प्रेस वक्तव्य

नई दिल्ली-23 सितम्बर, 2010

श्रीराम को मिला फिर से एक बार वनवास,

विलम्बित न्याय में देरी न्याय से इंकार

भारत की संसद में कानून ही एक मात्र रामजन्मभूमि पर

मंदिर का मार्ग

विश्व का करोड़ों हिन्दू अपनी श्रद्धा एवं आस्था के केन्द्र भगवान राम की जन्मभूमि पर भव्य मंदिर बनाने की राह देख रहा है। 450 वर्षों में मुसलमानों से सभी वार्ताएं विफल रही है। गत 60 वर्षों से न्यायालय भी न्याय देने में असमर्थ रहा, अब निर्णय की घड़ी आयी थी किन्तु आज सर्वोच्च न्यायालय ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ, जो कि इस मुकदमें की सुनवायी कर रही थी के निर्णय देने पर रोक लगाकर हिन्दुओं की भावनाओं पर कुठाराघात किया है। ऐसा प्रतीत होता है कि रामलला को फिर से एक बार तिरपाल में रहने का वनवास मिल गया है। विश्व के करोड़ों हिन्दुओं के आराध्य श्रीराम की जन्मभूमि सिर्फ सम्पŸिा का विवाद नहीं है अपितु करोड़ों हिन्दुओं की श्रद्धा,आस्था एवं राष्ट्र की अस्मिता का प्रश्न है। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा वाद के प्रमुख पक्षकारों के समझौते से इंकार के वावजूद निर्णय को टाले जाने के कारण हिन्दू समाज अचम्भित है। इस सम्पूर्ण प्रकरण से संतों के इस प्रस्ताव को बल मिला है कि श्रीराम जन्मभूमि पर भव्य मंदिर निर्माण का एक मात्र विकल्प संसद में कानून बनाया जाना ही है।

आगामी 24,25 सितम्बर को संतों की उच्चाधिकार समिति की दिल्ली मंे होने वाली बैठक में किये गए निर्णय के आधार पर हिन्दू समाज मंदिर निर्माण हेतु आगे बढ़ेगा।

हमारा संकल्प है कि भगवान श्रीराम की हम जन्मभूमि पर उनकी गरिमा के अनुरूप मंदिर का निर्माण करके ही दम लेंगे। सम्पूर्ण अधिगृहीत एवं विवादित परिसर सहित भगवान श्रीराम की जन्मभूमि एवं बाल्यकाल की लीला-क्रीड़ा स्थली है। इसमे किसी भी प्रकार का विभाजन हमें स्वीकार नहीं है।

जारीकर्ता

विश्व संवाद केन्द्र

(प्रकाश शर्मा) प्रवक्ता

विश्व हिन्दू परिषद् संकटमोचन आश्रम, (हनुमान मंदिर) से0-6,रामकृष्णपुरम,नई दिल्ली- 110 022

दूर-011-26178992, 26103495 फैक्स-26195527

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