसे सभी अथक प्रयास अशोक जी करते रहे।

1995 में कश्मीर में अलगाववादियों ने अमरनाथ यात्रा बंद करने की धमकी दी। अशोक जी के नेतृत्व में विश्व हिन्दू परिषद ने उस दहशत का मुकाबला किया। 1992 के राम मंदिर आंदोलन के पश्चात जब केंद्र में नयी सरकार आयी, तब अशोक जी आनंदित थे। उनके जीवन का स्वप्न  पूर्ण होगा, अयोध्या में भव्य राम मंदिर बनेगा ऐसी आशा लेकर उन्होंने देशभर में प्रवास किया। उसके पश्चात जो हुआ ही नहीं उसके लिए उनके मन में दु:ख था, लेकिन वे कभी हारे नहीं ! सभी का मनोबल बनाकर रखा और 2 वर्ष पहले उनकी  वही आशा फिर से जग गयी। उनकी वृद्ध आंखों में आशा की  एक उज्जवल किरण चमकी और उस ऊर्जा ने उनके व्याधिग्रस्त वृद्ध शरीर में भी शक्ति भर दी। फिर से देशभर में प्रवास कर उन्होंने नयी सरकार बने इस पर काम किया। जब नयी सरकार बन गयी, तब अनेक हिन्दुओं के साथ अशोक जी की भी वही अदम्य आशा जग गयी कि अब अयोध्या में राम जन्मभूमि पर भव्य मंदिर अवश्य बनेगा। इसी आशा से आज भी उनका हृदय सभी हिन्दुओं में धड़कता होगा। राह देखना अदम्य आशा का स्वभाव होता है। इस प्रयास में निराशा के झटके भी लगते हैं, किन्तु हम सभी का उत्तरदायित्व है कि अशोक जी का वह जीवनस्वप्न पूर्ण करें।

हमारे करने के लिए अनेक कार्य हैं। समाज में करोड़ों बच्चे, परिवार अच्छे स्वास्थ्य और शिक्षा से वंचित हैं, उन्हें  सुविधाएं प्राप्त करवाना संस्कार और  संस्कृत एवं वेद का सुलभ भाषा में प्रसार प्रचार करना इत्यादि। अशोक जी ने गोवंश बचाने हेतु देशभर में गोरथ आयोजित किये थे-उनका कार्य आगे ले जाना होगा। अविरल निर्मल गंगा हेतु एक दशक पहले ही अशोक जी के  नेतृत्व में विश्व हिन्दू परिषद ने ‘काशी से गंगा सागर’ तक यात्रा निकाली थी जिसमें गंगा किनारे बसे गांवों के लोगों को गंगाजी को निर्मल रखने के उपाय समझाए गए थे। यह कार्य भी आज हम सभी की राह देख रहा है। युवाओं को जोड़ने हेतु आरम्भ हुए  बजरंगदल और दुर्गावाहिनी पर भी आज दायित्व है कि सभी कार्यों को आगे ले जाएं।

अशोक जी का शरीर आज भले हमारे बीच में नहीं है, लेकिन उनके द्वारा जलायी गई प्रेरणा की ज्योति उनके जैसी अदम्य आशा लेकर हर हिन्दू मंक प्रकाशित होती रहेगी। 2020 में जब विश्व हिन्दू परिषद 75वीं वर्षगांठ मनाएगी, तब उनके सभी स्वप्न पूर्ण कर कई वर्ष आगे चल पड़ी होगी विश्व हिन्दू परिषद! चलें, हम सभी के प्रेरणा-गुरु अशोक जी को साष्टांग प्रणाम कर धर्मपथ पर आगे बढें।

-डॉ. प्रवीण तोगडि़या , विश्व हिन्दू परिषद के अन्तरराष्ट्रीय कार्याध्यक्ष


कर्मयोगी महामानव

स्वामी सत्यमित्रानंद जी ने कहा कि 60 वर्ष की उम्र में ही अशोक जी को महात्मा कह देना चाहिए था। भारत में तमाम प्रकार की उपासनाएं हैं, दार्शनिक मार्ग हैं, लेकिन सब मार्गों के संत, महात्माओं, धर्माचार्यों को किसी एक मंच पर देश की, समाज की समस्याओं को हल करने के लिए जोड़ देने वाले व्यक्ति थे अशोक सिंहल जी। सभी जानते हैं कि वे जो ठान लेते थे वही करते थे। इसका अर्थ ये नहीं कि वे जिद्दी थे। वे संकल्प के धनी थे, वे आज्ञाकारी भी थे और धैर्यवान बहुत थे। अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए प्रतीक्षा करते रहना, लक्ष्य कभी भूलना नहीं- ये उनकी विशेषता थी। साथ ही साथ दया और करुणा का भाव उनमें बहुत अधिक था, छोटे बड़े का विचार नहीं था। उनकी सिक्योरिटी का पीएसओ, गाड़ी चलाने वाला चालक, उनकी सेवा करने वाला सेवक अगर उसके घर में कोई सुख-दु:ख है तो बिना किसी से कहे कार्यक्रम अपने आप बनाते थे और चल देते थे। उनको किसी ने निमंत्रण दिया, नहीं दिया इसका विचार दिमाग में नहीं रखते थे। उनको जानकारी मिलनी चाहिए- ये कार्यक्रम हो रहा है, बहुत महत्व का कार्यक्रम है बिना बुलाये पहुंच जाते थे। मान अपमान का विचार उनको छू तक नहीं सकता था। मुझे ऐसा लगता है कि वे अपने कमरे के सामने अपने देवता रखते थे। अपने गुरु और परमपूज्य श्रीगुरुजी का चित्र रखते थे। कहते थे ये दो ही मेरे गुरु हैं। शायद वह सीधी प्रेरणा वहां से प्राप्त करते थे। इसीलिए उनके निर्णय हृदय से, आत्मा से लिए गए निर्णय होते थे। प्रथम दृष्ट्या तो यह लगता था कि यह कैसे होगा, ये क्या कह रहे हैं लेकिन उनका कहा हुआ हो भी जाता था। अंतत: सब कहते थे ये सही निकला। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में भी जब उनके पास केवल शाखा का ही काम था तो भी वे देश की तमाम समस्याओं पर बोलते और सोचते थे। विश्व हिन्दू परिषद में रहकर तो हमें स्पष्ट अनुभव हुआ कि उनकी सोच वैश्विक थी। हर समस्या के बारे में सुनते रहना, अध्ययन करते रहना, चर्चा करना और समाधान खोजते रहने की उनमें विलक्षण प्रतिभा थी, शायद भगवान ने ही उन्हें यह जन्मना दी थी। कम लोगों को ही पता होगा कि कानपुर में पता लग गया कि रेलगाड़ी से गाय ले जायी जा रही हैं, उन्होंने कार्यकर्ताओं को लेकर ताले तोड़ दिए, गायों को मुक्त कर दिया और वहां से आगे की यात्रा पर निकले तो किसी की पकड़ में नहीं आए। दिल्ली का झंडेवालान मंदिर अराजक तत्वों के हाथ में था, श्रद्धालुओं की भावना का सम्मान करते हुए मार-मारकर उन्हें वहां से भगा दिया। आज वह मंदिर शुद्ध और प्रतिष्ठित है, सबके सामने है लेकिन उनकी व्यक्तिगत लिप्सा कभी उस मंदिर से नहीं रही। वेदों का पुनरुद्धार होना चाहिए, उत्तर भारत में वेदपाठ को कंठस्थ करने की परंपरा का बीज उन्होंने धरती पर डाला और आज वह जम गया। देश के माथे से गुलामी के कलंक हटने चाहिए, बच्चे-बच्चे के मन में एक ललक जगा दी। 1526 में हमारा अपमान हुआ था उसका परिमार्जन करने की प्रबल भावना जन-जन में जगा दी। देश के हर नौजवान में अपने पावन स्थल को मुक्त करने की चेतना जग गई, देश में हजारों मंदिर तोड़े गए थे, सभी के प्रति ऐसा भाव जग गया। कभी वंदेमातरम् और भारतमाता की जय के नारे हमारी स्वाधीनता की पहचान थे, वे आज भी याद किये जाते हैं।  जय श्रीराम हमारे यहां पहले भी बोलते थे लेकिन ‘जय श्रीराम’ के नारे में वीरत्व भर दिया। तो अशोक जी का बहुत बड़ा योगदान है। अशोक जी तो शायद पढ़ने के बाद ही साधु जीवन की ओर, संन्यास लेने जा रहे थे लेकिन किसी शक्ति ने ही उन्हें प्रेरणा दी कि भारतमाता की यह दशा है तुम कहां जा रहे हो। फिर उसी प्रेरणा से उन्होंने संतों में जागरूकता पैदा की। जो संत केवल भजन करने में ही व्यस्त रहते हैं उन्हें समाज और देश की समस्याओं में भी रुचि लेनी चाहिए। हर आदमी को वैभव अच्छा लगता है वे तो वैभव छोड़कर घर से आए थे। घर के वैभव के बाद उन्हें किसी ने क्या खिलाया, कहां बिठाया, इस पर उन्होंने कोई विचार नहीं किया। मैं तो समझता हूं भगवान की कोई विशेष शक्ति अशोक जी में अवतरित हुई थी, इसी उद्देश्य के लिए उनका जन्म हुआ था। मैंने एक बार उनसे कहा कि कुछ आराम कर लिया कीजिए तो कहने लगे कि प.पू. श्रीगुरुजी ने एक बार कहा था कि आराम तो चिता पर ही होता है।

वास्तव में अशोक जी ने श्रीगुरुजी के शब्दों को सार्थक किया। 12 नवंबर शाम को उन्होंने एक घंटे मुझसे बात की। 13 नवंबर को केन्द्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री श्रीमती स्मृति ईरानी को बुलाया, उनसे एक घंटे बात की। इसी दिन रात्रि में 9 बजे स्वामी रामदेव से टेलीफोन पर वार्ता की और इसी वार्ता में उनका स्वास्थ्य बिगड़ गया तब उन्हें रात्रि 2.30 बजे अस्पताल ले जाया गया। 10 नवंबर को परम पूजनीय सरसंघचालक जी से उन्होंने अपने मन की बात की। अंतिम समय में अस्पताल में भी लोगों को बुला-बुलाकर वे बातें करते रहे। हंसी मजाक नहीं करते थे देश की बात करते थे। 14 नवंबर के बाद उनकी वाणी बंद हो गई। उनको वेंटिलेटर लग गया, किडनी का फंक्शन घटने लगा। 17 नवंबर को दोपहर 2 बजकर 24 मिनट पर उनकी सांस बंद हो गई। अर्थात कुल मिलाकर साढ़े तीन दिन उन्होंने अपने जीवन में आराम किया। इससे पहले कभी उन्होंने बीमारी में भी आराम नहीं किया, ऐेसे विरले ही कर्मयोगी होते हैं। ऐसे महान कर्मयोगी को मेरा कोटि-कोटि प्रणाम।

-चंपत राय, विश्व हिन्दू परिषद के अंतरराष्ट्रीय महामंत्री


एक श्रेष्ठ संयोजक

मा. अशोक जी का आज जो व्यक्तित्व विश्वमानव के रूप में हम सबके सामने है, उसके पीछे उनके जीवन की कठोर साधना है। उनका कतृर्त्व विहिप के समाजव्यापी कार्य को बनाने, बढ़ाने और जन-जन तक पहुंचाने के लिए मील का पत्थर सिद्ध हुआ। संगठन के स्वरूप को खड़ा करने के साथ इसे विस्तार देने के लिए उन्होंने 20-25 प्रकार के विभिन्न आयामों के रूप में कार्य विभागों का व्यवस्थित स्वरूप खड़ा किया। इसका परिणाम यह निकला कि भारत तथा विश्व में उस कार्य का व्यापक स्वरूप हम सबके सामने है। कार्यकर्त्ताओं से अपनत्व और आत्मीयता का भाव रखते हुए कार्यकर्त्ताओं को जोड़ने का, सक्रिय करने का यह उनका विशेष स्वभाव रहा और उसके कारण आज समाज के कार्यकर्ता के रूप में अच्छे व्यक्तियों का जुड़ाव उनके साथ रहा। वे गो, गंगा, गीता, वेद और श्रीराम जन्मभूमि, श्रीकृष्णजन्मभूमि तथा बाबा विश्वनाथ, जो हमारे श्रद्धा के केन्द्र हैं, इन सबके प्रति अत्यंत संवेदनशील थे। विश्व में वर्तमान में 6.5 करोड़ हिन्दू हैं। भारत के साथ-साथ विदेश में रहने वाले असंख्य हिंदुओं के बीच हिन्दू संस्कार, जीवनचर्या और हिन्दू संस्कृति को उनके जीवन में उतारने के लिए भी कार्य किया। आज लगभग 32 देशों में विहिप का कार्य और 80 देशों में संपर्क विभाग हैं। लंबे समय बाद हिन्दू समाज के स्वाभिमान को जगाने का अपूर्व कार्य अशोक जी द्वारा किया गया। आज हिन्दू स्वाभिमान के साथ खड़ा दिखाई देता है तो यह अशोक सिंहल जी की कठोर साधना का ही फल है। ऐसी पावन आत्मा को विनम्र होकर हम बारंबार वंदन करते हैं।

