विश्व हिन्दू परिषद और वेद शिक्षा

-चम्पतराय

महामंत्री, विश्व हिन्दू परिषद

बात अक्टूबर, 1991 की है, मेरा केन्द्र अयोध्या घोषित हुआ और दायित्व घोषित हुआ उत्तर प्रदेश का सह क्षेत्र संगठन मंत्री, तब उत्तराखण्ड राज्य की रचना नहीं हुई थी। उत्तर प्रदेश के क्षेत्रीय संगठन मंत्री थे एक वरिष्ठ प्रचारक ठाकुर गुरुजन सिंह जी, जो आज संभवतः 93 वर्ष की आयु में हैं और प्रयागराज में ही महावीर भवन में रहते हैं।

प्रथम विश्व वेद सम्मेलन

एक दिन माननीय अशोक सिंहल जी ने माघ मेला प्रयागराज में संगमतट पर विश्व वेद सम्मेलन करने की इच्छा प्रकट की और मुझे उसकी व्यवस्था देखने के लिए कहा। सहज रूप से मैंने स्वीकृति दे दी परन्तु वेद सम्मेलन यानि क्या ? यह मैं जानता नहीं था। मुझे यह भी कहा गया कि कलकत्ता निवासी श्री सत्यनारायण जी भागचन्दका, श्री गोपालभाई आशर, काशी निवासी श्री विश्वनाथ देव जी तथा आचार्य रामनाथ जी सुमन (अब चारों ही स्वर्गवासी) इस कार्य में आवश्यक सहयोग और मार्गदर्शन करेंगे। चारों को मैं जानता और पहचानता था। स्वर्गीय विश्वनाथ देव जी तो काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में वेद विभाग के अध्यक्ष थे, वेदमूर्ति कहलाते थे। उनसे वेद सम्मेलन की कल्पना जानने मैं काशी गया। जो कुछ वे बोलते रहे वह डायरी पर लिखता गया। बातचीत का सारांश था कि-

1. सम्मेलन में वेद मंत्रों का उच्चारण होगा, चारों वेदों की जिन-जिन शाखाओं के वेदज्ञ सम्मेलन में आएंगे वे अपनी-अपनी शाखाओं के अनुसार वेद मंत्रों का उच्चारण करेंगे। उनके लिए अलग-अलग वेदियाँ बनाई जाएंगी। दूरी इस प्रकार हों ताकि मंत्रों की ध्वनि आपस में बाधक न बने।

2. एक यज्ञ मण्डप बनेगा जिसमें चारों वेदों के मंत्रों के साथ आहुतियाँ दी जाएंगी।

3. वेदों में जिन विषयों का वर्णन है उनमें से कुछ विषयों पर गोष्ठियाँ होंगी, इनमें वैदिक विद्वान अपने विषयों का प्रतिपादन करेंगे।

4. वेद मंत्रों के विषयों को चित्रों के द्वारा चित्रित करके प्रदर्शनी लगाएंगे।

सारा विषय श्री अशोक जी व आचार्य रामनाथ जी सुमन को बताया गया। आचार्य सुमन जी उन सब स्थानों पर गए जहाँ-जहाँ वेदज्ञ रहते थे। वे केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक, आन्ध्र, महाराष्ट्र व काशी गए, वेदज्ञों से भेंट की। किन-किन शाखाओं के कौन-कौन वेदज्ञ सम्मेलन में भागीदारी करने के लिए प्रयागराज आएंगे, उनके नाम, पते, आयु वे अपने साथ लेकर आए। अपने स्थान से प्रयागराज आने और वापस जाने के लिए रेल टिकट बनवाने की व्यवस्था कौन करेगा ? विश्व हिन्दू परिषद का कौन कार्यकर्ता इनके साथ आएगा, यह सब योजना आचार्य सुमन जी ने की। आचार्य सुमन जी विश्व हिन्दू परिषद में केन्द्रीय मंत्री थे। संस्कृत के प्रचार-प्रसार का दायित्व उनके पास था। वे व्याकरण के विद्वान थे। केवल शब्दों की ही नहीं अपितु अक्षरों की भी व्याख्या कर देते थे।

