श्रीराम जय राम जय जय राम, শ্ৰীৰাংজয়ৰাংজয়জয়ৰাং, শ্রীরাম জয় রাম জয় জয় রাম , શ્રીરામ જય રામ જયજય રામ, ಶ್ರೀರಾಮಜಯರಾಮಜಯಜಯರಾಮ, ശ്രിറാം ജയ് റാം ജയ്‌ ജയ് റാം, శ్రీరాంజయరాంజయజయరాం

राष्ट्रीय चेतना का उदघोष : अयोध्या आंदोलन

श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन से सम्बंधित लेखमाला ‘राष्ट्रीय चेतना का उदघोष : अयोध्या आंदोलन’ तैयार की गई है। इसको आज से प्रारम्भ किया जा रहा है।
लेखक  : नरेन्द्र सहगल- पूर्व संघ प्रचारक, लेखक एवं पत्रकार

राष्ट्रीय चेतना का उदघोष : अयोध्या आंदोलन – 1
पतित-पावनी : अयोध्या
जिसे युद्ध में कोई जीत न सके वही अयोध्या है। हिमालय की गोद में अठखेलियां खेलती हुई पण्य-सलिला सरयु अविरल चट्टानी रास्तों को तोड़कर मैदानी क्षेत्रों को तृप्त करती चली आ रही है। वैदिक काल से आज तक निरंतर चला आ रहा यह पुण्य प्रवाह अपने अंदर भारत राष्ट्र के सहस्राब्दियों पुराने इतिहास को संजोए हुए है। इसी पतित पावनी नदी ‘सरयु मैया’ के किनारे मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की क्रीडास्थली अयोध्या नगरी बसी है। यही राम की जन्मस्थली है। राम भारतीय संस्कृति की सशक्त और चिरंतन अभिव्यक्ति हैं। इसलिए अयोध्या भी इस मृत्युंजय संस्कृति का एक अमिट हस्ताक्षर है। राम और अयोध्या परस्पर प्रयाय हैं।
दशरथनंदन राम के जन्म के उपरांत तो अयोध्या का संबंध सम्पूर्ण सृष्टि के साथ जुड़ गया। संसार के प्राणी मात्र के लिए स्वर्ग का द्वार बन गई अयोध्या। विश्व के प्राचीनतम उपलब्ध ज्ञान के भंडार वेद के रचियता ने अयोध्या के महात्मय को निम्नलिखित श्लोक में प्रकट किया है –
अष्ट चक्रा नव द्वारा देवानां यूः अयोध्या।
तस्या हिरण्यमयः कोशः स्वर्गो ज्योतिषावृतः।। (अथर्व वेद, 10-2-32)
भारत और भारतीय जीवनमूल्यों के गगनस्पर्शी ध्वज यदि राम हैं तो अयोध्या को इस ध्वज (भारतीय संस्कृति) का ध्वजस्थान मान लेना कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। अतः राम, अयोध्या और भारत यह तीनों ही एक ही भावधारा को प्रकट करते हैं और तीनों ही अवध्य अर्थात परास्त नहीं किए जा सकते।
इतिहास साक्षी है कि सरयु के पवित्र तट पर मनु के द्वारा बसाई इस अयोध्या नगरी ने वैभव और पतन के कई कालखंड देखे। परन्तु अपने नाम को सदैव सार्थक रखा। विदेशी आक्रमणकारियों की गिद्धदृष्टि प्राचीनकाल से ही अयोध्या पर रही है। भारत पर आक्रमण करने वाले प्रत्येक विदेशी आक्रमणकारी ने अयोध्या को अपना लक्ष्य बनाया। अयोध्या को विजित किये बिना भारत विजय की कल्पना भी अधूरी थी। यह महानगरी मानो भारत राष्ट्र का प्राणतत्व थी। यही कारण है कि भारत के राजाओं और प्रजा ने सहस्रों बार अपने प्राणों की आहूति देकर अयोध्या की रक्षा की। एक समय तो ऐसा भी था जब अयोध्या के सूर्यवंशी पुत्रों ने अयोध्या के परम्परागत शत्रु महापापी पौलस्त्य वंशीय दसग्रीव (रावण परम्परा) के घर जाकर उसकी समस्त पापमयी लंका को ही भस्म कर दिया।
हिन्दू समाज जिन सात तीर्थों को सर्वश्रेष्ठ मानकर उनकी यात्रा को अपना अहोभाग्य मानता है। जिनकी यात्राओं को मोक्ष प्राप्ति हेतु आवश्यक समझा जाता है, उनमें अयोध्या की गणना सर्वपरि है। अयोध्या को भगवान विष्णु का शीर्ष कहा जाता है। अयोध्या को महाऋषियों ने मोक्षदायिनी कहा है।
अयोध्या मथुरा माया, काशी कांची अवंतिका।
पुरी द्वारावतीश्चैव सप्तैता मोक्षदायिकाः।।
जैन मत और अयोध्या
अयोध्या जैन धर्मावलम्बियों के लिए भी एक महत्वपूर्ण श्रद्धा केन्द्र है। जैन धर्म में तीर्थकारों का एक विशेष स्थान है। यह कहना सत्य ही होगा कि जैन धर्म के सिद्धान्तों के प्रचार-प्रसार का आधार स्तम्भ यह तीर्थकर ही थे। जैन धर्म के 22 तीर्थकर सूर्यवंशी थे। इनमें से अधिकांश अयोध्या के ही थे। यह भी उल्लेखनीय है कि जैन धर्म की स्थापना अयोध्या में ही हुई थी। अतः अयोध्या भगवान राम के साथ-साथ जैन धर्म की भी जन्मस्थली है।
बौद्ध मत और अयोध्या
अयोध्या बौद्ध संस्कृति का भी एक सशक्त और विशाल केन्द्र रहा है। कौशल प्रदेश की प्राचीन राजधानी अयोध्या ने अनेक बौद्ध भिक्षुओं एवं पंडितों को जन्म दिया। प्रसिद्ध बौद्ध दानशीला विशाखा, महादानी पिडिक और कौशल प्रदेश के सम्राट बौद्ध धर्मावलम्बी महाराजा प्रसैनजित यह सभी अयोध्या के निवासी थे। बौद्ध स्तूपों के खण्डहर तो आज भी अयोध्या के बड़े-बड़े टीलों के रूप में दृष्टिगोचर होते हैं।
भगवान बुद्ध भी अयोध्या को पवित्र नगरी मानते थे। बुद्ध चार्तुमास में (वर्षाकाल) विशेष रूप से साधनारत रहते थे। इस तपस्या हेतु वे पवित्र एवं किसी विशेष आध्यात्मिक स्थल की तलाश करते थे। बौद्ध साहित्यानुसार उन्होंने अपने जीवन के 25 चार्तुमास अयोध्या के निकट श्रावस्ती में और 16 चार्तमास अयोध्या में बिताकर अपनी तपस्या को पूर्ण किया था।
सिख पंथ और अयोध्या
अयोध्या में ब्रह्मकुंड नामक स्थान पर सिख बंधुओं का एक प्रसिद्ध गुरुद्वारा भी है। कहा जाता है कि जब श्री गुरुनानक देव जी भारत भ्रमण करते हुए अयोध्या पहुंचे तो उन्होंने यहां अनेक दिनों तक अकाल पुरुष की आराधना में जप किया और अयोध्यावासियों को एक ओंकार के अस्तित्व का उपदेश दिया। सिख मान्यतानुसार श्री गुरुनानक देव जी को यहां ब्रह्मकुंड नामक स्थान पर ब्रह्मा के दर्शन हुए।
दशमेश पिता श्री गुरुगोविंद सिंह जी ने भी अयोध्या की तीर्थयात्रा की थी। औरंगजेब के काल में श्री गुरुगोविंद सिंह जी महाराज ने अयोध्या स्थित राम जन्मभूमि की मुक्ति हेतु युद्ध भी किया था। उन्होंने अपना सम्बन्ध भगवान राम के सूर्यवंश से जोड़ा है। श्रीगुरु की आत्मकथानुसार बेदी और सोढ़ी वंश दोनों का सम्बंध राम के पुत्रों लव और कुश से है।