– दिनेश चन्द्र, विहिप के अंतरराष्ट्रीय संगठन महामंत्री 


अलौकिक प्रतिभा के धनी श्रद्धेय अशोक सिंहल जी
अशोक जी आज हमारे मध्य में नहीं है। अशोक जी ने अपना स्थुल देह त्याग दिया यह तो सत्य है। फिर भी हम कार्यकर्ता अनुभव करते हैं कि अशोक जी हमारे में है, उनकी सुक्ष्म चेतना हमें पाथेय प्रदान कर रही है और आगे भी करती रहेगी।
योजकता अशोक जी का सहजात गुण था। धर्म प्रसार, बांसवाड़ा परियोजना, सामाजिक समरसता, सांस्कृतिक गौरव संस्थान, विशेष संपर्क, मातृशक्ति जागरण इन महत्वपूर्ण कार्यों में उन्होंने कल्पक, चिंतक, परिश्रमी कार्यकर्ता दिये। इसके सुपरिणाम भी सामने आये।
मंदिरों का सुपरिचालन हो, इस हेतु भारत में कुछ प्रयत्न तो हुए। अमेरिका में कुछ फलप्रसु प्रयास हुए। वहाँ मंदिर प्रबन्धकों की हुई बैठक में भारत से कुछ मंदिर प्रबन्धकों के साथ अशोक जी स्वयं गये थे। विदेशों में कार्यवृद्धि की दृष्टि से अशोक जी ने अनेक देशों का प्रवास किया था।  Hindu Heritage Pratishthan  एवं World Buddhist Cultural Foundation के माध्यम से हिन्दू बौद्ध समन्वय का जो कार्य हुआ, उसमें अशोक जी का उपादेय निर्देशन रहा। भारतोद्भूत मत-पंथ- संप्रदायों में समन्वय बढ़ाते हुए भारतीय संस्कृति का संरक्षण – संवर्धन हो, इस वर्तमान संदर्भ में महत्वपूर्ण कार्य को अशोक जी का हार्दिक सक्रिय पाथेय प्राप्त होता रहा।
अशोक जी के हृदय में संत- महात्माओं के प्रति सहज श्रद्धा का भाव था। संत शक्ति को समन्वित कर इनकी सात्विक ऊर्जा को राष्ट्र कार्य में लगाने की धुन अशोक जी के अंतरस्थ थी। मार्गदर्शक मंडल, धर्मसंसद इन संकल्पनाओं को साकार रूप प्रदान करने मे अशोक जी की महत्वपूर्ण भूमिका रही।
अगस्त 2000 में न्यूयार्क में हुए Millennium World Peace Summit में भारत से शताधिक संत सहभागी हुए। नवम्बर 1999  में सारनाथ में कांची कामकोटि पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी जयेन्द्र सरस्वती जी महाराज एवं विपश्यनाचार्य श्रद्धेय श्री सत्यनारायण गोयनका जी की संयुक्त विज्ञप्ति प्रसारित हुई। प्रयागराज महाकुंभ 2001 में कांची कामकोटि पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी जयेन्द्र सरस्वती जी महाराज एवं महामहिम परम पावन श्री दलाई लामा जी का संयुक्त घोषणापत्र प्रसारित हुआ। महाकुंभ 2013 में दलाई लामा के अनुगामी बौद्धों का, शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबन्ध समिति द्वारा सिखों का एवं जैन साधकों के अलग-अलग शिविर लगना, एक ऐतिहासिक घटना थी। अशोक जी की संतों के प्रति विनम्र समर्पित श्रद्धा एवं राष्ट्र कार्य में संतों से पाथेय प्राप्त करने की लगन इन सब घटनाओं के मूल में रही।
14 मई, 2013 को मुम्बई के पूज्य भदन्त राहुल बोधी महाथेरो महाराज, हरिद्वार में हुए पूजनीय स्वामी गोविन्ददेव गिरि जी महाराज के महापट्टाभिषेक कार्यक्रमोपरान्त, संकट मोचन आश्रम पधारे थे। उक्त कार्यक्रम में अशोक जी के सान्निध्य में वे रहे थे। उन्होंने सानुभव कहा – ‘‘ अशोक जी के पास रहने से  Strong Vibrations मिलती है। संतो को जोड़ने का बड़ा कार्य उन्होने किया है।’’ 11 व 12 जून, 2013 को हरिद्वार में केन्द्रीय मार्गदर्शक मंडल की हुई बैठक में श्रद्धेय अशोक जी उपस्थित नहीं रह पाये थे। जगतगुरु शंकराचार्य-मध्वाचार्य-रामानंदाचार्य, 13 अखाड़ों के महामंडलेश्वर तथा अनेक प्रमुख महात्मागण बैठक में उपस्थित थे। लगभग सभी के वक्तव्यों में अशोक जी का सादर उल्लेख रहा।
केन्द्रीय कार्यालय में रहने पर अशोक जी की दिनचर्या सुबह साढे़ तीन बजे जागरण से प्रारंभ होती थी। सुनियोजित दिनक्रम में आसन- प्राणायाम- ध्यान- स्वाध्याय तो थे ही। समवेत एकात्मता स्तोत्रादि के बाद अषोक जी शाखा में आते थे। तत्पश्चात् अल्प अनौपचारिक वार्ता करते थे। गौमाता को हरी घास और गुड़- रोटी भी खिलाते थे। शरीर स्वास्थ्य की दृष्टि से आवश्यक व्यायाम, चिकित्सा, आहारादि भी दिनचर्या में समाहित रहते थे।
दिन भर समष्टि कार्य से जुड़े कामों में मग्नता रहती थी। संत- महात्मा, संघ परिवार कार्यकर्ता, विश्व हिन्दू परिषद के विविध आयामों के कार्यकर्ता, सामाजिक संगठनों के प्रमुख गण, चिंतक गण इनसे मिलना तो होता ही था। समय की अनुकूलता होने पर सर्वसाधारण कार्यकर्ता भी सहजता से मिलकर अपनी बात कह सकता था। सब की बातें धैर्य- शांति से सुनते थे, संवाद बन ही जाता था, आगन्तुक प्रसन्नचित्त से विदा होते थे।
जो श्रेय लगती थी उन बातों का अशोक जी आग्र्रह रखते थे। इसी कारण विश्व हिन्दू परिषद कार्य में कार्यकर्ता प्रशिक्षण को गति प्राप्त हुई। एकल विद्यालय कार्य योजना के माध्यम से वनवासी तथा दूर दूरान्तर ग्रामों में संपर्क बढ़ा। सुप्त ऊर्जा जगी, कार्य की व्याप्ति सम्प्रसारित हुई। देवभाषा संस्कृत का कार्य ‘‘भारत संस्कृत परिषद’’ के माध्यम से सातत्य से चलने में अशोक जी का प्यार भरा मार्गदर्शन प्रेरक रहा। वेदों के प्रति अशोक जी के हृदय में अपरिसीम भक्ति थी। उनकी प्रेरणा से वेद विद्यालयों का विस्तार हुआ। गौरक्षा – गौ संवर्धन अशोक जी के हृदय का विषय रहा। देवलापार में अनुसंधान तथा संवर्धन केन्द्र का उचित विकास होने में कार्यकर्ताओं की लगन व क्षमता के साथ अशोक जी के पाथेय का महत्वपूर्ण योगदान रहा। अषोक जी ने सक्षम अनुभवी गहरी दृष्टि वाले कार्यकर्ताओं को सेवा कार्य में संयोजित किया जिससे उस कार्य को शनैः शनैः उपयुक्त दिशा व गति मिली।
अशोक जी विजीगीषु भावना के धनी थे। श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन को श्रेष्ठ ऊँचाई प्राप्त हुई। समाज की विविध सद्भावी षक्तियों का प्रभावी समन्वित रुप प्रकट हुआ। राजनीति में हिन्दू चेतनानुकूल परिणाम आये। तय प्रारूप का भव्य मंदिर राम जन्मस्थान पर ही बनेगा एवं अयोध्या की सांस्कृतिक परिसीमा में कोई भी नया इस्लामिक केन्द्र का निर्माण नहीं होगा, यह संकल्प कार्यान्वित करने के लिए व्यक्ति-व्यक्ति के हृदय में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के पावन विग्रह की सक्रिय प्राण प्रतिष्ठा हेतु जनता-जनार्दन जागरण रुपी हमारा तेजस्वी संगठित पुरुषार्थ अवश्यंभावी है।
पुरुषार्थ करते समय मनःस्थिति कैसी हो, इस संदर्भ में एक प्रसंग का स्मरण हो रहा है। बैठक चल रही थी। विभिन्न संदर्भो के आधार पर यह स्पष्ट हुआ कि दो प्रभावी कर्तृत्ववान कार्यकर्ताओं में मनमुटाव हुआ था और उसका प्रकटीकरण सम्वाद जगत में भी हो रहा था, जो संघ चेतना के प्रतिकूल था। कुछ चर्चा हुई। अंत में अशोक जी ने संयत पर दृढ़ता के साथ कहा- ‘‘कटुता हमारा नुकसान ही करती है। उसे हमें हजम करना होगा। अनंत प्रेम ही हमारी ऊर्जा शक्ति है। सात्विक प्रेम ही हमारे कार्य का आधार है।’’
हमारे प्राचीन ऋषि- मुनियों ने परम सत्य की अनुभूति को मानव जीवन का लक्ष्य माना। जीवन यात्रापथ स्थूल से सूक्ष्म, सूक्ष्मतर, सूक्ष्मतम, इन्द्रियातीत, सर्वज्ञता की ओर है, यह स्वानुभव से बताया। ज्ञान- भक्ति- कर्म का त्रिवेणी संगम श्रेयस्कर है। चित्त की नितांत निर्मलता, यह व्यष्टि की अध्यात्म साधना आधारभूत है। लौकिक क्षेत्र में तेजस्वी समन्वित प्रखर पुरुषार्थ, यह समष्टि साधना वर्तमान में विशेष आवश्यक है। कार्यकर्ता के लिए प्रवहमानता, चरैवेति चेतना स्वाभाविक है, अपेक्षित है। अशोक जी के जीवन में इसके सजग प्रकटीकरण का मंगलकारी अनुभव दिखता था। मैत्री, करुणा, मुदिता, उपेक्षा इन चार ब्रह्म विहारों में अशोक जी का चित्त विचरण करता रहता था। उनका जीवन हमें निरलस साधनानंद में निमग्न होने का मौन आह्वान कर रहा है, उसे हम सानंद ग्रहण करें, यह ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजली होगी।
– बालकृष्ण उ. नाईक, विश्व हिन्दू परिषद- उपाध्यक्ष


