विश्व हिन्दू परिषद् के बढते चरण (Rising stages of Vishva Hindu Parishad)

 

स्थापना , स्थापना की पृष्ठभूमि
सम्मेलन पर्व
धर्म प्रसार कार्य
सामाजिक समरसता के कार्य
गोरक्षण-गोसंवर्धन के लिए कार्य
श्रीराम जन्मभूमि, गंगा व रामसेतु की रक्षा
सन्त शक्ति हिन्दू समाज का मार्गदर्शन करने को तत्पर हुई
यात्राएं जिनके कारण अभूतपूर्व जन जागरण हुआ
तीर्थ एवं धर्मयात्राओं के कार्य
मठ मन्दिर
संस्कृत, अर्चक पुरोहित, योग एवं वेद शिक्षा
समन्वय मंच
सेवा कार्य
दैवीय आपदा में सहायता
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विश्व हिन्दू परिषद की स्थापना, स्थापना की पृष्ठभूमि, एवं कार्य
विश्व हिन्दू परिषद् के बढते चरण
विश्व हिन्दू परिषद भारत तथा विदेश में रह रहे हिंदुओं की एक सामाजिक, सांस्कृतिक संस्था है, सेवा इसका प्रधान गुण है। इसकी स्थापना हिन्दुओं के धर्माचार्यों और संतों के आशीर्वाद तथा विश्व विख्यात दार्शनिकों और विचारकों के परामर्श से हुई है।
स्थापना
एक हजार वर्ष के निरन्तर संघर्ष से प्राप्त स्वातंत्र के पश्चात् यह इच्छा स्वाभाविक थी कि भारत अपनी वैश्विक भूमिका निर्धारित करे। हिन्दू धर्माचार्य यह अनुभव कर रहे थे कि हिन्दू राष्ट्र के रूप में भारत विश्व के समस्त हिन्दुओं के आस्था केन्द्र के रूप में स्थापित हो और विश्व कल्याण के अपने प्रकृति प्रदत्त दायित्व का निर्वाह करे। इस उदात्त लक्ष्य की पूर्ति के लिए पूज्य स्वामी चिन्मयानंद जी (चिन्मय मिशन के संस्थापक) की अध्यक्षता में उन्हीं के मुम्बई स्थित आश्रम ‘‘सांदीपनी साधनालय’’ में आयोजित बैठक में मास्टर तारा सिंह, ज्ञानी भूपेन्द्र सिंह (अध्यक्ष-शिरोमणि अकाली दल), डॉ0 के. एम. मुंशी, श्रीगुरु जी (तत्कालीन सरसंघचालक-राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ), स्वामी शंकरानंद सरस्वती, राष्ट्र सन्त तुकड़ो जी महाराज, वी. जी. देशपांडे (तत्कालीन महामंत्री-हिन्दू महासभा) बैरिस्टर एच.जी. आडवाणी, पद्मश्री के. का. शास्त्री, श्रीपाद् शास्त्री किंजवड़ेकर, डाॅ0 वी. ए. वणीकर, प्रिंसीपल महाजन, के. जे. सोमय्या, राजपाल पुरी, श्री सूद एवं श्री पोद्दार (नैरोबी), श्रीराम कृपलानी (त्रिनिदाद), धर्मश्री मूलराज खटाऊ, डॉ0 नरसिंहाचारी आदि 40 से भी अधिक सन्तों एवं विचारकों ने चिन्तन किया। इस अवसर पर मास्टर तारा सिंह ने स्पष्ट कहा कि हिन्दू और सिख दो अलग जातियां नहीं हैं। सिखों का उत्थान तभी संभव है, जब तक हिन्दू धर्म जीवित है।
संस्था के नाम ‘‘विश्व हिन्दू परिषद’’ की घोषणा भी इन्हीं श्रेष्ठजनों ने विक्रमी संवत 2021, 29 अगस्त, 1964 ई0 श्रीकृष्ण जन्माष्टमी (भगवान श्रीकृष्ण का जन्मदिन) को की।
डॉ0 के. एम. मुंशी ने परिषद के उद्देश्यों को निम्नलिखित प्रकार से रखा –
1. हिंदू समाज को सुसंगठित एवं सुदृढ़ बनाने की ओर अग्रसर रहना। 2. आधुनिक युग के अनुकूल समस्त विश्व में हिंदू धर्म के नैतिक एवं आध्यात्मिक सिद्धांतों तथा आचार-विचार का प्रचार करना। 3. विदेश स्थित समस्त हिंदुओं से सुदृढ़ संपर्क स्थापित करना तथा उनकी सहायता करना।
संस्था का पंजीकरण एक्ट 1860’ के अंतर्गत दिल्ली में 08 जुलाई, 1966 को हुआ (पंजीकरण संख्या एस 3106) और पंजीकृत संविधान में उद्देश्य लिखे गए-
1. भारत तथा विदेशस्थ हिंदुओं में भाषा, क्षेत्र, मत, सम्प्रदाय और वर्ग सम्बन्धी भेदभाव मिटाकर एकात्मता का अनुभव कराना।
2. हिन्दुओं को सुदृढ़ और अखंड समाज के रूप में खड़ा कर उनमें धर्म और संस्कृति के प्रति भक्ति, गौरव और निष्ठा की भावना उत्पन्न करना।
3. हिंदुओं के नैतिक एवं आध्यात्मिक जीवन मूल्यों को सुरक्षा प्रदान कर उनका विकास और विस्तार करना।
4. छुआछूत की भावना समाप्त कर हिन्दू समाज में समरसता पैदा करना।
5. हिंदू समाज के बहिष्कृत और धर्मान्तरित, पर हिंदू जीवन पद्धति के प्रति लगाव रखने वाले भाई-बहिनों को हिंदू धर्म में वापस लाकर उनका पुनर्वास करना।
6. विश्व के भिन्न-भिन्न देशों में बसे हिंदुओं को धार्मिक एवं सांस्कृतिक आधार पर परस्पर स्नेह के सूत्र में बांधकर उनकी सहायता करना और उन्हें मार्गदर्शन देना।
7. संपूर्ण विश्व में मानवता के कल्याण हेतु हिन्दू धर्म के सिद्धांतों और व्यवहार की व्याख्या करना।
स्थापना की पृष्ठभूमि
हिन्दू समाज हजार वर्ष के परतंत्रता काल में अपना स्वत्व, स्वाभिमान, गौरव और महत्व भूल गया। उसने उन सब महान विशेषताओं को अन्धकार में विलीन कर दिया, जिनके बल पर वह विश्वगुरु था।
इसी बीच ईसाई पादरियों द्वारा विदेशी डाॅलर के बल पर म0प्र0 में अशिक्षित, निर्धन और सामाजिक दृष्टि से कमजोर वर्गों के धर्मान्तरण के समाचार मिल रहे थे। इस समस्या की वास्तविकता जानने के लिए नियुक्त नियोगी कमीशन की रिपोर्ट 1957 में प्रकाशित होते ही देश में हडकंप मच गया।
विदेशों में बसे हिन्दुओं की संस्कृति और संस्कारों के संरक्षण की चिंता भी अनेक श्रेष्ठजनों को सता रही थी। त्रिनिदाद से भारत आये एक सांसद डा0 कपिलदेव ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तत्कालीन सरसंघचालक श्री गोलवलकर (श्रीगुरु जी) से भेंट करके उन्हें कैराबियाई द्वीप समूह में रह रहे हिन्दुओं पर मंडराते खतरे की बात कही और विदेशस्थ हिन्दुओं से संपर्क स्थापित करने की आवश्यकता पर बल दिया।
इन्हीं परिस्थितियों में यह अनुभव किया जाने लगा था कि हिंदू समाज के बीच काम करने वाला एक संगठन खड़ा किया जाए। स्वामी चिन्मयानंद जी के मन में भी हिंदुओं के एक विश्वव्यापी संगठन बनाने की इच्छा पनप रही थी। इसी मंथन का परिणाम है विश्व हिन्दू परिषद।
हिन्दू की परिभाषा
परिषद के संविधान में ‘हिन्दू’ की परिभाषा लिखी गई कि:-
‘‘जो व्यक्ति भारत में विकसित हुए जीवन मूल्यों में आस्था रखता है, वह हिंदू है। इससे भी आगे बढ़कर कहा गया कि जो व्यक्ति अपने आप को हिंदू कहता है, वह हिंदू है।‘’
इस परिभाषा के अंतर्गत वे सब सम्मिलित हो जाते हैं, जो अन्य देशों के नागरिक हैं; पर स्वयं को हिंदू कहते हैं।
घोष वाक्य
हिंदू समाज को गतिशील, सक्रिय और सुधरे रूप में प्रतिष्ठापित करने हेतु घोष वाक्य दिये गये।
‘‘हिन्दवः सोदराः सर्वे, ना हिंदु पतितो भवेत
मम दीक्षा हिंदू रक्षा, मम मंत्रः समानता।’’
प्रारम्भ में राष्ट्रीय, प्रांतीय और स्थानीय स्तर पर हिन्दू सम्मेलन आयोजित किए गए। समर्पित और प्रशिक्षित कार्यकर्ताओं द्वारा जगह-जगह पर इकाइयाँ बनाई गईं। संगठन विस्तार के लिए जन-जागरणात्मक, आंदोलनात्मक और रचनात्मक तीन प्रकार के कार्य किए गए।
सम्मेलन पर्व
प्रथम विश्व हिन्दू सम्मेलन: 22, 23 और 24 जनवरी, 1966 – प्रयागराज (उत्तर प्रदेश) गंगा, यमुना एवं सरस्वती के संगम पर। इसमें चारों पूज्य शंकराचार्यों सहित हिंदुओं के सभी संप्रदायों और पंथों के प्रमुख धर्माचार्यों ने भाग लिया। सम्मेलन में उन हिन्दुओं के लिए, जो अपना धर्म एवं समाज किन्हीं परिस्थितियों में त्याग चुके थे, एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव कि ‘‘आज यह बहुत ही आवश्यक हो गया है कि ऐसे जो भी व्यक्ति बिना किसी दबाव के स्वेच्छा से अपने पूर्वजों के धर्म में वापस आना चाहते हैं उन्हें आत्मसात् कर लिया जाए।’’ स्वीकार किया गया। इस प्रकार स्वधर्म में वापसी को पूज्य सन्तों द्वारा मान्यता मिली, इस सम्मेलन की यह महत्वपूर्ण उपलब्धि है।
विदेशस्थ हिन्दुओं के सम्बन्ध में पारित प्रस्ताव में कहा गया कि विदेश में रहने वाले हिन्दू धीरे-धीरे अपनी मातृभूमि और धर्म से कटते जा रहे हैं, वे अपने परम्परागत धार्मिक, सामाजिक संस्कारों से भी दूर होते जा रहे हैं अतः उनसे सम्पर्क बनाकर रखना और उनमें अपनी संस्कृति को सुदृढ़ करना आवश्यक है। सम्मेलन में कुल 11 प्रस्ताव पारित हुए, जिनमें मंदिरों का वैभव, गोरक्षा, संस्कृत का शिक्षण भी थे।
उडुप्पी सम्मेलन – कर्नाटक राज्य का प्रथम ऐतिहासिक हिंदू सम्मेलन 13-14 दिसंबर, 1969 को उडुप्पी में हुआ। इसमें सभी जगद्गुरुओं और धर्माचार्यों ने ‘हिन्दवः सोदरा सर्वे’ का उद्घोष कर संपूर्ण हिंदू जगत से छुआछूत को मिटाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि हमारा उद्देश्य हिन्दू समाज को अखंड एकात्मता की भावना से संगठित रखना है, जिससे अस्पृश्यता जैसी प्रवृतियों और भावनाओं के कारण उसमें कोई विघटन न हो।
उल्लेखनीय है कि जहाँ हिंदुत्व का रथ सवर्ण-दलित के दलदल में धंस रहा था, वहाँ श्रीगुरु जी के प्रयत्नों से ‘न हिन्दू पतितो भवेत’ का जयकार पूज्य सन्तों ने किया।
जोरहाट सम्मेलन – असम के जोरहाट में 27, 28, 29 मार्च, 1970 को हुए सम्मेलन में पधारे वनवासी, गिरिवासी और नगरवासियों में हिंदुत्व के प्रति प्रेम और आस्था जाग्रत हुई। इसमें भारत के सभी प्रमुख तीर्थों और 45 नदियों का पवित्र जल जलकुंड में डाला गया। इससे यहां के लोगों में भारत की एकता का सन्देश प्रसारित करने में परिषद को बड़ी सफलता मिली। लोग इस कुंड का पवित्र जल अपने घर ले गये। सम्मलेन में अनेकों पूज्य सत्राधिकारी सन्तों एवं नगा रानी गाइडिन्ल्यू ने भाग लिया। सम्मेलन में सर्वसम्मति से घोषणा की गई कि ‘‘हिन्दू हिन्दू एक हों’’। श्रीगुरु जी ने कहा कि हम सब एक हैं। अतः अपने को हिन्दू कहलाने में गौरव का अनुभव करें और आगामी जनगणना में ट्राइबल जैसे तुक्ष शब्दों को त्यागकर स्वयं को हिन्दू लिखवाएं। इसी सम्मेलन के परिणामस्वरूप अरुणाचल, मणिपुर, त्रिपुरा, मेघालय में भी परिषद की इकाई गठित हुई।
सम्मेलनों की श्रृंखला
हिन्दू समाज में व्यापक जन जागरण, राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय समस्याओं के प्रति तथा सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध जागरूकता निर्माण करने के लिए राष्ट्र, प्रान्त एवं जिला स्तर पर हिन्दू सम्मेलन हुए। सम्मेलन विवरण-
पूर्वोत्तर भारत सम्मेलन: अक्टूबर, 1966 – गुवाहाटी। ईसाइयों की बढ़ती गतिविधियों पर चिंता प्रकट की गई, घोषणा हुई कि सभी हिंदू प्रकृति पूजक हैं, स्वार्थी तत्व हमारे समाज की एकता, देश की अखंडता और धर्म की व्यापकता को सहन नहीं कर पा रहे हैं, हमें ध्यान रखना होगा कि हम सब हिन्दू हैं और यह देश हिन्दू राष्ट्र है। 1980 का नौगाँव (असम)। 1980 से 1982 के बीच असम के अनेक जिलों, तहसीलों में कुल 27 सम्मेलन हुए। मणिपुर प्रान्त सम्मेलन- 1983 में इम्फाल, 1984 में थीबल व मोइरांग में सम्मेलन हुए। 2001 में त्रिपुरा।
बिहार – 1982 किशनगंज (बिहार) के सम्मेलन में घुसपैठियों के विरुद्ध समाज व सरकार का ध्यान आकृष्ट किया गया। बनमनखी (पूर्णिया)।
