राष्ट्रीयता की भावना मजबूत करने में मंदिर आंदोलन की रही भूमिका

राष्ट्रीयता की भावना मजबूत करने में मंदिर आंदोलन की रही भूमिका
– उमेश चतुर्वेदी

सोशल मीडिया के हस्तक्षेपी युग में राम मंदिर निर्माण के लिए निधि संग्रह का अभियान शुरू हो और इस पर टीका-टिप्पणी ना हो, तभी हैरत होती। इस पर टीका-टिप्पणी करने वाला समूह और वर्ग करता रहेगा। लेकिन निधि संग्रह अभियान के बहाने राम मंदिर आंदोलन के प्रभावों का आकलन करना और उसे आने वाली पीढ़ियों को समझाना भी जरूरी है। राममंदिर आंदोलन को एक वर्ग द्वारा भारत की कथित सहिष्णु परंपरा को तोड़ने की बात अब अनजानी नहीं रही। इस विचार के बरक्स राष्ट्रवादी विचारधारा इस आंदोलन को राष्ट्र के गौरवबोध के जागरण से जोड़कर भी देखती है। विरोधी इसे हिंदुत्व का गौरवबोध बताते नहीं थकते, लेकिन हकीकत यह है कि लोक जागरण की यह भावना हिंदुत्व की बजाय राष्ट्रबोध को ज्यादा प्रतिबिंबित करती है। राम मंदिर आंदोलन को सिर्फ हिंदुत्व के उभार से ही जोड़ना एक पक्षीय ही माना जाना चाहिए।
आधुनिक युग में राममंदिर के लिए आंदोलन की शुरूआत 1853 से मानी जाती है। लेकिन उसे निर्णायक परिणति तक पहुंचाने वाला आंदोलन 1989 में शुरू हुआ, जिसे मुख्य रूप से विश्व हिंदू परिषद ने नेतृत्व दिया। हालांकि विश्व हिंदू परिषद ऐसा दावा नहीं करती। बल्कि आधिकारिक रूप से वह मानती है कि सही मायने में यह जन आंदोलन था, बस लोक जागरण में उसकी भूमिका रही। लेकिन इस लोकजागरण ने राष्ट्र को एक सिरे से लेकर दूसरे सिरे तक जोड़ दिया। आजादी के समूचे आंदोलन का लक्ष्य सिर्फ विदेशी दासता से भारत भूमि को मुक्ति दिलाना ही नहीं रहा, बल्कि लोक जागरण के जरिए हर भारतीय के मन में राष्ट्रीयता की सोच को ठोस आधार देना भी रहा। स्वाधीनता आंदोलन की इस सोच के जरिए आधुनिक अर्थों में अखंड राष्ट्र-राज्य का निर्माण भी रहा। लोक जागरण के लिए सनातनी सोच को ही आधार बनाया गया। प्रथम स्वाधीनता संग्राम के नाकाम होने के बाद उभरे राजनीतिक और सांस्कृतिक विचारों का आधार पारंपरिक भारतीय सांस्कृतिक सोच और दर्शन ही है। देश के पूर्वी छोर पर स्थित बंगाल के बंकिम चंद्र हों या तमिलनाडु में सुब्रमण्यम भारती या फिर हिंदी में भारतेंदु हरिश्चंद्र, सबकी रचनाओं के मूल स्वर का आधार पारंपरिक भारतीय गौरवबोध ही है। हिंदी में बाद के दिनों में इस सोच का विस्तार जयशंकर प्रसाद की रचनाओं में दिखता है। भारतीय लोकजागरण के लिए बंकिम दुर्गेश नंदिनी को आधार बना रहे थे, आनंद मठ के जरिए वंदे मातरम् गाकर भारतीयता की प्रतिष्ठा कर रहे थे तो भारतेंदु हरिश्चंद्र प्राचीन भारतीय गौरवबोध के आधार पर तत्कालीन भारत की स्थिति का दारूण गान ‘हा, भारत दुर्दशा देखि ना जाई’ कर रहे थे। बलिया के ददरी मेले के मंच पर 1893 में वे जब ‘भारतवर्षोन्नति कैसे हो सकती है’ की रूपरेखा प्रस्तुत कर रहे होते हैं तो दरअसल वे सांस्कृतिक और पारंपरिक भारत के आधार पर ही नए भारत के सृजन का सपना दिखा रहे होते हैं। समीक्षकों ने इस दौर की रचनाओं को सिर्फ राष्ट्रीय आंदोलन का प्रभाव ही माना है। यह सच तो