मा. अशोक जी और सामाजिक समरसता आयाम
अपने हिन्दू समाजमें आज भी जातिभेद और उँचनीच की समस्या है। विश्व हिन्दू परिषद का काम ही हिन्दू संगठन और जागरण का है। इसलिए प्रारंभ से ही परिषद समरसता के लिए प्रयत्नरत है। विहिप ने 1969 में उडुपी सम्मेलन में सर्वे हिन्दवः सोदरा, न हिन्दू पतितो भवेत् का घोष किया। 10 नवम्बर 1989 के दिन श्री राम जन्मभूमि मंदिर निर्माण शिलान्यास होने वाला था। पू. शंकराचार्य सहित अनेक प्रमुख धर्माचार्य उस समय अयोध्या थे। मा. अशोक जी और सन्त महात्माओं की चर्चा हुई और एक ऐतिहासिक निर्णय हो गया। उसके अनुसार शिलान्यास श्री कामेश्वर जी चैपाल नामक एक अनु. जाति के कार्यकर्ता द्वारा संपन्न हुआ। इसी शृंखला में 1994 में काशी में विशेष धर्म संसद अधिवेशन के समय मा. अशोक जी और सभी प्रमुख धर्माचार्यों का सामुहिक सहभोज डोम वस्ती में हुआ। सा. समरसता के लिए ऐसे अनेक छोटे बड़े कार्यक्रम परिषद करती है।
अस्पृश्यता को लेकर वैचारिक भ्रम निर्माण किये जाते है। अनेक लोगों ने इस कुप्रभाव के लिए हिन्दू धर्म को दोषी ठहराया। विद्वेष और शत्रुता का भाव निर्माण करने का प्रयत्न कुछ लोगो ने किया और आज भी कर रहे है।
वास्तव में हिन्दू धर्म का तत्वज्ञान समरसता, एकात्मता निर्माण करने वाला है। कण-कण में भगवान यह हमारा सिद्धांत है। सभी में परमेश्वर है तो ये उच्चनीचता, भेदभाव कैसे आया ? वेदकाल में अस्पृश्यता नहीं थी। चातुर्वण्र्य था परंतु उच्चनीचता नहीं थी। वेद व्यास केवट माता के पुत्र , ऐतरेय ब्राह्मण के ग्रंथकर्ता महिदास शूद्र माता के पुत्र थे। विश्वामित्र भी जन्मना ब्राह्मण नहीं थे, परंतु वे ब्रह्मर्षि बने।
इस विषय में प्रवोधन होना चाहिए। अपने समाज में अस्पृश्यता कब, क्यों और कैसे आयी, इसके लिए गहराई में जाना चाहिए।
यह कार्य परिषद ने प्रारंभ किया है। इस वैचारिक प्रबोधन को दिशा और प्रेरणा देनेवाले महापुरुष थे मा. अशोक जी सिंहल।
मा. अशोक जी ने पू. परमाचार्य (काची कामकोटी पीठ) से चर्चा की और प्रश्न किया, किसी धर्मग्रंथ में कौन सी जातियाँ अछूत है ऐसी सूची दी है क्या ? पू. परमाचार्य जी ने उत्तर नहीं दिया। और भी कुछ धर्माचार्यों से मा. अशोक जी ने चर्चा की, उत्तर आया ऐसी सूची नहीं है। उसी समय प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ. के. एस. लाल की एक पुस्तक उन्हें मिली – Growth of Scheduled caste & Scheduled tribes in medieval India (मध्यकाल में अनुसूचित जातियाँ, जनजातियों का उद्भव) मुस्लिम राज में अस्पृश्यता कैसे आयी उसकी उदाहरणों सहित विस्तार से चर्चा उस पुस्तक में उन्होंने की है। प्रयाग (इलाहाबाद) के श्री ब्रह्मलोचन दुबे जी से भी उस विषय पर चर्चा होती थी। उस गहरे चिंतन का सार एक सार्वजनिक कार्यक्रम में भाषण द्वारा मा. अशोक जी ने प्रकट किया।
प्रयाग में 17 अप्रैल 1994 को आयोजित महाराज सातन पासी के जन्म दिवस समारोह में मा. अशोक जी का ऐतिहासिक भाषण हुआ। वह भाषण सा. समरसता, अस्पृश्यता इस विषय को एक नई दिशा देने वाला है।परिषद के सा. समरसता आयाम का वैचारिक मुलाधार वह भाषण ही है। परिषद की बैठकों में और अन्यत्र अनेक बार मा. अशोक जी ने वह विषय रखा।
मा. अशोक जी ने कहा, ‘‘ हिन्दू समाज में पहले दलित या पिछड़े वर्ग थे ही नहीं, ये तो विदेशी मुस्लिम सत्ताधारीयों द्वारा बनायें गये थे। वास्तव में ये सब लोग वीर, पराक्रमी क्षत्रिय थे। जिन्होनंे मुस्लिम आक्रान्ताओं से डटकर संघर्ष किया था। युद्ध में हार जाने पर उन्होनें अनेक अमानुषिक यातनायें सहन की, परन्तु अपनी परम्परा, अपना हिन्दू धर्म नहीं छोड़ा। इसी की प्रतिक्रिया में  मुस्लिम शासकों ने उन्हें पिछड़ा, अछुत किया और मैला उठाने जैसे अपमान जनक काम करने के लिए बाध्य किया।
मा. अशोक जी ने उदाहरण दिया – महाराजा सुहेल देव महान राजा थे उस समय महमुद गजनी का भांजा सालार मसूद ने डेढ लाख की सेना लेकर आक्रमण किया। 1034 को उत्तरप्रदेश में बहराईच में हुई लड़ाई में सालार मसूद सहित उसकी सारी सेना मारी गई। मुट्ठी भर तुर्क बचे। इस लड़ाई का ऐसा परिणाम हुआ की आगे 150 साल तक किसी विदेशी मुस्लिम ने भारत पर आक्रमण करने की हिम्मत नहीं की। परन्तु आगे मोहम्मद गौरी जीता, दिल्ली मुसलमानों के हाथ में गई। सुहेल देव के वारिसों पर आक्रमण हुआ और वे हार गये। परन्तु उन्होंने धर्म नहीं बदला प्रतिक्रिया में मुस्लिम बादशहों ने उनके सारे समाज को जिन्हें आज हम पासी, राजभर कहते है उन्हें योजना पूर्वक दलित बनाया। आज पासी, राजभर अनुसूचित और पिछड़े जाति में है।
ऐसी ही बात वाल्मिीकि समाज की है। मुस्लिम अक्रान्ताओं ने पराभुत हिन्दूओं को पकड़कर कहा या तो इस्लाम स्वीकार करो या हमारे घर का मैला उठाओं। जो हिन्दू बने रहे उन्हें मैला उठाने का काम करना पड़ा उन्हें मेहतर, भंगी कहने लगे क्योंकि उनके स्वाभिमान का भंग हुआ। मेहतर या भंगी अछूत हो गये।’’

सन् 2003 में नागपुर के वाल्मिीकि समाज के अध्यक्ष कुछ लोगों के साथ मा. अशोक जी को मिलने आये। 35 पिढियों के पहले हम सारे राजस्थान में राजपूत क्षत्रिय थे, ये तथ्यों सहित जानकारी लेकर वे आये थे। हम सब जानते है वाल्मिीकी समाज के गौत्र राठोड़, चौहान, परमार होते है। यही गोत्र राजपूतो में भी है।
इसी तरह संत रविदास जी की जाति चमार नहीं, चंवर जाति रही है। जिसका उल्लेख महाभारत में भी आता है। इस चंवर कुल को नीचे उतारने का काम सिकंदर साह लोदी ने किया था।
डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर एक महान समाजिक सुधारक हुए। वे ‘‘अछूत कौन और कैसे ’’ नामक अपनी पुस्तक में लिखते है कि चैथी सदी तक हिन्दू समाज व्यवस्था में अस्पृश्यता नहीं थी। यह दोष उसके बाद आया। आगे उन्होने कहा अपवित्रता और छृआछूत दोनो में अंतर है, वो एक नहीं है।
मा. अशोक जी ने अनेक बार कहा ‘‘अनुसूचित जातियाँ और जनजातियाँ हमारे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी है। उन्हें धर्म योद्धा कहना चाहिए। ये जातिया धर्म और देश के लिए लड़ी। उन्होंने अस्पृश्यता स्वीकार की परन्तु अपना धर्म नहीं बदला। अगर ये सारी जातिया मुसलमान बन जाती तो हिन्दूस्तान का क्या होता ? इसलिए हिन्दू समाज पर इन पिछड़े और अनुसूचित समाज का बड़ा ऋण है। सारे समाज ने इन जातियों को उनके धर्म रक्षा के काम के कारण सम्मान देना चाहिए, उन्हें प्रणाम करना चाहिए।’’
सामाजिक समरसता आयाम
यह जो नया विचार है इसका प्रचार प्रसार हो इस दृष्टि से विश्व हिन्दू परिषद ने मा. अशोक जी की प्रेरणा से सामाजिक समरसता यह नया आयाम प्रारंभ किया। उसकी जिम्मेदारी परिषद के केन्द्रीय मंत्री मा. रामफल सिंह जी को दी गई। मा. रामफल सिंह जी ने परिश्रम करके काम खड़ा किया और अनेक पुस्तकें भी लिखी। समरसता आयाम के छोटे बड़े कार्यक्रमोमें, बैठको में मा. अशोक जी हमेशा जाते थे। उनका मार्गदर्शन पग-पग पर मिलता था।
मा. अशोक जी ने हर जाति का प्रामाणिक इतिहास संकलित करने की बात कही। उनकी प्रेरणा से कुछ शोध छात्रों ने यह काम प्रारंभ भी किया। हर जाति के, हर कुल के गोत्र और कुलदेवता की खोज की जाय। इन तथ्यों से पता लगेगा की कौन सी जाति किस वर्ण से संबंधित रही है।
मा. अशोक जी की प्रेरणा से संत रविदास चेतना यात्रा का आयोजन नवम्बर 2005 में किया गया। यह यात्रा चितौड़गढ से काशी तक थी। इस कार्यक्रम के लिए मा. अशोक जी राजस्थान के मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधराराजे सिंधीया सहित अनेक महानुभावों को मिलें। यात्रा सफल हुई। अनेक साधु संत सहभागी हुए। इस यात्रा के प्रमुख श्री मेवादास जी महाराज थे। मा. अशोक जी का और महाराज जी का अपार स्नेह था।
सामाजिक समरसता आयाम का काम बढ रहा है। आज मा. अशोक जी नहीं रहे परन्तु उनके दिशा दर्शन के अनुसार समरसता का काम चलेगा और आप सभी के सहयोग से बढेगा।