अतः समस्त भारत के आध्यात्मिक जीवन के साथ अयोध्या का इतिहास भारत के सांस्कृतिक राष्ट्र जीवन की निर्विवाद अभिव्यक्ति है। भारत राष्ट्र का वैभव और पराभव अयोध्या के उत्थान और पतन के साथ जुड़ा हुआ है। राम इसी राष्ट्र जीवन के नायक हैं। जैसे राम और अयोध्या को बांटा नहीं जा सकता, उसी प्रकार राम और राष्ट्र को बांटा नहीं जा सकता। राम भारत के राष्ट्र जीवन की सरल, स्पष्ट और अद्वितीय परिभाषा है। अयोध्या इसी राष्ट्र जीवन (राम) की जन्मस्थली है। इस जन्मस्थली पर श्रीराम का भव्य मंदिर पहले भी था, अब भी है और आगे भी रहेगा।


राष्ट्रीय चेतना का उदघोष : अयोध्या आंदोलन – 2
कुश निर्मित आद्य श्रीराम मंदिर
मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने भारत की सांस्कृतिक मर्यादा के अनुरूप अनेक महत्वपूर्ण निर्णय अपने जीवन में ही ले लिये थे। मरते दम तक सत्ता से चिपके रहने के अनैतिक दुर्भाव को ठोकर मारकर राजा राम ने समस्त साम्राज्य को अपने भाईयों एवं पुत्रों में बांट दिया था। श्रीराम ने अयोध्या छोड़ने का निश्चय कर के महाप्रयाण की मानसिकता बना ली। आयु का प्रभाव शरीर पर पड़ते ही उन्होंने सरयु मैया की गोद में शरण लेकर इस शाश्वत प्रवाह को गौरवान्वित कर दिया।
महाराज कुश ने सभी प्रमुख प्रशासनिक अधिकारियों से वार्तालाप करके श्रीराम की स्मृति में एक भव्य स्मारक/मंदिर बनाने का निर्णय लिया। महाराज कुश की देखरेख में कसौटी के 84 खम्बों पर भव्य श्रीराम मंदिर निर्मित हो गया। चैत्र शुक्ल नवमी पर मंदिर में भगवान राम की प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा की गई। इस मंदिर में कसौटी के जिन 84 खम्बो को लगाया गया था, इनकी चर्चा आज तक किसी न किसी रूप में चल रही है। लोमस रामायण में वर्णित बालकांड के अनुसार यह खम्बे श्रीराम के पूर्वज महाराजा अनरण्यक के आदेश पर विश्व प्रसिद्ध शिल्पी विश्वकर्मा के द्वारा गढ़े गए थे।
सूर्यवंश के पूर्व पुरुष महाराजा इक्ष्वाकु के समय से ही भारत पर राक्षसों के आक्रमण होने प्रारम्भ हो गए। यह आक्रमण लंका की ओर से समुद्री मार्ग से होते थे जो पीढ़ी दर पीढ़ी होते रहे। लंका के प्रत्येक राजा को रावण की उपाधि दी जाती थी। अतः इक्ष्वाकु वंश की 64 पीढ़ियों ने लंका के लगभग इतने ही रावणों से अयोध्या की रक्षा की थी। इसी इक्ष्वाकु वंश के एक राजा अनरण्यक को उस समय के लंकाधिपति रावण ने परास्त कर दिया। राक्षसी सेना ने अयोध्या में लूटपाट की। सोने, हीरे जवाहरात के ढेरों के ढेर लंका पहुंचा दिये गए। महाराज अनरण्यक के राजदरबार में लगे कसौटी के खम्बों को भी तत्कालीन रावण अपने साथ ले गया। इस युद्ध में महाराज अनरण्यक अपनी मातृभूमि की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हो गये। उस समय का रावण जीता परन्तु अयोध्या पर वह अधिकार नहीं कर सका।
सूर्यवंशी प्रतापी सम्राट अनरण्यक की मृत्यु के समाचार से समस्त भारतवासी शोक में डूब गये। यह आघात पूरे राष्ट्र पर था। कसौटी के खम्बों का लंका में चले जाना देश का घोर अपमान था। इस राष्ट्रीय अपमान को अयोध्यावासी कभी नहीं भूले। इस दाग को वह मिटाना चाहते थे। अयोध्या के सूर्यवंशी राजाओं की प्रत्येक पीढ़ी ने यह प्रतिज्ञा दोहराई ‘हम इस अपमान का बदला लेंगे’। इन खम्बो को वापस भारत में लाना एक महान राष्ट्रीय कार्य था। इस कार्य को सम्पन्न किया था धनुर्धारी श्रीराम ने।
रावणवध के पश्चात श्रीराम ने महाबलि हनुमान से वार्तालाप करते हुए कहा था कि सीता को वापस ले लिया गया है अयोध्या पर अनेक आक्रमण करने वाली रावण परम्परा को समाप्त किया जा चुका है। परन्तु सूर्यवंशी सम्राट अनरण्यक (श्रीराम के पूर्वज) का जो अपमान हुआ है उसको कैसे धोया जाए? तब ‘विद्यावान गुणी अति चातुर’ वीर हनुमान ने श्रीराम को इस अपमान का परिमार्जन करने का मार्ग सुझाया था। पवन सुत हनुमान ने कसौटी के खम्बों को वापस भारत में लाकर राष्ट्र के सम्मान पर लगी चोट मिटानी चाहिए ऐसा सुझाव दिया। इसी सुझाव को शिरोधार्य करते हुए धर्नुधारी श्रीराम भारत के गौरवशाली अतीत की इन समृतियों को वापस अयोध्या लाए थे।
महाराज कुश ने जब अयोध्या में मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के मंदिर का प्रस्तावित नक्शा सबके सामने रखा तो सभी ने एक स्वर में कहा कि श्रीराम का मंदिर सम्पूर्ण राष्ट्र के गौरव का प्रतीक होगा। भारत ने संसार में राक्षसी वृति को समाप्त करने हेतु लंका के साथ सैंकड़ों वर्षों तक जब युद्ध लड़ा तो उसकी विजय का श्रेय श्रीराम को जाता है। श्रीराम का मंदिर किसी एक वंश, जाति, पंथ और विचारधारा का न होकर सारे राष्ट्र की विजय का प्रतीक होगा। इस मंदिर में इन्हीं कसौटी के खम्बो को स्तम्भों के रूप में जढ़ना चाहिए जिन्हें श्रीराम लंका से वापस लाए थे। राम मंदिर के आधार के यह खम्बे राष्ट्र मंदिर के आधार स्तम्भ होंगे।
इस प्रकार राम मंदिर के निर्माण को राष्ट्रीय कार्य घोषित करके महाराज कुश ने कसौटी के इन 84 खम्बों के ऊपर एक भव्य राममंदिर का निर्माण करवा दिया। यह कार्य चैत्र शुक्ल नवमी के शुभावसर पर सम्पन्न हुआ। कुश के द्वारा रामनवमी राष्ट्रीय पर्व घोषित कर दी गई। अतः यह मंदिर, राम और राष्ट्र परस्पर पर्याय बन गए। आज इसी स्थान पर भव्य मंदिर का पुर्ननिर्माण करने के लिए हिन्दू समाज आंदोलित है।


राष्ट्रीय चेतना का उदघोष : अयोध्या आंदोलन – 3
मंदिर की रक्षार्थ बलिदानों की झड़ी
श्रीराम जन्मभूमि के साथ भारत की अस्मिता और हिन्दुओं का सर्वस्व जुड़ा है। यही कारण है कि रावण से लेकर बाबर तक जिस भी विदेशी और अधर्मी आक्रांता ने रामजन्मभूमि को अपवित्र करने का जघन्य षड्यंत्र रचा, हिन्दुओं ने तुरन्त उसी समय अपने प्राणों का उत्सर्ग करते हुए अपने इस सांस्कृतिक प्रेरणा केन्द्र की रक्षा की। जन्मभूमि पर महाराजा कुश के द्वारा बनवाया गया मंदिर भी आक्रान्ताओं का निशाना बनता रहा। यह मंदिर अपने बिगड़ते-संवरते स्वरूप में सदियों पर्यन्त आघात सहन करता रहा, परन्तु इसका अस्तित्व कोई नहीं मिटा सका।