है, लेकिन यह भी सच है कि अपनी रचनाओं के जरिए बंकिम, भारतेंदु और जयशंकर प्रसाद सांस्कृतिक भारतीय मूल्यों के आधार पर नए भारत की ना सिर्फ मीमांसा कर रहे थे, बल्कि लोगों में नवराष्ट्रवाद का संचार भी कर रहे थे। जयशंकर प्रसाद की नायिकाएं जब ‘हिमाद्रि तुंग शृंग से, प्रबुद्ध शुद्ध भारती/ स्वयंप्रभा समुज्ज्वला स्वतंत्रता पुकारती’ या ‘अरूण यह मधुमय देश हमारा, जहां पहुंच अनजान क्षितिज को मिलता एक सहारा’ गा रही होती हैं तो दरअसल वे पारंपरिक भारतीय मूल्यों के जरिए नए भारतीय राष्ट्रीय विचारधारा का पोषण भी कर रही होती हैं।
साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में लोकजागरण के लिए भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों का जिस तरह बंकिम, भारतेंदु, सुब्रमण्यम भारती आदि ले रहे थे, राजनीति के क्षेत्र में वही काम बाल गंगाधर तिलक और लाला लाजपत राय ने भी किया। बाल गंगाधर तिलक ने पारिवारिक स्तर पर होने वाले गणपति पूजन को सार्वजनिक पूजन बना दिया। कुछ यही स्थिति बंगाल के दुर्गा पूजा की भी रही। उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध के पहले तक यह पूजा सिर्फ बंगाली जमींदारों के अहाते में या कतिपय सामर्थ्यवान बंगाली परिवारों तक सीमित थी। लेकिन बंगाल के तत्कालीन सामुदायिक नेताओं ने उसे सार्वजनिक पूजा बना दिया। कुछ वैसी ही भूमिका उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में बाल गंगाधर तिलक ने पूर्व मराठा साम्राज्य में निभाई। जिसका असर आज तक सार्वजनिक गणेश पूजा के तौर पर महाराष्ट्र, गुजरात, मध्य प्रदेश और कर्नाटक तक दिखता है। इसी तरह लाला लाजपत राय ने देश के पश्चिमी हिस्से में भी लोक जागरण के लिए स्थानीय सांस्कृतिक प्रतीकों का सहारा लिया। उन्होंने आर्यसमाज के जरिए वेद और वैदिक विद्यालयों की पंजाब में स्थापना की। इसके जरिए उन्होंने पश्चिमी भारत में वैदिक संस्कृति की ना सिर्फ प्रतिष्ठा की, बल्कि इसके जरिए उन्होंने लोक जागरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अतीत के प्रति उनकी आस्था और उसके जरिए भविष्य निर्माण की दृष्टि को उनके इस कथन में देखा और समझा जा सकता है। वे कहते हैं, “अतीत को देखते रहना व्यर्थ है, जब तक उस अतीत पर गर्व करने योग्य भविष्य के निर्माण के लिए कार्य न किया जाय।”
आजाद भारत में विकसित संकुचित राजनीतिक दर्शन ही है कि राम मंदिर आंदोलन को कभी आजादी के आंदोलन की इन परंपराओं के साथ न तो जोड़ा गया और नही देखा गया। गुलाम भारत में लोकजागरण और भारत की भावी व्यवस्था के लिए जिन सांस्कृतिक व्यक्तित्वों और प्रतीकों को पैमाने के तौर पर स्वीकार किया गया, वे व्यक्तित्व और वे परंपराएं आजाद भारत की राजनीति और संस्कृति में अस्वीकार्य हो गए। आजाद भारत में वैचारिकता का जो तानाबाना विकसित हुआ, उसमें धर्म का अर्थ लगातार संकुचित होता चला गया। वह संप्रदाय में बदलता गया। धार्मिकता को सांप्रदायिकता के नकारात्मक खांचे में फिट कर दिया गया। ऐसे माहौल में राम मंदिर आंदोलन भी लोकजागरण का प्रतीक ना रहकर सांप्रदायिकता का ही एक रूप बन गया। स्वाधीनता के पहले सांस्कृतिक हस्ती बंकिम हों, सुब्रमण्यम भारती हों, भारतेंदु हों या फिर जयशंकर प्रसाद उस दौर में सांप्रदायिक नहीं माने गए। यही स्थिति बाल गंगाधर तिलक और लाला लाजपत राय जैसे नेताओं की भी रही। लेकिन आजाद भारत में सोच बदल गई और इसके चलते स्थितियां भीं।