पश्चिम बंगाल – 1983 का मालदा।
अंडमान द्वीप समूह सम्मेलन – अप्रैल, 1983, पोर्ट ब्लेयर। 6,000 लोगों की सहभागिता, बड़ी संख्या में वनवासी उपस्थित।
जम्मू सम्मेलन – 1981। पश्चिमोत्तर राज्यों के 7,500 लोग उपस्थित रहे।
पंजाब – मार्च, 1983-अमृतसर। स्थानीय गुरुद्वारों ने अपने लंगर खोल दियेे, सिख और गैर-सिख में एकात्मता के दर्शन हुए।
राजस्थान – 1970 का हाड़ौती (राजस्थान), 2005 में ब्यावर (राजस्थान) सम्मेलन में पूर्व में मुस्लिम बने 1,900 लोग पुनः अपने पूर्वजों की परम्परा में वापस हुए।
महाराष्ट्र के सम्मेलन – पंढरपुर, दिसंबर, 1970, 1978 में मंगेश (गोवा), 1981 नरसोवाबाड़ी, 1987 आलन्दी, अक्टूबर, 1995-नागपुर, केन्द्र सरकार की मुस्लिम व ईसाई तुष्टीकरण की नीति पर प्रहार किये गए। 2003 में शम्भाजी नगर (औरंगाबाद), 2005 में पंढरपुर, 2006 में देवगिरि सम्मेलन।
गुजरात – अक्टूबर, 1972 सिद्धपुर। सम्मेलन में 15,000 प्रतिनिधि, विदेशस्थ हिंदुओं से हो रहे दुव्र्यवहार पर दुःख प्रकट किया गया।
आन्ध्र – तिरुपति सम्मेलन – 1974। पूज्य स्वामी चिन्मयानंद जी महाराज ने हिंदू वोट बैंक बनाने का आह्वान किया और कहा कि वे वोट की शक्ति को समझें। हैदराबाद में दिसंबर, 1988।
कर्नाटक – 2003 में बंगलौर एवं उडुपी में सम्मलेन हुए।
तमिलनाडु – 1982 का नागरकोइल। 2006 में इरोड सम्मेलन। इरोड सम्मलेन में कहा गया कि हिन्दू समाज तभी दुनिया में सम्मानपूर्वक जी सकेगा, जब प्रत्येक हिन्दू स्वयं को सिर्फ हिन्दू के नाते पहचानेगा। हमें जातिगत भेदभाव को दूर कर हिन्दुओं के नाते संगठित होना होगा।
केरल – 1982 एर्नाकुलम्, सम्मेलन में 95 धार्मिक एवं सामाजिक संगठनों की भागीदारी।
द्वितीय विश्व स्तरीय सम्मेलन 1979-प्रयाग:- 24 जनवरी, 1979 विश्व संस्कृत सम्मेलन, 25 जनवरी, 1979 सन्त सम्मेलन, 26 जनवरी, 1979 मातृ सम्मेलन, 27 जनवरी, 1979 विश्व हिन्दू सम्मेलन। विश्व संस्कृत सम्मेलन की अध्यक्ष्ता डा0 कर्ण सिंह जी ने की थी। मातृ सम्मेलन की अध्यक्षता श्रीमती महादेवी वर्मा ने की थी, नगारानी माँ गाइडिल्यू सम्मेलन में पधारी थीं। मातृ सम्मेलन ने घोषणा की थी कि ‘स्त्री ही संस्कारित समाज का निर्माण कर सकती है, सेवावृत्ति स्त्री का सहज स्वभाव है और पावित्र्य की रक्षा। अध्यक्षा श्रीमती महादेवी वर्मा ने कहा था कि महिलाएं अन्याय के विरुद्ध संघर्ष करें और समाज के उपेक्षित महिलाओं के विकास के लिए समुचित प्रयास करे। सन्त सम्मेलन की अध्यक्षता महामण्डलेश्वर पूज्य प्रकाशानन्द जी महाराज ने की थी। सम्मेलन में सन्तों ने समाज में फैल रही भ्रान्तियों का उत्तर दिया था और हिन्दू, हिन्दी, संस्कृति और गोमाता की रक्षा का दायित्व स्वीकार करते हुए घोषणा की थी कि जिस धर्म की रक्षा हम अपने मठों में बैठकर कर रहे हैं, उसी की रक्षा के लिए गाँव-गाँव भ्रमण करें और जागरण का मंत्र फूँके। हमें व्यक्तियों को सुसंस्कार देने हैं। वनवासियों के कल्याण के लिए तीव्र गति से कार्य करना आवश्यक है। आपसी भेदभाव मिटाकर यह बोध जगाना है कि हम हिन्दू हैं। विदेशस्थ हिन्दू सम्मेलन की अध्यक्षता लाला हंसराज जी ने की थी। सम्मेलन में 23 देशों के प्रतिनिधि उपस्थित थे, विदेशस्थ हिन्दुओं की गौरव रक्षा, सुरक्षा, सहयोग एवं बंगलादेश के हिन्दुओं पर प्रस्ताव स्वीकार किए गए थे। देश-विदेश के एक लाख से अधिक प्रतिनिधियों ने भाग लिया। सभी सत्रों को मिलाकर तीन लाख से अधिक लोगों ने इन कार्यक्रमों को देखा और सुना।
इन सम्मेलनों ने समाज में स्वाभिमान पैदा किया, यह भाव पनपा कि ‘‘हम सब हिन्दू हैं।’’ जहाँ-जहाँ सम्मेलन हुए वहाँ संगठन की इकाइयाँ गठित होने लगीं।
तृतीय विश्व हिन्दू सम्मेलन फरवरी, 2007-प्रयागराज अर्द्ध कुम्भ मेला, उपस्थिति-दो लाख। भारत हिन्दूराष्ट्र है, इसी एक सूत्र को आधार बनाकर सन्तों ने समाज का मार्गदर्शन किया।

धर्मप्रसार-कार्य
पृष्ठभूमि – विश्व हिन्दू परिषद के निर्माण की वेला में जो महानुभाव स्वामी चिन्मयानन्द जी के सान्दीपनी साधनालय में एकत्रित आये थे उन सभी के लिए हिन्दुओं में हो रहा धर्मान्तरण एक महत्वपूर्ण विषय था। इसी कारण से जनवरी, 1966 में प्रयाग में आयोजित प्रथम विश्व हिन्दू सम्मेलन में परावर्तन को पूज्य सन्तों की ओर से स्वीकृति प्राप्त हुई थी। परिषद में धर्मप्रसार कार्य का सृजन हुआ। प्रथम प्रयोग राजस्थान में हुआ था। इस्लाम का उदय अरब में हुआ था। इस्लाम के आक्रमणकारी बर्बर थे। इस्लाम ने विश्व में तलवार के बलपर मानवता का विनाश किया। यही जेहादी आक्रमणकारी भारत में भी आये, इन्होंने मारकाट द्वारा भय का वायुमण्डल निर्माण किया था। इसी भय के कारण जो हिन्दू जीवित रहना चाहते थे उन्होंने मुस्लिम रीतियों का पालन करना आरभ्भ किया। ऐसी जातियां बची रही जो मुस्लिम रीतियों के साथ-साथ हिन्दू संस्कारों का भी पालन करती रही।
ब्यावर –
ऐसी ही एक जाति मेहरात है, ये चैहानवंशीय क्षत्रिय हैं, इन्होंने विवाह में कलमा पढ़ने के साथ पण्डितों के द्वारा सप्तपदी का चलन भी अपना रखा था, इनकी वेशभूषा और त्यौहार हिन्दुओं जैसे ही रहे। अजमेर, पाली और भीलवाड़ा जनपद में इनकी जनसंख्या लगभग तीन लाख है। इनके पूर्वज सम्राट पृथ्वीराज चैहान थे और इनकी इष्टदेवी आशापूर्णा माँ है। इन्हें अपने वंश का स्मरण सदैव बना रहा, इनके श्रेष्ठ पुरूषों ने कभी जोधपुर महाराजा से आग्रह किया था कि एक बार आप हमारी पंगत में बैठकर भोजन करें और हमें चैहान वंशीय क्षत्रीय घोषित कर दें तो हम सभी पूर्णरूप से हिन्दूधारा में आ जायेंगे। जोधपुर महाराजा की अनायास मृत्यु के कारण यह कार्य सम्पन्न नहीं हो सका।
परिषद के राजस्थान प्रान्त के कार्यकर्ताओं ने इस जाति के ग्रामों में जाकर अध्ययन किया व जाति के श्रेष्ठजनों से सम्पर्क प्रारम्भ किया। सम्राट पृथ्वीराज चैहान की जयन्ती मनाना शुरू किया, आशापुरा माता रथ यात्रा का आरम्भ हुआ। क्रमशः कार्यक्रमों का क्रम बढ़ा, जनमन में अपने पूर्वजों के घर में आने की चाह खड़ी हुई। यज्ञ-हवन ने इस चाह को परावर्तन (घरवापसी) में परिणित कर दिया। अब तक लगभग 80 हजार मेहरातों की घर वापसी हुई है। इनके ग्रामों में लगभग 60 मंदिरों का निर्माण किया गया है, ग्रामों में भजन मण्डलियां चलती हैं, विद्यालय संचालित हैं, छात्रावास चलता है। इस क्षेत्र का केन्द्र ब्यावर है। वहीं एक आशापुरा माता का मंदिर बनाया गया है, जहाँ नवरात्र महोत्सव के समय चैहानभक्त बड़े-बडे झण्डे लेकर, पदयात्रा करते हुए आते हैं।
बांसवाड़ा –
राजस्थान के बांसवाड़ा जिला में 70 प्रतिशत अनुसूचित जनजाति का निवास है। अंग्रेजों के शासनकाल से इस जिले पर चर्च की दृष्टि पड़ी थी। चर्च ने भील वनवासियों को भारी संख्या में ईसाई बनाया। एक समय यह स्थिति बन गई थी कि यहाँ राम-राम के बजाय जय ईशु गूंजता था।
जनजाति से सम्पर्क साधा गया है, उनमें अपने पूर्वजों, देवी-देवताओं का भाव जागृत हुआ है, घर के द्वार पर गणेश लगवाये गये, गणेश महोत्सव किये गये, गांवों में हनुमान मंदिर निर्माण किये, भजन मंडलियों का निर्माण व पहले से चली आ रही भजन मंडलियों को प्रोत्साहन दिया गया। बांसवाड़ा नगर में प्रतिवर्ष 6 दिसम्बर को लगभग 15 से 20 हजार जनजाति बन्धु अपनी भजन मंडलियों सहित आते हैं, सन्तों के प्रवचन होते हैं, रातभर भजन गाये जाते हैं।
बांसवाड़ा, डूंगरपुर व प्रतापगढ़ के जनजातीय क्षेत्रों में लगभग 400 विद्यालय चल रहे हैं, जिनमें लगभग 42 हजार विद्यार्थी पढ़ते हैं। ये सभी इसी क्षेत्र की जनजाति के लाल हैं, शिक्षक 99 प्रतिशत जनजातीय बन्धु है। परिणामस्वरूप आज ईसाईयत सिकुड़ गई है और जनजाति समाज गर्वीला हिन्दू बना है। आसपास के जिलों में 30 छात्रावास भी चलते हैं। 636 भजन मंडलियों के माध्यम से जनजातीय बन्धुओं से सम्पर्क बना है।
जहाँ-जहाँ सन्तों का सम्पर्क बढ़ा वहाँ-वहाँ परावर्तन (घरवापसी) के कार्यक्रम हो रहे हैं। पूर्वी आन्ध्र में प्रतिमास परावर्तन के कार्यक्रम हो रहे है।
तमिलनाडु –
रामनाथपुरम (तमिलनाडु) जिले के जिन गाँवों में सामूहिक धर्मान्तरण हुआ था वहाँ व्यापक जन सम्पर्क व अध्ययन, सन्तों की पदयात्राएं कराई गईं। सन्तों ने हरिजनों के साथ बैठकर भोजन किया। हरिजन परिवार में जन्मे एवं मलयेशिया के एक मठ के स्वामी श्रीरामदास जी महाराज के साथ उन गाँवों में हरिजनों की गोष्ठियाँ हुई, उन्होंने धर्मान्तरण का विचार छोड़ा और दो महीने तक उन्हीं क्षेत्रों में स्वामी रामदास जी महाराज ने गाँव-गाँव भ्रमण किया।
1981 में तमिलनाडु के एक कस्बे मीनाक्षीपुरम में बड़ी संख्या में हरिजन परिवारों को मुस्लिम बना लिए जाने से हिन्दू समाज चकित रह गया। परिषद ने इनको वापस लाने का संकल्प लिया। हिन्दू समाज में नई चेतना जगी। संस्कृति रक्षा योजना बनी। जुलाई, 1982 में हरिद्वार में अखिल भारतीय प्रशिक्षण वर्ग लगा, 114 कार्यकर्ता आए। धर्मान्तरण के विरुद्ध व्यापक जन जागरण का संकल्प लिया गया। गाँव-गाँव सम्पर्क, जनसभाएं, समूह बैठकें, प्रभात फेरियाँ, सन्तों के प्रवचन प्रारम्भ हुए।
तमिलनाडु के इदंतकुराई ग्राम में मछुआरे रहते थे। इनके पूर्वजों को 400 वर्ष पूर्व ईसाई बना लिया गया था परन्तु चर्च इन पर अत्याचार करता था। घर लूटना, घरों को आग लगाना, झूठे मुकदमें चलाना, माँ-बहनों पर अत्याचार होते थे। परिषद कार्यकर्ताओं ने सम्पर्क किया और 176 परिवारों के 1200 सदस्यों ने विधिवत परावर्तन किया।
धर्मप्रसार का उद्देश्य-
समाज के आबालवृद्ध में हिन्दूधर्म के प्रति निष्ठा-भक्ति निर्माण कर इसे सुदृढ़ स्वाभिमानी हिन्दू के रूप में खड़ा करेंगे।
धर्मान्तरण को रोकना-
इस्लाम के काल से तलवार के आधार पर धर्मान्तरण हुआ। अंग्रेजी काल में बड़ी मात्रा में धर्मान्तरण हुआ। धर्मान्तरण के कारण ही पाकिस्तान बना। धर्मान्तरित होने वाला अपनी पूर्वपम्परा, पूर्वज, ग्रंथ, देवी-देवता को त्यागकर विदेशी धर्मनिष्ठा को स्वीकार कर लेता है, भारत को माँ कहने और वन्देमातरम् घोष का विरोध करने लगता है। अतः धर्मान्तरण राष्ट्रान्तरण है। इस धर्मान्तरण को रोकना आवश्यक है।
परावर्तन को सन्तों ने स्वीकारा-
हिन्दू समाज से छीन लिए गए थे अतः अब वापस हिन्दू समाज में ही आ रहे हैं, इसी कारण यह धर्म परिवर्तन नहीं अपितु परावर्तन है। जनवरी, 1966 में प्रयाग में सम्पन्न हुए प्रथम विश्व हिन्दू सम्मेलन में इसी परावर्तन को सन्तों की स्वीकृति प्राप्त हुई।