आचार्य रामनाथ सुमन जी के सहयोगी तथा संस्कृत कार्य के लिए ही परिषद में केन्द्रीय सहमंत्री आचार्य राधाकृष्ण मनोड़ी जी को गोष्ठियों का दायित्व संभाला। वेदों में विज्ञान, वेदों में गणित, वेदों में चिकित्सा, वेदों में विश्व शान्ति जैसे विषय गोष्ठी के लिए चयन किए। आचार्य मनोड़ी जी ने अनेक विश्वविद्यालयों में वेद एवं संस्कृत के विद्वानों से सम्पर्क किया, वे किस विषय पर अपना लिखित वक्तव्य प्रस्तुत कर सकते हैं, यह सुनिश्चित किया। अनेक विश्वविद्यालयों से विद्वान इन गोष्ठियों में आए। आचार्य मनोड़ी जी ने गोष्ठियों का संचालन किया था।

विश्व हिन्दू परिषद के एक और केन्द्रीय मंत्री थे श्री सन्तोष जी त्रिवेदी (अब स्वर्गीय) वे उज्जैन के निवासी थे, संघ के प्रचारक थे, कलात्मक रुचि के थे, हिन्दू पर्व समन्वय का कार्य उनकी ओर था। एक दिन वे अपने साथ उज्जैन निवासी एक युवक को लेकर आए और कहा कि यह युवक वेद मंत्रों पर प्रदर्शनी तैयार करेगा। मैं स्वयं तो वेदों के बारे में कुछ जानता ही नहीं था अतः शंका करने का कोई आधार मेरे पास नहीं था, जिसने जो मुझे कहा वह मैं स्वीकार करता रहा। (उस युवक का नाम है ‘सत्यनारायण मौर्य’, जो आज विश्वभर में अपनी कला के लिए विख्यात है)।

प्रयाग में ही श्री बैकुण्ठनाथ जी भार्गव (अब स्वर्गीय) के द्वारा कीटगंज में प्रदत्त भवन में विश्व हिन्दू परिषद का कार्यालय था। कार्यालय के बगल में ही स्थित भार्गव जी का अतिथि गृह सत्यनारायण मौर्य का केन्द्र बना। रात-दिन जुटकर सत्यनारायण मौर्य जी ने प्रदर्शनी तैयार कर दी। अद्भूत है उनकी चित्रकला। जहाँ उनकी तूलीका चल जाती है, वहाँ ही चित्र बन जाता है।

सम्मेलन की व्यवस्थाओं में लगे थे इलाहाबाद के फिजिशियन डॉ0 बी. एल. अग्रवाल, श्री राधेश्याम रस्तौगी, उच्च न्यायालय में सेवारत न्यायाधीश की धर्मपत्नी श्रीमती गिरिजा सिंह, कर्नल के. सी. पंत (सेवानिवृत्त), श्री देवेन्द्रपाल माथुर व अन्य अनेक राजकीय सेवा से निवृत्त पदाधिकारी, जो सभी विश्व हिन्दू परिषद के कार्य में जुटे थे। एक युवा कार्यकर्ता श्री राकेश श्रीवास्तव का नाम भी उल्लेखनीय है, वह इलाहाबाद से वाराणसी हर दूसरे अथवा तीसरे दिन जाकर रेलवे टिकट बनवाकर लाते थे। विश्व हिन्दू परिषद कार्यालय कीटगंज पर बैठकर ठाकुर गुरुजन सिंह जी सब व्यवस्थाओं की देखभाल करते थे। सम्मेलन सम्पन्न कराने का उनका लम्बा अनुभव था। सम्मेलन के लिए माघ मेला के परेड मैदान में स्थान आबंटित कराया गया था। सम्मेलन फरवरी, 1992 के प्रथम सप्ताह में हुआ था।

