महिला सुरक्षा: कड़े क़ानून और सामाजिक संवेदनशीलता आवश्यक – डॉ. प्रवीण तोगड़िया

प्रेस विज्ञप्ति :

महिला सुरक्षा: कड़े क़ानून और सामाजिक संवेदनशीलता आवश्यक – डॉ. प्रवीण तोगड़िया

कानपूर, दिसंबर २९, २०१२

दिल्ली में सामूहिक बलात्कार की शिकार महिला की मृत्यु से देश-विदेश में शोक के साथ साथ क्रोध की बड़ी लहर आयी है. इस विषय पर बोलते हुए विश्व हिंदू परिषद् के आंतरराष्ट्रीय कार्याध्यक्ष डॉ प्रवीण तोगड़िया ने कहा, “इस महिला की मृत्यु से इतना गंभीर मुद्दा समाप्त नहीं होता. यह कोई राजनीतिक मुद्दा नहीं कि एक पक्ष ने दुसरे पर और आरोप-प्रत्यारोप कर इसे भुनाया जाय. यह एक सामाजिक समस्या है, जो समाज के हर वर्ग को प्रभावित कर रही है. यह एक मानसिकता है, जो भयावह स्वरूप ले रही है. आज युवा पीढ़ी समाजोन्मुख होकर इस विषय को और ऐसे अनेक विषयों को देख-समझ रही हैं, उन के धक्के से मीडिया , क़ानून और राजनीतिक व्यवस्थाओं को हिलना पड़ा है. केवल इससे भी यह समस्या समाप्त नहीं होती. दिल्ली की युवती पर यह भीषण समय लाने वालें उस के गुनाहगारों को तुरंत कड़ी सजा देकर ही उस युवती को और उस के परिवार को एवं उस युवक को भी – जो उस युवती के साथ था और उसे भी पीटा गया था – न्याय मिलेगा. लेकिन ऐसी अनेक घटनाएँ गाँवों – कस्बों में हर रोज हो रही है. दलित, वनवासी, गरीब, नाबालिग – बालिग़ कन्याओं-महिलाओं पर कई स्थानों पर गत कुछ वर्षों से बलात्कार की घटनाएँ बढ़ गयी हैं. क्यों बढ़ी, यह सामाज शास्त्र के अभ्यास का विषय होगा; लेकिन जो घटनाएँ हुयी हैं और हो रही हैं उन में लिप्त गुनाहगारों को कड़ी सजा तुरंत मिलें ऐसे प्रावधान संविधान में करना आवश्यक हो गया है. बलात्कारित महिला की जाती, सामाजिक स्थान, भाषा, उम्र, व्यवसाय आदि से बलात्कार की घिनौनी वारदात को मापना, उसी आधार पर मीडिया में उसे उठाना या दबाना, उसी आधार पर राजनीतिक – सामाजिक संघटनों ने उस की दखल लेना यह कोई न्याय की परिभाषा नहीं. उत्तर प्रदेश के प्रतापगड के पास अस्थान गाम की दलित नाबालिग गरीब लड़की हो – जिस पर ४ लोगों ने अमानुष बलात्कार कर उसे जिंदा जला दिया, या पुणे में कार्यरत बी.पी.ओ में काम करनेवाली पढ़ी लिखी महिला हो, या सूरत में दसवी कक्षा में पढनेवाली ट्यूशन जाने के लिए सुबह निकली नाबालिग कन्या हो जिसे ४ लोगों ने गाडी में जबरन उठाकर बलात्कार कर रस्ते पर उसी तरह फेंक दिया जिस तरह दिल्ली में हुआ… ऐसी अनेक घटनाएँ हैं, जो किसी मीडिया पर एक भी स्क्रोल तक नहीं बनती या कोई राजनीतिक पक्ष अपने अपने कारणों से उन्हें दबा देते हैं – ये सभी अन्याय एक ही मानसिकता से आते हैं. महिलाओं के प्रति ‘उपभोग की वस्तु’ के नाते देखना और समाज के कई वर्गों ने ‘जाने डॉ, मुझे क्या लेना देना’ मानकर अपने अपने कामों में लग जाना . जब तक यह मानसिकता पुरुष और समाज भी नहीं बदलेंगे तब तक १०० गुनाहगारों को भी सजा हो तो भी महिलाओं पर अत्याचार होते ही रहेंगे.”