समझाकर, पूर्वजों की याद दिला कर वापिस लाना परावर्तन है। इसे ही घर वापसी कहा जाता है।
समरसता का प्रयास-
जो घर में आ गये उनको शिक्षित व संस्कारित करना, उन्हें ठीक प्रकार बसाना, सुरक्षा करना, रोजी-रोटी का प्रबन्ध करना, सन्तति को शिक्षित कर कार्य प्रवण बनाना आवश्यक है। इस दृष्टि से संस्कार केन्द्रों का संचालन, मंदिरों का निर्माण, भजनमंडलियों का गठन, विद्यालय, छात्रावास निर्माण, कथा-प्रवचन कार्यक्रम किए जाते हैं। समाज में वे सम्मानित जीवन जियें, ऐसा मन हिन्दू समाज तैयार किया जाता है।
समरसता हेतु सामूहिक कार्यक्रमों का आयोजन, त्योहारों पर, तीर्थयात्राओं के अवसर पर, सभी को सम्मानित करने का कार्य, वाल्मीकि जयन्ती, रविदास जयन्ती मनाना, ‘न हिन्दू पतितो भवेत’, ‘हिन्दव सोदरा सर्वे’ के भाव को प्रबल बनाते हैं। इस सम्पूर्ण कार्य के लिए 300 कार्यकर्ता रात-दिन भ्रमण व परिश्रम करते हैं। जातियों का चयन कर उनके लिए विशेष प्रकल्प तैयार करके, भिन्न-भिन्न प्रकार के सेवा कार्य ऐसे क्षेत्रों में चलाए जा रहे हैं।
सामाजिक समरसता के कार्य
1969 उडुप्पी में सम्पन्न सम्मेलन में अस्पृश्यता के विरुद्ध सन्तों का उद्घोष।
1970 में महाराष्ट्र के पंढरपुर अधिवेशन में द्वारका तथा शृंगेरी के जगद्गुरु शंकराचार्य और मध्व तथा वल्लभ संप्रदायों के पूज्य आचार्यों ने छुआछूत का विरोध किया।
देशभर में शिक्षा, आरोग्य, स्वावलम्बन के लिए सेवा कार्य प्रारम्भ।
1982 की तमिलनाडु ज्ञान रथं यात्रा – रथ पर लकड़ी का मन्दिर बनाकर, भगवान मुरुगन की मूर्ति प्रतिष्ठापित कर इसे उन पिछड़े क्षेत्रों में ले जाया गया, जहां हिंदू धर्म विरोधी प्रचार चलाया जा रहा था। लगभग 21,000 कि.मी. लंबी इस यात्रा में छह लाख लोगों से संपर्क हुआ।
1983 में कर्नाटक के उजीरे धर्मस्थल पर हुए सम्मेलन में 60,000 प्रतिनिधियों ने भाग लिया। इसमें हिंदू धर्म के मठों के लगभग 174 अधिपतियों ने सर्वसम्मति से अस्पृश्यता के उन्मूलन और हिंदू एकता के लिए संघर्ष का आह्वान किया।
केरल में 1983 में सन्तों के नेतृत्व में दो धर्मरथों में धर्मयात्रा प्रारम्भ। सन्तों ने मुख्य रूप से हरिजन बस्तियों का भ्रमण किया और उन्हीं की झोपडि़यों में जाकर उन्हीं के द्वारा बनाया गया तथा उन्हीं के द्वारा वितरित किया गया भोजन ग्रहण किया।
सेलम (तमिलनाडु) संत सम्मेलन – जनवरी, 1988। सम्मेलन में वैदिक, बौद्ध, नामधारी सिख आदि प्रमुख संप्रदायों के 23 मठाधिपतियों ने भाग लिया। सम्मेलन में सर्वसम्मत निर्णय हुआ कि छूआछूत का हिंदू धर्म में कोई स्थान नहीं है। इसे पूर्णतया समाप्त किया जाना चाहिए।
अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि मन्दिर का शिलान्यास नवम्बर, 1989 में बिहार के एक हरिजन कार्यकर्ता श्री कामेश्वर चैपाल जी से कराया गया।
ग्राम पुजारी प्रशिक्षण – तिरुम लैकोदी (तमिलनाडु) में सन 1990 से ग्रामीण मंदिर के पुजारियों को प्रशिक्षण देने के लिए 15-15 दिन के शिविर लगाये गये। इनमें वनवासी, जनजाति, अति पिछड़ी, पिछड़ी, और अगड़ी जातियों के इन वर्षों में ऐसे शिविरों के द्वारा कई हजार पुजारी मंदिर में पूजा-अर्चन के लिये प्रशिक्षित हुये। कोविल पैरावेरू, त्रिचनापल्ली में 5,300 ग्राम पुजारियों का एक प्रांतीय सम्मलेन 1995 में हुआ। इसका उद्देश्य पुजारियों को संगठित कर उन्हें अपने अधिकार और कर्तव्य के प्रति सजग करना था। परिणाम स्वरुप पुजारियों को सरकार से पेंशन मिलने लगी।
1994 में काशी में धर्मसंसद का आयोजन हुआ। सन्त-महात्मा डोमराजा के घर निमन्त्रण देने के लिए स्वयं चलकर गए, प्रसाद ग्रहण किया, अगले दिन डोमराजा धर्मसंसद अधिवेशन में मंच पर सन्तों के मध्य बैठे, सन्तों ने पुष्प-हार पहनाकर स्वागत किया। इस धर्मसंसद में 3500 सन्त उपस्थित थे।
महर्षि वाल्मीकि व सिद्धू-कान्हू रथ यात्राएं – आजादी के बाद से ही समाज को जाति व धर्म के आधार पर बांटने के प्रयास हो रहे थे। इसके विरुद्ध जनजागरण हेतु मार्च, 1994 में बिहार में दो रथ यात्राएं आयोजित कीं। 1. महर्षि वाल्मीकि रथ यात्रा, जो उत्तर बिहार के क्षेत्रों में गयी। 2. सिद्धू कान्हू रथ यात्रा जो सिंहभूम जिले से बिहार के अत्यंत पिछड़ेे क्षेत्रों में गयी। दोनों यात्राओं ने लगभग तीन हजार कि.मी. की दूरी तय की और लाखों लोगों की इसमें सहभागिता हुई। इस यात्रा ने अति पिछड़े जनजातीय व वनवासी लोगों के हृदय को छुआ। इससे सामाजिक समरसता का वातावरण बिहार में निर्मित हुआ।
अक्टूबर, 1995 में द्वितीय एकात्मता यात्रा के नागपुर में समापन के अवसर पर हिन्दू सम्मेलन। सन्त-महात्मा दीक्षा भूमि पर दर्शन करने गए।
अप्रैल, 2005 में छत्तीसगढ़ के अम्बिकापुर से बिलासपुर तक 782 कि.मी. की पदयात्रा सामाजिक समरसता कार्यक्रम के अन्तर्गत सम्पन्न।
सन्त रविदास चेतना यात्रा – नवम्बर-दिसम्बर, 2005 में चित्तौड़ से काशी तक सन्त रविदास जी की प्रतिमा के साथ 12 दिवसीय गुरु रविदास चेतना यात्रा का आयोजन, 1600 कि.मी. की दूरी में 25 जनसभाएं, 245 स्थानों पर स्वागत, 10 स्थानों पर शोभायात्राएं। कार्यक्रम का आयोजन सन्तों के नेतृत्व में हुआ।
2006 में उड़ीसा में अष्टमातृका रथयात्रा – 8 देवी पीठों से रथयात्रा उड़ीसा में 7 दिन तक भ्रमण, सभी गाँव से मिट्टी और जल चकापाद लाया गया। गोवर्धन पीठाधीश्वर पूज्य जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद जी महाराज एवं स्वामी लक्ष्मणानंद जी महाराज के द्वारा स्फटिक शिवलिंग का अभिषेक एवं संग्रहीत मिट्टी से तुलसीचैरा बनाया गया। 265 गाँवों से यात्रा गुजरी, 115 धर्मसभाएं, 1684 स्थानों पर स्वागत हुआ। यात्रा के दौरान हनुमान चालीसा, सुन्दरकाण्ड, रामचरितमानस, श्रीमद्भगवद्गीता, श्रीराम के चित्र व लाॅकेट वनवासी समाज को सन्तों द्वारा भेंट किए गए।
1986 में सुन्दरगढ़ (उड़ीसा) में वनवासी तथा औरंगाबाद (बिहार) में जातीय एकता सम्मेलन किये गये।
गोरक्षण-संवर्धन के लिए कार्य
जनवरी, 1966 में प्रयाग में आयोजित प्रथम विश्व हिंदू सम्मेलन में गोरक्षा पर पारित प्रस्ताव में कहा गया कि गोमाता के प्रति हिन्दुओं की श्रद्धा का आदर करते हुये समस्त भारत में गोहत्या बन्द करने का केन्द्रीय कानून अविलम्ब बनाया जाये। दिल्ली में 07 नवंबर, 1966 को गोरक्षा के लिये सम्मेलन तथा 20 नवंबर, 1966 से गोवर्धन पीठाधीश्वर पूज्य जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी निरंजनदेव तीर्थ जी महाराज और पूज्य श्री प्रभुदत्त ब्रह्मचारी जी द्वारा आमरण अनशन की घोषणा की गयी।
07 नवम्बर, 1966 को सर्वदलीय गोरक्षा महा अभियान समिति के तत्वावधान में दिल्ली में संसद के सामने विराट प्रदर्शन हुआ, जिसमें सरकार की ओर से निर्मम गोलीवर्षा की गयी थी।
1986 में गोरक्षण तथा संवर्धन के लिए अलग विभाग का गठन किया। बिहार के आरा एवं टाटा नगर के गोरक्षा सम्मेलन। गोसेवा महाभियान समिति के आह्वान पर 25-26 मार्च, 1987 को गोरक्षा सम्मेलन आयोजित हुआ। 25 मार्च को सामुहिक उपवास रखा गया। कोलकाता में 24-25 नवंबर, 1988 को गोपालक सम्मेलन आयोजित हुआ। 1988 में कोलकाता पिंजरापोल सोसायटी शताब्दी आयोजन में 2000 गोशालाओं से सम्पर्क हुआ, सम्मेलन में 12 राज्यों के प्रतिनिधि आये।
कोयम्बटूर में 4 राज्यों के गोसेवकों का सम्मेलन, गोहत्या बन्दी कानून की मांग। 1990 में मध्य प्रदेश में गोहत्या बन्दी का संकल्प घोषित कराया गया। पाली में गोशाला की स्थापना हुई। हैदराबाद स्थित ‘अल कबीर यांत्रिक कत्लखाना हटाओ समिति’ का गठन किया गया। जनांदोलन के कारण 1994 में कत्लखाना अस्थायी रूप से स्थगित कर दिया गया।
1993 से महाराष्ट्र के अकोला में एवं 1995 से देवलापार, नागपुर में पंचगव्य पर अनुसंधान प्रारम्भ हुआ। गोविज्ञान अनुसंधान केन्द्र नागपुर में गठित गोमूत्र, गोबर से मनुष्य के लिये उपयोगी औषधियाँ निर्माण, कीटनियंत्रक, उर्वरक एवं अन्य मनुष्योंपयोगी वस्तुओं का उत्पादन प्रारम्भ हुआ। आज देश में 600 स्थानों पर पंचगव्य एवं गोआधारित जैविक कृषि पर कार्य हो रहा है। किसानों को प्रशिक्षित किया जाता है। कीट नियंत्रक एवं गोमूत्र अर्क पर गोविज्ञान अनुसंधान केन्द्र नागपुर ने भारत सरकार ने वैज्ञानिकों के साथ मिलकर 06 अन्तरराष्ट्रीय पेटेंट प्राप्त किये हैं।
1996 में प्रयाग मे संगम तट पर माघ मेला में गोरक्षा के लिये बजरंग दल के आह्वान पर राष्ट्रीय सम्मेलन हुआ। सम्मेलन में बजरंग दल के 1,25,000 युवक उपस्थित थे। कत्लखानों को जाने वाली गऊओं को रोकने का संकल्प लिया गया। गोरक्षा वाहिनियों का गठन हुआ। कसाइयों के हाथों से गोवंश को मुक्त करने का राष्ट्रव्यापी अभियान छेड़ा और वर्ष भर में 300 से अधिक स्थानों पर प्रान्तीय सीमाओं पर चैकपोस्ट (चैकियाँ) बनाकर लाखों गोवंश को कत्लखाने जाने से बचाया और मुक्त हुए गोवंश के पालन-पोषण हेतु गोसदनों तथा गोशालाओं का सहयोग प्राप्त करने के अतिरिक्त नये गोसदन भी स्थापित किए गए।
बकरीद पर गोहत्या का विरोध – बकरीद पर गोहत्या के सन्दर्भ में सभी राज्यों में विशाल जनसभा व रैलियां आयोजित कर सरकार से मांग की गई कि उच्चतम न्यायालय के आदेश का पालन हो और बकरीद पर एक भी गाय न कटे।
गो-जागरण रथयात्राएं – धर्माचार्यों के आह्वान पर 1997 से 2000 तक 100 रथयात्राएं पूरे देश में निकाली गयीं। इनसे गोसेवा एवं गोरक्षा के लिये लोक जागरण, लोक संस्कार और लोक प्रशिक्षण के कार्य हुए।
2006 में हुए गोरक्षा सम्मलेन में 700 प्रतिनिधियों ने भाग लिया। इनमें 200 से अधिक गोशालाओं के प्रतिनिधि थे।
गुजरात सरकार द्वारा पूर्ण गोहत्या बन्दी के निर्णय के विरुद्ध कसाइयों की याचिका पर गुजरात उच्च न्यायालय ने उच्चतम न्यायालय के 1958 के निर्णय के आधार पर सरकार का कानून निरस्त कर दिया। गुजरात सरकार ने उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर की। अब तक किए गए अनुसन्धानों से तथा आयोग की रिपोर्ट के तथ्यों के आधार पर 26 अक्टूबर, 2005 को उच्चतम न्यायालय की सप्त न्यायाधीशों की बंेच ने पूर्ण गोहत्याबन्दी का निर्णय दिया। सप्त न्यायाधीशों की बेंच ने यह माना कि गोवंश कभी भी अनुपयोगी नहीं होता। उच्चतम न्यायालय में अपील के दौरान विश्व हिन्दू परिषद ने अथक प्रयास किया। उसी का परिणाम यह ऐतिहासिक निर्णय है।
अन्य कार्य
कत्ल हेतु ले जाए जाने वाले गोवंश का रक्षण करना। गोवंश की वृद्धि, उपयोगिता के प्रति जन-जागृति करना। पंचगव्य आधारित (गोबर, गोमूत्र, दूध, दही, घी) औषधियों का निर्माण कर उनका प्रचार, प्रसार करना। कृषि के लिए गोबर, गोमूत्र से निर्मित खाद एवं कीट नियंत्रक तैयार करना, वितरित करना, किसानों को प्रशिक्षण देना। जैविक खेती करने के लिए किसानों को प्रवृत्त करने हेतु किसान प्रशिक्षण शिविरों का आयोजन करना।