रामजन्मभूमि मंदिर के ऊपर विदेशियों के आक्रमण यूनान के यवनों के साथ शुरु हुए थे। ईसा से तीन शताब्दी पहले ग्रीक से यवन आक्रान्ता भारत आए। राष्ट्रजीवन के प्रतीक इस मंदिर पर पहला विधर्मी आघात ईसा से 150 वर्ष पूर्व हुआ। एक विदेशी यवन मिलेन्डर ने भारत पर अपनी सत्ता जमाने के उद्देश्य से अयोध्या पर आक्रमण कर दिया। उसने समझ लिया था कि रामजन्मभूमि पर बने मंदिर को तोड़े बिना भारत की शक्ति को क्षीण नहीं किया जा सकता। इस प्रकार के आध्यात्मिक केन्द्र ही हिन्दुओं को शक्तिशाली बनने की प्रेरणा प्रदान करते हैं। इस विधर्मी सेनापति ने एक प्रबल सैनिक टुकड़ी के साथ महाराजा कुश द्वारा निर्मित मंदिर को भूमिसात कर दिया।
हिन्दू समाज के प्रबल विरोध के बावजूद वह अपनी विशाल सैनिक शक्ति के बल पर जीत तो गया, परन्तु इस विजय के बाद तीन मास के भीतर ही उसे हिन्दुओं की संगठित शक्ति के आगे झुकना पड़ा। शुंग वंश के पराक्रमी हिन्दू राजा द्युमदसेन ने अपनी प्रचंड सेना के साथ उसे घेर लिया। इस वीर राजा ने न केवल जन्मभूमि को ही मुक्त करवाया अपितु मिलेन्डर की राजधानी कौशांभी पर अपना अधिकार जमाकर उसकी सारी सेना को समाप्त कर दिया। मिलेन्डर को भी यमलोक पहुंचाकर द्युमदसेन ने हिन्दू समाज की संकठित शक्ति का परिचय देकर राममंदिर के अपमान का बदला ले लिया।
मंदिर तो मुक्त हो गया परन्तु उसके जीर्णोद्धार की कोई व्यवस्था नहीं हो सकी। विदेशी आक्रमणों से जूझते रहने के कारण हिन्दू राजा इस ओर ध्यान नहीं दे सके। तो भी मंदिर के खण्डहरों में ही गर्भगृह स्थान पर एक पेड़ के नीचे हिन्दू अपने आराध्य देव की पूजा करते रहे।
ईसा से एक शताब्दी पूर्व उज्जैन के राजा विक्रमादित्य ने श्रीराम जन्मभूमि पर फिर से वैभवशाली मंदिर बनाने का बीड़ा उठाया। विदेशी आक्रांता शकों को पूर्णतया परास्त करके उन्हें भारत की सीमाओं से बाहर खदेड़ने का कार्य सम्पन्न करने के पश्चात शकारि विक्रमादित्य ने अयोध्या की प्राचीन सीमाओं को ढूंढने के लिए एक सर्वेक्षण दल की स्थापना की। प्राचीन ग्रंथों को आधार मानकर रामजन्मभूमि का वास्तविक स्थान खोज पाना बहुत कठिन काम था। प्राचीन शास्त्रों के आधार पर जन्मभूमि के निकटवर्ती शेषनाथ मंदिर की कंटीली झाड़ियों के मध्य में से इस स्थान को खोज लिया गया। शास्त्रों में वर्णित मार्गों को नापा गया, रहस्य खुलते चले गए।
लक्ष्मण घाट के निकट एक ऊंचे टीले की खुदाई की गई, उत्खनन कार्य से प्राचीन मंदिर के अवशेष मिलते चले गए। भूगर्भ में समाए हुए मंदिर के कसौटी के 84 खम्बे भी प्राप्त हो गए। इन्हीं खम्बों को आधार स्तम्भ बनाकर विक्रमादित्य ने एक अति विशाल राम मंदिर का निर्माण करवा दिया। भारत का विराट राष्ट्रपुरुष फिर से स्वाभिमान के साथ मस्तक ऊंचा करके खड़ा हो गया। विक्रमादित्य की योजनानुसार भारत के प्रत्येक पंथ, जाति और क्षेत्र के सहयोग से अनेक मंदिर बनना प्रारम्भ हो गए। आज भी अयोध्या में इन हजारों मंदिरों को देखा जा सकता है।
सम्राट विक्रमादित्य ने सम्पूर्ण भारत को एक सूत्र में पिरोकर राष्ट्रीय एकता का अदभुत एवं सफल प्रयास किया। अयोध्या सम्पूर्ण भारत का एक मूर्तिमान स्वरूप बन गई। विविधता में एकता का प्रतीक अयोध्या आज भी अपने इस एकत्व भाव के साथ भारत के एक राष्ट्र होने का प्रमाण प्रस्तुत कर रही है। अयोध्या के मध्य में राम का मंदिर और चारों ओर भारत के सभी सम्प्रदायों के मंदिर, पूजास्थल और अखाड़े इसी तथ्य को सारे संसार के समक्ष उजागर करते हैं कि सभी पंथों के आदि महापुरुष श्रीराम भारत के राष्ट्रजीवन के प्रतीक हैं।
अतः अयोध्या में कारसेवकों द्वारा बनाए गए अस्थाई एवं साधारण मंदिर को भव्य स्वरूप देना अब हमारे राष्ट्र की एकता, अखंडता और परम वैभव के लिए आवश्यक है। यह कार्य यथाशीघ्र सम्पन्न होना चाहिए। पिछले 490 वर्षों से श्रीराम मंदिर के पुर्ननिर्माण की प्रतीक्षा कर रहे करोड़ों हिन्दुओं के धैर्य का बांध टूट रहा है। अयोध्या में सम्पन्न हुई धर्मसभा में हिन्दू संतों ने ‘भीषण संग्राम’ की चेतावनी दे दी है। उन्होंने काशी और मथुरा के मंदिरों पर चढ़ाई गई मस्जिदों का मुद्दा भी जोरशोर से उठा दिया है। अब सर्वोच्च न्यायालय को अपनी प्राथमिकता में परिवर्तन करना चाहिए और सरकार को यथाशीघ्र कानून बनाकर मंदिर निर्माण का रास्ता प्रशस्त करना चाहिए।


राष्ट्रीय चेतना का उदघोष : अयोध्या आंदोलन – 4
एक भी यवन सैनिक जिंदा नहीं बचा
11वीं सदी के प्रारम्भ में कौशल प्रदेश पर महाराज लव के वंशज राजा सुहैल देव का राज था। उनकी राजधानी अयोध्या थी, इन्ही दिनों महमूद गजनवी ने सोमनाथ का मंदिर और शिव की प्रतिमा को अपने हाथ से तोड़कर तथा हिन्दुओं का कत्लेआम करके भारत के राजाओं को चुनौती दे दी। परन्तु देश के दुर्भाग्य से भारत के छोटे-छोटे राज्यों ने महमूद का संगठित प्रतिकार नहीं किया। गजवनी भारत को अपमानित करके सुरक्षित वापस चला गया। इसके बाद गजनवी का भांजा सालार मसूद भी अत्याचारों की आंधी चलाता हुआ दिल्ली तक आ पहुंचा। इस दुष्ट आक्रांता ने भी अपनी गिद्ध दृष्टि अयोध्या के राम मंदिर पर गाढ़ दी।
सोमनाथ मंदिर की लूट में मिली अथाह संपत्ति, हजारों गुलाम हिन्दुओं और हजारों हिन्दू युवतियों को गजनी में नीलाम करने वाले इस सालार मसूद ने यही कुछ अयोध्या में करने के नापाक इरादे से इस ओर कूच कर दिया। सालार मसूद के इस आक्रमण की सूचना जब कौशलाधिपति महाराज सुहेलदेव को मिली तो उन्होंने सभी राजाओं को संगठित करके मसूद और उसकी सेना को पूर्णतया समाप्त करने की सौगंध उठा ली।