हरिद्वार के वृन्दावन टेन्ट हाउस को आवासीय व्यवस्था के लिए कलकत्ता के कार्यकर्ताओं ने निर्धारित किया था। सम्मेलन के लिए मैदान पर कहाँ क्या बनेगा, इसका रेखाचित्र इलाहाबाद में ही निवास करने वाले सेवानिवृत्त इंजीनियर श्री सत्यवीर जी ने तैयार किया था। रेखाचित्र के अनुसार तम्बू, शामियाने लगने प्रारम्भ हो गए, एक-दो दिन काम हुआ परन्तु अपने स्वभाव के अनुसार तीव्र वर्षा हुई और सब धाराशायी हो गया। मैदान के बहुत बड़े हिस्से में पानी भर गया। किसी तरह वह पानी हटा, सारा ढांचा फिर से खड़ा किया गया, सम्मेलन निर्धारित तिथि पर प्रारम्भ हुआ।

सम्मेलन में चारों वेदों की 10 शाखाओं के 600 वेदज्ञ पधारे थे। 8 विषयों पर गोष्ठियाँ हुई थीं। अनेक विश्वविद्यालयों के विद्वानों ने अपने लिखित वक्तव्य प्रस्तुत किए थे। भारत सरकार के सेवानिवृत्त प्रशासनिक अधिकारी श्री किरीट जोशी जी (आई.ए.एस), विख्यात संविधानवेत्ता श्री लक्ष्मीमल जी सिंघवी (अब स्वर्गीय) तथा डॉ0 मुरलीमनोहर जी जोशी भी गोष्ठी सत्रों में पधारे थे। सभी कार्यकर्ताओं के लिए, माघ मेला में आने वाले समाज के लिए, सन्त-महापुरुषों के लिए, प्रशासनिक अधिकारियों के लिए, सभी के लिए यह एक नये प्रकार का आयोजन था। सभी प्रसन्न थे और चकित भी थे। तभी यह बात ध्यान में आई कि दक्षिण के चार राज्य और महाराष्ट्र के अतिरिक्त देश के किसी राज्य में वेद मंत्रों को गुरु-शिष्य परम्परा के अन्तर्गत कंठस्थ कराने की पाठशाला नहीं है। काशी में भी जो वेद मंत्र कंठस्थ करते थे, वे सब महाराष्ट्र मूल के युवक थे। वेदमंत्रों का ऑडियो रिकार्डिंग श्री अशोक जी सिंहल के छोटे भाई मुम्बई निवासी श्री पीयूष सिंहल जी (अब स्वर्गीय) ने कराया था। पंचदिवसीय सम्मेलन तो पूर्ण हो गया परन्तु श्री अशोक जी के मन में बीज जम गया कि हम भी वेद पाठशाला प्रारम्भ करेंगे।

वेद पाठशाला प्रारम्भ

महाराष्ट्र निवासी कथाव्यास पूज्य किशोर जी व्यास (संन्यास लेने के पश्चात वर्तमान नाम पूज्य स्वामी गोविन्ददेव गिरि जी महाराज) महाराष्ट्र में वेद पाठशालाएं चला रहे थे। श्री अशोक जी की इच्छा को स्वीकारते हुए स्वामी जी ने महाराष्ट्र की अपनी पाठशाला से एक आचार्य और 10 वेद बटुक (छात्र) दिल्ली भेजे। रामकृष्णपुरम स्थित परिषद कार्यालय के एक भाग में गुरुपूर्णिमा वर्ष 1994 में वेद पाठशाला प्रारम्भ हो गई। पाठशाला में शुक्ल यजुर्वेद की माध्यन्दिनी शाखा के मंत्रों का उच्चारण होने लगा। स्वर्गीय आचार्य रामनाथ सुमन जी धीरे-धीरे गाजियाबाद जनपद के अपने परिचित ग्रामों से वेद पढ़ने के लिए छात्रों को लाने लगे। कांची कामकोटि पीठ द्वारा दिल्ली के कटवारिया सराय क्षेत्र में स्वयं के आश्रम में चलाए जा रहे वेद विद्यालय से पढ़े श्री चन्द्रभानु जी शर्मा को आचार्य रूप में रख लिया गया। कुछ दिनों बाद एक अन्य वेदपाठी रामकुमार जी शर्मा भी वेदाचार्य के रूप में रख लिए गए। लगभग एक वर्ष बाद आचार्य किशोर जी व्यास द्वारा भेजे गए छात्र और आचार्य सम्मानपूर्वक वापस भेज दिए गए।