गो विज्ञान अनुसंधान केन्द्र, देवलापार (नागपुर) की गतिविधियाँ
यह केन्द्र निम्न गतिविधियों का विस्तार अनेक धार्मिक, सामाजिक संस्थाओं के साथ कर रहा हैः-
01. गोवंश आधारित शाश्वत खेती 02. गोबर से केंचुआ खाद
03. गोमूत्र $ नीम से कीट नियंत्रक (अन्तर्राष्ट्रीय पेटेंट) 04. गोबर $ गोमूत्र $ गुड़ से अमृतपानी
उक्त चीजों के निर्माण का प्रशिक्षण किसानों को प्रतिवर्ष दिया जा रहा है। फलतः पूरे भारत में कई हजार टन कंेचुआ खाद का निर्माण होने लगा है तथा गोमूत्र का उपयोग कृषि में हो रहा है। इसके कारण रसायनिक खाद और कीटनाशक का उपयोग कम होता जा रहा है। संस्था किसानों को सही अर्थों में स्वावलम्बी बनाने का कार्य कर रही है। साथ ही केन्द्र द्वारा निर्मित 29 पंचगव्य आयुर्वेद औषधियों (जो भारतीय गोवंश के गोबर, गोमूत्र, दूध, दही, घी, छाछ के उपयोग से बनती है) को शासकीय मान्यता प्राप्त हो गई है।
केन्द्र ने निम्नलिखित अनुसंधान किए हैं:-
कामधेनु कृषि। पंचगव्य आयुर्वेद चिकित्सा (मानव स्वास्थ्य रक्षा के लिए)। पंचगव्य आयुर्वेद पद्धति से पशु-पक्षियों की चिकित्सा। ऊर्जा के साधन के रूप में गोबर गैस से बिजली, बैल चालित जनरेटर आदि। भारतीय गोवंशीय नस्लों की सुरक्षा एवं संवर्धन। अन्य उपयोगी उत्पाद जैसे, धूप, मच्छर निरोधक बत्ती, फिनाइल आदि। प्राकृतिक मृत्यु के पश्चात समाधि खाद व चर्म का उपयोग।
वर्तमान स्थिति –
परिषद द्वारा संचालित गौशालाएँ – 370, सम्पर्कित गौशालाएँ-1220, पंचगव्य औषधि निर्माण केन्द्र-340, जैविक खाद निर्माण केन्द्र-333, प्रतिवर्ष गोविज्ञान पर छात्रों को अध्ययन के लिए प्रोत्साहन किया जाता है, परीक्षा ली जाती है, 25 प्रान्तों में दो लाख विद्यार्थी गोविज्ञान परीक्षा में बैठते हैं। डेराबसी (पंजाब), गाजियाबाद, औरया, इटावा (उत्तर प्रदेश), दिल्ली, अमरावती (महाराष्ट्र) एवं इन्दौर (मध्यप्रदेश) में कत्लखाने नहीं खुलने दिए। राजस्थान, बुन्देलखण्ड (उत्तर प्रदेश) में सूखा के समय चारा देकर गोवंश की रक्षा की गई। 500 वैद्यों ने पंचगव्य चिकित्सा कार्यशाला एवं 1000 किसानों ने जैविक कृषि तथा पंचगव्य से खाद एवं कीट नियंत्रक निर्माण कार्यशाला में प्रशिक्षण लिया।
दैवीय आपदा में सहायता
भारत एक विशाल देश है। यहाँ भिन्न-भिन्न जलवायु में प्राकृतिक स्थितियाँ भी अलग-अलग हैं। स्थिति अनुसार प्राकृतिक त्रासदी/आपदाएं भी आती रहती है – कभी दुर्भिक्ष, कभी भूकम्प, कभी अतिवृष्टि, कभी चक्रवात। देश में जहाँ कहीं भी प्राकृतिक आपदाएं आती हैं, वहाँ पीडि़तों की सहायता के लिए परिषद सदा ही तत्पर रहती है। यहाँ कतिपय उदाहरण ही दिए जा रहे हैं-
उत्तरकाशी भूकम्प –
20 अक्टूबर, 1991 की नीरव रात्रि की अशुभ घड़ी में विनाशकारी भूकम्प ने हिमालय की गोद में बसी देवभूमि के अनेक गाँवों को कुछ ही क्षणों में उजाड़ कर फेंक दिया। उत्तरकाशी, चमोली और टिहरी जनपद भूकम्प से सर्वाधिक प्रभावित हुए। उत्तरकाशी में भी भटवाड़ी तहसील क्षेत्र में तो विनाश का भयंकर तांडव हुआ। लगभग 28,220 मकान ध्वस्त हो गए, 20,685 मकानों में दरार पड़ गई, 1000 से अधिक मनुष्यों की अकाल मृत्यु हो गई।
भूकम्प से प्रभावित अनेक स्थानीय कार्यकर्ता अपना दुःख भूलकर मलबे में दबे मृत व घायलों को अस्पतालों, राहत शिविरों आदि में पहुँचाने लगे, भोजन, जलपान से लेकर ढाँढस बाँधने तक का कार्य इन्होंने ही किया। पश्चिम उत्तर प्रदेश में श्रीराम जन्मभूमि के लिए अयोध्या में किए जा रहे अनुष्ठान में आने वाले भक्तों के लिए एकत्र की गई खाद्य सामग्री को उत्तरकाशी भेज दिया गया।
समाज से प्राप्त 1000 टेन्ट, 2000 तिरपाल, 35000 कम्बल, 3500 रजाई, 900 गाँठ ऊनी वस्त्र, 300 गाँठ सूती वस्त्र, 1/2 टन चाय पत्ती, 35 कि. मोमबत्ती, 2000 टीन की चादरें, 50 टन आटा, 35 टन चावल, 14 टन दाल, 65 टन गुड़, 1 टन चीनी, डेढ़ टन सूखा दूध, 1 टन खाद्य तेल, 2 टन साबुन, लगभग 12 लाख रुपए मूल्य की दवाएँ, डबलरोटी, बिस्कुट के पैकिट, बर्तन, जूते, माचिस आदि लगभग 1.5 करोड़ रुपए की सामग्री पीडि़तों में वितरित की गई।
भूकम्प की विनाश लीला में असमय ही काल कवलित लोगों की आत्मा की शांति के लिए उत्तरकाशी में भागीरथी गंगा तट पर पूज्य स्वामी भगवानदास जी वैष्णव के सान्निध्य में 10 दिवसीय नारायण बलि यज्ञ का आयोजन किया गया। साथ ही श्रीमद्भागवत पाठ, रुद्री पाठ, श्री विष्णुसहस्रनाम पाठ, महामती चण्डी पाठ, गायत्री जाप, रामायण पाठ आदि धार्मिक अनुष्ठान भी किए गए।
बेघर हुए लोगों के पुनर्वास के लिए पहल की गई, उत्तरकाशी जनपद में ध्वस्त 8 गाँवों को गोद लिया गया। सी. बी. आर. आई. रुड़की के पूर्व उपनिदेशक प्रो. के. एल. दत्ता के संयोजन में बनी भवन निर्माण विशेषज्ञ समिति ने रुड़की विश्वविद्यालय के भूकम्प विभाग की सलाह से भूकम्प निरोधी, शीत अवरोधी, स्थानीय आवश्यकता के अनुरूप परम्परागत शैली पर आधारित, भवन का प्रारूप तैयार किया। इसमें एक परिवार की आवश्यकता के अनुरूप 2 रिहायशी कमरे, ईधन व चारा रखने हेतु भंडार तथा रसोई व स्नान गृह की व्यवस्था की गई थी।
प्रत्येक परिवार को टीन की नालीदार चादरों से ढका, पाइपों का लौह ढाँचा प्रदान किया गया, दीवारों व फर्शों का निर्माण-कार्य श्रमदान व परस्पर सहयोग से, ग्रामीणों को शासन की ओर से प्रदत्त अनुदान एवं वन विभाग द्वारा दी गई सस्ती लकड़ी से किया गया।
भूकम्प से देवालय भी ध्वस्त हुए थे, परिषद ने उत्तरकाशी नगर के प्राचीन ‘महिषासुर मर्दिनी’ देवी मंदिर एवं पाव ग्राम में ‘नरसिंह देवता’ के मंदिर का पुनर्निर्माण किया गया।
भूकम्प के कारण हुए अनाथ, असहाय व निराश्रितों के लिए छात्रावास आरम्भ किया गया। इसमें भोजन, आवास, शिक्षा व चिकित्सा की निःशुल्क व्यवस्था की गई। कढ़ाई, सिलाई, बुनाई-कताई, फल संरक्षण, लघु घरेलू उत्पाद आदि के प्रशिक्षण की स्थानीय स्तर पर व्यवस्था की गई।
महाराष्ट्र भूकम्प-
सन् 1992 में लातूर (महाराष्ट्र) में आए भीषण भूकम्प में भी कार्यकर्ताओं ने भूकम्प पीडि़तों में भोजन, वस्त्र, दवाइयों आदि का वितरण किया।
गुजरात भूकम्प –
26 जनवरी, 2001 को भूकम्प से कच्छ जिले को भारी नुकसान हुआ। चारों ओर मौत का मातम फैल गया। परिवार के परिवार मकानों में दब गए। 8 लाख परिवार बेघरबार हुए और 13 हजार लोग मारे गए। परिषद ने संगठन के अन्य सभी कार्य बन्द करके तत्काल युद्ध स्तर पर सहायता कार्य किया। 1,18,000 कम्बल, 1,00,000 से ज्यादा लोगों को भोजन, 25,000 से ज्यादा मरीजों को चिकित्सा, 04 मेडिकल एम्बुलेन्स तथा अन्य जीवनोपयोगी सामग्री पहुँचाई। पुनर्वसन की दृष्टि से बेटद्वारिका, नागलपर, जामदुधाई, संगमनेर गाँवों को गोद लिया। अमेरिका विश्व हिन्दू परिषद के सहयोग से भूकम्प के केन्द्र लोडाई का पुनर्वसन का काम सम्पन्न किया गया। 15 गाँवों में स्कूल के भवन बनवाए।
जम्मू कश्मीर भूकम्प –
08 अक्टूबर, 2005 को आए भीषण भूकम्प ने पूरे उत्तर भारत को झकझोर दिया। मुख्य प्रभावित इलाका कश्मीर घाटी के उड़ी और बारामूला क्षेत्र और जम्मू संभाग का पुंछ शहर थे। पाक अधिकृत मुजफ्फराबाद तो बिलकुल ही बर्बाद हो गया। वहां पर 50 हजार से ज्यादा लोगों की मृत्यु हुई। पुंछ नगर में किले की दीवार टूटकर घरों पर दुकानों पर गिर गई थी। इससे 300 से अधिक मकान व दुकान क्षतिग्रस्त हो गईं। ऐतिहासिक गीता भवन भी क्षतिग्रस्त हो गया। झलास, अजोट, गुलपुर, मंगनाड, दर्रादुलियां, दिगवार, सलोथरी और खड़ी इत्यादि में 200 से ज्यादा मकान क्षतिग्रस्त हो गए। पुंछ से 54 कि0मी0 दूर उड़ी नगर और आसपास के गाँव भी भूकम्प से बहुत अधिक मात्रा में प्रभावित हुआ था। वहाँ संपर्क के लिए सीधा कोई मार्ग नहीं था इसलिए श्रीनगर होकर 650 कि0मी0 का रास्ता सड़क से पार कर जाना पड़ा। उड़ी का मुख्य बाजार भूकम्प में पूरी तरह ध्वस्त हो गया था। बारामूला शहर और उसके 9 अन्य गांव, कुपवाड़ा जिले की तंगधार तहसील भी प्रभावित हुई थी। कश्मीर घाटी में सेना के 50 जवानों सहित 1500 लोग मारे गए और 4,000 से अधिक घायल तथा इतने ही लापता हुए। जम्मू संभाग में 17 लोग मारे गए और 500 से ज्यादा घायल हुए।
पुंछ के कार्यकर्ता अपने घरों की परवाह न करते हुए सेवा कार्य में जुट गए, जो बच सकता था उसे बचाया, घायलों का उपचार कराया। ठहरने और भोजन के प्रबंध में लग गए। सेना को भी इस त्वरित कार्यवाही का लाभ हुआ। 1000 कंबल पहंुचाए गए। राशन और कंबलों की व्यवस्थाा पूज्य स्वामी विश्वात्मानंद सरस्वती जी के द्वारा करवाई गई।
सत्संग भवन, मन्दिर व सामाजिक भवनों का जीर्णोद्धार कराया गया।
बिहार व असम बाढ़ –
2004 में बिहार में आई बाढ़ के दौरान 19 जिलों में राहत कार्य किया। दरभंगा में दो स्थानों पर राहत शिविर चलाया गया। 20 बोरा चिउडा, जीवन रक्षक दवाएं और एण्टी डायरिया ड्राप एवं ब्लीचिंग पाउडर उपलब्ध करवाया।
2004 में असम में आई भीषण बाढ़ के दौरान राहत व सहायता कार्य किया। नदियों में नावों द्वारा रंगिया, नलवाड़ी, द0 कामरूप, मोरी गाँव, नवगाँव व मंगलदाई जिलों में यथाशक्ति राहत सामग्री वितरित करते हुए 70 गाँवों के 50,000 परिवारों को समय पर सहायता पहंुचाई। नलबाड़ी में नाव से नदी पार करने के बाद अपने सर पर राहत सामग्री से भरी बोरियाँ लादकर 5 कि0मी0 नंगे पाँव पैदल चलकर जरूरतमन्दों को सहायता पहंुचाई।
राजस्थान बाढ़ –
जोधपुर महानगर के बजरंग दल कार्यकर्ताओं को बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों के लिए सहायता सामग्री लेकर जाते समय ज्योतिष्पीठाधीश्वर बद्रिकाश्रम के पूज्य जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी वासुदेवानन्द सरस्वती ने आशीर्वचन दिया तथा संत अमृतराम रामस्नेही जी ने वाहनों को रवाना किया।
लोगों से आटा, दाल, चावल, मसाला, चाय, शक्कर, आलू, प्याज, मोमबत्तियों सूखा भोजन सामग्री के अतिरिक्त बर्तन, तिरपाल व कम्बलों का संग्रह कर राजस्थान के बाड़मेर जिले के बन्धरा, राणासर, झडकली, हरसाणी आदि ग्रामों में बाढ़ग्रस्तों के बीच वितरण किया गया। बाढ़ग्रस्त क्षेत्र में मारे गए मवेशियों के शवों पर लाईम पाउडर का छिड़काव कर बाढ़ प्रभावित लोगों को महामारी से बचाया गया।
गुजरात बाढ़ –