डॉ तोगड़िया ने मांग की :

१) हमारे अभी के क़ानून के कारण बलात्कार सिद्ध करना असंभव हो जाता है अगर बलात्कारित की तुरंत वैद्यकीय चिकित्सा न हो और उस की रिपोर्ट सही न लिखी जाय. यही शुरुआत में ही उस महिला की ‘केस’ तोड़ी जाती है. कभी स्थानीय दबंगों द्वारा या कभी राजनीतिक पक्षों द्वारा तो कभी पोलिस द्वारा यह होता है. इसलिए घटना के बाद तुरंत किसी के भी प्रभाव से दूर ऐसी वैद्यकीय चिकित्सा के लिए केंद्र बनाने चाहिए जो किसी अस्पताल से जोड़े हो. उन केन्द्रों की व्यवस्था महिला डॉक्टरों पर सौंपी जाय जो सरकारी नौकर न हो. समाज के अन्य सन्माननीय व्यक्ति – वकील आदि भी इन केन्द्रों की कुशलता और निर्भीकता का ध्यान रखें. कई बार छोटे गाँवों में बलात्कार की घटनाएँ होती हैं तब आस पास कोई वैद्यकीय सुविधाएँ नहीं होती. जिले के अस्पताल में जाने तक सभी सबूत मिट जाते हैं और महिला के परिवार के लोग भी समाज के, पोलिस के या अन्य दबंगों के प्रभाव में पीछे हट जाते हैं. महिला सुरक्षा एवं वैद्यकीय चिकित्सा केन्द्रों से महिलाओं को तुरंत उपचार भी मिलेंगे और इन की केस भी कड़ी रहेगी.

२) आज भी हमारे संविधान में कुछ हद तक कड़ी सजा के प्रावधान कुछ केसों के लिए हैं, लेकिन वे प्रावधान इतने धुंधलें हैं की गुनाहगारों को ही उन का लाभ मिलता है और पीड़ित न्याय से वंचित रह जाती हैं. इसलिए, एक सशक्त क़ानून बनाने के लिए सामाजिक संघटन, वकील, डॉक्टर, निवृत्त न्यायाधीश, पोलिस अधिकारी, सामाज शास्त्र आदि के जानकारों की समिति बनायी जाय जिस में युवा प्रतिनिधि भी हो जो किसी भी राजनीतिक पक्ष से संबंधित न हो. आज के युवाओं में विचार करने की उच्च शक्ति दिखती है और अपने विचार निर्भयता से रखने की उन्हें इच्छा भी हैं. युवतियाँ आज अनेक कामों के लिए बाहर जाती हैं, पढ़ती हैं, उन्हें जो अनुभव आते हैं, उन को ध्यान में लिया जाय तो यह क़ानून सशक्त होगा. महिलाओं का एक वर्ग हमेशा इन विषयों के विचार में उपेक्षित रहता है – गृहिणी. माता, पत्नी, भगिनी के नातें वह अनेक स्थानों पर जाती हैं. सब्जी – फल खरीदने, बच्चों को शालाओं में छोड़ने – लेने, बेंक – पोस्ट में जाती हैं, घर में रहती हैं तब भी अनेक लोग घर के दरवाजे पर आते हैं – दूध, पेपर, कुरिअर, पोस्टमैन, परिचित ‘अंकल’ आदि. उन्हें अनेक ऐसी स्थितियों का सामना करना होता है को किसी बलात्कार से बहुत कम घिनौनी नहीं होती. उन के अनुभव का भी समावेश इस समिति ने अवश्य क़ानून बनाते समय करना चाहिए. जब यह सब कर क़ानून का मसौदा तैयार हो तब देश की जनता के भी विचार उस पर लेने के लिए खुला कर देना चाहिए और जब वह भी कार्य पूर्ण हो तब सभी राजनीतिक दलों ने एक होकर उसे ‘पास’ करना चाहिए, तभी कुछ होगा.