बद्रीभगत झण्डेवाला टेम्पल सोसायटी के अध्यक्ष श्री प्रेम कपूर जी (अब स्वर्गीय) को वेद पढ़ाने का यह कार्य बहुत अच्छा लगा। जब उन्होंने सारा इतिहास सुना तो वे बोल पड़े कि यह तो भारतीय संस्कृति के बीज की रक्षा का कार्य है। दिल्ली-लोनी-गाजियाबाद सीमा पर मण्डोली गांव के पास एक भूखण्ड खरीद कर वेद पाठशाला के लिए एक भवन बद्रीभगत झण्डेवाला टेम्पल सोसायटी की ओर से तैयार करवाया गया। अन्ततः विद्यालय संकट मोचन आश्रम, रामकृष्णपुरम, नई दिल्ली से अपने नवनिर्मित भवन में स्थानान्तरित हो गया। झण्डेवाला टेम्पल सोसायटी ने विद्यालय को सब प्रकार से अंगीकार कर लिया। यह वेद पाठशाला आज भी कार्यरत है।

द्वितीय विश्व वेद सम्मेलन

जनवरी, 1996 से मेरा केन्द्र दिल्ली घोषित हो गया और दायित्व घोषित हुआ केन्द्रीय सहमंत्री (कार्यालय)। श्री अशोक जी कुछ दिन के लिए श्री वासुदेव जी अग्रवाल के दिल्ली में ही पंजाबी बाग स्थित निवास पर विश्राम करने गए। संभवतः वेदों के सम्बन्ध में चर्चा चली होगी। विश्राम से वापस कार्यालय लौटने पर श्री अशोक जी ने दिल्ली में वेद सम्मेलन आयोजन की चर्चा की। इस द्वितीय विश्व वेद सम्मेलन के आयोजन की तिथियाँ दिसम्बर, 1998 के प्रथम सप्ताह में निश्चित की गई। यह सम्मेलन भी पांच दिवसीय रहा। सम्मेलन के पूर्व पूज्य किशोर जी व्यास ने ‘‘विश्व वेद संस्थान’’ के नाम से एक न्यास का गठन दिल्ली में किया। यह सम्मेलन इसी न्यास के अन्तर्गत हुआ। स्वयं श्री वासुदेव जी अग्रवाल इसके अध्यक्ष बने। उन्हीं के भांजे श्री रोशनलाल जी अग्रवाल (अब स्वर्गीय) संस्थान के कोषाध्यक्ष बनाए गए। दिल्ली के आर्य समाज के प्रमुख पदाधिकारी तथा लालबहादुर शास्त्री संस्कृत विद्यापीठ, कटवारिया सराय के उपकुलपति श्री वाचस्पति जी उपाध्याय (अब स्वर्गीय) इस संस्थान से जुड़े। आचार्य सुमन जी ने पूर्ववत् देश का भ्रमण करके वेदज्ञों को निमंत्रित किया तथा आचार्य मनोड़ी जी ने वैदिक गोष्ठियों की तैयारी पहले के समान की। श्री सत्यनारायण जी मौर्य ने और अधिक परिष्कृत रूप में वेद प्रदर्शनी मुम्बई के कार्यकर्ताओं के आर्थिक सहयोग से तैयार की। चारों वेदों के मंत्रों से होमात्मक यज्ञ हुआ। दो आयाम और जुड़े – (1) वेद कथाएं – स्वयं किशोर जी व्यास ने व्यासपीठ पर बैठकर चार दिन वेदों में आई कथाओं का रसपान श्रोताओं को कराया। (2) वेद मंत्रों का कम्प्यूटर से उच्चारण – हैदराबाद की एक संस्था ने वेद मंत्रों के स्वर को कम्प्यूटर में सुरक्षित किया था। उस संस्था के पदाधिकारी उस कम्प्यूटर को लेकर सम्मेलन में आए थे। ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य पूज्य स्वामी वासुदेवानन्द सरस्वती जी महाराज, मणिरामदास छावनी-अयोध्या के श्रीमहंत नृत्यगोपालदास जी महाराज, श्री किरीट जोशी, डॉ0 मुरलीमनोहर जोशी, श्री भानुप्रताप शुक्ल सरीखे प्रमुख महानुभाव सम्मेलन में भिन्न-भिन्न अवसरों पर पधारे थे। इस बार तो प्रसन्नता हुई कि चारों वेदों की 11 शाखाओं के विद्वान सम्मेलन में आए। पिप्पलाद शाखा के इकलौते विद्वान उड़ीसा से आए थे। गुजरात तथा बद्रीभगत झण्डेवाला टेम्पल सोसायटी द्वारा संचालित पाठशाला के छात्र भी सम्मेलन में थे। 33 वेदज्ञ ऐसे थे, जिनके परिवारों में कुल परम्परा से वेद मंत्रों की रक्षा की जा रही थी। इस सम्मेलन को सफल बनाने के लिए महर्षि सान्दीपनी राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान-उज्जैन (भारत सरकार का उपक्रम), उत्तर प्रदेश व हिमाचल प्रदेश की राज्य सरकार, तिरुपति तिरुमला देवस्थानम् ने अपना आर्थिक सहयोग प्रदान किया। यह सम्मेलन राजागार्डन में शिवाजी कालेज के सामने के मैदान पर सम्पन्न हुआ। विश्व हिन्दू परिषद के ही कार्यकर्ता श्री सन्तराम जी गोयल, श्री अमृतलाल जी शर्मा तन-मन से सम्मेलन की व्यवस्थाओं में जुटे थे। यह सम्मेलन दिल्ली की जनता के लिए अनोखा रहा।