अगस्त, 2006 में गुजरात प्रान्त में आई बाढ़ से प्रभावित लोगों की सहायता में सेवा कार्य किया। प्रतिदिन 5 ट्रक राहत-सामग्री, यथा-40 टन खाद्य सामग्री, लाखों फूड पैकेट्स, पानी के पाउच, खाद्य तेल, लड्डू इत्यादि प्रभावित क्षेत्रों में भेजा गया। 11 से 16 अगस्त, 2006 तक सूरत शहर में स्थान-स्थान पर निःशुल्क भोजनशालाओं के आयोजन किए गए।
उड़ीसा बाढ़ –
उड़ीसा में आई बाढ़ के समय केन्द्रापाड़ा जिले के चार ग्राम पंचायत-श्यामसुन्दरपुर, जुटीयाल, पुरुषोत्तमपुर एवं बागड़ा के ग्रामवासियों को बचाने का कार्य किया। 1500 लोगों को भोजन एवं निःशुल्क चिकित्सा उपलब्ध कराई गई। गोधन के लिए चारा की व्यवस्था की गई। तुणपुर, बलरामपुर, पाटना, टोटासाही, सूर्यपुर, हरकुल, कलापाड़ा, छाघरिया, नानकाना ग्रामों में विशेष कार्य किया।
महाराष्ट्र में अतिवृष्टि –
महाराष्ट्र के 18 जिलों के 51 गाँवों की 101 बस्तियों में 153 टन अनाज का वितरण, 9,400 किट्स (जिसमें अनाज, शक्कर, चायपत्ती, चटाई, चादर, साड़ी, बर्तन, स्टोव, मिट्टी का तेल आदि सामग्री थी), 10 ट्रक कपड़े, 1,49,750 भोजन पैकेट्स वितरित किए गए। 56 वैद्यकीय शिविरों में 40 हलार लोगों पर 50 डाॅक्टरों द्वारा उपचार किया गया, 275 लोगों को डूबने से बचाया गया।
ठाणे जिले के किराडपाडा में 90, बापगाँव में 40 तथा कल्याण के उंबरडा सापरडा में 10 घरों का पुनर्वसन किया गया। कुल 140 घर बनाकर दिए गए।
कोंकण, ठाणे, नांदेड़ आदि स्थानों पर लगभग 100 टन अनाज, दस हजार किट्स (जिसमें चावल, ज्वार, गेंहूँ, दाल, चटाई, चादर, साड़ी, स्टोव, पानी की बोतलें आदि वस्तुएं थीं), 50000 भोजन पैकेट्स का वितरण किया गया। कचरा उठाना, कीटनाशक दवाइयों का छिड़काव, स्कूल के बच्चों को उनके घरों, रिश्तेदारों तक पहुँचाना, बाढ़ में फंसे लोगों को राह दिखाकर सुरक्षित स्थानों पर पहुँचने के लिए मदद करना कार्य भी किए गए।
राजस्थान और उड़ीसा में दुर्भिक्ष –
2001 में राजस्थान और उडीसा में सूखे के समय अनेक शिविर खोले गए, उनमें भोजन की व्यवस्था की गई, पीडित क्षेत्रों में 400 से अधिक कुओं को गहरा करवाया गया, राजस्थान के सूखा पीडित क्षेत्रों में अनाज बाॅंटा गया। मक्खन, दूध और विटामिन गोलियाँ महिलाओं और बच्चो में बांटे गए। उडीसा में काम के लिए अनाज देने की प्रक्रिया शुरु की गई। पशुधन को बचाने के लिए चारा बांटा गया।
उड़ीसा में चक्रवात –
तटीय क्षेत्रों में अक्टूबर 1999 में 300 किलोमीटर प्रति घण्टे की गति से चली तूफानी हवाओं से उत्पन्न चक्रवातों के कारण लाखों लोग प्रभावित हुए, कई नदियों में बाढ़ जैसी स्थिति बन गई। मरने वालों की संख्या 20,000 हो गई थी। खाने के लिए भोजन और पीने के पानी मिलना दूभर हो गया, इस चुनौती को स्वीकारा और आपदा में मरे लोगों की अन्तिम क्रिया की, लगभग 11,500 कंकालो को हटाया। 50 लाख लोंगो में भोजन वितरित किया और 15,0000 लोगों को काम के बदले अनाज देने के कार्य में लगाया। लोगों को पोलीथीन शीट बांटे। 429 डाक्टर सेवा में लगे। 4 लाख लोगों में कपडे वितरित हुए। एक अनाथाश्रम वात्सल्य मंदिर के नाम से शुरु किया गया जिसने सौ अनाथ बच्चों को रखा गया।
आन्ध्र प्रदेश में समुद्री तूफान –
70 ग्रामों में चावल, वस्त्र एवं बर्तन वितरित किए गए। 50,000 नारियल वृक्षों की पौध, 500 बोरा धान के बीज, 500 बोरी यूरिया खाद उसी प्रकार कपड़ा बनाने की हाथ मशीनें, धागा, मछली पकड़ने के जाल, लोगों को वितरित कराए गए।
तमिलनाडु सुनामी –
वर्ष 2005 में तमिलनाडु में सुनामी लहरों ने भयंकर बर्बादी मचाई थी। अनेक मौत के शिकार हुए, हजारों लापता हुए और अरबों रुपए की सम्पत्ति नष्ट हुई। सहायता कार्य प्रारम्भ हुए। मछुआरों को जिनकी नावें नष्ट हो गई थीं नावें देने की व्यवस्था की। फाइबर की एक नाव की लागत लगभग डेढ़ लाख रुपए, काष्ठ नौका की प्रति नाव लागत 82,000 रुपए, पावर इंजिन लगभग 23,000 व मछली पकड़ने के लिए जाल की कीमत लगभग 45,000 रूपए आती है। वहाँ विश्व हिन्दू परिषद द्वारा 25 नावें वितरित की गई।
बिहार की बाढ़ 2008 –
18 अगस्त, 2008 को उत्तर बिहार के छः जिलों के 32 प्रखण्डों के एक हजार से अधिक ग्रामों ने रातों रात समुद्र का रूप धारण कर लिया। 30 लाख से अधिक की आबादी तबाह हो गई, एक लाख नर-नारी, बूढ़े-बच्चे तथा पांच लाख पशु तीव्र जलधारा की भेंट चढ़ गए।
19 अगस्त से ही विहिप के 50 कार्यकर्ताओं ने बचाव कार्य प्रारंभ किया। शहर एवं आसपास के गावों से भोजन के पैकेट लाकर 500 लोगों को भोजन कराया। 20 अगस्त को एकमा, बमनगामा, बरैल, बरुआरी, परसौनी के सभी विद्यालयों में लोगों को ठहराया गया, भोजन के पैकेट दिए गए। उपर्युक्त स्थानों पर ठहरे लोगों को 12 सितम्बर तक भोजन के पैकेट दिए गए। भीमनगर, वीरपुर, वसंतपुर, हृदयनगर में सूखा भोजन पैकेट भेजा गया। प्रत्येक दिन 5000 लोगों को भोजन कराया गया।
20 ट्रक खाद्यान्न, चूड़ा, चावल, त्रिपाल, दाल, बिस्कुट, दवाई 10 कार्टून, पटना से 5 कार्टून दवाई, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के डाॅक्टरों की टीम ने 4 दिन में 1500 लोगों को दवा वितरण की। दिल्ली, हरियाणा, पंजाब एवं लखनऊ के डाॅक्टरों की टीम बच्चों के लिए दूध पाउडर लेकर पहंुची। उ0 बिहार के किशनगंज जिला से एक ट्रक खाद्यान्न एवं कपड़े, पटना चूड़ी बाजार से एक मिनी ट्रक खाद्यान्न, कपड़े, बिस्कुट, फिरोजाबाद पटना से एक ट्रक चावल, आटा, दाल, रिफाईन, मसाला एवं कपड़े। सिलीगुड़ी बंगाल से 2000 साड़ी कुर्ता, पैजामा, गमछा, 3000 किलो चूड़ा-गुड़ का वितरण हुआ।

आतंकवादियों की चुनौती स्वीकार की
1987 में सन्तों की राष्ट्रीय सद्भावना यात्रा –
शनिवार, दिनांक 28 फरवरी से सोमवार, दिनांक 09 मार्च, 1987 तक 10 दिनों की अवधि में भारत के महान सन्तों ने एक ‘‘राष्ट्रीय सद्भावना यात्रा‘‘ ब्रह्मकुण्ड (हर की पौड़ी-हरिद्वार) से अमृतकुण्ड (श्रीहरमन्दिर साहिब-अमृतसर) तक निकाली थी। इस यात्रा का मुख्य उद्देश्य पंजाब के सभी वर्गों में सद्भावना का निर्माण करना था।
जब-जब भी हिन्दू समाज किसी सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक अथवा राष्ट्रीय समस्या से घिरा है तब-तब समाज के विकास और समस्याओं के निदान के लिए ऋषि, महर्षि और सन्त-महात्माओं ने आगे आकर मार्गदर्शन किया है।
1980 ई. के बाद पंजाब में स्थिति बड़ी भयंकर हो गई थी। आतंकवादियों द्वारा गैर सिक्खों को मारा जाने लगा था। हिन्दू-सिखों में परस्पर अविश्वास की भावना घर करती जा रही थी। हिन्दुओं और सिखों में सद्भावना का वातावरण बनाना एक अनिवार्यता बन गई थी। 1986 में अहमदाबाद में केन्द्रीय मार्गदर्शक मण्डल की बैठक में साधु-सन्तों, धर्माचार्यों के नेतृत्व में ‘‘राष्ट्रीय सद्भावना यात्रा‘‘ निकालने की घोषणा की गई। इस यात्रा और उसके कार्यक्रम की पुष्टि हरिद्वार में आयोजित सन्त सम्मेलन में की गई।
यात्रा 28 फरवरी, 1986 को हरिद्वार से प्रारम्भ हुई तथा रूड़की, सहारनपुर, यमुनानगर, जगाधरी, अम्बाला, चण्डीगढ़, सरहिन्द, राजपुरा, पटियाला, संगरूर, नाभा, गोविन्दगढ़, खन्ना, लुधियाना, मोगा, फिरोजपुर, जीरा, तरनतारन, कपूरथला, जालन्धर, फगवाड़ा, बंगा, नवांशहर, होशियारपुर, मुकेरियाँ, पठानकोट, तारागढ़, गुरूदासपुर, धारीवाल, बटाला होती हुई 09 मार्च, 1986 को अमृतसर पहुँची।
सन्त समाज वाहनों से चलता था, नगर में प्रवेश से लेकर सभा स्थल तक पदयात्रा, नगर संकीर्तन व सद्भावना सभा के पश्चात् नगर के दूसरे छोर तक पुनः पदयात्रा करते थे। निर्धारित कार्यक्रमों के अतिरिक्त मार्ग में पड़ने वाले ग्रामों या बाजारों में भी यात्रा के स्वागत कार्यक्रम और इन स्वागत स्थलों पर प्रमुख धर्माचार्यों द्वारा आशीर्वाद देने की व्यवस्था भी रखी गई थी। यात्रा में कुल 20 कार्यक्रम स्थल तथा 45 स्वागत स्थल रखे गए थे।
सम्पूर्ण भारत के शैव, वैष्णव, बौद्ध, जैन, सिख, आर्य समाजी, सनातनी, उदासीन, रामानन्दी, कबीरपंथी, नानकपंथी एवं राधास्वामी सम्प्रदायों के धर्माचार्य इस सद्भावना यात्रा में सम्मिलित हुए। शान्ति और सद्भावना का सन्देश जन-जन में पहुँचाने के लिए और लोगों को राष्ट्रीय एकता एवं सामाजिक भाइचारे के प्रति जागरूक करने हेतु अपने मठों से निकल पड़े थे। पंजाब समस्या के इतिहास में यह पहला अवसर था कि देश की सन्त शक्ति ने सैंकड़ों किलोमीटर की लम्बी यात्रा में भाग लिया और 44 स्थानों पर पदयात्राएँ करके सांस्कृतिक तथा राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने का सन्देश दिया था। सद्भावना यात्रा में लगभग 60 निहंग सिखों का जत्था अत्यन्त प्रेरणा और आकर्षण का केन्द्र बिन्दु रहा। वीर वेश में सजे हुए निहंग रास्ते में युद्धाभ्यास करते हुए चलते थे।
धर्माचार्यों द्वारा दिए गए भाषणों का सार यह था कि सिखों और सहजधारियों के पूर्वज, इष्टदेव, गुरु और संस्कृति एक है, उनके मध्य रक्त एवं मांस का सम्बन्ध है। यह रिश्ते तोड़ने का काम राजनीतिज्ञों ने किया है, लेकिन इन सम्बन्धों को जोड़ने का काम सन्त-महात्मा करेंगे। आतंकवाद का मुकाबला दोनों समुदायों को एकजुट होकर करना चाहिए। पूज्य वामदेव जी महाराज एवं स्वामी सत्यमित्रानन्द जी महाराज के प्रभावी भाषणों की पंजाब में गहरी छाप पड़ी।
यात्रा में नामदेव की डिन्डी महाराष्ट्र से 20, गुजरात से 16, केरल से 5, कर्नाटक से 8, तमिलनाडु से 4, राजस्थान, मध्यप्रदेश, चित्रकूट और अयोध्या से 350 से अधिक सन्त और जगाधरी के अखिल भारतीय वाल्मीकि खालसा पंथ के 50 निहंग भी सम्मिलित हुए थे। श्रीमंत विजयाराजे सिन्धिया भी यात्रा में सम्मिलित हुईं। कुल 500 से अधिक सन्त और हजारों की संख्या में अन्य व्यक्ति इस यात्रा में सहभागी बने।
मोगा, तरनतारन, जगरांव, बटाला जैसे आतंकवादियों के गढ़ समझे जाने वाले स्थानों पर सिख तथा सिक्खेतर समग्र हिन्दू समाज ने पूरे उत्साह से यात्रा का स्वागत किया एवं श्रद्धा से पदयात्रा में सम्मिलित होकर कीर्तन किया। रात्रि के 9 तथा 10 बजे तक की सभाओं में सम्मिलित रहकर जनता ने निर्भयता का परिचय दिया। जबकि उस समय समग्र पंजाब में संध्या को 6 बजे तक सभी बाजार बन्द होकर सड़कें सूनी हो जाती थीं।
अनेक धर्माचार्य मार्ग में सहज रूप से पड़ने वाले सभी प्रमुख मन्दिरों एवं गुरुद्वारों में सद्भावना प्रार्थना के लिए जाते थे। प्रायः सभी स्थानों पर प्रेम, सौहार्द और सद्भावना की विचित्र त्रिवेणी देखने को मिली। इसे देखकर नेत्र तृप्त हो जाते थे। धोबी एसोसिएशनों की ओर से निःशुल्क वस्त्र प्रक्षालन, वस्त्र रात्रि तक धोकर दे दिए जाते थे। रात्रि में सेवा के लिए नापित समाज, दर्जी समाज सब सुध-बुध विसार कर सन्तों की सेवार्थ जुट जाते थे।