विनायक देशपाण्डे,  विश्व हिन्दू परिषद सह संगठन महामंत्री


अद्वितीय मा. अशोक जी सिंहल
विश्व हिन्दू परिषद को सच्चे अर्थों में विश्व-पटल पर प्रस्थापित करने वाले श्रद्धेय अशोक जी सिंहल वस्तुतः एक युग-निर्माता एवं इतिहास-पुरुष हैं। अयोध्या में श्रीराम जन्मस्थान पर 464 वर्षों से खड़े बाबरी ढाँचारूपी कलंक को ध्वस्त करने के लिए 6 दिसम्बर, 1992 को देश के कोने-कोने से लाखों कारसेवकों को ‘लक्ष्य-प्राप्ति की बलिवेदी पर अपना तन-मन वारो’ की भावना के साथ समवेत करने वाले सिंह-सपूत सिंहल जी हिन्दू समाज के अप्रतिम सेनानायक बनकर उभरे हैं। ‘केसरी बाना सजाये वीर का श्रंगारकर, ले चले हम राष्ट्रनौका को भँवर से पार कर’ के भाव से भरे इस महानायक का बाबरी ध्वंसकाण्ड के बाद की विदेश-यात्रा में इस प्रकार अभिनन्दन किया गया था- एक प्रकार से ‘ब्रजादपि कठोराणि, मृदूनि कुसुमादपि’ का ही भाव था यह। समाज के इसी आलोड़न-बिलोड़न के बीच उन्हें ‘हिन्दू-हृदय सम्राट’ का स्थान सहज ही प्राप्त हो गया।
नाभिषेको न संस्कारः सिंहस्य क्रियते वने।
विक्रमार्जितस्य स्वत्वस्य, स्वयमेव मृगेन्द्रता।।
मूलतः उ0प्र0 के अलीगढ़ जिले के बिजौली ग्राम का निवासी सिंहल परिवार कालान्तर में प्रयाग आकर बस गया था। श्री अशोक जी के पिताजी श्री महावीर सिंह सिंहल प्रशासनिक अधिकारी थे, उन्होंने प्रसिद्ध ‘आनन्द भवन’ के निकट एक भूखण्ड लेकर अपना भवन बनवाया था, आज वहीं कमला नेहरू चिकित्सालय के सामने-स्थित विशाल ‘महावीर भवन’ सिंहल परिवार का पैतृक निवास है। प्रयाग-प्रवास के दौरान अपने अशोक जी का निवास यहीं रहता है। गुरुपूर्णिमा और नवदुर्गा-जैसे अवसरों पर सिंहल परिवार यहीं एकत्र होता है। अतीव आध्यात्मिक रुझान वाले अशोक जी के गुरु पण्डित रामचन्द्र तिवारी (कानपुर) भी यहीं रहकर अपनी साधना किया करते थे। महावीर भवन अब सामाजिक कार्य के लिए पूर्ण रूप से समर्पित कर दिया गया है। इस लेखक को सन् 1975 के आपात्काल के दौरान उनका अत्यधिक स्नेह एवं मार्गदर्शन प्राप्त करने का सुअवसर प्राप्त हुआ है।
आश्विन कृष्ण तृतीया तदनुसार 27 सितम्बर, 1926 को राजा मण्डी आगरा में जन्मे श्री अशोक प्रकाश सिंहल (पूरा नाम यही है) विद्यार्थी-अवस्था में प्रयाग में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सम्पर्क में आये। बाद में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के आई.टी. संस्थान से धातु विज्ञान (डमजंससनतहल) सेे बी.टेक. की पदवी ग्रहण कर 1950 में संघ के प्रचारक बनकर सारा जीवन राष्ट्र-सेवार्थ समर्पित कर दिया। 32 वर्ष तक संघ के विभिन्न दायित्व निर्वाह करने के बाद सन् 1982 में संघ की योजनानुसार विश्व हिन्दू परिषद के संयुक्त महामंत्री की जिम्मेवारी स्वीकार की। उस समय वे संघ के दिल्ली व हरियाणा प्रान्त के प्रचारक थे। इसी दौरान उन्हें डॉ. कर्ण सिंह के साथ ‘विराट हिन्दू समाज’ का कार्य खड़ा करने का अवसर मिला था। उस समय परिषद के अध्यक्ष महाराणा भगवत सिंह मेवाड़ तथा महामंत्री श्री हरमोहन लाल थे। उपाध्यक्षों में श्रीमंत राजमाता विजयाराजे सिंधिया भी शामिल थीं।
सन् 1982 ई. में तमिलनाडु के तिरुनेलवेली जिले में मीनाक्षीपुरम नामक ग्राम में बहुत बड़ा धर्मान्तरण कर उसे ‘रहमत नगर’ बना दिया गया था, जिसमें एक हजार से अधिक हिन्दुओं को इस्लमपंथी बना दिया गया था। इसके बाद विहिप की ओर से ‘संस्कृति रक्षा योजना’ (हिन्दुओं का धर्मान्तरण रोकने व धर्मान्तरित हिन्दुओं को अपनी मूल संस्कृति में वापस लाने-हेतु धर्म रक्षक कार्यकर्ताओं की प्रचण्ड वाहिनी खड़ा करने लिए अक्षय कोष) (बवतचनेद्ध,फिर एकात्मता यात्रा व रामशिलापूजन-जैसे ऐतिहासिक आयोजन हुए। इसी कड़ी में श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति-यज्ञ एवं मंदिर-निर्माण आन्दोलन भी प्रारम्भ हुआ। इन सबमें उनकी अति महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
इन पंक्तियों का लेखक उन सौभाग्यशाली लोगों में शामिल है, जिन्हें ऋषितुल्य अशोक जी की शीतल, स्नेहिल छाया में चहचहाने का सुअवसर प्राप्त हुआ है। युवा पीढ़ी में बेहद लोकप्रिय श्रद्धेय सिंहल जी तब संघ के कानपुर नगर प्रचारक (जी हाँ; उत्तरप्रदेश के सबसे बड़े इस नगर को संघ में तब ‘महानगर’ कहना शुरू नहीं किया गया था। सन् 1960 के आस-पास तब संघ कार्यालय 105/731 गाँधी चैक,गाँधी नगर, सीसामऊ में हुआ करता था। वहाँ उनका रहना 8 फीट लम्बी एवं 5 फीट चैड़ी, रेलवे की शायिका-जैसी कोठरी में होता था। किन्तु इस कुटिया के बेजोड़ चुम्बकीय व्यक्तित्व के धनी इस संत के कारण वहाँ तरुणाई का मेला-सा लगा रहता था और वहाँ गपशप व गीतों का दौर-दौरा चलता रहता था। इसी छोटे से स्थान से विलक्षण कार्यकर्ताओं की अद्भुत श्रंखला उद्भूत हुई। इनमें संघ के अ.भा. सह-व्यवस्था प्रमुख मा. बाल जी (बालकृष्ण त्रिपाठी), विश्व हिन्दू परिषद के वर्तमान संयुक्त महामंत्री व एकल विद्यालयों की पचास-हजारी पंक्ति का विक्रम पार करने वाले मा. श्याम जी गुप्त, मध्यभारत के पूर्व प्रान्त प्रचारक मा. शरत चन्द्र मेहरोत्रा (अब स्वर्गीय), आई. आई. टी. कानपुर के प्रोफेसर भूषणलाल धूपड़ (बाद में सह प्रान्त संघचालक), डॉ. जगमोहन गर्ग (क्षेत्र संघचालक पश्चिमी उ0प्र0), मा. वीरेन्द्र पराक्रमादित्य (कानपुर प्रान्त-संघचालक), मा. रामफल सिंह, केन्द्रीय मंत्री विहिप (अब स्वर्गीय), मा. रामेश्वर दयाल शर्मा, केन्द्रीय सहमंत्री विहिप (अब स्व.), श्री गिरीश अवस्थी (राष्ट्रीय अध्यक्ष भारतीय मजदूर संघ)- सरीखे कार्यकर्ता विशेष उल्लेखनीय हैं।
कार्यकर्ताओं का निर्माण आदर्शवाद की कठोर चट्टान पर करने का उनका प्रयास सदैव से रहता रहा है। सन् 70-71 की बातें अभी तक ठीक से याद है। कार्यालय पर अति प्रातः जागरण होकर प्रातः स्मरण (उस समय 42 श्लोक वाला लम्बा प्रातः स्मरण था) तत्पश्चात् गीता का 12वाँ अध्याय वे स्वयं ही दोहरवाते थे और उसके बाद 15-20 मिनट तमिल भाषा का पठन-पाठन (तमिलनाडु के इंजीनियर कार्यकर्ता श्री रामाचारी द्वारा) फिर तैयार होकर शाखाओं पर निकलना। यह लेखक तो रात एक-दो बजे ‘दैनिक जागरण’ के उप सम्पादक की रात्रिकालीन शिफ्ट (ड्यूटी) पूरी करके लौटता था, अतः प्रभात शाखा पर कार्य करने में बड़ा कष्ट होता था। उन दिनों कार्यालय पर प्रातःकालीन चाय की व्यवस्था नहीं रहती थी।
आज भी मा. अशोक जी की वैसी ही कठोर दिनचर्या है। अति प्रातः तीन बजे जागरण, 1 घण्टे का निजी पाठ, फिर ध्यानकक्ष में सामूहिक एकात्मता(भारतभक्ति) स्तोत्र, ‘श्रीराम जय राम जय-जय राम’ का विजय महामंत्र और उद्घोष (धर्म की जय हो, अधर्म का नाश हो, प्राणियों में सद्भावना हो, विश्व का कल्याण हो, गोवंश-हत्या बन्द हो, धर्मान्तरण बन्द हो, भारत अखण्ड हो) आदि द्वारा कार्यकर्ताओं का आध्यात्मिक, सांस्कृतिक व राष्ट्रीय व्यक्तित्व गढ़ते रहते हैं।
मा. अशोक जी सदैव अग्रिम मोर्चे पर रहकर नेतृत्व करने वाले सेनापति रहे हैं। उनके जन-जन का हृदयहार बन जाने का रहस्य यही है। अयोध्या में जब 30 अक्टूबर, 1990 को कारसेवकों ने जन्मभूमि के गुम्बदों पर भगवा ध्वज फहराकर अपनी प्राणज्योति को श्रीरामजी की ज्योति में मिलाया था, उस समय अशोक जी सिर में पत्थर लगने से रक्त से सराबोर थे। जब एक पत्रकार कार्यकर्ता ने उनसे पूछा ‘अब हम क्या करें? आपका कोई संदेश?’’ उन्होंने अपनी चोट से हाथ हटाया और गरजकर बोले, ‘‘मुझे छोड़ो, जन्मभूमि की ओर बढ़ो, वहाँ कारसेवा करनी है।’’ उन्हें अस्पताल ले जाया गया, जहाँ बी.बी.सी. के पत्रकार ने उन्हें सूचना दी कि जन्मभूमि पर कारसेवा हो गई है और मंदिर पर भगवा ध्वज फहरा दिया गया है। यह सुनते ही वे भाव-विहृल हो गये और बोले ‘‘वी हैव डन इट’’(हमने इसे कर दिखाया)। अभी आगे ध्येय संकल्प की पूर्ति तक उन्हें बहुत कुछ कर दिखाना है।
जब तक लक्ष्य न पूरा होगा,
तब तक पग की गति न रुकेगी।
आज कहे चाहे जो दुनिया,
कल को झुके बिना न रहेगा
हिन्दु राष्ट्र के बिखरे कण-कण को, कर दें चट्टान।
टक्कर ले आने वालों का, रहे न नाम-निशान।
देश करें बलवान, विधि का यही विधान।
दुर्बल देशों का नहिं जग में रहने वाला नाम।
उद्दाम आकांक्षाधारी मा. अशोक जी के प्रचारक निकलने की जानकारी पाकर उनके पिताजी बहुत क्षुब्ध थे। उन्होंने बहुत समझाया-बुझाया, डराया-धमकाया, पर अडिग अशोक जी ने एक ही उŸार दिया ‘‘अब कुछ भी हो, जब तय कर लिया है तो तय हो चुका। फिर, इसी घर से ही तो शिक्षा पायी है कि जो निश्चय करो, पूरे मन-आत्मा से विवेकपूर्वक करो। यही निश्चय मैंने किया है।’’
पिता ने बाध्य होकर अनुमति तो दे दी, पर एक शर्त के साथ, ‘‘वचन दो मुझे कि अब जो निर्णय तुमने ले लिया है, जीवन पर्यन्त इस मार्ग अथवा निर्णय से हटोगे नहीं।’’
यह बंधन तो उनके मनमाफिक ही था। वे प्रसन्न ही हुए।
ऐसा भी बताते हैं कि धुन के पक्के मा. अशोक जी जब घर-बार के काम-काज में न उलझकर अपने कर्तव्य-पथ पर डटे रहने की जिद पर ही अड़े रहे, तो उनकी माताजी श्रीमती विद्यावती सिंहल ने अपने अंगूठे के रक्त से तिलक करते हुए उन्हें सात्विक क्रोध के साथ यह कहकर विदा किया था- जा, अपने कर्म में जुट जा।
ऐसा लगता है कि उनके शीश पर उसी आशीष की घनेरी छाया इस 77वें धर्मयुद्ध में उनका शिरस्त्राण बनकर उन्हें ‘विजयी भव’ व ‘यशस्वी भव’ का वरदान दे रही है। वह फलीभूत होगा, इसमें कोई संदेह नहीं।
श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति के एक महत्वपूर्ण सदस्य वीतराग स्वामी वामदेव जी महाराज (ब्रह्मलीन) का कथन भी इसी से मेल खाता प्रतीत होता है।
‘‘अशोक जी में ईश्वर-प्रदत्त मानवता के अलौकिक गुण हैं। ये गुण उनके स्वर-माधुर्य तथा व्यक्तित्व के माध्यम से प्रभुभक्ति और उससे प्राप्त शक्ति में देखे जा सकते हैं। अनेक साधु-संतों एवं महात्माओं से उन्हें आशीष मिला है। ऐसा आशीष तभी मिलता है, जब उसके योग्य पात्र का चुनाव कर लिया जाता है। देश, जाति और जन-जन कल्याण के निमिŸा वे इसीलिए प्रभु-प्रदत्त मानवीय गुणों से आच्छादित हैं। श्रीराम प्रभु के मंदिर-निर्माण हेतु उनके सद् मानवीय प्रयास इसी कारण सदा स्मरण किये जाते रहेंगे। वे इतिहास-पुरुष सिद्ध होंगे।’’
मा. अशोक जी के संत व्यक्तित्व से संबंधित एक उदाहरण विशेष उल्लेखनीय है। मार्च, 2011 में नागपुर के पास उदासा नामक स्थान पर विहिप के प्रचारकों का अ.भा. प्रशिक्षण वर्ग आयोजित था। प्रसिद्ध कथावाचक एवं आध्यात्मिक विभूति स्वामी गोविन्ददेव गिरि जी (पूर्व नाम किशोर व्यास) उसके उद्घाटन सत्र के मुख्य अतिथि थे। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह मा. भैया जी जोशी भी कार्यक्रम में उपस्थित थे। देश भर के कार्यकर्ता यह देखकर आश्चर्यचकित रह गये कि स्वागत-सत्कार के समय संघ-सरकार्यवाह द्वारा स्वामी गोविन्ददेव गिरि की चरणवन्दना की गई, किन्तु भगवावस्त्रधारी पू.गोविन्ददेव जी ने परिषद-अध्यक्ष अशोक जी के चरण स्पर्श किये और अपने उद्बोधन में कहा कि श्वेत वस्त्रधारी इस संत का वे सर्वाधिक सम्मान करते हैं।
अपनी इसी प्रतिष्ठा के बल पर मंदिर-आन्दोलन के अग्रणी अशोक जी इसमें सहस्रों संतों को सम्मिलित करने और इस संघर्ष को समाजव्यापी व सर्वस्पर्शी बनाने में सफल हुए है। इस प्रकार सारे समाज को साथ लिए वे सफलता के सोपानों पर सतत चढ़ते जा रहे हैं।
जहाँ तक मा. अशोक जी का प्रश्न है, वे तो ‘चला उदधि को आज लाँघने ईश्वर का विश्वासी’ के दृढ विश्वास के साथ श्रीराममंदिर निर्माण-आन्दोलन में आहुति दे रहे लोगों का यही आह्वान कर रहे हैं-
पहली आहुति है, अभी यज्ञ चलने दो,
दो हवा देश की आग जरा बढ़ने दो
जब हृदय -हृदय पावक से भर जायेगा
सारे भारत का पाप उतर जायेगा।
उनकी दृढ़ आस्था है कि –
बिना राम के मर्यादा का चरमोत्कर्ष कहाँ है?
बिना राम के इस भारत में भारतवर्ष कहाँ हैं?
भगवत्कृपा से यह दृश्य हम अनतिदुर भविष्य में ही देख सकेंगे कि –
चोटें यदि पड़ती रहीं, शिला टूटेगी।
भारत में कोई नई धार फूटेगी।।
वीरेश्वर द्विवेदी, सदस्य केन्द्रीय प्रबंध समिति-विहिप