सुहेलदेव ने भारत के प्रमुख राजाओं को अपनी सेना सहित अयोध्या पहुंचने के संदेश भेजे। अधिकांश राजाओं ने तुरंत युद्ध की रणभेरी बजा दी। सभी राजाओं ने सुहेलदेव को विश्वास दिलाया कि वह सब संगठित होकर लड़ेंगे और मातृभूमि अयोध्या की रक्षा के लिए प्राणोत्सर्ग करेंगे। मसूद ने हमारे श्रद्धा केन्द्रों को अपमानित किया है, हम उसे और उसके एक भी सैनिक को जिंदा वापस नहीं जाने देंगे। चारों ओर युद्ध के नगाड़े बज उठे। सुहलदेव के आह्वान का असर गांव-गांव तक हुआ। साधु-सन्यासी, अखाड़ों के महंत और उनकी प्रचंड शिष्य वाहनियां भी शस्त्रों के साथ इस संघर्ष में कूद पड़ी। सबके मुंह से एक ही वाक्य बार-बार निकल रहा था, ‘इस बार मसूद के एक भी सैनिक को जिंदा नहीं छोड़ेंगे, मसूद का सिर काटकर अयोध्या के चौराहे पर टांगेंगे।
देखते ही देखते 15 लाख पैदल सैनिक और 10 लाख घुड़सवार अपने-अपने राजाओं के नेतृत्व में अयोध्या के निकट बहराइच के स्थान पर पहुंच गए। बहराइच के हाकिम सैयद सैफुद्दीन के पसीने छूट गए। उसने तुरन्त सालार मसूद को अपनी सारी सेना के साथ बहराइच पहुंचने का संदेश भेज दिया। सालार अपने जीवन की अंतिम जंग लड़ने आ पहुंचा। इसी स्थान पर हिन्दू राजाओं ने सालार मसूद को घेरने की रणनीति बनाई। सालार मसूद का बाप सालार शाह भी एक बहुत बड़े लश्कर के साथ उसकी सहायता के लिए आ गया।
प्रयागपुर के निकट घाघरा नदी के तट पर महायुद्ध हुआ। यह स्थान बहराइच से करीब 7 किलोमीटर दूर है। सुहेलदेव के नेतृत्व में लगभग 25 राजाओं की सैनिक वाहनियों ने मसूद और उसके बाप सालार शाह की सेना को अपने घेरे में ले लिया। हर-हर महादेव के गगनभेदी उदघोषों के साथ हिन्दू सैनिक मसूद की सेना पर टूट पड़े। मसूद की सेना घबरा गई। उसके सैनिकों को भागने का न तो मौका मिला और न ही मार्ग। विधर्मी और अत्याचारी आक्रांता के सैनिकों की गर्दनें गाजर मूली की तरह कटकट कर गिरने लगीं।
सात दिन के इस युद्ध में हिन्दू सैनिकों ने सालार मसूद की सम्पूर्ण सेना का सफाया कर दिया। एक भी सैनिक जिंदा नहीं बचा। मसूद की गर्दन भी एक हिन्दू सैनिक ने काट दी। विदेशी इतिहासकार शेख अब्दुल रहमान चिश्ती ने सालार मसूद की जीवनी ‘मीरात-ए-मसूदी’ में लिखा है, ‘इस्लाम के नाम पर जो अंधड़ अयोध्या तक जा पहुंचा था वह सब नेस्तेनाबूद हो गया, इस युद्ध में अरब और ईरान के हर घर का चिराग बुझा है, यही कारण है कि 200 वर्षों तक विदेशी और विधर्मी भारत पर हमला करने का मन न बना सके’।
सालार मसूद का यह आक्रमण केवलमातृ अयोध्या पर नहीं था यह तो समूचे भारत की अस्मिता पर चोट थी। इसीलिए भारत के राष्ट्रजीवन ने अपने आपको विविध राजाओं की संगठित शक्ति के रूप में प्रकट किया और हिन्दू समाज ने एकजुट होकर अपने राष्ट्रीय प्राण तत्व श्रीराम मंदिर की रक्षा की।
राम जन्मभूमि को विध्वंश करने के इरादे से आए आक्रांता मसूद और उसके सभी सैनिकों का महाविनाश इस बात को उजागर करता है कि जब भी हिन्दू समाज संगठित और शक्ति सम्पन्न रहा विदेशी ताकतों को भारत की धरती से पूर्णतया खदेड़ने में सफलता मिली। आज भी संतों के मार्गदर्शन और विश्व हिन्दू परिषद के नेतृत्व में श्रीरामजन्मभूमि पर भव्य मंदिर के निर्माण हेतु जो अयोध्या आंदोलन चल रहा है वह भी भारत की राष्ट्रीय अस्मिता का पुर्नजागरण है। मंदिर कोर्ट के फैसले से बने, सरकारी कानून से बने अथवा सहमति से बने, यह तो अब बन कर ही रहेगा।


राष्ट्रीय चेतना का उदघोष : अयोध्या आंदोलन – 5
दो विधर्मी फकीरों की गद्दारी
सम्पूर्ण भारत के भूगोल, इतिहास और सांस्कृतिक धरोहर को बर्बाद करने के उद्देश्य से विदेशी हमलावरों ने जो हिंसक रणनीति अपनाई थी उसी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा था हिन्दुओं के धार्मिक स्थलों को तोड़ना और अत्यंत अपमानजनक हथकंडे अपना कर भारत के राष्ट्रीय समाज का उत्पीड़न करना। इसी अमानवीय व्यवहार के अंतर्गत हजारों मंदिर टूटे, ज्ञान के भंडार विश्वविख्यात विद्या परिसर जले, अथाह धन सम्पदा लूटी गई, युवा कन्याओं को गुलाम बनाकर विदेशी बाजारों में बेचा गया, लाखों लोग तलवार के जोर पर मतांतरित किए गए। परिणामस्वरूप विश्व गुरु भारत की धरती पर कई इस्लामिक देश अस्तित्व में आ गए।
विधर्मी आक्रमणकारियों द्वारा अपनाई गई इस रणनीति के लम्बे चौड़े इतिहास का ही एक अध्याय है, श्रीराम जन्मभूमि पर बने मंदिर का विध्वंश। भारत राष्ट्र के चेतना स्थल और हृदय अयोध्या में सरयु नदी के तट पर शोभायमान भव्य श्रीराम मंदिर को गिराकर उसी के मलबे से वहीं पर थोप दिए गए एक आधे अधूरे ढांचे का भी एक दिलचस्प इतिहास है, जिससे हिन्दुओं की उदारता, कट्टर मुसलमानों के षड्यंत्र और विदेशी आक्रांताओं के नापाक इरादों का एकसाथ परिचय मिलता है।
सरयु नदी के तट पर एक हिन्दू योगी स्वामी श्यामानंद का आश्रम था। यह स्वामी जी एक सिद्ध पुरुष थे। इन्होंने अपने प्रभाव से अनेक लोगों को हिन्दुत्व अर्थात भारतीय तत्वज्ञान के प्रचार प्रसार में लगा दिया। अयोध्या में श्रीराम मंदिर की व्यवस्था इन्हीं की देखरेख में होती थी। स्वामी जी ने सभी मजहबों एवं वर्गों के लोगों को योगसाधना में दीक्षित किया।
इसी क्षेत्र में एक मुसलमान फकीर ख्वाजा अब्बास मूसा आशिकान भी सक्रिय था। वह भी स्वामी श्यामानंद की यश कीर्ति सुनकर उनके आश्रम में जा पहुंचा। कई दिन आश्रम में रहकर हिन्दू महात्मा द्वारा किए जाने वाले निर्मल और निश्चल अतिथि सत्कार का पूरा आनंद लेता रहा। इसने विधिवत स्वामी जी का शिष्यत्व स्वीकार कर लिया। स्वामी जी ने इस फकीर को अपने ही आश्रम में एक सुन्दर स्थान देकर स्थायी रूप से रहने की सभी सुविधाएं दे दीं।
हिन्दू तत्वज्ञान की विशालता इसी एक बात से सिद्ध होती है कि स्वामी श्यामानन्द ने इस मुसलमान फकीर को हिन्दू नहीं बनाया। हिन्दू जीवन प्रणाली इतनी वैज्ञानिक है कि इसे अपनाने के लिए किसी को अपना मजहब छोड़ने की जरूरत नहीं पड़ती। योगसाधना तो प्राणीमात्र के कल्याण का एक मार्ग है, जिसे कोई भी मतावलम्बी अपना सकता है। इसमें पूजा पद्धति का कोई बंधन नहीं होता।