आतंकवादी क्षेत्र में जहाँ भय और शंका का वातावरण था, वहाँ इस यात्रा से विश्वास एवं निर्भयता का वातावरण उत्पन्न करने में बड़ा सहयोग मिला। ‘‘हम सब एक हैं, एक रहेंगे‘‘ यह संकल्प सभी जगह सभी के द्वारा निःसंकोच भाव से बार-बार दोहराया गया।
परमहंस स्वामी वामदेव जी, संयोजक महामण्डलेश्वर स्वामी सत्यमित्रानंद जी, पेजावर मठाधिपति विश्वेशतीर्थ जी, जगद्गुरु रामानन्दाचार्य श्री स्वामी शिवरामाचार्य जी, नाथ सम्प्रदाय के प्रमुख महंत अवेद्यनाथ जी, अडमार पीठ के प्रमुख श्री स्वामी विभुदेशतीर्थ जी, महामण्डलेश्वर स्वामी निरंजनानन्द जी, परमार्थ आश्रम-हरिद्वार के स्वामी चिन्मयानन्द जी, चित्रकूट के मानस महारथी श्री त्यागी जी, श्री अशोक जी सिंहल, आचार्य गिरिराज किशोर जी, पंजाब प्रान्त के परिषद के अध्यक्ष श्री ग. न. यादव और महंत रामप्रकाशदास जी ने अकाल तख्त के कार्यकारी जत्थेदार प्रो. दर्शन सिंह रागी से भेंट की। प्रो. रागी ने धर्माचार्यों के समक्ष आतंकवाद की निन्दा की। उन्होंने देश का आदर्श राज्य ‘‘रामराज्य‘‘ बताया, धर्माचार्यों से बातचीत के समय प्रो. रागी के साथ दरबार साहिब के मुख्य ग्रन्थी ज्ञानी पूरन सिंह, श्रीअकाल तख्त के मुख्य ग्रन्थी ज्ञानी कश्मीर सिंह और दमदमी टकसाल के जत्थेदार ज्ञानी जसवंत सिंह भी उपस्थित थे।
1996 की अमरनाथ यात्रा –
जब से कश्मीर में मुस्लिम जेहादी आतंकवाद बढ़ा था, प्रतिवर्ष होने वाली श्री अमरनाथ यात्रा पर संकट के बादल गहराते जा रहे थे, आतंकवादियों की ओर से धमकियाँ आने लगी थी। जनवरी, 1996 में अमरनाथ यात्रा को एक अभियान के रूप में लेने का संकल्प लिया। सम्पूर्ण देश में अमरनाथ यात्रा के सम्बन्ध में वातावरण निर्माण हुआ।
श्री अमरनाथ बर्फानी: कश्मीर के अनन्तनाग जिले की ऊँची-ऊँची पहाड़ी चोटियों के मध्य 12,500 फीट की ऊँचाई पर स्थित गुफा जहाँ तक पहुँचने के लिए 14,500 फीट ऊँचा पर्वत पार करना पड़ता है। अमरनाथ गुफा भगवान शंकर का स्थान है। श्रावण मास की पूर्णिमा को गुफा में बर्फ का शिवलिंग बनता है। यात्री गुफा में हिम शिवलिंग के दर्शन हेतु जाते हैं।
ऊँचाई के कारण हाड़ कँपा देने वाली ठंड और कच्चे-पक्के पहाड़ों को काटकर बनाया गया दुर्गम चढ़ाई वाला मार्ग वर्ष के 8 माह बर्फ से ढका रहता है। आतंकवादियों की चुनौती का सामना करने, सर पर कफन बाँधकर, कठिनाई भरी इस अमरनाथ यात्रा पर नौजवान 18 अगस्त, 1996 को चल पड़े। संख्या को देखकर जम्मू प्रशासन के हाथ पाँव फूलने लगे।
22 अगस्त की देर रात्रि में अचानक भीषण वर्षा आरम्भ हो गई। वर्षा तीव्र से तीव्रतर और तीव्रतर से तीव्रतम होती गई। बरसते पानी और हड्डी कंपाने वाली ठंड में वे अभी थोड़ी दूर ही चले थे कि रोक दिए गए, सूचना आ गई कि मौसम बहुत खराब हो गया है, बर्फ गिर रही है रास्ता बन्द हो गया है, सैंकड़ों लोग हताहत हुए हैं, गायब हैं। जितने मुँह उतनी बातें और उतनी ही अफवाहें। पहलगाम में थोड़ी देर के लिए भय और अनिश्चितता का माहौल बन गया। पानी मूसलाधार गिर रहा था, सर छुपाने के लिए जगह नहीं दिख रही थी। पहलगाम की क्षमता से अधिक लोग वहाँ पहुँच गए थे। 24 अगस्त की दोपहर तक पानी लगातार बरसता रहा, लोग सूचनाएँ प्राप्त करने का प्रयास करते रहे, लोगों में गजब का उत्साह था, विपरीत परिस्थितियों में भी युवक यात्रा पर जाने को तैयार थे किन्तु त्रासदी भीषण थी, मार्ग बन्द हो गया था। प्रशासन गए हुओं को वापस लाने के लिए सोच रहा था। अनेकों के मरने की सूचना आ रही थी। इधर भण्डारों में भोजन समाप्त प्रायः था। अस्पताल बीमारों और शवों से पट गया था।
ऐसे में बजरंग दल का कार्यकर्ता अपने साथ के कार्यकर्ताओं को एकत्रित कर जुट गया सेवा कार्यों में। अपने कार्यकर्ताओं के साथ आम दर्शनार्थियों के भी सुरक्षित रहने की कमान संभाली। अफरा-तफरी का माहौल बन गया था, भोजन के लिए लोग टूट पड़ने लगे। किन्तु बजरंग दल ने सभी व्यवस्था संभाल ली। चिकित्सालय में बीमारों की व्यवस्था देखना, शवों की पहचान करना, लाशों को ढोना, इसके साथ ही जन सामान्य को भी साहस बाँधकर प्रोत्साहित करने का काम कार्यकर्ताओं ने किया। इतनी बड़ी त्रासदी से उत्पन्न अव्यवस्था में प्रशासनिक अधिकारियों के कैम्प कार्यालय पर जाकर उन्होंने मेला अधिकारी से सम्पर्क करके भोजन, आवास तथा अन्य मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए सभी व्यवस्थाओं को सुचारु बनाया। मार्ग खुलने के बाद सभी के सुरक्षित वापस होने तक बजरंग दल कार्यकर्ता सक्रिय रहे।
आतंकवादियों को यह सबक मिला कि हिन्दू धमकियों से नहीं घबराता, वहीं समाज के सामने प्रकट किया कि बजरंग दल के कार्यकर्ता का वास्तविक स्वरूप है – सेवा, सुरक्षा और संस्कार। वह नहीं जो हमारे विरोधियों द्वारा अपने राजनैतिक लाभ के लिए समाज को दिखाया गया है।
2005 की बाबा बूढ़ा अमरनाथ यात्रा –
जम्मू शहर से उत्तर-पश्चिम में 290 कि.मी. दूर पंुछ जिले की मण्डी तहसील के ग्राम राजपुरा स्थित लोरेन घाटी में समुद्र तल से 4500 फीट की ऊँचाई पर बाबा बूढ़ा अमरनाथ चट्टानी के नाम से पुलस्ती नदी के बायें तट पर प्रसिद्ध स्थान है। यहाँ से पीर-पंजाल की बर्फीली चोटियाँ दिखाई देती हैं।
जम्मू से सुन्दरबनी, नौशेरा, राजौरी, स्वर्णकोट (सुरनकोट), चण्डक होते हुए मण्डी अथवा चण्डक से पुंछ होकर मंडी का मार्ग है। सम्पूर्ण मार्ग अत्यन्त दुर्गम और आतंकवाद से ग्रस्त है। पूरे रास्ते में घने जंगल है, आतंकवादियों के ठिकाने हैं। सायंकाल 4.00 बजे के बाद इस मार्ग पर यातायात रोक दिया जाता है और प्रातः 7.00 बजे तब खुलता है जब सेना का बम निरोधक दस्ता पूरे मार्ग का निरीक्षण कर लेता है। मार्ग पाकिस्तान सीमा से सटकर जाता है। उस पर पाक की नजरें हैं। सम्पूर्ण क्षेत्र आतंकवादियों का अड्डा है। नौशेरा, राजौरी और पुंछ से भी हिन्दुओं को भगाने का षडयंत्र चल रहा है। आतंकवाद के विस्तार के कारण यह यात्रा लगभग समाप्त सी हो गयी थी। इसे पुनप्र्रतिष्ठित करने का दायित्व बजरंग दल ने लिया।
1965 में जब भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध हो रहा था तब पाकिस्तानी सेना ने कब्जा करके इस शिवलिंग को तोड़ने का प्रयास किया था किन्तु वे सफल नहीं हो सके और शिव कृपा से विजयश्री भारतीय सेना को मिली। मंदिर में स्थित शिवलिंग श्वेत चकमक (स्फटिक) पत्थर का है जो बर्फ की तरह ही चमकता है।
सम्पूर्ण क्षेत्र में चले आ रहे आतंकियों के कहर ने इस राष्ट्रीय यात्रा को तहसील और जिले तक ही सीमित कर दिया और समय सीमा भी दो-तीन दिन तक ही सिमट गई। इस यात्रा को पुनप्र्रतिष्ठित करना आवश्यक था। बँटवारे के समय कश्मीर एवं जम्मू के बहुत बड़े भू-भाग पर पाकिस्तान ने और 1962 से चीन ने कब्जा कर रखा है और लगातार आतंकी हमलों के कारण कश्मीर घाटी हिन्दुओं से खाली हो गई। अब योजना बचे हुए जम्मू को खाली कराने की है। आज राजौरी में 35 प्रतिशत और पुंछ में 8 प्रतिशत हिन्दू-सिख बचे हैं।
धर्म को पूजा-पाठ एवं कर्मकाण्ड के प्रति आस्थाओं तक ही समेटे न रहें। राष्ट्र निष्ठा एवं राष्ट्ररक्षा का संकल्प यात्रा के माध्यम से प्रकट हो जैसे-1996 में समाप्त प्राय हो रही बाबा अमरनाथ की यात्रा को इस देश की नौजवानी ने अपना बलिदान देकर पुनप्र्रतिष्ठित किया। वैसे ही वर्ष 2005 में बजरंग दल के द्वारा इस यात्रा का आयोजन किया, जिसमें हजारों की संख्या में हिन्दू युवकों ने भाग लेकर अपने संकल्प को प्रकट किया। आज यह यात्रा स्थापित हो चुकी है। आतंकवादी हिम्मत हार चुके हैं।
राष्ट्रीय अपमान का परिमार्जन एवं मानबिन्दुओं की रक्षा
श्रीराम जन्मभूमि की रक्षा
सम्पूर्ण अयोध्या हिन्दुओं का पवित्रतम (सप्तपुरियों में प्रथम) तीर्थ क्षेत्र है। उसके सांस्कृतिक स्वरूप की रक्षा करना हिन्दू समाज का कत्र्तव्य है। श्रीरामजन्मभूमि मंदिर परिसर या अयोध्या की सांस्कृतिक सीमा में कोई मस्जिद/स्तम्भ/इस्लामिक सांस्कृतिक केन्द्र बनाने के षडयन्त्र को पूरी ताकत से विफल किया जाएगा।
सरकार व मुस्लिमों के वचन – सितम्बर, 1994 में भारत सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में एक शपथपत्र दायर करके कहा था कि यदि यह सिद्ध हो जाए कि 1528 के पहले विवादित स्थल पर कोई हिन्दू भवन था तो भारत सरकार हिन्दू भावनाओं के अनुसार व्यवहार करेगी।
मुस्लिम समाज ने भी भारत सरकार को यह वचन दिया था कि यदि यह सिद्ध हो जाता है कि किसी मन्दिर को तोड़कर यह ढांचा बना है तो हम स्वेच्छा से यह स्थान हिन्दू समाज को सौंप देंगे।
2003 में श्रीराम जन्मभूमि के नीचे की राडार तरंगों द्वारा कराई गई फोटोग्राफी रिपोर्ट तथा भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा किए गए उत्खनन से यह सिद्ध हो चुका है कि इस स्थान पर ईसा पूर्व 1500 वर्ष से उत्तर भारतीय शैली का मन्दिर था। धरती के नीचे दीवारें, फर्श, ऊपर खड़े रहे खम्भों के आधार, जल पुष्करणी एवं एक शिव मन्दिर प्राप्त हुए हैं। अतः भारत सरकार और मुस्लिम समाज दोनों को अपने वचनों का पालन करना चाहिए।
सन्तों का संकल्प है कि ‘भारत सरकार द्वारा अधिगृहीत सम्पूर्ण 70 एकड़ भूमि प्रभु श्रीराम की प्राकट्य भूमि, क्रीडा भूमि व लीला भूमि है। जन्मस्थान सहित अधिगृहीत सम्पूर्ण परिसर पर ही भगवान श्रीराम का उनके गौरव के अनुरूप भव्य मंदिर बनेगा और उन्हीं पत्थरों से बनेगा जो श्रीराम जन्मभूमि न्यास द्वारा अयोध्या में रामघाट चैराहा, परिक्रमा मार्ग पर स्थित कार्यशाला में तराश कर रखे गए हैं।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पूर्णपीठ ने सितम्बर, 2010 को दिए गए अपने निर्णय में स्पष्ट लिखा है कि यह निश्चित किया जाता है कि हिन्दुओं के विश्वास के अनुसार और जैसा कि वे पूजा करते चले आ रहे हैं, तीन गुम्बदों वाले ढाँचे में बीच वाले गुम्बद का स्थान ही भगवान राम का जन्मस्थान है।
सुन्नी वक्फ बोर्ड ने अदालत से यह माँग की थी कि विवादित ढाँचे को मस्जिद घोषित किया जाए। अदालत ने अपने निर्णय में स्पष्ट रूप से लिखा कि वह बाबरी मस्जिद नहीं है, विवादित ढाँचा जिसे बाबरी मस्जिद के रूप में जाना जाता था, वह जन्मस्थान मन्दिर को तोड़कर बनाया गया और ढाँचे को मस्जिद के रूप में घोषित किए जाने के लिए कोई वैधानिक वक्फ निर्मित नहीं हुआ। इसी आधार पर अदालत ने लिखा कि मुकदमें में सुन्नी वक्फ बोर्ड को कोई राहत नहीं मिलेगी और उनका मुकदमा निरस्त किया जाता है।