सम्मेलन का यह लाभ मिला कि वेद पाठशालाओं की संख्या बढ़ने लगी। बद्रीभगत झण्डेवाला टेम्पल सोसायटी द्वारा संचालित वेद पाठशाला से वेदमंत्र सीखे छात्रों ने इलाहाबाद, अयोध्या, कानपुर, काशी में आचार्य रूप में वेद पाठशालाएं प्रारम्भ कीं। सभी स्थानों पर पाठशालाओं की देखभाल के लिए स्थानीय सज्जनों की प्रबन्ध समिति बनी। काशी की पाठशाला स्वर्गीय विश्वनाथ देव जी के नाम से चल रही है और इसकी व्यवस्था देखभाल पूज्य स्वामी गोविन्ददेव गिरि जी महाराज के काशी के शिष्य करते हैं। कानपुर की वेद पाठशाला की देखभाल योगक्षेम सेवा न्यास-कानपुर करता है, इस पाठशाला का नाम राम-कृष्णा वेद विद्यालय है। अयोध्या की पाठशाला का नाम श्रीराम वेद विद्यालय है, यह कारसेवकपुरम में चलता है, विद्यालय संचालन के लिए महर्षि वसिष्ठ विद्या समिति नाम से स्वतंत्र समिति का पंजीकरण कराया गया है। मणिरामदास छावनी के वर्तमान महंत पू0 कमलकिशोरदास जी महाराज समिति के अध्यक्ष एवं बड़ा भक्तमाल मन्दिर के महंत कौशलकिशोरदास जी महाराज समिति के उपाध्यक्ष हैं। इलाहाबाद में वेद विद्यालय चलाने के लिए श्री हरिसिंह महेश्वरी जी एवं उनके भाइयों ने अपना पैतृक भवन श्री अशोक जी को समर्पित किया। यह भवन पन्नालाल मार्ग पर केसर भवन के नाम से जाना जाता है और विद्यालय का नाम ‘महर्षि भरद्वाज वेद विद्यालय’ है। श्री आशानारायण जी टण्डन पहले दिन से ही इस विद्यालय के पालक हैं यद्यपि इसके संचालन के लिए एक स्वतंत्र समिति पंजीकृत है।