सवाल उठ सकता है कि राममंदिर आंदोलन ने किस तरह देश को एक किया। इसके बरक्स आसानी से यह तर्क दिया जा सकता है कि इसने देश को हिंदू और मुसलमान के सांप्रदायिक खांचे में बांट दिया। याद कीजिए 1990 की दीपावली को। तब विश्व हिंदू परिषद ने सनातन समाज को जगाने के लिए रोशनी के इस त्योहार का सहारा लिया था। विश्व हिंदू परिषद ने तय किया था कि एक दीपक से पूरे देश के सनातनी घरों का दीप जलाएंगे। इस तरह देश को एकता के सूत्र में जोड़ने में इस अभियान ने गहन भूमिका निभाई। उस दीपावली के दिन पूर्वी उत्तर प्रदेश में तेज पछुआ हवा चल रही थी। लेकिन विश्व हिंदू परिषद के आह्वान पर बाल्टियों और बर्तनों में छुपाकर स्वयंसेवी दीपक लेकर गांवों, मोहल्लों और ढाणियों तक पहुंचे थे और वहां दीप जलाया था। इस अभियान में जातियों की सीमा टूट गई थी। खुद को उच्च बताने वाली जातियों के कार्यकर्ता भी दलितों और पिछड़ों के घर पहुंचे थे। और उस पवित्र दिन को झोपड़ियों तक को एक ही दीये से रोशन करने में योगदान दिया था।

पौने पांच सौ साल तक चले राम मंदिर संघर्ष पर जितने सवाल बीसवीं और इक्कीसवीं सदी में उठे, उतने पहले नहीं उभरे। इक्कीसवीं सदी में जन्मे और तेजी से उभरे सोशल मीडिया ने इस मोर्चे पर दोहरी भूमिका निभाई। शुरू में तो उसने देवत्व दिखाया और सकारात्मक प्रभाव डाला। लेकिन जैसे-जैसे इसकी ताकत बढ़ती गई, वैसे-वैसे इसका दनुज रूप उभरता गया। जीवन के हर पहलू में इसकी दखल बढ़ती गई। ऐसे में एक वर्ग ऐसा भी उभरा, जिसने गर्वीली घटनाओं में भी नकारात्मक संदेश देखना शुरू किया। ऐसे में राम मंदिर के लिए शुरू हुए निधि संग्रह अभियान पर सवाल उठना ही था। राममंदिर जैसे आंदोलनों पर सवाल उठाने का मकसद हिंदुत्ववादी विचारधारा को दकियानूस आधार पर कमतर साबित करना बीसवीं सदी का शगल रहा, सोशल मीडिया वाली इक्कीसवीं सदी में इसे और बढ़ावा ही मिला। लेकिन इसके समानान्तर इसी सोशल मीडिया के सहारे एक और धारा भी चलती रही। जिसने राममंदिर आंदोलन को सांप्रदायिकता के खांचे से अलग राष्ट्रीयता के उभार और भारतीय स्वाभिमान एवं मनीषा के जागरण के प्रतीक के रूप में भी देखना शुरू किया। इस सोच को जनता के बड़े हिस्से का जैसे-जैसे समर्थन बढ़ता गया, वैसे-वैसे राममंदिर आंदोलन को लेकर उसके विरोधियों का भी विचार बदला है। इसके बावजूद दुर्भाग्यवश राम मंदिर आंदोलन के दौरान समाज और राष्ट्र को जोड़ने वाले कई सकारात्मक प्रयासों को भुला दिया गया है। निधि संग्रह के दौरान ऐसे सभी सकारात्मक प्रयासों को याद करना जरूरी है। नई पीढ़ी को यह भी बताना जरूरी है कि इस आंदोलन ने ही समाज को एक साथ खड़ा होने का बड़ा आधार दिया। राजनीतिक उलटबांसियां ना होती तो जाति की दीवार तोड़ने में भी इस आंदोलन ने बड़ी भूमिका निभाई है।