ख्वाजा अब्बास मूसा ने अल्लाह-अल्लाह के जप के साथ योग साधना सीख ली। कालांतर में यह मुस्लिम फकीर भी स्वामी श्यामानंद का शिष्य होने के कारण पूरे क्षेत्र में प्रसिद्ध हो गया। परन्तु इसकी मनोवृति में अपने मुसलमान होने का जुनून और अहंकार नहीं मिट सका। उसके लिए ‘जो मुसलमान नहीं है वह तो काफिर है, इन मूर्तिपूजकों को किसी भी तरीके से मुसलमान बनाना अथवा समाप्त कर देना यही पवित्र कार्य था, इसी से अल्लाह प्रसन्न होता है’।
एक मतान्ध मुसलमान की तरह ख्वाजा अब्बास मूसा भी दूसरों के पूजा स्थलों को कुफ्र के अड्डे समझता रहा। श्रीराम जन्मभूमि पर बना हुआ विश्वप्रसिद्ध राम मंदिर भी इस मुस्लिम फकीर की आंखों में खटकता रहा। जिस थाली में खाता रहा उसी में छेद करने के षड्यंत्र उसके दिमाग में उभरने लगे। जिस व्यक्ति के आर्शीवाद से उसने चारों ओर ख्याति प्राप्त की थी, उसी से धोखा करने के इरादे पालने लगा। जिस पवित्र स्थान पर बैठकर योगसाधना की तथाकथित तपस्या की, उसी स्थान को बर्बाद करने के मंसूबे गढ़ते रहा।
इसी मनोभूमिका के साथ इस फकीर ने एक अन्य मुसलमान फकीर जलालशाह को भी इस हिन्दू आश्रम में बुला लिया। इस दूसरे फकीर ने भी स्वामी श्यामानन्द का शिष्यत्व गहण कर लिया। यह दोनों मुस्लिम फकीर हिन्दुत्व की शरण में आकर पीठ में छुआ घोंपने की मानसिकता के साथ आश्रम में रहने लगे। स्वामी श्यामानन्द को इन दोनों फकीरों के भीतर के इरादों का तनिक भी आभास नहीं हुआ। अपनी उदारता के कारण वे शत्रु और मित्र की परख नहीं करते थे।
सर्व विदित है कि इस प्रकार की असंख्य ऐतिहासक भूलों के कारण ही अपना देश 1200 वर्षों की गुलामी के दुष्परिणाम भोगता रहा। हिन्दू समाज की इसी राष्ट्रघातक भूल का लाभ विधर्मी और विदेशी आक्रमणकारी उठाते रहे। हमारी उदारता ही अभिशाप बन गई।
हिन्दुओं की इसी कूटनीति रहित उदारता और अदूरदर्शी अतिथि सत्कार का लाभ उठाकर मुगल हमलावर बाबर भी दो बार महाराणा सांगा से मार खाकर फिर तीसरी बार आ धमका और उसने सरयु के तट पर मार्च 1527 (934 हिजरी) को अपनी सेना का पड़ाव डाल दिया। भारत की सेना से एक बार पूर्णतया पराजित और दूसरी बार अच्छी खासी मार खाने के पश्चात बाबर अब अयोध्या पर आक्रमण करके सीधे भारत के अंतःस्थल पर चोट करने के इरादे से जंग की तैयारियों में जुट गया।
अयोध्या के स्वामी श्यामानन्द के दोनों शिष्य ख्वाजा अब्बास और जलालशाह तो ऐसे मौके की तलाश में थे ही। इन दोनों कट्टरपंथी फकीरों ने बाबर और उसके मुख्य सेनापति मीर बांकी से सम्पर्क साधा और उसे राम मंदिर तोड़कर उसके स्थान पर मस्जिद बनाने की सलाह दी। बाबर को और क्या चाहिए था, इन दोनों फकीरों के मार्गदर्शन में मंदिर तोड़ने की योजना तैयार हो गई।


राष्ट्रीय चेतना का उदघोष : अयोध्या आंदोलन – 6
मंदिर के खण्डहरों पर बाबरी ढांचा
अयोध्या के प्रसिद्ध हिन्दू संत स्वामी श्यामानंद को अपना गुरु मानने वाले दोनों मुस्लिम फकीरों ख्वाजा अब्बास और जलालशाह ने बाबर को चेतावनी दी कि यदि रामजन्मभूमि पर बने मंदिर को नहीं तोड़ा गया तो हिन्दू पुनः संगठित और शक्तिशाली होकर बाबर और उसके सारे सैन्यबल का सफाया कर देंगे। ठीक उसी तरह जैसे राणा संग्राम सिंह के मात्र 30 हजार सैनिकों ने बाबर के 1 लाख सैनिकों को गाजर-मूली की तरह काट डाला था। इसलिए भारत को जीतने का एक मात्र रास्ता यही है कि हिन्दू समाज और हिन्दुत्व के चेतना-स्थल राम मंदिर के स्थान पर मस्जिद खड़ी कर दी जाए। यह बाबरी मस्जिद के नाम से प्रसिद्ध हो जाएगी और यही हिन्दुस्थान पर बाबर की विजय का स्तम्भ होगी।
दोनों मुसलमान फकीरों ने बाबर को समझाया कि हिन्दुओं के मंदिरों, धर्मग्रंथों, गौशालाओं, पुस्तकालयों, शिक्षा के केन्द्रों और इसी प्रकार के हजारों मानबिंदुओं को समाप्त किए बिना भारत में मुसलमानों का वर्चस्व स्थापित करना असंभव है। यही संस्कृति-केन्द्र वास्तव में हिन्दू समाज के प्रेरणा स्रोत हैं। इन्हीं से प्रेरणा लेकर ही यह हिन्दू बार-बार संघर्ष के लिए उठ खड़े होते हैं।
बाबर भी इसी मंतव्य के साथ भारत में घुसा था। दोनों मुसलमान फकीरों ने बाबर का स्वागत करते हुए उसका उत्साह बढ़ा दिया। दोनों की मदद का आश्वासन लेकर बाबर ने अपने सेनापति मीरबांकी को मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाने का आदेश दे दिया। यह शाही फरमान एक प्रसिद्ध पत्रिका ‘मार्डन रिव्यू’ के जुलाई 1924 के अंक में इस तरह छपा था – ‘शहंशाह हिन्द मुस्लिम मालिकुल जहां बादशाह बाबर के हुक्म व हजरत जलालशाह के हुक्म के बमूजिब अयोध्या में राम जन्मभूमि को मिसार करके उसके जगह उसी के मलबे व मसाले से मस्जिद तामीर करने की इजाजत दे दी गई है। बजरिए इस हुक्मनामे के तुम को इत्तिला किया जाता है कि हिन्दुस्तान के किसी भी सूबे से कोई हिन्दू अयोध्या न आने पाए’।
मुगल बादशाह यह आदेश देकर निश्चिंत होकर चला गया, उसे लगा कि हिन्दू अब प्रतिकार नहीं कर सकते। बिना किसी रोकटोक के मंदिर पर मस्जिद चढ़ा दी जाएगी। उसके सेनापति मीरबांकी ने भी इस काम को आसान समझकर अपने सैन्यबल के सहारे मंदिर को गिराने का ऐलान कर दिया। इस अभियान को प्रारम्भ करते ही उसे समझ में आ गया कि हिन्दू समाज इस काम को सरलता से सफल नहीं होने देगा, उसका अनुमान सत्य निकला। हिन्दुओं ने मीरबांकी की विशाल सेना की ईंट से ईंट बजा दी। जमकर संघर्ष हुआ, मंदिर के पुजारी, साधु संत, निकटवर्ती राजाओं के सैनिक और साधारण नागरिक सभी ने मंदिर की रक्षा के लिए अपने प्राणों की बाजी लगा दी।
बाबर हिन्दुस्थान में दिल्ली शासक के रूप में केवल 5 वर्ष ही रहा। 1526 से 1530 तक हिन्दुओं ने उसे चैन से नहीं बैठने दिया। हिन्दू राजाओं के सैनिकों ने बाबरी सेना के कई लाख सैनिकों को जहन्नुम पहुंचाया। सन्यासियों ने गांव-गांव में जाकर के हिन्दुत्व की अलख जगाई। मीरबांकी ने राष्ट्र की आत्मा पर प्रहार किया था, सारा देश हिल उठा। राष्ट्र के स्वाभिमान की रक्षा के लिए हिन्दू समाज ने जमकर प्रतिकार किया। हंसवर राज्य के नरेश रणविजय सिंह, महारानी जयराजकुमारी, भीटी के राजा महताब सिंह, स्वामी महेश्वरानंद और पंडित देवीदीन पांडे ने अपने-अपने सैन्यबलों के साथ लाखों मुगल सैनिकों की कुर्बानियां लेकर अपने बलिदान दिए थे।