कालान्तर में हरिद्वार में निवृत्तमान जगद्गुरु शंकराचार्य महामण्डलेश्वर पूज्य स्वामी सत्यमित्रानन्दगिरि जी महाराज के आश्रम समन्वय कुटीर में ‘समन्वय वेद विद्यालय’ तथा जम्मू में स्थानीय समाज की इच्छा से पूज्य स्वामी गोविन्ददेव गिरि जी महाराज ने ‘महाराजा प्रताप सिंह वेद विद्यालय’ प्रारम्भ किया। दोनों विद्यालयों में बद्रीभगत झण्डेवाला टेम्पल सोसायटी द्वारा संचालित वेद विद्यालय के छात्र ही आचार्य रूप में सेवारत हैं। सभी विद्यालयों में शुक्ल यजुर्वेद की माध्यन्दिनीय शाखा के 40 अध्यायों के 1975 मंत्रों को कंठस्थ कराया जाता है।

विद्यालय का स्वरूप

वेद पाठशाला के लिए न्यूनतम कक्षा 6 उत्तीर्ण, 11 अथवा 12 वर्ष आयु का बालक लिया जाता है। बालक हकलाता-तुतलाता न हो, उच्चारण शुद्ध हो, कंठस्थ करने की क्षमता हो। प्रारम्भ में एक वर्ष तक गीता पाठ, देवी-देवताओं के स्तोत्र, त्रिकाल संध्या का अभ्यास कराया जाता है। इस एक वर्ष में बालक के स्वभाव व क्षमताओं की भी जानकारी हो जाती है। तत्पश्चात् यज्ञोपवीत संस्कार होता है। इसी संस्कार के बाद वेदमंत्र कंठस्थ कराने का कार्य प्रारम्भ करते हैं। एक आचार्य अधिक से अधिक 10 छात्रों को ही वेदमंत्र कंठस्थ करा सकता है। यह श्रुति परम्परा है। वेदमंत्र के स्वर को सुनकर कंठस्थ करना होता है। मंत्र का स्वर ही महत्वपूर्ण है, स्वर ही मंत्र का प्राण है, यही परिणामकारी है, स्वर से ही मंत्र में निहित भाव की अनुभूति की जा सकती है, इसलिए स्वर ही महत्वपूर्ण है। इन मंत्रों के रचयिता ऋषियों ने मंत्रों का सृजन नहीं अपितु दर्शन किया। इस कारण वे मंत्रदृष्टा कहलाए। सामान्यतया 6 वर्ष में एक बालक इन मंत्रों को कंठस्थ कर लेता है। तत्पश्चात 108 पारायण करने से ये मंत्र अस्थिमज्जागत हो जाते हैं, मंत्रोच्चारण करते समय पोथी देखनी नहीं पड़ती। इन छात्रों की परीक्षा होती है, परीक्षा लिखित नहीं है, मात्र मौखिक है। मंत्र का उच्चारण, उच्चारण की शुद्धि, स्वर, हस्त-संचालन, मत्रोच्चार के समय मुखाकृति आदि ही परीक्षा के विषय हैं। महर्षि सान्दीपनी राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान-उज्जैन के प्रतिष्ठित विद्वान छात्रों की परीक्षा लेते हैं। हमारी पाठशालाओं से पढ़कर लगभग 50 छात्र समाज जीवन में कहीं न कहीं स्थापित हैं। आज भी 150 छात्र अध्ययनरत हैं।

वेदांग विद्यालय

वेद मंत्रों को समझने के लिए 6 विषयों का ज्ञान और चाहिए, वे हैं- छन्द, कल्प, ज्योतिष, निरुक्त, शिक्षा और व्याकरण। इन्हें षड़ंग कहा गया है। यदि वेद को एक पुरुष मान लें तो, छन्द को वेद का पैर, कल्प को हाथ, ज्योतिष को आंख, निरुक्त को कान, शिक्षा को नासिका और व्याकरण को वेद का मुख माना गया है।

