पूज्य संत रविदास

पू.संत रविदास महान संत थे। आप काशी रहते थे और पू.रामानंदाचार्यजी महाराज के शिष्य थे। संत रविदास जी नेे जाति भेद मिथ्या है, यह कहा। जन्म से कोई ऊँच-नीच नहीं होता, कर्म से व्यक्ति बड़ा होता है। उन्होंने कहा, जाति कोई भी हो भगवत् भक्ति सभी का उद्धार करेगी। संत रविदास काफी प्रभावशाली संत थे। संत रविदास अगर मुसलमान बनेंगे तो उनके हजारों अनुयायी भी मुसलमान बनेंगे ऐसा सोचकर उन पर मुसलमान बनने के लिए अनेक प्रकार के दबाव आये। सदना पीर उन्हें मुसलमान बनाने के लिए आया। दोनों का शास्त्रार्थ हुआ। सदना पीर रविदास जी के सामने निरूत्तर हुआ, उसने हिन्दू धर्म की श्रेष्ठता मान ली। रविदास जी की भक्ति और आध्यात्मिक साधना से भी वह प्रभावित हुआ और वह हिन्दू बन गया। रामदास नाम से संत रविदास जी का शिष्य बन गया।
और भी मुसलमान हिन्दू बने। उस समय सिकंदर लोदी सुल्तान था। उसके पास मौलवियों ने शिकायतें की। सुल्तान ने रविदास जी को बन्दी बनाया। मुस्लिम होने के लिए दबाव डाला, कष्ट दिया, प्रलोभन भी दिखाया। संत रविदास टस से मस नहीं हुए। उन्होंने दृढ़ता से हिन्दू धर्म में श्रद्धा, निष्ठा व्यक्त की - ”वेद धरम त्यागूँ नहीं, जो गल चलै कटार।“ धमकी आने पर वे बोले, प्राण तजूँ पर धर्म न देऊँ। परंन्तु बाद में चमत्कार हुआ और सिकंदर लोदी ने क्षमा मांगकर रविदास जी को कारागार से मुक्त कर दिया।
उनका भक्ति भाव देखकर काशी नरेश उनके शिष्य बने। चित्तौड़ की महारानी झाली बाईसा जी, कुलवधू संत मीरा जी उनकी शिष्या बनीं। चित्तौड़ में संत रविदास जी की समाधि है। चित्तौड़ के महाराणा ने मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा के लिए रविदास जी को बुलाया। ब्राह्मण पंड़ितों ने विरोध किया तो भी राजा ने रविदास जी का सम्मान किया।
संत रविदास जी चंवर वंश के क्षत्रिय थे और पिप्पल  गोत्र के थे। संत रविदास जी अपने भजन में कहते हैं - ”जाके कुटुम्ब सब ढोर ढोवंत, आज बारानसी आसपासा। आचार सहित विप्र करहिं दंडवत तिन तनय रैदास दासानुदासा“।। अर्थात रविदास जी के जाति भाई आज वाराणसी के आस पास मरे हुये पशु ढो रहे हैं, परंतु उनके पूर्वज प्रतिष्ठित व्यक्ति थे, जिन्हें ब्राम्हण साष्टांग प्रणाम करते थे। इस क्षत्रिय चंवर कुल को इस तरह नीचे उतारने का काम सिकंदर लोधी ने किया था।
हम सब एक बात ध्यान रखंे कि भारत में इस्लाम के आक्रमण के बाद अस्पृश्यता आयी। पूर्व काल में हमारे ऋषि-मुनि मृगचर्म, व्याघ्रचर्म रखते थे। जंगलो में कोई मृत हिरण या शेर मिलता था तो उसका चमडा उतारना और उसे साफ करने का कार्य वे और उनके शिष्य ही करते थे। परंतु इन ऋषि-मुनियों को हमने चर्मकार (अछूत) नहीं कहा।
हम सूत के, रेशम के वस्त्र पहनते थे और निर्यांत भी करते थे। रस्सी, धागा सूत या रेशम के होते थे। चमडे के जूते नहीं थे, लकडी की खडाऊ होती थी। परंतु अरबस्थान में सूत या रेशम नहीं था। वहाँ चमडे के अधोवस्त्र बनते थे, चमडे के जूते, चमडे की थैली, चमडे की रस्सी और चमडे की जीन होती थी। वहाँ खेती नहीं थी। सभी मांसाहारी थे। जब वे भारत में आये तो ये सब काम उन्होंने भारत में शुरू किया। चमडे की मांग सैकडों गुना बढ गयी। मांसाहार भी सैकडो गुना बढ़ गया। लाखों की संख्या में गाय, बैल और अन्य पशुओं की हत्या होने लगी। गोमांस भक्षक मुस्लिम आक्रांताओं ने बलपूर्वक, जबरदस्ती से परास्त हुए, गुलाम बने हिन्दू बंदियों को इस काम में लगाया। (चमडा उतारना, जूता, चप्पल बनाना, ढाल या अन्य युद्ध सामग्री बनाना आदि) ये चमडे का काम करने वाले हिन्दु बन्दी चर्मकार हो गये - धीरे धीरे अछूत बन गये। जिन्हें पशु काटने का काम करना पडा वे हिन्दु खटीक बन गये और अछूत बन गये। परंतु इन सभी ने अपना हिन्दु धर्म नहीं छोड़ा - ये सारे धर्मयोद्धा हैं।