निर्मोही अखाड़ा की माँग थी कि ढाँचे के अन्दर विराजमान भगवान की पूजा-अर्चना और चढ़ावे का प्रबन्धन निर्मोही अखाड़े को सौंपा जाए। अदालत ने स्पष्ट लिखा कि विवादित सम्पत्ति पर निर्मोही अखाड़ा का मालिकाना हक नहीं बनता तथा अखाड़े ने जिस रूप में अपना मुकदमा लिखा है वह स्वीकार करने योग्य नहीं है और निर्धारित समय सीमा में दायर नहीं किया गया है अतः निर्मोही अखाड़ा को कोई राहत नहीं दी जा सकती है और मुकदमा रद्द किया जाता है।
अयोध्या का इतिहास – भारत की समृद्ध संस्कृति का इतिहास है। अयोध्या की गौरवगाथा अत्यन्त प्राचीन है। यह सूर्यवंशी राजाओं की राजधानी रही, महाराजा सगर, भगीरथ तथा सत्यवादी हरिश्चन्द्र इसी वंश में हुए। जैन परम्परा में पाँच तीर्थंकरों की जन्मभूमि, गौतम बुद्ध की तपस्थली दंत धावन कुण्ड अयोध्या में है, गुरुनानक देव जी महाराज ने 1509 ई0 में अयोध्या आकर श्रीराम जन्मभूमि मन्दिर के दर्शन किए थे। श्रीराम जन्मभूमि पर कभी एक भव्य व विशाल मन्दिर था।
गुलामी को हटाने की ललक – आजादी के बाद देश के प्रथम गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल ने संकल्प लेकर आक्रमणकारी महमूद गजनी द्वारा तोड़े गए भगवान सोमनाथ के मन्दिर के पुनर्निर्माण कराया। मन्दिर में प्राण-प्रतिष्ठा के समय तत्कालीन महामहिम राष्ट्रपति देशरत्न डाॅ0 राजेन्द्र प्रसाद जी स्वयं वहाँ उपस्थित रहे थे। भारत सरकार ने 1947 के बाद देश के पार्क, सड़क, अस्पताल, नगर, रेलवे स्टेशन के नाम बदले, विक्टोरिया एवं जार्ज पंचम की मूर्तियाँ हटाई, क्योंकि ये सब गुलामी की याद दिलाते थे। श्रीराम जन्मभूमि की मुक्ति और मन्दिर का निर्माण इसी श्रृंखला की कड़ी है।
जन्मभूमि मुक्ति के संकल्प से शिलान्यास तक – 8 अप्रैल, 1984 को दिल्ली के विज्ञान भवन में भारत की अनेक धार्मिक परम्पराओं के 558 सन्त धर्माचार्य एकत्र हुए (प्रथम धर्मसंसद), ताले को खुलवाने के लिए व्यापक जन-जागरण का संकल्प लिया, रामजानकी रथयात्रा द्वारा जनजागरण हुआ। फैजाबाद के जिला न्यायाधीश ने 01 फरवरी, 1986 को ताला खोलने का आदेश दे दिया।
जनवरी, 1989 में प्रयागराज में कुम्भ मेला के अवसर पर पूज्य देवराहा बाबा की उपस्थिति में मन्दिर निर्माण के लिए शिलापूजन का निर्णय हुआ। देश-विदेश से पौने तीन लाख शिलाएं अयोध्या पहुँची। 09 नवम्बर, 1989 को भावी मन्दिर का शिलान्यास सम्पन्न हुआ।
प्रथम आह्वान- 24 मई, 1990 को हरिद्वार में हिन्दू सम्मेलन हुआ, देवोत्थान एकादशी (30 अक्टूबर, 1990) को मन्दिर निर्माण के लिए कारसेवा करने की घोषणा हुई। यह सन्देश गांव-गांव तक पहुँचाने के लिए 01 सितम्बर, 1990 को अयोध्या में अरणि मंथन के द्वारा अग्नि प्रज्ज्वलित की गई, इसे ‘रामज्योति’ कहा गया। दीपावली के पहले देश के लाखों गांवों में यह ज्योति पहुँचा दी गई। उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री ने घोषणा की कि ‘अयोध्या में परिन्दा भी पर नहीं मार सकता’। परन्तु रामभक्तों ने 30 अक्टूबर, 1990 को गुम्बदों पर चढ़कर झण्डा गाड़ ही दिया। 02 नवम्बर को भयंकर नरसंहार हुआ, देशभर में रोष छा गया। कारसेवकों की अस्थियों का देशभर में पूजन हुआ, 14 जनवरी, 1991 को अस्थियाँ माघ मेला के अवसर पर प्रयागराज संगम में प्रवाहित कर दी गईं। मन्दिर निर्माण का संकल्प और मजबूत हो गया। घोषणा हुई- सरकार झुके या हटे।
वार्ताओं के दौर – वार्ताएं भी हुई हैं। स्वर्गीय राजीव गांधी के प्रधानमंत्रित्व काल में गृहमंत्री बूटा सिंह वार्ता कराया करते थे। हर मीटिंग में वार्ता के मुद्दे ही बदल जाते थे। स्व0 विश्वनाथ प्रताप सिंह के प्रधानमंत्रित्व काल में एक वार्तालाप का दिन शुक्रवार था, मुस्लिम पक्ष के लोग दोपहर की नमाज के समय नमाज पढ़ने चले गए, वापस लौटे तो स्वामी सत्यमित्रानन्द जी महाराज ने खड़े होकर अपना आंचल फैलाकर कहा कि ‘‘मैं आपसे श्रीराम जन्मभूमि की भीख मांगता हूँ’’। नमाज के बाद जकात (दान) होती है, आप मुझे जकात में श्रीराम जन्मभूमि दे दीजिए। एक बार सैयद शहाबुद्दीन साहब ने स्वयं कहा था कि यदि यह सिद्ध हो जाए कि किसी मन्दिर को तोड़कर यह स्थान बना है, तो हम इसे छोड़ देंगे। अगली बैठक में सैयद शहाबुद्दीन अपनी बात से पलट गए। श्री चन्द्रशेखर साहब जब प्रधानमंत्री थे तब भी वार्ताएं हुईं। दोनों पक्षों ने अपने साक्ष्य लिखित रूप में गृह राज्यमंत्री को दिए। साक्ष्यों का आदान-प्रदान हुआ। दोनों पक्षों ने एक दूसरे के साक्ष्यों के उत्तर/आपत्तियाँ दी। निर्णय हुआ कि दोनों पक्षों के विद्वान आमने-सामने बैठकर प्रस्तुत हुए लिखित साक्ष्यों पर वार्तालाप करेंगे। 10 जनवरी, 1991 का दिनांक विद्वानों के मिलने के लिए तय हुआ परन्तु मुस्लिम पक्ष के राजस्व और कानूनी विशेषज्ञ मीटिंग में आए ही नहीं। पुनः 25 जनवरी, 1991 को गुजरात भवन में मीटिंग निर्धारित की गई। मुंिस्लम पक्ष का कोई भी विशेषज्ञ नहीं पहुँचा। मुस्लिम पक्ष की अनुपस्थिति को अपमानजनक समझते हुए वार्तालाप का दौर यहीं समाप्त हो गया।
विशाल रैली – 04 अप्रैल, 1991 को दिल्ली के बोट क्लब पर रैली हुई, देशभर से पचीस लाख रामभक्त आए, भारत के इतिहास की विशालतम रैली थी। भारत सरकार ने रैली की विशालता को देखकर बोट क्लब पर रैली आयोजन ही प्रतिबंधित कर दिया।
समतलीकरण के दौरान मन्दिर के प्रमाण मिले – उत्तर प्रदेश सरकार ने विवादित ढाँचे के चारों ओर कुछ भूमि अधिग्रहीत कर उसका समतलीकरण कराया, ढाँचे के दक्षिणी-पूर्वी कोने से जमीन के नीचे से शिव पार्वती की खंडित मूर्तियाँ, सूर्य के समान अर्ध कमल, मन्दिर शिखर का आमलक, उत्कृष्ट नक्काशी वाले पत्थर व देवगणों की मूर्तियाँ प्राप्त हुईं।
द्वितीय आह्वान- दिल्ली में 30 अक्टूबर, 1992 को पुनः धर्मसंसद हुई, गीता जयन्ती (6 दिसम्बर, 1992) कोे कारसेवा पुनः प्रारम्भ करने की घोषणा की गई, लाखों रामभक्त अयोध्या पहुँचे, निर्धारित तिथि व समय पर रामभक्तों का रोष फूट पड़ा, जो ढाँचे को समूल नष्ट करके ही शान्त हुआ।
शिलालेख मिला- 6 दिसम्बर, 1992 को जब ढाँचा गिर रहा था तब उसकी दीवारों से एक शिलालेख प्राप्त हुआ था, विशेषज्ञों ने पढ़कर बताया कि यह शिलालेख 1154 ई0 का संस्कृत में लिखा 20 पंक्तियों का है, ऊँ नमः शिवाय से शिलालेख प्रारम्भ होता है, विष्णुहरि के स्वर्ण कलशयुक्त मन्दिर व अयोध्या के सौन्दर्य का वर्णन है, दशानन के मान-मर्दन करने वाले का वर्णन है। शिलालेख उस स्थान पर कभी खड़े रहे भव्य मन्दिर के अस्तित्व को ही सिद्ध करता है।
कपड़े के घर में रामलला- ढाँचा ढह जाने के तत्काल बाद उसी स्थान पर भगवान का विग्रह रखकर पूजा प्रारम्भ हो गई। चार कोनों पर चार बल्लियाँ खड़ी करके कपड़े लगा दिए और बन गया मन्दिर। आज भी भगवान् कपड़े के इसी मन्दिर में विराजमान हैं। प्रतिदिन हजारों भक्त दर्शन करते हैं, बीस वर्ष बीत चुके हैं, अब कपड़े का बना भगवान का घर आँखों में खटकता है। बस ! इसी को भव्य रूप देना है।
भावी मन्दिर- भावी मन्दिर पत्थरों से बनेगा, मन्दिर दो मंजिला होगा, भूतल पर रामलला और प्रथम तल पर राम दरबार होंगे। सिंहद्वार, नृत्य मण्डप, रंग मण्डप, गर्भगृह और परिक्रमा मन्दिर के अंग हैं। मन्दिर 270 फीट लम्बा, 135 फीट चैड़ा तथा शिखर 125 फीट ऊँचा, परिक्रमा मार्ग 10 फीट चैड़ा, 106 खम्भे-भूतल के खम्भे 16 फीट ऊँचे, दीवारें 6 फीट मोटी हैं, चैखटें सफेद संगमरमर पत्थर की होंगी।
मन्दिर के फर्श पर लगने वाला सम्पूर्ण पत्थर तैयार किया जा चुका है। भूतल पर लगने वाले 106 खम्भे तैयार हैं, भूतल और प्रथम तल पर रंग मण्डप एवं गर्भगृह की दीवारों तथा संगमरमर की चार चैखटें, खम्भों के ऊपर रखे जाने वाले 150 बीम तथा बीम के ऊपर रखे जाने वाले छत के पत्थर भी पर्याप्त संख्या में तैयार हैं। दो मंजिले मन्दिर में लगने वाले पत्थरों का 60 प्रतिशत से अधिक कार्य पूर्ण हो चुका है, पत्थर नक्काशी कार्य अयोध्या में रामघाट चैराहा, परिक्रमा मार्ग पर श्रीराम जन्मभूमि मन्दिर निर्माण कार्यशाला में चल रहा है।
श्रीराम जन्मभूमि सम्पत्ति नहीं है, यह विवाद सम्पत्ति का विवाद ही नहीं है, हिन्दुओं के लिए श्रीराम जन्मभूमि आस्था है, भगवान की जन्मभूमि स्वयं में देवता है, तीर्थ है व धाम है। रामभक्त इस धरती को मत्था टेकते रहे हैं।
वचन का पालन हो – भारत सरकार सर्वोच्च न्यायालय को दिए गए अपने शपथपत्र का पालन करे, संसद में कानून बनाए और मन्दिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त करे। भारत में निवास करने वाले वर्तमान मुस्लिम समाज का बाबर से कोई रक्त सम्बन्ध नहीं है। बाबर कोई धार्मिक पुरुष नहीं था, वह आक्रमणकारी था। अतः मुस्लिम पक्ष श्रीराम जन्मभूमि से अपना वाद वापस ले और अपने वायदे को निभाते हुए स्वेच्छा से यह स्थान हिन्दू समाज को सौंप दे। हिन्दु समाज बदले में उन्हें आत्मीयता और सद्भाव देगा, जो अन्य किसी प्रकार प्राप्त नहीं हो सकेगा।
गंगा रक्षा के प्रयास
अंग्रेज सरकार ने हरिद्वार में गंगा को बाँधकर गंग नहर निर्माण करने की योजना जब बनाई उस समय माँ गंगा के निर्बाध व अविरल प्रवाह को सुरक्षित रखने की, हिन्दू समाज की आस्था की, लड़ाई महामना मदनमोहन जी मालवीय ने प्रारम्भ की। अंग्रेज सरकार झुकी और सरकार ने मालवीय जी के साथ 1916 ई0 में गंगा की निर्बाध अविरल धारा के लिए एक समझौता किया।
जीवन के अन्तिम समय में मालवीय जी ने शिवनाथ काटजू जी (केन्द्र सरकार में मंत्री रहे श्री कैलाशनाथ जी काटजू के सुपुत्र तथा इलाहाबाद उच्च न्यायालय में अधिवक्ता) को अपने पास बुलाकर कहा था कि गंगा के निर्बाध व अविरल प्रवाह के लिए मैं जीवन भर प्रयत्न करता रहा हूँ। मुझे शंका है कि भविष्य में भी गंगा को बाँधने के प्रयास किए जा सकते हैं। उस समय गंगा के प्रवाह को निर्बाध व अविरल बनाए रखने का दायित्व मैं तुम्हें सौंप रहा हूँ।
श्री शिवनाथ काटजू जी कालान्तर में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश बने। न्यायाधीश के पद से सेवानिवृत्ति के पश्चात वे विश्व हिन्दू परिषद के अन्तर्राष्ट्रीय अध्यक्ष बने, तब एक अवसर पर उन्होंने श्री अशोक जी सिंहल को यह प्रसंग सुनाते हुए कहा था कि तब तो मैं यह समझ नहीं सका कि मालवीय जी ने मुझसे यह बात क्यों कही ? मुझे यह दायित्व क्या सोचकर सौंपा ? परन्तु आज विश्व हिन्दू परिषद का अध्यक्ष बनने पर मुझे यह रहस्य समझ में आ रहा है इसलिए विश्व हिन्दू परिषद को गंगा के निर्बाध व अविरल प्रवाह को बनाए रखने का कार्य करना है। मैं तो अपने जीवन में शायद ही कुछ कर सकूँ ?