मुसलमान सेनापति मीरबांकी ने भी अत्याचारों की झड़ी लगा दी। अंग्रेज इतिहासकार और मीरबांकी के प्रशासनिक अधिकारी हेमिल्टन ने इस जालिम मुस्लिम सेनापति के कुकृत्यों का परिचय बाराबंकी के गजेटियर में इस प्रकार दिया है- ‘जलालशाह ने हिन्दुओं के खून का गारा बनाकर लखौरी ईंटों को मस्जिद की नींव में लगा दिया। इतिहास में यह भी दर्ज है कि आसानी से मंदिर को गिरा देने का मीरबांकी का इरादा मिट्टी में मिल गया। भारत के इस चेतनास्थल की रक्षा के लिए लाखों शीश चढ़ गए। प्रसिद्ध अंग्रेज इतिहासकार कनिंघम ने लिखा है -‘जन्मभूमि के गिराए जाने के समय हिन्दुओं ने अपनी जान की बाजी लगा दी और 1 लाख 73 हजार लाशें गिर जाने के बाद ही मीरबांकी मंदिर को तोप से गिराने में सफल हो सका।’
इतने खून-खराबे के बाद बाबर ने मंदिर के स्वरूप को बिगाड़कर जो मस्जिदनुमा ढांचा खड़ा कर दिया था उसे हिन्दुओं ने कभी स्वीकार नहीं किया। बाबर द्वारा मंदिर को ध्वस्त करके उस पर जबरदस्ती एक ढांचा खड़ा करने के पश्चात भी हिन्दू एक क्षण के लिए भी चुप नहीं बैठे। श्रीराम जन्मभूमि के स्थान पर मंदिर का पुर्ननिर्माण करने के लिए हिन्दू समाज ने 76 बार आक्रमण करके 4 लाख से भी ज्यादा बलिदान दिए हैं। इसलिए श्रीराम जन्मभूमि पर मंदिर निर्माण अवश्य हमारे राष्ट्र के स्वाभिमान, अस्मिता और अखंडता के साथ जुड़ गया है। अगर मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त नहीं हुआ तो किसी शक्तिशाली आन्दोलन की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।


राष्ट्रीय चेतना का उदघोष : अयोध्या आंदोलन – 8
तथाकथित मानवतावादी अकबर की कुटिल कूटनीति
इस्लाम की मूल भावना और शरीयत के सभी उसूलों को तक पर रखकर बाबर ने मंदिर तोड़कर जो मस्जिद का ढांचा खड़ा कर दिया। यह हिन्दू समाज पर एक कलंक का टीका था। बाबर की विजय विदेश की विजय थी। आक्रमणकारी बाबर के द्वारा किसी भी प्रकार का स्मृति चिन्ह समस्त भारत का अपमान था। राष्ट्र के हृदय-स्थल पर एक विदेशी आक्रांता के द्वारा हिन्दुओं के ही श्रद्धा केन्द्र को ध्वस्त करके बनाए गए इस ढांचे को हिन्दुओं ने कभी स्वीकार नहीं किया। बाबर के बाद हुमांयु के काल में भी हिन्दुओं ने मंदिर की मुक्ति के लिए संघर्ष जारी रखा।
महारानी जयराज कुमारी ने कुलगुरू स्वामी महेश्वरानंद के मार्गदर्शन में राममंदिर का जीर्णोंद्धार करने की विस्तृत योजना बनाई। दिल्ली के तख्त पर हुमांयु का कब्जा हो जाना राममंदिर के जीर्णोद्धार के पवित्र कार्य में बाधक बन गया। हुमांयु के द्वारा भेजी गई सैनिक सहायता के बल पर मुगल सेना ने फिर से जन्मभूमि पर कब्जा कर लिया। महारानी ने मंदिर को बचाने के लिए पूरी ताकत के साथ प्रतिकार किया। स्वामी महेश्वरानंद ने भी अपनी विशाल चिमटाधारी साधू मंडली के साथ मुगल सेना का जमकर विनाश किया। परन्तु मुगल सेना का राक्षसी बाहुल्य और दिल्ली सम्राट का तोपखाना महारानी की सैनिक टुकड़ी पर भारी पड़ गया। स्वामी महेश्वरानंद और महारानी जयराज कुमारी दोनों लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए।
इस प्रकार रामजन्मभूमि पर कभी हिन्दुओं का तो कभी मुगल सेना का कब्जा होता रहा परन्तु एक क्षण भी ऐसा नहीं आया जब हिन्दू अपने आराध्य देव श्रीराम के जन्मस्थान की ओर आंखें मूंदकर शांत हो गए हों। एक पीढ़ी संघर्ष की बागडोर दूसरी पीढ़ी के हाथ में देती रही। इस तरह जन्मभूमि मुक्ति आंदोलन निरंतर चलता रहा।
हुमांयु के बाद अकबर ने कूटनीति का सहारा लिया, उसने दो राजाओं टोडरमल और बीरबल को इस समस्या के समाधान हेतु मध्यस्तता करने के आदेश दिए। इन दोनों हिन्दू नेताओं ने इस नकली मस्जिद में एक चबूतरा बनवा दिया। हिन्दू समाज ने यहीं पर पूजा अर्चना शुरु कर दी।
अकबर के द्वारा इस बाबरी ढांचे में चबूतरा बनवाकर हिन्दुओं को पूजा करने की इजाजत देने से नकली मस्जिद का रहा सहा स्वरूप भी समाप्त हो गया। बाबर ने मंदिर में गुम्बद लगवाकर, परिक्रमा सुरक्षित रखकर, भगवान शंकर की मूर्तियों वाले कसौटी के पत्थरों का आधार स्वीकार करके, अंदर की दीवारों पर कमल के आकारों को मान्यता देकर, द्वारों में चंदन की लकड़ी लगाकर, मुख्य द्वार पर गोल चक्र रखवाकर और घंटी की आवाज के साथ मूर्तिपूजा करते हुए पूजा अर्चना की इजाजत देकर इस भवन को मंदिर स्वीकार कर लिया था।
परिणामस्वरूप मुसलमानों का तो इस नकली मस्जिद में आना ही बंद हो गया। वे तो पहले ही यहां आना पसंद नहीं करते थे। आम मुसलमान इसे मंदिर ही मानता था। साधारण मुस्लिम समाज की इस मंदिर के प्रति पूर्ण श्रद्धा थी। वे तो अब भी श्रीराम को अपने आराध्य पूर्वज के रूप में मानते थे। केवल विदेशी मुगल बादशाहों ने ही इस भवन को मस्जिद कहा था।
अकबर के काल में ही हिन्दू समाज ने स्वामी बलरामाचार्य के नेतृत्व में 20 बार मुगलिया फौज के साथ युद्ध किया। प्रत्येक बार अकबर ने शाही फौज भेजकर हिन्दुओं को दबाने का पूरा प्रयास किया। जब हिन्दू थके नहीं, हारे नहीं और उन्होंने मंदिर की मुक्ति हेतू और भी प्रचंड वेग से मुगलों से लोहा लेते रहने का निश्चय किया तो अकबर ने मजबूर होकर राम चबूतरे को पुनः मान्यता दे दी। ध्यान दें कि बाबर के द्वारा बनाए गए राम चबूतरे को हुमांयु ने तुड़वा दिया था।
राम चबूतरे का निर्माण हिन्दू समाज की विजय थी। यह विजय वीरों की तरह युद्ध में प्राप्त की थी, यह अकबर के द्वारा दिया गया पुरस्कार नहीं था। हिन्दुओं ने अपने पौरुष और भुजबल से मुगल बादशाहों को मंदिर के अस्तित्व को स्वीकार करने को बाध्य किया था। मंदिर चाहे कैसा भी हो, संगमरमर का अथवा कपड़े का या फिर वर्तमान मंदिर की तरह टीन का वह तो मंदिर ही कहा जाएगा।