मंत्र के स्वर, वर्ण व शुद्ध उच्चारण आदि का ज्ञान शिक्षा के माध्यम से प्राप्त होता है। वेद मंत्रों में शुद्ध उच्चारण महत्वपूर्ण है। स्वर बदलने से अर्थ बदल जाता है, मंत्र विपरीत परिणाम देता है। मंत्र के पद्य भाग का ज्ञान छन्द से होता है। प्रत्येक मंत्र किसी न किसी छन्द के अन्तर्गत है। प्रत्येक छन्द में अक्षरों की संख्या निश्चित रहती है। शब्द की उत्पत्ति कैसे हुई, इसकी जानकारी निरुक्त देता है, मंत्रों में प्रयुक्त हुए कठिन शब्दों का संग्रह निरुक्त में है। वेद मंत्रों में निहित विज्ञान की जानकारी ज्योतिष के माध्यम से प्राप्त होती है। शब्दों का सही अर्थ व्याकरण जानने से निकलता है। कर्मकाण्ड और संस्कारों की जानकारी कल्पसूत्रों से प्राप्त होती है।

वेदांगों के अध्ययन के लिए माननीय अशोक जी सिंहल ने अपने पैतृक भवन परिसर में एक भवन का निर्माण अपने भतीजे मुम्बई निवासी श्री मुकुल सिंहल से कराया, श्री मुकुल जी ने अपने पूज्य पिता स्वर्गीय पीयूष सिंहल जी की स्मृति में यह भवन सन् 2006 में वेदांग अध्ययन के लिए समर्पित किया। इस भवन में वेदांग विद्यालय आज चल रहा है। श्री मुकुल जी इस विद्यालय की आर्थिक आवश्यकताओं की पूर्ति भी करते हैं।

वेद छात्रों के सर्वांगीण विकास के लिए प्रतिवर्ष माघ मास में इलाहाबाद में संगमतट पर 15 दिवसीय शिविर लगाया जाता है। सभी विद्यालयों के छात्र शिविर में आते हैं। शारीरिक विकास के लिए खेलकूद, योगासन, सूर्य नमस्कार का नियमित अभ्यास कराते हैं, आन्तरिक परीक्षा ली जाती है। छोटी-छोटी टोलियों में छात्र विभिन्न विषयों पर चर्चा करते हैं। छात्रों के बीच सन्त-महापुरुषों व अन्य श्रेष्ठ लोगों के प्रवचन होते हैं। छात्रों के बीच भिन्न-भिन्न प्रकार की प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती हैं।

विद्यालयों में बच्चों को अंग्रेजी, गणित व सामाजिक विषयों का अभ्यास भी कराते हैं। संस्कृत विश्वविद्यालयों की परीक्षाओं में छात्र बैठते हैं। अनेकों छात्रों ने शास्त्री (स्नातक) अथवा आचार्य (स्नातकोत्तर) अथवा शिक्षा शास्त्री (बी.एड) परीक्षाएं उत्तीर्ण की हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में अनेक छात्र उच्च शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। झण्डेवाला टेम्पल सोसायटी द्वारा संचालित विद्यालय में वेद मंत्रों के पद-पाठ एवं शतपथ ब्राह्मण का अभ्यास छात्र कर रहे हैं।

वेद मंत्रों के संरक्षण का यह कार्य माननीय अशोक जी के संकल्प का ही सुपरिणाम है। श्री अशोक जी के पिताजी नित्य वेद मंत्रों के उच्चारण से घर में हवन किया करते थे। इसका संस्कार अवश्य श्री अशोक जी के मन पर रहा होगा। श्री अशोक जी के एक आध्यात्मिक गुरु भी थे, उनका नाम था श्री रामचन्द्र जी तिवारी। वे चारों वेदों के मंत्रों का नित्य पारायण करते थे। उनकी असीम कृपा श्री अशोक जी पर रही। गुरुदेव की कृपा से ये वेद पाठशालाएं हैं। वेद भगवान की कृपा बनी रही तो वर्ष 1994 में वेद पाठशाला रूपी रोपा गया बीज आगामी वर्षों में वृक्ष के रूप में दिखाई देगा।