अशोक सिंहल एक संस्कृतिक धरोहर
विश्व हिन्दू परिषद के मार्गदर्शक अशोक सिंहलजी का 17 नवम्बर 2015 को दोपहर में दिल्ली के पास गुडग़ांव में देहान्त हो गया। कुछ दिन पहले ही देशभर में उनका जन्मदिन मनाया गया था। उन्होंने जीवन के 89 वर्ष पूरे कर लिये थे और 90 में प्रवेश किया था। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के स्नातक अशोकजी प्रशिक्षण से धातु विज्ञानी थे। इलाहाबाद के सम्पन्न परिवार के अशोकजी ने कुछ वर्ष पहले करोड़ों की अपनी पैतृक सम्पत्ति दान कर एक न्यास बना दिया था। महर्षि वशिष्ठ के नाम से बनाये गये इस न्यास के नाम के आगे वशिष्ठ ऋषि की अर्धांगिनी का नाम जोड़कर इसका पूरा नाम अरुंधति वशिष्ठ अनुसंधान पीठ रखा। पीठ का मुख्य उद्देश्य दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानव दर्शन पर शोध कार्य करना है। जिस प्रकार महात्मा गांधी मानते थे कि भारत का विकास हिन्द स्वराज के आधार पर ही हो सकता है, पश्चिमी अवधारणाओं पर किया गया विकास भारत को भारत ही नहीं रहने देगा, उसी प्रकार अशोक सिंहलजी मानते थे, कि विकास की सही दिशा उपाध्याय का एकात्म मानव दर्शन ही हो सकता है। यही दर्शन भारतीय स्वभाव और प्रकृति के अनुकूल है। गांधी का हिन्द स्वराज और उपाध्याय का मानव दर्शन मोटे तौर पर एक ही धरातल पर अवस्थित हैं।
अशोकजी की धातु प्रोद्यौगिकी से लेकर एकात्म मानव दर्शन तक पहुंच पाने की यात्रा बहुत लंबी है। 1926 में उनकी यह जीवन यात्रा आगरा से शुरु हुई थी। यह परिवार आगरा का ही रहने वाला है। वही आगरा जिसने इतिहास के न जाने कितने उतार चढ़ाव अपने जीवन-काल में देखे। इसी आगरा से निकले अशोक सिंहल ने स्वयं भी भारतीय इतिहास पर अपना एक स्थायी पद चिन्ह छोड़ दिया। अशोकजी के निकटवर्ती विजय कुमार के अनुसार नौवीं कक्षा में पढ़ते हुये उन्होंने स्वामी दयानन्द की जीवनी पढ़ ली थी। जाहिर है इस जीवनी ने बाद में अशोकजी को कभी चैन से नहीं बैठने दिया। लेकिन सभी जानते हैं कि शुरुआत चाहे आगरा से हो या किसी और स्थान से भारत को अपने भीतर आत्मसात करने का रास्ता प्रयागराज से होता हुआ काशी में जाकर ही रुकता है। 1942 में अशोकजी भी प्रयागराज इलाहाबाद में ही अध्ययन कर रहे थे। इलाहाबाद उबल रहा था। आनन्द भवन कांग्रेस की गतिविधियों का केन्द्र था। महात्मा गांधी ने अंग्रेजों को भारत छोडऩे का अल्टीमेटम दे दिया था। सत्याग्रह हो रहा था। उधर द्वितीय विश्व युद्ध की ज्वालाओं में यूरोप धधक रहा था। बाबा साहिब आम्बेडकर काउंसिल के सदस्य होकर भारत में अस्पृश्यता उन्मूलन के रास्ते तलाश रहे थे। गांधीजी गिरफ्तार हो चुके थे। देश में निराशा का वातावरण छाने लगा था। अशोक सिंहलजी की उम्र उस समय सोलह साल की थी। वे संगम तट पर खड़े होकर, कल-कल, छल-छल बहती-क्या कहती गंगाधारा को समझने का प्रयास कर रहे थे। वे जानते थे, यह गंगाधारा ही अनन्त काल से भारत की आवाज है। वहीं उनकी भेंट प्रो.राजेन्द्र सिंह (जो बाद में रज्जू भैया के नाम से जाने गये) से हुई जिन्होंने गंगा की कल-कल ध्वनियों की व्याख्या अशोक को समझाई। भारत मां को विश्व के गुरु के आसन पर स्थापित करने की ध्वनि। विदेशी दासता से मुक्त करवाने की गुहार। अशोकजी उसी उम्र में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ गये थे। लेकिन, संघ से सोलह वर्ष के उस किशोर के लिये जुडऩा उस समय भी इतना आसान नहीं था। प्रो. राजेन्द्र सिंह को बाकायदा परिवार में बुलाया गया और उनसे संघ की प्रार्थना सुनी गई। ‘नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे।’ प्रार्थना सुन कर अशोकजी की माताजी को संतुष्टि हुई। यही देश की मुक्ति का रास्ता है। सिंहलजी ने शाखा जाना शुरु कर दिया। उसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा। कभी घर की तरफ भी नहीं।
प्रयागराज से ही अशोकजी काशी गये। महामना मालवीयजी के काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में धातु विज्ञान की पढ़ाई करने के लिये। यहीं उन्होंने मनुष्यों के भीतर भी ऐसी धातु निर्माण का मंत्र सीखा जिसके चलते कोई अपना सर्वस्व भारत माता के चरणों में अर्पित कर देता है। सबसे पहले उन्होंने यह ताकत अपने भीतर ही पैदा की। गंगा के चौरासी घाटों पर गंगा को निहारते हुये, काशी विश्वनाथ मंदिर के घंटानाद को सुनते हुये, महामना की प्रयोगस्थली में घूमते हुये, उन्होंने अपने भीतर को फौलादी बना लिया। बी.ई. की पढ़ाई बीच में ही छोड़ कर वे 1948 में जेल चले गये। पंडित नेहरु ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबन्ध लगा दिया था। जेल से छूटने के बाद ही उन्होंने अपनी बी.ई की पढ़ाई पूरी कर डिग्री हासिल की। लेकिन इसके साथ- साथ उन्होंने संघ की पढ़ाई भी पूरी कर ली थी। यही कारण है कि इंजीनियर बनने के बाद वे वापस घर नहीं गये, बल्कि संघ के प्रचारक बन गये।
लगभग 800 साल की गुलामी के कारण भारतीय इतिहास पुरुष के शरीर पर पड़ गये काले धब्बे अशोकजी की चिन्ता का कारण थे। यह चिन्ता तो देश में और अनेक चिन्तकों को भी है। लेकिन अशोकजी चिन्तन और यथार्थ के अन्तराल को कर्म से पाटने वाले वीरव्रती थे। यही कारण है कि काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से धातु विज्ञान में पढ़ाई करने के बाद भी सांसारिक झमेलों से किनारा करते हुये वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक बन गये थे। अशोकजी की यही चिन्ता उन्हें बार-बार अयोध्या की ओर खींच कर ले जाती थी। विदेशी आक्रमणकारियों ने अयोध्या में राम स्मृति मंदिर को ध्वस्त कर उसके स्थान पर बाबर की स्मृति में एक ढांचा खड़ा कर दिया था। भारत के लोगों को आशा थी कि जिस प्रकार यूरोपीय विदेशी शासकों के भारत से चले जाने के बाद सरकार ने उन शासकों के बुत और अन्य चिन्ह सार्वजनिक स्थानों से हटा दिये थे, उसी प्रकार मंगोल, तुर्क, अफगान व अरब शासकों के चिन्ह भी हटा दिये जायेंगे। सरदार पटेल ने सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण से उसकी शुरुआत भी की थी, लेकिन उनकी मृत्यु के बाद वह कार्य वहीं स्थगित हो गया। सरदार पटेल के उसी कार्य को आगे बढ़ाने का प्रश्न था। अयोध्या में बने बाबरी ढांचे को लेकर अशोकजी की चिन्ता भी यही थी। बहुत से लोग अज्ञानतावश यह मानते हैं कि वे मुसलमानों के विरोधी थे, इसलिये बाबरी ढांचा हटाना चाहते थे। लेकिन इस का लेशमात्र भी सत्य नहीं है। मुझे अशोकजी का सानिध्य पिछले लगभग पन्द्रह बीस सालों से मिलता रहा है। दरअसल वे तो आश्चर्य व्यक्त किया करते थे कि भारत के मुसलमानों का बाबर से क्या सम्बंध है? ये मुसलमान तो अपने ही बन्धु हैं, जो विदेशी इस्लामी सत्ता के दिनों में किन्हीं कारणों से मतान्तरित हो गये। इनका बाबर से क्या लेना देना है। अशोकजी का कहना था कि इन लोगों को कुछ निहित स्वार्थी तत्व अपने राजनैतिक नफा-नुकसान के लिए भड़काते रहते हैं। बाबर मध्य एशिया से आया विदेशी आक्रमणकारी था। जिसने भारत के इस खंड को जीत ही नहीं लिया था, बल्कि यहां के लोगों पर अमानुषिक अत्याचार किये थे। धीरे-धीरे देश में बाबर के वंशजों का राज्य फैलता गया। मतान्तरण उसी कालखण्ड के अत्याचारों का परिणाम है। लेकिन, उस कालखंड में भी भारत के लोग निरन्तर संघर्षशील रहे। आज जिन भारतीयों ने इस्लाम मजहब को अंगीकार कर लिया है, उन्हीं के पूर्वज इन विदेशी इस्लामी आक्रमणकारियों के अत्याचारों का सर्वाधिक शिकार हुए थे। भारत के मुसलमानों का न तो मध्य एशिया से और न ही बाबर से कोई ताल्लुक है, बल्कि इनके पूर्वज तो बाबर और उनके वंशजों के अत्याचारों का शिकार हुए। इसलिए अयोध्या का प्रश्न राष्ट्रीय प्रश्न है, उसका मजहब से कुछ लेना-देना नहीं है। यह सभी भारतीयों के सम्मान का प्रश्न है, चाहे वे इस्लाम मजहब को मानते हों, वैष्णव सम्प्रदाय के हों, या शैव मत के, जैन मताबलम्बी हों या बौद्ध पंथ के अनुरागी हों। सिक्ख पंथ के उपासक हों या नास्तिक ही क्यों न हों। क्योंकि, राम सभी के यशस्वी पूर्वज थे। कभी अल्लामा इकबाल ने सभी भारतीयों की तरफ से राम की महत्ता का जिक्रकरते हुये लिखा था –
है राम के वुजूद पे हिन्दोस्तां को नाज
अहले नजर समझते हैं उसको इमाम ए हिन्द
अशोकजी इसी राम के वजूद की निशानियों को समेट रहे थे, जिनको नष्ट कर दिया गया था या करने के प्रयास हो रहे थे। एक वक्त ऐसा भी आया जब राम के वजूद की दूसरी निशानी राम सेतु को तोडऩे की लगभग सब तैयारियां पूरी कर ली गई थीं। यदि उस वक्त अशोकजी के नेतृत्व में विश्व हिन्दू परिषद सक्रिय न होती तो सचमुच राम सेतु का वजूद समाप्त हो जाता। लेकिन, इन सभी प्रयासों में मुस्लिम विरोध कहीं दूर-दूर तक नहीं था। यही कारण था कि अशोकजी प्रयास कर रहे थे कि अयोध्या में वर्तमान राम मंदिर का विस्तार कर भव्य राम मंदिर सर्वानुमति से बनें। संसद इसके लिये प्रस्ताव पारित करे। इसी हेतु वे समाज के सभी वर्गों से मिलते थे। देह शान्त हो जाने से पूर्व भी उन्होंने यही कहा कि अभी भव्य राम मंदिर का निर्माण करना है, ऐसा समाचार पत्रों में छपा भी था। अयोध्या में राम मंदिर तो अशोकजी ने बना दिया था। अब तो केवल उसका स्वरुप युगानुकूल भव्य बनाना है।
लेकिन, राम मंदिर आन्दोलन तो बहुत बाद की बात है। संघ की दृष्टि से उनका लम्बा कार्यकाल कानपुर का ही रहा। आपातकाल में देश पर लाद दी गई संवैधानिक तानाशाही के खिलाफ नानाजी देशमुख के नेतृत्व में देशभर में आन्दोलन चला तो उसमें अशोकजी भी अग्रणी पंक्तियों में थे। पुलिस ने उन्हें पकडऩे के भरसक प्रयास किये लेकिन, भूमिगत हो गये अशोकजी की छाया को भी वे पकड़ नहीं पाये। अशोकजी से प्रेरणा लेकर न जाने कितनें युवकों ने जेल जाना स्वीकार कर लिया अपने व्यवसाय और कैरियर को ठोकर मार कर। आपातकाल में देशवासियों द्वारा किये गये संघर्ष की भट्टी में से तप कर निकले अशोकजी दिल्ली में प्रान्त प्रचारक बन कर आये। उधर सांय प्रचारक का दायित्व इन्द्रेश कुमार जी ने संभाला। इन दोनों की योजना से ही दिल्ली का ऐतिहासिक तीर्थस्थान झंडेवाला मंदिर किसी की निजी सम्पत्ति न रह कर सार्वजनिक न्यास के रुप में विकसित हो सका। 1981 में अशोकजी ने विश्व हिन्दू परिषद की जिम्मेदारी संभाली। उन दिनों विश्व हिन्दू परिषद सीमित क्षेत्रों में ही जाना जाता था। उसका कार्यक्षेत्र विस्तृत होते हुये भी, काम सीमित ही था। अशोकजी ने इसे व्यापक फलक प्रदान किया। कार्यों का विस्तार किया। मीनाक्षीपुरम में हुए मतान्तरण ने उन्हें कहीं भीतर तक हिला कर रख दिया। जाति के आधार पर सामाजिक स्थान और नियति का निर्धारण। उन्होंने हिन्दू समाज के भीतर अस्पृश्यता विरोधी व ऊंच-नीच विरोधी आंदोलन को और गतिशील बनाया। सामाजिक समरसता परिषद का नारा बन गया। बाबा साहेब आम्बेडकर जिंदगी भर इस कार्य में लगे रहे थे। उन्होंने अनेक स्थानों पर जाति की जड़ता की चट्टानों को हिलाकर रख दिया था। लेकिन इन चट्टानों को तोडऩे का काम अभी बाकी था। अशोक सिंहल ने यही काम शुरु किया। मंगल काल में अनेक बन्धु अनेक कारणों से हिन्दू समाज को त्याग कर इस्लाम में दीक्षित हो गये थे। कालान्तर में वे उनकी सन्तानें राष्ट्र विरोधी धरातल पर जा खड़ी हुईं। मतान्तरण से राष्ट्रन्तरण होता है। लेकिन, शिक्षा के प्रभाव के कारण ऐसे अनेक बन्धु, खासकर युवा पीढ़ी पुन: अपने घर वापिस आ जाना चाहती थी।
विश्व हिन्दू परिषद ने परावर्तन आंदोलन शुरु किया। यह एक प्रकार से स्वामी दयानन्द द्वारा चलाये गये शुद्धि आंदोलन का ही विस्तार था। इसी परावर्तन से आगे जाकर धर्म जागरण का आंदोलन फैला। धर्म जागरण ने गौ-रक्षा के प्रश्न को एक बार फिर केन्द्र बिन्दु में स्थापित कर दिया।
सनातन भारत के भावात्मक प्रतीकों को सायास नष्ट करने के प्रयासों का अशोक सिंहलजी विश्व हिन्दू परिषद के माध्यम से विरोध कर रहे थे। वे मानते थे कि भौतिक उपादानों से राज्य का निर्माण होता है। राष्ट्र के निर्माण के लिये भावात्मक कारकों के प्रति लगाव एवं भक्ति ही इतिहास-सिद्ध मंत्र है।
यह अशोक सिंहलजी की ऊर्जा ही थी जिसने विश्व हिन्दू परिषद को उसकी पहचान और दिशा दी। परिषद के संस्थापक महासचिव दादा साहेब आप्टे ने परिषद की जो कल्पना की थी, उससे भटका न जाये इसी की पूर्ति हेतु अशोकजी ने कुछ वर्ष पूर्व हिन्दुस्तान समाचार संवाद समिति के साथ मिलकर (समिति के संस्थापक भी आप्टे ही थे) दादा साहिब आप्टे की जन्म शताब्दी मनाने का निर्णय किया और आप्टेजी की जीवनी लिखने का जिम्मा मुझे सौंपा था। उन दिनों मुझे अशोकजी से बार-बार मिलने का मौका मिलता था, इसलिये उनके विषय में जानने का अवसर भी। दरअसल उन दिनों ही अशोकजी के व्यक्तित्व को मैं सही ढंग से पकड़ पाया।
अशोकजी की हिन्दू व हिन्दुत्व की अवधारणा बहुत व्यापक थी। वे मानते थे कि यूरोपीय बुद्धिजीवियों ने या तो अपनी अज्ञानता के चलते या फिर साम्राज्यवादी षडयंत्र के कारण हिन्दुत्व को भी सामी सम्प्रदायों के समकक्ष मान कर उसे संकीर्ण मजहबी सीमाओं में समझने की भूल की। दुर्भाग्य से नई शिक्षा पद्धति से पढ़े-लिखे लोग भी हिन्दुत्व को उन्हीं संकीर्ण सीमाओं में देखने लगे। अशोकजी हिन्दुत्व को जीवन शैली के तौर पर देखते थे। इसे सुखद संयोग ही कहना चाहिये कि, उच्चतम न्यायालय ने भी अपने एक निर्णय में हिन्दुत्व को जीवन शैली की ही संज्ञा दी। शायद यही कारण था कि वे ब्रिटिश शिक्षा पद्धति के स्थान पर भारतीय शिक्षा पद्धति के पक्षधर थे। इस स्थल पर अशोकजी महामना मदनमोहन मालवीय के अनन्य प्रशंसकों में से थे। ये मालवीयजी ही थे जिन्होंने अंग्रेज काल में भी सीमित स्पेस उपलब्ध होने के बावजूद शिक्षा पद्धति को भारतीयता का पुट देने का प्रयोग किया। अशोकजी उसी प्रयोग को आज भी आगे बढ़ाने के पक्षधर थे।
अशोकजी विज्ञान के छात्र थे। लेकिन उनकी रुचियों का क्षेत्र विस्तृत था। शास्त्रीय संगीत उनकी कमजोरी थी। शास्त्रीय गायन में सिद्धहस्त थे। बहुत कम लोगों को ज्ञात होगा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यक्रमों में गाये जाने वाले अनेक गीतों की लय उन्होंने ही बनाई थी। विदेशी आक्रमणों के कारण भारतीय विज्ञान में होने वाले विकास और शोध की भंग हो चुकी परम्परा को वे पुन: स्थापित करने के पक्षधर थे। वेद-विज्ञान विषय विश्वविद्यालयों में पढ़ाये जाने चाहिये और उनमें स्थापित मान्यताओं को आधुनिक उपकरणों से प्रयोगशालाओं में प्रमाणित भी किया जाना चाहिये। विश्व हिन्दू परिषद में ही कार्य कर रहे एक अन्य प्रचारक विजय कुमार का कहना है कि वेदों में अशोकजी की रुचि अपने कानपुर के कार्यकाल में पैदा हुई। वहां उनका सम्पर्क रामचन्द्र तिवारी नाम के विद्वान से हुआ, जिन्होंने उन्हें वेदों की ओर आकर्षित किया। वेदों में उनकी यह रुचि जीवन भर बनी रही। यह संयोग ही कहा जायेगा कि विश्व हिन्दू परिषद के संस्थापक महासचिव दादा साहेब आप्टे विदेशों में स्थान-स्थान पर वेद भगवान की स्थापना कर आये थे और उनके उत्तराधिकारी अशोक सिंहलजी अब वेद को विश्व के विज्ञान पटल पर स्थापित करने का उद्यम कर रहे थे।
पिछले कुछ अरसे से उनके शरीर ने अपनी सीमा के संकेत देने शुरु कर दिये थे। चिन्तन और कर्म की गति का यही विरोधाभास है। कर्म की गति शरीर पर निर्भर है और शरीर की क्षमता और उम्र, दोनों सीमित हैं। चिन्तन तो कालातीत है, परन्तु शरीर तो काल के पाये से बंधा हुआ है। काल के पाये से बंधा यह शरीर ही अब धीरे-धीरे उनका साथ नहीं दे रहा था। शरीर के इन संकेतों को उनसे ज्यादा और कौन समझ सकता था? वे ऋषि परम्परा के सिद्ध पुरुष थे। संघर्षों की ज्वाला में साधना करते सन्यासी योद्धा थे। कुछ मास पहले की बात है। उनका फोन आया। उन्होंने दिल्ली बुलाया था। मैं वहां गया और मिला तो अरुंधति वशिष्ठ अनुसंधान पीठ की चर्चा शुरु कर दी। प्रो. मुरली मनोहर जोशी पीठ के मार्गदर्शक हैं। सुब्रह्मण्यम स्वामी उसके अध्यक्ष हैं , इत्यादि बताते रहे। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मुझे सब क्यों बता रहे हैं। फिर बोले, मैं चाहता हूं आप इस पीठ के महासचिव का कार्यभार संभालें। मैं चुप हो गया और वे भी। कुछ देर बाद शायद अपने आप से ही बोल रहे हों, भारत का रास्ता इसी एकात्म मानव दर्शन से निकलेगा और कोई रास्ता नहीं है। मैंने उनके चरण स्पर्श किये और उनके स्वप्न को धारण किया। मेरे लिये यही अशोकजी का प्रसाद था।
उस वीरव्रती ने अपना सम्पूर्ण जीवन भारत माता के चरणों में खपा दिया। स्वयं के लिये किसी पद की कामना नहीं की। आपातकाल में जेल में हम जयप्रकाश नारायण की जेल में समगल की गई एक कविता पढ़ा करते थे, जिसमें जयप्रकाश नारायण ने लिखा था कि यदि मैं चाहता तो कितना ही बड़ा पद प्राप्त कर सकता था। पद मेरे पास चल कर आये। लेकिन मेरा उद्देश्य पद प्राप्त करना नहीं था। यही भाव अशोक सिंहलजी का था। पद प्राप्त करना उनके जीवन मार्ग का हिस्सा ही नहीं था। वे समस्त मानव जाति की मंगल कामना के लिये भारतीय दर्शन के विविध प्रयोग कर रहे थे। यही उनका रास्ता था। यही मानव मंगल का रास्ता है। सुरुचि प्रकाशन में कार्य कर रहे विजय कुमार ने लिखा, जिनके लिये सारा देश शोक में डूबा है वे स्वयं अ-शोक थे।
कुलदीप चन्द्र अग्निहोत्री