३) केवल क़ानून बनाने से भी न्याय नहीं मिलते. उन पर कड़ाई से अमल होना जरुरी होता है. पोलिस थानों पर ही आधे से अधिक बलात्कार के मुकदमें तोड़ दिए जाते हैं, कभी दबाव से, कभी ‘परिवार क्या मुँह दिखाएगा’ ऐसा डर दिखा कर तो कभी धमकियों से. इसलिए महिलाओं और बच्चों से संबंधित सभी विषयों के लिए अलग पोलिस थाने हो जिन में महिलायें – वे भी ठीक से प्रशिक्षित – हो जो संवेदना से बातों को देखें.

४) भारत में जब ऐसी घटनाएँ होती हैं, तब देखा गया है कि उन पर न्याय से अधिक राजनीति हावी हो जाती है. पीड़ित या गुनाहगार की जाति, समाज, भाषा, राज्य, आर्थिक स्थिति आदि देखकर मीडिया, राजनीतिक पक्ष, सामाजिक संघटन आदि उन्हें ‘उठाती’ हैं या ‘दबा’ देती हैं. यह भयावह है. सूरत की २ वर्ष ५ महीने की छोटी बच्ची हो या हरयाना, बंगाल की महिला, या दिल्ली की छात्रा हो या मुंबई की बड़ी अफसर, बलात्कार एक ने किया हो या अनेकों ने, उस महिला का जीवन यह घटना झिंझोड़ देती है, उस के तन-मन पर आघात करती है. बलात्कार या छेड़खानी के बाद महिला की जान बची तो भी उसे जीवन मृत्युवत लगे इस तरह समाज उसे ताने देता है. कुछ महिलाएँ डर से या समाज ने जबरन तैयार कि हुयी शर्म से आत्महत्या कर लेती हैं, जब कि उस घटना में उस का कोई भी दोष नहीं होता . इन सभी में किसी ने राजनीति नहीं करनी चाहिए. मानवाधिकार और महिला आयोग पर ऐसे किसी को न रखा जाय जो किसी भी राजनीतिक पक्ष से जुड़े हो तभी न्याय की दिशा में महिलाएँ आगे आएगी.

५) पीड़ित का नजदीकी समाज, गाम, पडोसी, स्नेही, रिश्तेदारों का भी काउंसेलिंग करना जरुरी है कई बार वे तो वे शर्म से चूप होते हैं, या पीड़ित को न्याय माँगने से चूप कराते हैं या तानें देते रहते हैं. भारत की सामाजिक-सांस्कृतिक सोच इतनी भी संकुचित नहीं कि जिसने दुःख झेलें हैं उसे ही गुनाहगार की तरह रखें! इन सभी के लिए कौन्सेलिंग केंद्र और फिर पीड़ितों के लिए पुनर्वास प्रणाली भी तैयार करने होंगे . किसी अलग हॉस्टल में उन्हें रखने से यह नहीं होगा, समाज के विचारों में परिवर्तन कर उन्हें साथ लेकर ‘नॉर्मल’ जीवन जीने की उम्मीद उन में निर्माण करनी होगी. सरकार ही सब करें यह अपेक्षा करना उचित नहीं. हम सभी ने मिलकर यह कार्य करना होगा.

६) धोखा है, ऐसी स्थिति जब महिला के ध्यान में आती है तब उसे तुरंत मदद मिले ताकि वह बलात्कार, छेड़खानी से बच सकें यह केवल एक कॉल नंबर देने से नहीं होगा. आस पास के सामान्य लोगों ने भी उसमें योगदान देना होगा. गौहत्ति के रास्ते पर या मेरठ की गलियों में जब कईयों युवा एक युवती को छेड़ रहे थे, तब भीड़ केवल देख रही थी, दिल्ली में भी बलात्कारित छात्रा ३ घंटें रस्ते पर जख्मी पड़ी रही. समाज में डर है कि मदद करने जायेंगे तो पोलिस सताएगी या कोई मार डालेगा. इस डर से समाज यस देश आगे नहीं बढ़ते. आज अपरिचित महिला की मदद नहीं करेंगे तो घर जाकर अपनी माँ बहन पत्नी बेटी को क्या मुँह दिखाएँगे यह सोच ही हमें सबल बनाएगी और गुनाहगारों के मन में खौफ पैदा करेगी. अब ऐसी घटनाओं में क़ानून हाथ में लेने की जरुरत नहीं होती, केवल एक फोन कॉल पर, व्यवस्थापर, पोलिस मदद भेजें और तब तक उस महिला की समाज मिलकर रक्षा भी करें.