जन्मभूमि मंदिर के खंडित स्वरूप में ही एक स्थान पर राम चबूतरा बनवाकर हिन्दू समाज चुप नहीं बैठा। मंदिर की पूर्ण मुक्ति और एक भव्य मंदिर का निर्माण इस उद्देश्य की पूर्ति हेतु हिन्दू समाज ने सदियों पर्यन्त बलिदान दिए। अकबर के साथ हुआ समझौता तो हिन्दुओं की उदार और समन्वयात्मक वृति का परिचायक था। यही समझौता जहांगीर और शाहजहां के साथ भी चलता रहा। परन्तु इस कालखंड में भी हिन्दुओं ने जन्मभूमि मुक्ति अभियान को विराम नहीं दिया।
शाहजहां के बाद जब उसका धर्मान्ध बेटा औरंगजेब दिल्ली की गद्दी पर बैठा तो मजहबी उन्माद में पागल हुए इस बादशाह ने हिन्दू समाज और इसके धार्मिक स्थलों को समाप्त करने के ‘खुदाई हुक्म’ को चलाने हेतु अत्याचारों की सारी हदें पार कर दीं। कट्टरपंथी मुल्ला-मौलवियों के हाथों कठपुतली बनकर औरंगजेब ने सबसे पहला शाही फैसला अयोध्या के राममंदिर के खण्डहरों और राम चबूतरे को पूर्णतः समाप्त करने का किया।


राष्ट्रीय चेतना का उदघोष : अयोध्या आंदोलन – 10
राष्ट्रवादी मुस्लिम सरदार और धूर्त अंग्रेज
औरंगजेब के पश्चात कुछ समय तो शांति से कटा, परन्तु धर्मान्ध मुस्लिम नवाबों के अहम के कारण यह विवाद सुलझने के स्थान पर उलझता चला गया। हिन्दुओं ने एक दिन भी मंदिर पर अपने अधिकार को नहीं छोड़ा। एक कालखंड ऐसा भी आया जब हिन्दू मुस्लिम सदभाव का वातावरण बना। सन् 1789 में महाराष्ट्र के एक सशक्त हिन्दू राजा महादजी सिंधिया ने दिल्ली पर आक्रमण करके विजय प्राप्त की। मुगल शासक शाह आलम ने महादजी के प्रतिनिधि के रूप में शासन चलाना मान लिया।
शाह आलम ने गोवध पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया और 1790 में मथुरा, वृंदावन और काशी के तीर्थस्थल हिन्दुओं को सौंप दिए गए। इसके कुछ ही समय पश्चात हिन्दू योद्धा नाना फणनवीस के आग्रह पर श्रीराम जन्मभूमि को भी हिन्दुओं को वापस सौंपने की तैयारी शाह आलम ने कर ली। परन्तु हिन्दू समाज और राष्ट्र ने अभी और परीक्षा देनी थी। 1857 का स्वतंत्रता संग्राम पराजय में बदल गया। शाह आलम और नाना फणनवीस की मृत्यु से यह राष्ट्रीय कार्य सम्पन्न नहीं हो सका। दिल्ली की सत्ता पर अब अंग्रेजों ने अपनी कुटिल चालों से पूर्ण अधिकार कर लिया।
सन् 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के एक देशभक्त मुस्लिम नेता सरदार अमीर अली खाँ ने फैजाबाद अयोध्या के सभी मुसलमानों का एक सम्मेलन आयोजित करके उन्हें समझाया – ‘हम सभी मुसलमान विदेशियों के वंशज नहीं हैं, हम भारतीय हैं। हिन्दू और मुसलमान भाई-भाई हैं। मजहब अलग होने से क्या होता है? हम आज भी कंधे से कंधा मिलाकर अंग्रेजों को अपनी मातृभूमि से खदेड़ने की कोशिश कर रहे हैं। हमने मिलकर तलवार उठाई है। रामजन्मभूमि हिन्दुओं का श्रद्धास्थान है। हम सब स्वेच्छा से उसे हिन्दुओं को वापस कर 329 वर्ष पहले की भूल को दुरस्त करें’।
अमीर अली खाँ की इस अपील का असर हुआ। मुस्लिम समाज राष्ट्र की मुख्यधारा में आने को उत्सुक था। सदियों पूर्व बिछड़े भाई एक दूसरे के गली लगने ही वाले थे कि धूर्त अंग्रेजों ने दोनों को कुटिलता से अलग करके दोनों के हाथों में फिर खंजर पकड़ा दिए। हिन्दू और मुसलमानों के मिलन से अंग्रेज शासक घबरा गए थे। उन्हें अपनी फूट डालो और राज करो की पापमय नीति का जहर अपने ही गले में उतरता दिखाई दिया। अंग्रेजों की इसी पतली हालत का अनुमान कर्नल मार्टिन की दिल्ली गजट की रिपोर्ट में मिलता है – ‘‘अयोध्या की बाबरी मस्जिद मुसलमानों के द्वारा हिन्दुओं को वापस दिए जाने की खबर सुनकर हम लोगों में घबराहट फैल गई और यह विश्वास हो गया कि हिन्दुस्तान से अब अंग्रेज खत्म हो जाएंगे। लेकिन अच्छा हुआ कि गदर का पासा पलट गया और अमीर अली तथा बलवाई बाबा रामचरण दास को फांसी पर लटका दिया गया। इसके बाद से फैजाबाद जिले में हमारा प्रभाव जम गया। क्योंकि गौंडा का राजा देवीबक्श सिंह पहले ही फरार हो चुका था। इस काम में राजा मानसिंह मेहदीना वाले ने हमारी बड़ी मदद की’’।
अंग्रेजी शासन के काल में योजनाबद्ध तरीके से हिन्दू और मुसलमान में भेद उत्पन्न करके पहले से पड़ी इस दीवार को और गहरा कर दिया गया। अंग्रेजों की इस विभाजक नीति ने मुसलमानों को एक भिन्न राष्ट्र के रूप में खड़ा कर दिया। विदेशी मुसलमानों ने बलात धर्मान्तरण के द्वारा हिन्दू समाज में से ही मुस्लिम श्रेणी खड़ी की और अंग्रेजों ने इस मुस्लिम श्रेणी के अहम को जागृत करके उन्हें भारत की राष्ट्रीय धारा से अलग कर दिया। परिणामस्वरूप मुस्लिम लीग का जन्म हुआ। जिन्ना ने मुस्लिम राष्ट्र की मांग की और अंग्रेज सरकार ने पाकिस्तान की मांग स्वीकार करके सदियों पुराने राष्ट्र के टुकड़े कर दिए, कांग्रेस के नेताओं ने भी इस पर मोहर लगा दी।
इसी प्रकार हिन्दू मुसलमानों का विभाजन करके अंग्रेजों ने दोनों के एकरस होते हुए उस प्रयास को भी दफन कर दिया जिसे मुस्लिम सरदार अमीर अली खाँ ने यह कहकर प्रारम्भ किया था कि -‘जन्मभूमि मंदिर हिन्दुओं का है, इसे उन्हें ही सौंप देंगे’। अंग्रेजों ने हिन्दू मुसलमानों के इस जन्मभूमि मुक्ति के संयुक्त अभियान को विफल कर दिया। दिल्ली गजेटियर के पृष्ठ 62 पर स्पष्ट लिखा है – ‘‘इसके पहले हिन्दू और मुसलमान एक ही इमारत में आराधना किया करते थे। लेकिन 1857 के गदर के समय मस्जिद के चारों तरफ एक घेरा डाल दिया गया। क्योंकि हिन्दुओं के लिए मस्जिद के भीतर जाना मना था। इसलिए वह अपने नये बनाए चबूतरे पर ही पूजा अर्चना करने लगे’’।