मा. अशोक जी के साथ …
दो साल पूर्व मेरी पुस्तक ‘जीवन दीप जले’ का विमोचन दिल्ली के कान्स्टिट्यूशन क्लब में मा. अशोक जी को करना था; पर उससे कुछ दिन पूर्व उनके छोटे भाई बहुत बीमार हो गये। कार्यक्रम वाले दिन ही गुड़गांव के मेदांता अस्पताल में उनका ऑपरेशन था। अशोक जी भी वहीं थे। पुस्तक के प्रकाशक बहुत चिंतित थे कि यदि मुख्य अतिथि ही नहीं आये, तो क्या होगा; पर अशोक जी ठीक समय से आये और कार्यक्रम के बाद सीधे गुड़गांव ही चले गये।
यह प्रसंग 1994-95 का है। मैं उन दिनों देहरादून में संघ का विभाग प्रचारक था। मा. अशोक जी साल में एक-दो बार देहरादून आते ही थे। एक बार उन्हें देहरादून से ऋषिकेश होते हुए हरिद्वार जाना था। उन्होंने मुझे भी साथ चलने को कहा। उन दिनों सुरक्षा का इतना अधिक तामझाम नहीं रहता था। अतः मैं कार में उनके साथ ही बैठ गया।
देहरादून से ऋषिकेश के बीच जौलीग्रांट गांव है। वहां स्वामी राम ने एक बड़ा ‘हिमालयन अस्पताल’ बनाया है। अशोक जी को उनसे मिलना था। मैंने उन्हें बताया कि उस क्षेत्र में स्वामी जी का कुछ विरोध है। कुछ दिन पहले अस्पताल वालों ने गांव की एक सड़क पर ही बैरियर लगा दिया था। इससे लोगों को परेशानी होने लगी थी। उन दिनों वहां के स्थानीय विधायक भा.ज.पा. के ही थे। लोगों ने उनके साथ जाकर वह बैरियर तोड़ दिया। मजबूरी में अस्पताल वालों को अपने लिए अपनी ही जमीन में रास्ता बनाना पड़ा। इससे स्वामी जी उस विधायक से और क्षेत्र के लोग स्वामी जी से नाराज थे।
स्वामी जी को अशोक जी के आगमन की सूचना मिल गयी थी। अतः वे प्रतीक्षा में थे। अशोक जी ने अपने स्वभाव के अनुसार दंडवत प्रणाम किया। उनकी देखादेखी मैंने भी ऐसा ही किया। कुछ देर सब लोग बाहर के कमरे में बैठकर बात करते रहे। अशोक जी ने उन्हें बताया कि सरकार ने बाबरी ध्वंस के बाद संतों में फूट डालने का बहुत प्रयास किया; पर कोई संत इस झांसे में नहीं आया। फिर स्वामी जी ने अशोक जी को अंदर चलने का संकेत किया। वहां भी उनमें कुछ बात हुई। बाहर आकर अशोक जी ने पुनः प्रणाम किया और ऋषिकेश के लिए चल दिये।
रास्ते में अशोक जी ने बताया कि स्वामी जी स्थानीय विधायक से बहुत नाराज हैं। मेरे मन में भी इस प्रकरण के चलते अस्पताल वालों से कुछ नाराजगी थी। मैंने जब यह बताया, तो अशोक जी ने कहा कि हमें इन स्थानीय झगड़ों में नहीं पड़ना चाहिए। ये तो आजकल में निबट जाएंगे। हमें तो संतों से लगातार मिलते रहना चाहिए। उनसे आदर एवं श्रद्धापूर्वक मिलते रहो, यही काफी है।
इसके बाद हम लोग ऋषिकेश कैलाश आश्रम में गये। वहां के बड़े स्वामी जी से भी इसी तरह भेंट हुई। फिर मैं ऋषिकेश में ही रुक गया। मा. अशोक जी हरिद्वार चले गये।
– विजय कुमार, संकटमोचन आश्रम, रामकृष्णपुरम्, सेक्टर 6, नयी दिल्ली – 110022