 

In Malayalam

ഫെബ്രുവരി 16 
ഗുരു രവിദാസ് 
ജയന്തി
 
 
"എൻറെ വീട്ടിലെയും കുടുംബങ്ങളിലെയും അംഗങ്ങൾ ഇപ്പോഴും ബനാറസിന് ചുറ്റും ചത്തുപോയ മൃഗങ്ങളെ  അവയുടെ തുകലിന് വേണ്ടി പൊക്കി എടുക്കുന്ന ജോലിചെയ്യുന്നവരാണ്. എന്നാൽ ഞാൻ ഈശ്വരന്റെ ദാസൻ ആയി ഈശ്വരഭക്തിയിൽ മുഴുകി കഴിയുന്നു. ഇപ്പോൾ  ആചാര്യന്മാരും ബ്രാഹ്മണരും വന്ന് എന്നെ സാഷ്ടാഗം നമസ്കരിക്കുന്നു. ഇതെല്ലാം ഈശ്വരന്റെ അനുഗ്രഹം കൊണ്ട് മാത്രം സാധ്യമായതാണ് "
 
പതിനാലാം നൂറ്റാണ്ടിൽ ജീവിച്ചിരുന്ന  ഭാരതത്തിലെ ഒരു സന്യാസി ശ്രേഷ്ഠന്റെ വാക്കുകളാണിവ.
വരണാസിയിലെ ഒരു ചെരുപ്പുകുത്തി കുടുംബത്തിലാണ്  രവിദാസ് ജനിച്ചത്. അദ്ദേഹത്തിന്റെ ആധ്യാത്മിക സാധനയും സ്വഭാവ വൈശിഷ്ട്യവും വിനയപൂർവ്വമായ പെരുമാറ്റവും കാരണം ആയിരക്കണക്കിനാളുകൾ അദ്ദേഹത്തിന്റെ ശിഷ്യരായി. സന്ത് രവിദാസ് അന്ന് സമൂഹത്തിൽ നിലനിന്നിരുന്ന ജാതി വ്യത്യാസം എന്ന സമ്പ്രദായത്തെ തന്റെ സ്വതസിദ്ധമായ ശൈലിയിൽ വളരെ സ്വാഭാവികമായി വ്യക്തമാക്കിയിട്ടുണ്ട് . "ആരും ജന്മനാ ശ്രേഷ്ഠനോ നീചനോ ആകുന്നില്ല. ഹീന കർമ്മങ്ങളാണ് ഒരുവനെ നീചൻ ആകുന്നത് " എന്ന് അദ്ദേഹം ജനങ്ങളെ പറഞ്ഞു മനസ്സിലാക്കി. 
 
അന്ന് ഭാരതം സിക്കന്തർ ലോധിയുടെ മുഗള ഭരണ വ്യവസ്ഥയ്ക്ക് കീഴിലായിരുന്നു .സന്ത് രവി ദാസിനെ മുസ്ലിമാക്കാൻ ലോധി പല ഉപായങ്ങളും പയറ്റി നോക്കി. കഠിനമായ ശിക്ഷ അനുഭവിക്കേണ്ടി വരുമെന്ന് ഭീഷണി മുഴക്കിയപ്പോഴും സന്ത് രവിദാസ് നിർഭയനായി നിലകൊണ്ടു .
മുസ്ലിം ഭീഷണിയുടെ രൂക്ഷത നിറഞ്ഞുനിന്ന ആ കാലഘട്ടത്തിലും സന്ത് രവിദാസ് യഥാർത്ഥ ഭക്തിയുടെ  അനേകം അനശ്വര ഗീതങ്ങൾ രചിച്ചു.
ഭക്ത മീരയുടെ ഗുരുവായിരുന്ന  സന്ത് രവിദാസ് ആ കാലഘട്ടത്തിൽ ഭാരതത്തെ മുന്നോട്ടു നയിച്ച ആധ്യാത്മിക വ്യക്തിത്വമാണ്.