ब्रिटिश सरकार ने यद्यपि जन्मभूमि के भी विभाजन का षड्यंत्र किया परन्तु हिन्दू समाज ने इस कालखंड में भी मंदिर मुक्ति के संघर्ष को विराम नहीं दिया। सन् 1912 और 1934 में हिन्दुओं ने दो बार फिर इस मंदिर को अपने अधिकार में लेने के लिए प्रबल आक्रमण किए। दूसरे आक्रमण के समय तो हिन्दुओं ने इस तथाकथित नकली मस्जिद को नष्टप्राय कर दिया। बाद में फैजाबाद के डिप्टी कमिश्नर जे.पी. निकलसन ने अपने विशेषाधिकार का प्रयोग करते हुए मुसलमानों को प्रसन्न करने हेतु इस नकली मस्जिद का जीर्णोद्धार करा दिया। परन्तु मुसलमानों के द्वारा नमाज पढ़ना पूर्णतः बंद हो गया। हिन्दुओं के द्वारा पूजा-अर्चना के कार्यक्रम चलते रहे। इस तरह हिन्दू समाज के द्वारा पूजा इत्यादि के कार्यक्रम भी चलते रहे और हिन्दू सैनिकों द्वारा जन्मभूमि को पूर्णतया मुक्त करवाने के अभियान भी चलते रहे।


राष्ट्रीय चेतना का उदघोष : अयोध्या आंदोलन – 11
आध्यात्मिक इतिहास की एक दुलर्भ घटना

श्रीराम जन्मभूमि मंदिर के बनते बिगड़ते स्वरूप और बलिदानों की अविरल श्रंखला के बीच भी हिन्दुओं के द्वारा आरती वंदन और अखंड रामायण पाठ एक क्षण के लिए भी बंद नहीं हुआ। अयोध्या क्षेत्र में संत महात्मा तथा समस्त हिन्दू समाज अपने श्रीराम की प्रतिमा को जन्मभूमि मंदिर में ही देखने के लिए उतावले हो रहे थे। संयम और उदारता अपनी सीमाएं पार करने ही वाले थे कि एक अनोखी एवं संसार के आध्यात्मिक इतिहास की दुलर्भ घटना घटी।
यह घटना थी या कि भारतीय राष्ट्र जीवन के अविरल प्रवाह का ऐतिहासिक प्रसंग- यह तो भविष्य ही बताएगा परन्तु इस सच्चाई से तो कोई भी आंखें नहीं मूंद सकता कि इस प्रसंग से हिन्दू जागरण का शंख एक बार फिर गूंज उठा। 23 दिसम्बर 1949 की मध्य रात्रि को रामजन्मभूमि में एक दिव्य प्रकाश हुआ और वहां पर तैनात एक मुस्लिम पहरेदार अबुल बक्श ने एक बाल प्रतिमा के दर्शन किए।
इस पहरेदार ने बाद में अयोध्या के जिलाधीश के.के. नायर के समक्ष स्वीकार किया था -‘‘जब से मैं यहां तैनात किया गया हूं, बराबर अपनी ड्यूटी दे रहा हूं, आज तक कोई भी कार्यवाही हिन्दुओं की ओर से नहीं हुई जो गैर कानूनी कही जा सके। 22-23 दिसम्बर की रात को तकरीबन 2 बजे बाबरी मस्जिद में मुझे यकायक एक चांदनी सी नजर आई। इस बीच मुझे मालूम हुआ कि जैसे एक खुदाई रौशनी मस्जिद के भीतर हो रही है। धीरे-धीरे वह रौशनी तेज होती गई और उसमें एक बहुत ही खूबसूरत 4-5 साल के बच्चे की सूरत मुझे नजर आई। उसके सिर के बाल घुंघराले थे, बदन मोटा ताजा, खूब तंदुरुस्त था। मैंने ऐसा खूबसूरत बच्चा अपनी जिन्दगी में पहले कभी नहीं देखा था। उस को देखकर मैं बेहोशी की हालत में हो गया। कह नहीं सकता कि मेरी ऐसी हालत कब तक रही, जब होश में आया तो देखता हूं कि सदर दरवाजे का ताला टूटकर जमीन पर पड़ा हुआ है। मस्जिद के भीतर हिन्दुओं की बेशुमार भीड़ घुसी हुई है। एक सिंहासन पर कोई बुत रखा हुआ है। उसकी ‘भय प्रकट किरपाला दीन दयाला कौशल्या हितकारी’ गाते हुए लोग आरती उतार रहे हैं। इसके अलावा मैं कुछ नही जानता’’।
यह वक्तव्य किसी समाचार पत्र के संवाददाता की रिपोर्ट नहीं थी, यह किसी राजनीतिक नेता का कोई चुनावी भाषण भी नहीं था और न ही किसी फिल्म का डॉयलॉग। यह तो सरकार की ओर से तैनात एक मुसलमान सिपाही का सरकार के ही एक जिलाधीश के समक्ष दिया बयान था। इस साधारण कर्मचारी ने जो देखा वो बता दिया। इस घटना का समाचार चारों ओर फैलते ही हिन्दू समाज में प्रसन्नता की लहर दौड़ पड़ी। मुस्लिम समाज इससे आश्चर्यचकित हो गया और उत्तर प्रदेश की सरकार का तो मानो अस्तित्व ही खतरे में पड़ गया। कट्टरपंथी मुस्लिम नेताओं को इसमें हिन्दुओं का एक षड्यंत्र नजर आने लगा। धर्मांधता के संस्कारों में पले कुछ अराष्ट्रीय तत्वों ने इस अवसर पर दंगे भड़काने का प्रयास भी किया, परन्तु हिन्दुओं के उत्साह और राम मंदिर की ओर उमड़ती भीड़ को देखते हुए वह कुछ नहीं कर सके।
हिन्दू दर्शनार्थियों का तांता लगता रहा और श्रीराम की स्तुति के कार्यक्रम चलते रहे। शांति का वातावरण बना रहा। अनेक मुसलमान भाई भी श्रीराम के दर्शनार्थ पहुंचे। परन्तु इस मजहब को भारत की राष्ट्रीय धारा से अलग-थलग करने के जिम्मेदार विदेशी मुल्ला-मौलवियों और शासकों के ही मानसपुत्र कुछ मुस्लिम नेताओं ने शोर मचा दिया। उन्हें हिन्दू और मुसलमान के एकरस होने का यह अवसर सुहाया नहीं। इनके शोर का वोट के लोभी सत्ताधारियों पर भी असर हो गया।
उत्तर प्रदेश की सरकार के तत्कालीन डिप्टी पुलिस इंस्पैक्टर जनरल श्री सरदार सिंह ने स्वयं राममंदिर में जाकर सारी स्थिति को देखा। वातावरण राममय था। सब ओर शांति थी। वे और गृहसचिव श्री भगवान सहाय अयोध्या के जिलाधीश को उचित कार्यवाही करने का आदेश देकर चले गए। केन्द्र सरकार के इशारे पर उत्तर प्रदेश की सरकार ने मंदिर पर ताला लगाने का आदेश जारी कर दिया। उस समय भारत के प्रधानमंत्री थे जवाहर लाल नेहरू, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे गोविन्द वल्लभ पंत और श्री के.के. नैय्यर फैजाबाद के जिलाधिकारी थे।
कानून और व्यवस्था का बहाना बनाकर तत्कालीन सिटी मेजिस्ट्रेट ने ढांचे को अपराधिक दंड संहिता की धारा 145 के तहत रखते हुए प्रिय दत्त राम को रिसीवर नियुक्त किया। सिटी मेजिस्ट्रेट ने मंदिर के द्वार पर ताले लगा दिए। परन्तु एक पुजारी को दिन में दो बार ढांचे के अंदर जाकर दैनिक पूजा और अन्य अनुष्ठान सम्पन्न करने की अनुमति दे दी। ताला लगे दरवाजों के सामने स्थानीय श्रद्धालुओं और संतों ने जय श्रीराम, जय श्रीराम का अखंड संकीर्तन शुरु कर दिया।
अप्रेल 1984 में विश्व हिन्दू परिषद द्वारा विज्ञान भवन-नई दिल्ली में आयोजित पहली धर्म संसद में जन्मभूमि के द्वार से ताला खुलवाने हेतु जन जागरण यात्राएं करने की घोषणा कर दी। इन रथ यात्राओं से हिन्दू समाज में ऐसा प्रबल उत्साह जगा कि फैजाबाद के जिला दंडाधिकारी ने 1 फरवरी 1986 को श्रीराम जन्मभूमि मंदिर के द्वार पर लगा ताला खोलने का आदेश दे दिया। हिन्दुओं के द्वारा मंदिर के भीतर जाकर श्रीराम लला की पूजा एवं आरती वंदन के कार्यक्रम पुनः शुरु हो गए।