Tribute to Ashokji : Grand Inspiration Personified
When he patted on my shoulders and said, “We all will together build the Grand Sri Ram Temple and Hindu Rashtra”, I was just 36, we were already working on many social projects together and it was a peak time of 1992 Sri Ram Temple movement. At his 66 at that time, his hand on my shoulders was firm and confident. Ashokji has always been confident and did what he did with utmost conviction. It is not easy for a professionally trained brilliant Engineer from a business family to give up the worldly materialistic joys for building the nation. Ashokji did it and as a young Pracharak then to the age of over 89, he served the nation to his last breathe.
Grand Sri Ram temple at Bhagwan’s Ram’s birthplace was not just his dream; it was his conviction and his lifetime commitment. Sangh has a great way of inculcating discipline and organising skills in its Swayamsevaks and followers. Ashokji was no exception. His planning for the Ram Temple movement was meticulous and we all saw the impact of it.
Most of the times, unfortunately, tall leaders like Ashokji are perceived the way public communicators like print/electronic media, internet etc project them in modern times. Ashokji was much more than what is today being projected as. Ram Temple movement was not the only grand uprising he conceptualised and led, but also many more other movements were charted out by him. ‘Dharma Sansad’ was Ashokji’s favourite concept. He worked tirelessly on it and re-grouped all Seers in Bharat and abroad under one forwardly moving force called ‘Dharma Sansad’. A word, a resolution by Dharma Sansad later became the direction for all to follow. He always would say, “England’s PM, US President etc take not only oath swearing by the God, their Parish Father is present on the stage at that time and yet these countries are called secular; why Bharat’s polity shouldn’t follow what the Dharma here says?” He thought ahead of times.
More than a decade back Ashokji embarked on ‘Aviral, Nirmal Ganga’ movement. Under his leadership, VHP conducted Kashi to Ganga Sagar Yatra to make people on the banks of river Ganga aware of the ways to keep Ganga clean and Her flow uninterrupted.
In 1995 the separatists in Kashmir threatened to halt Amarnath Yatra. Ashokji got into action. We all together mobilised over 50,000 people who went on the pilgrimage without any fear and the threat vanished in thin air. Bhagwan Amarnath Yatra then became a grand nationally and internationally known pilgrimage. Ashokji worked diligently on saving cow progeny. Apart from the time to time Gou Sewa programmes and a continued plan to make people aware of the issue, he organised Cow Chariots (Gou Raths) at many place in Bharat. It was the milestone in the cow progeny protection movement of VHP.
When there was a proposal by the then Government to break Rameshwaram Ram Sethu, Ashokji was visibly shocked. He was aghast at the very thought that someone in Bharat could even think of such a destructive project. Together with RSS, we planned the Ramesh-waram Ram Sethu Protec-tion Movement. Bharat stood up as one and the Government changed its decision. Some State Govern-ments tried to suppress the movement by using police force on the peaceful protestors. He was angry at the insensitivity of such governments, but he was proud of those Hindus who, despite brutal State force, stood up for Rameshwaram Ram Sethu.
Ashokji led a strict disciplined life. He would wake up at the Braahma Muhurta that is a little before 4 am, take bath even when he was old and would do his daily Pooja that he hardly missed. His eating habits were basic and simple. He was very particular about the cleanliness of his clothes and with his good height and confident stride, he would carry himself with strength. His rallies during Ram Temple movement can never be forgotten.
Ashokji believed that only cohesive social unity (Samarasata) can keep Bharat together and strong. He started and led the movement of opening temples for all classes and castes. It was not easy at that time. He specifically took efforts to hold meetings in towns, villages to convince people, temple trusts and all those who were involved.
It is a work of balance to run and project the organisation like VHP in the modern times when opinions are PR managed and manipulated by media, the so-called intellectuals and even polity many a times. Ashokji never got deterred to put forth his views. He was a born optimist. During 1992 Ram Temple movement, when I was with the Team Gujarat then in Ayodhya, for us young people, he was the inspiration. 1992 was the peak time of his organising skills and social movement planning. He did it so spectacularly well that as per his vision, the Dharma created the path for Bharateeya Polity. He was not only thrilled to see the then Government after 1992 but also was very hopeful that there would soon be a grand Ram Temple at Bhagwan Ram’s birth place. He waited. Millions of Hindus waited. Interestingly, he never lost hope and that was Ashokji’s strength. And his endless optimism was our strength. A youth movement that Ashokji had initiated, now has taken a positive leap in the form of Bajrang Dal and Durga Vaahini. A lot more is in store for social services too…
Past over 10 years the aged and ailing Ashokji worked day and night on many things. It was primarily for the grand Ram Temple at Ayodhya but also for spreading ancient Bharateeya scriptures like Vedas in Bharat and globally. Ashokji had his own way of thinking and his own unique style of working on things. There was a lot to learn from him. He connected with known and unknown people with equal ease and with the same conviction. Inspiring a Cancer Surgeon like me to leave behind a roaring practice and a family was not the only example; he inspired hundreds of people to come forward to serve the nation. Even before he connected with me, I was already a Swayamsevak from the tender age 10 and then as a young man, was rising in Sangh in the State. Ashokji had a knack to spot people and nurture them. When I left behind my practice for being in VHP more than two and a half decades back, my son was just 7 years old. He inspired many youths and today many of them are doing the nation’s work passionately.
Past 2 years despite his falling health, he again had a spark in his eyes. A spark of an untiring hope. A bright ray of hope that now Ram Temple would surely be built at Ayodhya at Bhagwan Ram’s birthplace. He travelled all over Bharat convincing people from many walks of life and sharing with them his hope.
Today, Ashokji may have gone physically. But his inspiration was unending and will remain with all of us eternally. We are sure that Bhagwan Ram will soon move out of His dilapidated tent and give darshan to His devotees from a grand temple. We now have a hope. Fearless, as Ashokji has always been, VHP has a hope, Hindus have a hope now.
Until this hope sees the day’s light, we all have a lot to work on: Cohesive Social Unity through which we have to weave all castes together in a beautifully strong fabric of our society; there are many poor who do not have access to health services / education and it is our duty to provide them with these; Hindus in Bharat and all over the world are looking up to Bharat now with huge expectations to lead the world and we should contribute our bit to it. VHP has a vast social services network now giving education/self-help/health to millions of kids and families and Ashokji’s soul will be glad to see it further grow… The work is vast and surely by the time VHP will complete its 75 years in 2039, a lot from Ashokji’s dreams would be achieved and a lot more would be added. Not only fulfilling Ashokji’s dreams but also taking those dreams ahead into a grand inspirational organisation for youth is our duty. Let us together, do Saashtaang Pranaam to our Inspirational Guru Man. Shri Ashok Singhalji and let us embark on a further inspirational path ahead.
Dr Pravin Togadia, Working President, VHP Contact: vhp.prezoffice@gmail.com


End of an Era — Saumitra Gokhale
Passing away of Ashokji is like the end of an era. His tremendous strength of deep conviction, indomitable energy and his towering leadership was just one of its kind. We could feel it even at his ripe age during his recent visit to the United States.
His stirring speeches during the Ram Janmabhoomi movement and his courage leading from the movement from the front made tremendous impact on countless youth including me at that time. I remember his extremely affectionate behaviour towards me when I first met him personally, while I was a Pracharak in the Caribbean countries. It made a lasting impression on me. Since then he never forgot my name and gave me the same amount of affection every time I got a chance to meet him. In him we have lost a great mass leader of Hindus, an organiser par excellence and above all a dedicated life-long Pracharak. This is the end of a life hallowed by sacrifice.
VHP UK: It is a sad moment in lives of all VHP karyakartas when their outstanding leader parts with them. We had so much to do with him because he was always there whether it was VHP function, RSS function, BJP function or the World Hindu organisation. In July 2000, Hindu Conference held in Port of Spain, a top Minister of the Government of Trinidad introduced Singhalji as the STRONGEST HINDU OF THE WORLD.
TM Ramchandran, Malaysia: He was an inspiration, and generations to come will remember him whenever there’s mention of Ayodhya.
Swami Aksharananda, Guyana: He was a personal inspiration to me and I am sure to countless millions of Hindus across the globe.