डॉ तोगड़िया ने आगे कहा, “विश्व हिंदू परिषद् समाज के सभी वर्गों, सभी उम्र के नागरिकों को संस्कार देने का प्रयास अब अधिक सबलता से करेगी जिस के आधार पर कोई व्यक्ति महिलाओं के प्रति सन्मान का उल्लंघन ही न करें. लेकिन समाज में हमेशा आदर्श स्थितियाँ नहीं होती. बजरंग दल के युवा कार्यकर्ता बाइक स्क्वाड लेकर तैयार रहेंगे और कहीं भी आस पास माता भगिनियों को सहायता की आवश्यकता हो तो दौड़ कर जायेंगे. दुर्गा वाहिनी गत कुछ वर्षों से स्व-संरक्षण के वर्ग महिलाओं के लिए चला रही हैं, अब इन में अधिक गति लायी जायेगी. लेकिन यह भी सत्य है कि अकेली महिला अनेकों का प्रतिकार करने में थक सकती हैं, छोटी बच्चियाँ दुर्बल होती हैं. ऐसे में स्थानीय पोलिस और बजरंग दल के साथ सुरक्षा विभाग बनाया जाय . जहाँ राजनीतिक कारणों से सरकारें इन में साथ नहीं देंगी, वहाँ समाज के अन्य घटकों को जोड़ कर महिला सुरक्षा विभाग बनाया जाएगा. हिंदू हेल्प लाइन आज भारत के अनेक स्थानों पर वैद्यकीय, कानूनी आदि मदद एक फोन कॉल पर उपलब्ध करा रही है. बलात्कार या छेड़खानी की घटनाएँ न हो इसलिए पोलिस या स्थानीय व्यवस्था को सहयोग देने के लिए हिंदू हेल्प लाइन तत्पर रहेगी अगर कॉल्स के लिए उन्हें आवश्यकता हो.”

डॉ तोगड़िया ने भारतीय संस्कारों पर जोर देते हुए कहा, “घरों घरों में संस्कारों की परंपरा थी जो एक पीढ़ी दूसरी को देती थी आज छोटे परिवारों में, समय के अभाव में और आधुनिकता के प्रभाव में यह कम हुआ है. इसमें किसी एक का दोष नहीं, यह समाज की आज कि अनिवार्य स्थिति है. ऐसे में नए माध्यमों की मदद से बच्चों को यह समझाना होगा कि महिलाओं का सन्मान करना उन्ही के हित में है, क्या बुरा- क्या अच्छा इन के उन्हें समझ में आए उस प्रकार के और उसी माध्यम से उदाहरण दिखाने होंगे. मीडिया से लेकर सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर दोनों प्रकार के विचार फ़ैल रहे हैं. एक हैं जो आधुनिक और सेक्युलर दिखने के लिए सभी प्रस्थापित विचारों – आचारों का विरोध करता है; दूसरा यह भी है जो लाखों युवाओं को सकारात्मक सोच से किसी और पर हुए अन्याय के लिए खड़ा भी करता है! सभी ने अपनी अपनी जिम्मेदारी उठायी तो महिलाएँ, बच्चें, वृद्ध, गरीब, अति-पिछड़ें आदि घटकों पर अन्याय नहीं होंगे. अन्याय, बलात्कार, अत्याचार करनेवालों में केवल युवा ही हैं यह सोच उचित नहीं. मानव में पशू जब हावी होता है, तब वह उम्र का, स्थान का, परंपरा का, धर्म का, सत्य का लिहाज नहीं रखता है. इसलिए, सभी ने मिलकर सकारात्मक संकल्प लेना चाहिए कि एक हिंदू के नाते, मैं किसी महिला पर बलात्कार / छेड़खानी नहीं होने दूँगा, न मैं ऐसी घटनाओं में सम्मिलित होऊंगा न मैं किसी को यह करने दूँगा. सच्चे मन से लिए हुए संकल्प बड़े बड़े संकटों को ढहा देते हैं.”

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