Ashok Singhal, the Engineer Who Built The Ram Temple Movement
“Ashok Singhal is no more. Announcement coming in a few minutes,” a source in the Vishva Hindu Parishad (VHP) told me on Tuesday afternoon. Instantly, my mind went back to October 1989, when I had met him for the first time.
Singhal was at the Digambar Akhada in Ayodhya, meeting Mahant Ram Chandra Paramhans, another emerging figure in the BJP’s frenzied campaign for a Ram temple, which had been gaining momentum ever since the Rajiv Gandhi government had said yes to a shilanyas near the disputed Babri mosque.
From the arched entrance to the Akhada, Singhal emerged frowning. I fired two questions and the frown deepened. He raised his voice and walked past me saying, “The Hindus are going to get a Ram temple at Ayodhya. I won’t die without that happening.”
Ashok Singhal will be remembered as one of the most divisive figures in Indian politics without ever being in active politics. A Sangh senior, briefing me on Singhal’s role, said “the metallurgy engineer did what the Banaras Hindu University taught him – converting raw metal, often in ore form, into a more useable format.”
He re-packaged Hindutva into an instant, easy to sell political mix. He shaped the concept of “kar sewa” for a Ram Mandir in the late 80s and on 6 December, 1992, thousands indoctrinated in the concept of “kar sewa for the Ram temple” brought down the Babri mosque.
Ashok Singhal’s status within the “parivar” zoomed after the Babri demolition.
In 1994, he was in Lucknow at an RSS camp. On the dais sat then RSS chief Rajinder Singh or Rajju Bhaiya and on the lone chair next, Ashok Singhal. LK Advani, the star of the Ram Janambhoomi Rath Yatra and then BJP president, sat in the front row of the audience. I asked Vinay Katiyar, then an upcoming face of belligerent Hindutva, about the seating arrangement.
“That’s the protocol,” Katiyar said.
Ashok Singhal was a trained vocalist. In 1997 on a visit to his palatial house Mahavir Bhawan in Allahabad – located just behind the Nehrus’ Anand Bhawan – Sangh workers and supporters gathered asked Singhal, who was speaking about the importance of patriotic songs, to sing. He agreed to sing only his favorite ‘Bharat Puneet Bharat Vishal’.
That day he recalled his first encounter with the RSS at BHU in the 1940s. At the time, Bhau Rao Deoras, brother of the second RSS chief Bala Saheb Deoras was deputed to Uttar Pradesh to recruit young meritorious students at campuses.
Singhal and Rajendra Singh, who became the fourth RSS chief, were recruited from Allahabad, and Atal Behari Vajpayee from Kanpur.
One year after the riots that erupted after Babri mosque was demolished, I toured towns that were scarred by the communal violence. In Kanpur, Muslims had moved out of Hindu-dominated mohallas or localities and vice versa. Roads passing between these mohallas were called “borders”.
Suspicion lurked in lanes crammed with vehicles and people. In Hindu mohallas Singhal and Advani were heroes. In contrast, members of the minority community talked of Singhal as a symbol of dread. Not Advani who was the face of the Ram temple movement and Babri demolition.
For Singhal was perceived as vitriolic; he was seen to stoke many fires at a time. He led the demand for Vandemataram and the Bhagwat Gita being made compulsory in schools and an anti-conversion tirade against Christians. He breathed fire on the issue of the country’s Muslim population growing faster than Hindus and on cow slaughter.
Ashok Singhal also crafted the international branding of the VHP, opening offices in 40 countries. And that brought funds for a movement that altered Indian politics.
He was the key organiser of the VHP’s first ‘Dharma Sansad’ in 1984 in Delhi. It brought the Sangh, saints and the BJP on one platform and the Ramjanambhoomi temple movement was born here. Which helped the BJP go from two seats in 1984 to power at the Centre a few years later.
Sangh members describe Ashok Singhal as a master strategist. Prime Minister Narendra Modi on Tuesday said Singhal was a “force behind several noble deeds and social work” and said his demise was a “deep personal loss.”
Last month, while releasing a book on Singhal’s life – Ashok Singhal, Hindutva ke Purodha – RSS chief Mohan Bhagwat said his tenure as a prant pracharak or regional in charge of Delhi was an “inspiration to other prant pracharaks” for his intensity and versatility.
If Ashok Singhal was one of the hardline powerhouses that made the RSS-backed BJP a political force, the BJP’s rise to power brought him face to face with the moderate Atal Bihari Vajpayee.
Managing a 24-party coalition Vajpayee had to rein in the VHP, and Singhal. In 2001, Vajpayee as PM thwarted Singhal’s attempts to re-ignite the Ram temple movement using the “shiladaan” at Ayodhya.
Visibly angry as he stood in the courtyard of the Digambar Akhada where he was forced to end his “shiladaan” Singhal accused PM Vajpayee of playing into the hands of the UP administration.
It is during the Vajpayee reign that Singhal starting losing his gun powder. The political energy generated by the movements he led helped the BJP but the BJP drifted away from his pet project.
Few electoral losses later Ram temple had served its electoral utility and by mid-2014, Singhal’s peers like Advani had lost ground in the party. None of the BJP’s top brass today is from the Ramjanambhoomi movement.
The rise of Narendra Modi from the ranks of RSS pracharaks to becoming the BJP’s candidate for PM activated the VHP cadres again, but – the Ram temple – remained a mere mention on page 42 of the party’s 2014 manifesto.
In May 2014, when the BJP won the national election, he said, “Modi’s victory put an end to 800 years of slavery.” It was a typical Ashok Singhal comment — loaded with overtones.
(Rahul Shrivastava is Senior Editor, Political Affairs NDTV 24×7)


Ashok ji Singhal’s Unfinished Wish – A Majestic Lord Ram Temple: Rahul Chandra
In Nov 2015 at World Hindu Congress 2014, when Ashok ji Singhal roared that after eight hundred years, ‘Bharat’ (India) is now in the control of a patriot Hindu ruler (referring to Indian PM Narendra Modi led NDA’s victory) , it was applauded and received with a thunderous response from more than two thousand Hindu dignitaries from eighty countries. It was a proud moment for all Hindus, it was also hoped that in the next upcoming years, there will be a robust political – social push for long pending demand of Hindu society – Lord Ram temple build up at Hindu sacred site of Ayodhya (Lord Ram, a prominent Hindu god was born in the sacred land of Ayodhya, Muslim ruler Babur constructed a Mosque right on that birth place, later that make shift Mosque was demolished in 1992 by devout Hindus, in brief – Lord Ram to Hindus is equivalent to Prophet Mohammad to Muslims and Jesus to Christians).
IUnfortunately, Ashok ji Singhal couldn’t see that happen in his life, it was his only and final wish to see a majestic Lord Ram Temple in Ayodhya – a wish that remains unfinished today.
In mid-2013, when I met Ashok ji Singhal at his Mumbai residence and apprised him of anti VHP powers operating in America within US Sangh Parivar and asked for his cooperation in taking it to RSS leadership, he told me “Rahul – Try your best to join Hindus together & let Dharma law separate such Hindus form the good”, he was a very high conscious saint. He also lauded efforts of Ramesh Shah, senior US Ekal Vidyalaya leader for his voluntary services. On being asked on VHP support for Narendra Modi, he said Modi has total VHP support.
Per many Hindu leaders who spend time with Ashok ji Singhal, he had two chronic nostalgic pains in his life. Here it’s important to mention that Ashok ji Singhal was one rare leader who had an emotional heart when it comes to Hindu cause and his workers.
First – the fact that hundreds of workers from VHP, Bajrang Dal & Shiv Sena ranks were mercilessly murdered by police bullets of the then UP administration under Samajwadi Party and in spite of so much loss of life of innocent Kar Sevaks (Hindu volunteers), money & material collection from across the world the sacred mission couldn’t be completed. For example two young Kothari brothers from Kolkata, only sons of a family were murdered by police bullets of UP Govt. Many other such stories of sacrifices can make even the toughest man cry. Today the birth place of Lord Ram is an official ‘disputed zone’ and is in dilapidated condition.
Per one senior Hindu leader, A. Joshi from New York, In many of his visits abroad in US and Europe, many Indian’s used to taunt him with slogan ‘Ashok ji – Ram Mandir Kab Banega, kab banaooge’ , (when will Lord Rama Temple be built Mr. Ashok, when will you build it). Such Indians were basically making sarcasm of his helplessness to push BJP govt. PM’s furthering Ram Janam Bhoomi movement & mocking his global Hindu authority. He could be seen visibly upset at such comments and often ignored answering.
Second – Ashok ji Singhal was visibly distressed because of the political apathy he received from top BJP leaders in absolute power. Whether it was Atal ji Bihari Vajpayee Government in 1998 or the current Govt. of Narendra ji Modi. It’s important to note that Ashok ji Singhal was key figure in mobilizing his millions of VHP and Bajrang Dal workers in making Indians aware of dangers of Congress Govt. and vote for Modi led NDA for better Hindu human rights. He even snubbed many including senior VHP leader Dr. Pravin Togadia during 2014 elections and took a heavy pro-Narendra Modi lead himself bypassing all criticism for the sake of victory for Indian PM Narendra Modi.
Unfortunately, the entire Hindu political fraternity disappointed him. While ex-PM Atal Bihari ji Vajpayee had a ‘reasonable excuse’ to offset Ram Temple build-up in lieu of managing a thirty political party coalition who had the power to bring his Govt. down if Atal Bihari ji Vajpayee Govt. proceed further to build a Lord Ram Temple. Today under the leadership of Govt. of Narendra ji Modi, the development agenda is in force and Hindutva agenda is shelved. There are mixed statements from NDA Govt. when it comes to Lord Ram Temple and no clear path to Lord Ram Temple build up is seen in near horizon. Now with the sad demise of Ashok ji Singhal, many fear that this Hindu demand will go in cold box and belittling hundreds of sacrificed life.
Today, Govt. of Narendra ji Modi is in total absolute power and can bring a law, start a conversation with opposing party, take them into confidence, get legal dispute diluted and proceed further with the construction of Lord Ram Temple build up. If Hindus can give up esteemed land areas to Muslims pan India to build up Mosques, civic Muslim society of India will not mind giving up that land area for Lord Ram Temple build up.
Hindus will greatly appreciate that. That would be a true tribune to Ashok ji Singhal & Hindu society will forever be thankful to such Government.

The author, Mr. Rahul Chandra is a senior Indo–American writer and speaker on global Hindu empowerment and a old timer senior VHP functionary


			

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