भागीरथी और भिलंगना के संगम पर गढ़वाल के टिहरी नगर में सोवियत संघ की तकनीकि सहायता से बाँध निर्माण करके जल विद्युत परियोजना तैयार की गई, जैसे ही योजना की बारीकियाँ इस विषय से सम्बंधित कुछ लोगों के सामने आईं तभी वैज्ञानिक डाॅ0 वाल्दिया और भूगोलवेत्ता डाॅ0 नित्यानन्द ने बाँध के कारण बनने वाली विशाल झील से उत्पन्न खतरों से समाज को अवगत कराते हुए अपना विरोध व्यक्त किया था। केन्द्र सरकार में ऊर्जा सचिव रहे श्री टी. एन. शेषन (जो कालान्तर में चुनाव आयुक्त बने) ने भी पर्वतीय क्षेत्र में 4000 फिट की ऊँचाई पर इतने बड़े बाँध की सुरक्षितता पर प्रश्नचिन्ह् लगाया थे। आन्ध्र के वैज्ञानिक डाॅ0 शिवाजी राव ने टिहरी बाँध को टाइम बम बताते हुए एक पुस्तक प्रकाशित की।
वर्ष 1983 ई0 में प्रथम बार (भारत माता-गंगा माता) तथा वर्ष 1995 ई0 में दूसरी बार (भारत माता-गंगा माता-गऊ माता) के माध्यम से विश्व हिन्दू परिषद के तत्वावधान में विराट जन-जागरण किया गया था। इन जन जागरण अभियानों को एकात्मता यात्रा नाम दिया गया था। 1983 ई0 में देवोत्थान एकादशी से गीता जयन्ती तक सम्पन्न 30 दिवसीय एकात्मता यात्रा में तीन प्रमुख यात्राएं एवं 350 उपयात्राएं थीं। देश के गांव-गांव में लगभग 10 करोड़ लोगों तक सम्पर्क हुआ था और गंगा माँ के प्रति परम्परा से चली आ रहे आस्था ने मूर्तरूप धारण किया था।
नवम्बर, 1996 में दिल्ली में आयोजित सप्तम धर्मसंसद अधिवेशन में माँ गंगा की अविरलता, निरन्तरता के लिए प्रस्ताव स्वीकार किया गया था।
प्रधानमंत्री श्री राजीव गांधी से मिलकर उन्हें गंगा की अवस्था के बारे में अवगत कराया गया। श्री राजीव गांधी जी ने कहा था कि वे गंगा की पवित्रता बनाए रखने के लिए एक विस्तृत योजना का प्रारुप तैयार कर रहे हैं, जिसके भविष्य में सुखद परिणाम आएंगे।
विश्व हिन्दू परिषद ने ‘‘गंगा रक्षा समिति’’ बनाई। समिति ने यह निर्णय लिया कि गंगा की वस्तुस्थिति जानने के लिए गंगासागर से हरिद्वार तक मोटरबोट के द्वारा एक जलयात्रा की जाएगी और गंगा के दोनों तटों पर स्थित नगरों में गंगा रक्षा हेतु समाज को जागृत करने के लिए सभाएँ करेंगे। गंगासागर से स्वामी चिन्मयानन्द सरस्वती जी एवं श्री जीवेश्वर मिश्र ने मोटरबोट के द्वारा यात्रा प्रारम्भ की, लगभग 25 सन्त भी थे। बीस दिन की इस यात्रा के पश्चात जब जलयात्रा प्रयागराज पहुँची तो प्रशासनिक अधिकारियों ने कहा कि हद्विार तक पहुँचने के लिए गंगा के प्रवाह में इतना जल नहीं है कि उसमें मोटरबोट चल सके, इसलिए हमारा आग्रह है कि आप इस यात्रा को यहीं विराम दें। जबकि मोटरबोट को चलने के लिए मात्र डेढ़ मीटर गहरे जल की ही आवश्यकता थी। यात्रा को प्रयागराज में ही विराम देने का निर्णय लेना पड़ा। 2500 कि.मी. लम्बी गंगा की वस्तुस्थिति को समझने का इससे अच्छा कोई प्रयास नहीं हो सकता था।
हरिद्वार से दिल्ली तक पूज्य स्वामी अवधेशानन्द गिरि जी महाराज के नेतृत्व में गंगा रक्षा यात्रा निकाली गई। यात्रा की पूर्णता के बाद गंगा रक्षा समिति का एक प्रतिनिधि मण्डल टिहरी बाँध के निर्माण को रोकने के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला था परन्तु वार्तालाप सार्थक न रही। उस समय के ऊर्जा मंत्री श्री कुमार मंगलम ने दो टूक कहा था कि यदि बाँध निर्माण से गंगाजल की गुणवत्ता प्रभावित होती होगी तो यह बाँध नहीं बनेगा।
टिहरी बाँध के विरुद्ध पनप रहे जनाक्रोश को देखते हुए रूड़की विश्वविद्यालय ने एक सेमिनार का आयोजन किया, जिसमें विभिन्न विधाओं के देश के ख्यातिनाम वैज्ञानिक सम्मिलित हुए। अनेक वैज्ञानिकों ने विभिन्न दृष्टिकोणों से अपने विचार व्यक्त किए। श्री अशोक जी सिहल ने एक मिनरल वाॅटर की बोतल सबको दिखाते हुए प्रश्न किया था कि वैज्ञानिक तरीके से शुद्ध किए गए जल की इस बोतल पर उपयोग की अन्तिम तिथि यानि एक्सपायरी डेट 6 माह लिखी है परन्तु गंगाजल के उपयोगिता की कोई अन्तिम तिथि निश्चित नहीं है, क्योंकि वह वर्षानुवर्ष तक शुद्ध बना रहता है। गंगाजल में यह आत्मशुद्धि का जो स्वाभाविक गुण है क्या इसके ऊपर देश में कोई शोध हुआ है ? सभी का उत्तर नकारात्मक था। इस सेमिनार में दो निष्कर्ष मुख्य रूप से सामने आए-
1. भूकम्प से टिहरी बाँध को कोई खतरा नहीं है।
2. गंगा के आत्मशुद्धि के गुण पर कोई वैज्ञानिक अध्ययन अभी तक भारत में नहीं हुआ।
भारत सरकार के प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी से आग्रह किया गया कि भविष्य में किसी संभावित भूकम्प के कारण टिहरी बाँध को होने वाले खतरे, उसके दुष्परिणाम तथा ऊँचे बाँध के कारण बनने वाली झील में एकत्र गंगाजल की गुणवत्ता पर कोई विपरीत प्रभाव पड़ेगा या नहीं, यह जानने के लिए एक विशेषज्ञ जांच समिति का गठन किया जाए। डाॅ0 मुरली मनोहर जोशी की अध्यक्षता में और डाॅ0 माशेलकर के नेतृत्व में समिति का गठन किया गया। समिति ने अपनी रिपोर्ट प्रधानमंत्री को सौंपी। रिपोर्ट के निष्कर्षों से देश अभी तक अनभिज्ञ है।
भारतीय संसद को एक याचिका प्रस्तुत की गई थी। संसदीय समिति में सरकार ने अपना पक्ष रखते हुए कहा था कि यह बाँध बाढ़ नियंत्रण एवं गंगा में जलधारा का प्रवाह बनाने के लिए बनाया जा रहा है तथा वर्षाकाल में ही वर्षा के जल से इस बाँध को भरा जाएगा।
गंगा रक्षा के लिए विभिन्न संगठनों के जो अलग-अलग प्रयास हो रहे हैं उन सभी को एक मंच पर लाने के लिए स्वामी रामदेव जी के नेतृत्व में गंगा रक्षा मंच का निर्माण किया गया। सभी जिला केन्द्रों पर प्रदर्शन कर जिलाधिकारी को पंचसूत्री माँगों का ज्ञापन दिया गया। गंगा रक्षा के विषय को इस कार्यक्रम ने अखिल भारतीय स्वरूप प्रदान किया। एक प्रतिनिधि मण्डल प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह जी से मिला और अपनी पंचसूत्रीय माँगों के संदर्भ में तत्काल कार्यवाही करने का निवेदन किया। वार्ता के दौरान प्रधानमंत्री जी ने कहा कि हम गंगा के सम्बन्ध में एक बड़ी योजना बनाने का विचार कर रहे हैं। प्रतिनिधि मण्डल ने प्रधानमंत्री से डाॅ0 मुरली मनोहर जोशी की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि टिहरी बाँध ने जो गंगा को बांध दिया है उसकी निर्बाध अविरलता के लिए गंगा की एक धारा झील के पिछले बिन्दु से निकाल कर बाँध को लांघते हुए गंगा में मिला दी जाए तो गंगा का प्रवाह निर्बाध बना रहेगा। गंगा के निर्बाध प्रवाह को बनाए रखने के इस अतिरिक्त कार्य पर लगभग 400 करोड़ रूपया खर्च हो सकता है। प्रधानमंत्री जी ने कहा था कि गंगा की अविरलता व निर्मलता के लिए हम धन की कमी नहीं आने देंगे।

ज्ञापन की प्रमुख माँगे –
1. गंगा को राष्ट्रीय नदी/धरोहर घोषित किया जाए और गंगा का संरक्षण और सम्मान अन्य राष्ट्रीय प्रतीकों के समान वैधानिक दृष्टि से किया जाए।
2. गंगा रक्षा के लिए राष्ट्रीय एवं राज्य स्तर पर एक सक्षम गंगा रक्षा प्राधिकरण का गठन किया जाए जिसमें भूकम्प, जल, पर्यावरण, मृदा आदि क्षेत्रों के विशेषज्ञ एवं गंगा से जुड़े राज्य सरकारों के प्रतिनिधि और साधु सन्त व गंगा से जीवन पाने वाले मल्लाह और किसानों के प्रतिनिधि सम्मिलित किए जाएं।
3. गंगा की निर्बाधता एवं अविरलता के सम्बन्ध में पं0 मदनमोहन मालवीय जी के साथ अंग्रेज सरकार के समझौते का पालन किया जाए, जो वैधानिक दृष्टि से आज भी मान्य है।
भैरों घाटी, लोहारी नागपाला, पाला मनेरी जल विद्युत परियोजनाओं से गंगा की अविरलता और निर्मलता को पहुँच रही क्षति को ध्यान में रखकर इन योजनाओं को निरस्त कराने के लिए ऊर्जा मंत्री श्री सुशील कुमार शिंदे से गंगा रक्षा मंच का एक प्रतिनिधि मण्डल मिला था।
परियोजनाओं के कारण प्रभावित हो रही गंगा की वस्तुस्थिति को समझने के लिए विभिन्न अखाड़ों के महंत, वरिष्ठ सन्त-महात्मा लोहारी नागपाला गए थे और वहाँ का दृश्य देखकर सभी आक्रोशित होकर लौटे।
हरिद्वार पूर्णकुम्भ-2010 में गंगा रक्षा का विषय प्रधान रूप से चर्चा में रहा। दिनांक 5 अप्रैल, 2010 को कुम्भ में एक विराट सन्त सम्मेलन में गंगा की अविरलता और निर्मलता को ध्यान में रखकर यह निर्णय लिया गया कि 9 अप्रैल, 2010 को प्रातः 9 बजे से लेकर 1 बजे तक कुम्भ के सभी शिविरों के कार्यक्रम स्थगित और शिविरों में स्थापित भगवान के कपाट बन्द रहेंगे। यह कुम्भ के इतिहास में अद्वितीय घटना थी।
गंगा रक्षा मंच की ओर से हरिद्वार में शंकराचार्य चैक पर स्वामी रामदेव जी और स्वामी सत्यमित्रानन्द गिरि जी के नेतृत्व में एक विशाल धरने का आयोजन किया गया जिसमें सैंकड़ों सन्त और हजरों भक्तों ने भाग लिया और जिलाधिकारी को ज्ञापन प्रेषित किया था।

रामसेतु रक्षा
1. भारत के दक्षिणी छोर में रामेश्वरम् के निकट स्थित धनुषकोटि से श्रीलंका तक प्रभु श्रीराम की वानर सेना ने नल व नील के मार्गदर्शन में, समुद्र पर एक सेतु का निर्माण किया था। भारत के प्राचीन ग्रन्थों में इसी को सेतुबन्ध रामेश्वरम् लिखा गया है। अंग्रेजों द्वारा लिखी गई पुस्तकों में इसी को ‘‘रामार सेतु’’ अथवा ‘‘एडम्स ब्रिज’’ लिखा गया है।
2. अमेरिका की अन्तरिक्ष अनुसंधान संस्था ‘‘नासा’’ तथा भारत की अन्तरिक्ष अनुसंधान संस्था ‘‘इसरो’’ ने इस सेतु के चित्र प्रकाशित किए हैं।
3. रामसेतु को बीच में से 300 मीटर चैड़ा तथा 12 मीटर गहरा तोड़कर समुद्र में नहर निर्माण की ‘‘सेतु समुद्रम नहर परियोजना’’ भारत सरकार ने घोषित की।
4. 02 जुलाई, 2005 को भारत के प्रधानमंत्री महोदय ने इस परियोजना का उद्घाटन किया।
आन्दोलन का क्रमिक विकास
* सन्तों ने प्रधानमंत्री जी से निवेदन किया कि वे कोई वैकल्पिक मार्ग खोजें ताकि समुद्र में नहर भी बन जाए और रामसेतु को भी न तोड़ना पड़े। प्रधानमंत्री महोदय ने श्री टी. आर. बालू से भेंट करने की सलाह दी, उन्होंने तो रामसेतु के अस्तित्व को ही नकार दिया।
* सम्पूर्ण भारत में हस्ताक्षर अभियान हुआ। 36 लाख हस्ताक्षरों से युक्त ज्ञापन 27 सितम्बर, 2006 को महामहिम राष्ट्रपति महोदय को सौंपा गया।
* दिसम्बर, 2006 में रामनाथपुरम की जिला अदालत में सिविल वाद दायर करके रामसेतु को पुरातात्विक स्मारक घोषित करने की मांग की गई।
* 18 मार्च, 2007 को तमिलनाडु के रामनाथपुरम कस्बे में, 18 अप्रैल, 2007 को रामेश्वरम् में 5,000 लोगों की ‘‘रामसेतु रक्षा संकल्प सभा’’, 13 मई, 2007 को दिल्ली में सभा हुई जिसमें लगभग 5,000 लोग उपस्थित थे। 27 मई, 2007 को रामलीला मैदान, दिल्ली में सभा हुई जिसमें 50,000 लोगों के अतिरिक्त 500 सन्त भी उपस्थित थे।
* जुन, 2007 में डॉ0 सुब्रह्मण्यम स्वामी एवं हिन्दू मुन्नानी (तमिलनाडु) के संस्थापक रामगोपालन जी ने चेन्नई उच्च न्यायालय में रामसेतु की रक्षा के लिए याचिका दायर की।
* सुप्रीमकोर्ट ने चेन्नई हाईकोर्ट से परियोजना सम्बंधित सभी याचिकाओं को अपने यहाँ मंगवा लिया।
* 22 जुलाई, 2007 को मदुरै में एक विशाल जनसभा हुई, 40,000 से अधिक उपस्थिति।
* 25-26 जुलाई, 2007 को रामलीला मैदान, दिल्ली में धर्मसंसद हुई, 4,000 सन्त उपस्थित।
* 12 अगस्त, 2007 को सम्पूर्ण देश में 1600 स्थानों पर धरना, उपवास, यज्ञ के कार्यक्रम।
* 26 अगस्त, 2007 को ‘‘चलो रामेश्वरम्’’ का नारा दिया गया, 40,000 रामभक्त रामेश्वरम् पहुँचे।
* रक्षाबन्धन को देश के लाखों लोगों ने ‘‘रामसेतु रक्षा सूत्र’’ बांधकर सेतु रक्षा का संकल्प लिया।
* भारत सरकार द्वारा गुपचुप तरीके से रामसेतु को डायनामाइट से उड़ाने की योजना का खुलासा हुआ तो सर्वोच्च न्यायालय में 31 अगस्त, 2007 को एक याचिका दायर की गई और उसी दिन माननीय न्यायालय ने 14 सितम्बर तक रामसेतु को किसी भी प्रकार से क्षतिग्रस्त किए जाने के विरुद्ध स्थगनादेश दे दिया।
* 10 सितम्बर, 2007 को भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय (ए.एस.आई.) ने सर्वोच्च न्यायालय में हलफनामा देकर कहा कि ‘‘राम के अस्तित्व को प्रमाणित करने के कोई साक्ष्य नहीं हैं।’’ उन्होंने ‘‘रामायण एवं उसके पात्रों को कपोल-कल्पित बताया।’’ देश में तीखी प्रतिक्रिया हुई।
* 12 सितम्बर, 2007 को प्रातः 8 से 11 बजे तक देशव्यापी चक्काजाम किया गया।
* सरकार ने कोर्ट में दाखिल अपना हलफनामा वापस ले लिया।
* अक्टूबर, 2007 में केन्द्र सरकार ने सेतु समुद्रम परियोजना की समीक्षा करने के लिए एक दस सदस्यीय समीक्षा समिति के गठन की घोषणा की।
* 20 नवम्बर देवोत्थानी एकादशी से 20 दिसम्बर, 2007 गीता जयन्ती तक सम्पूर्ण देश में 1,000 रामसेतु शिला यात्राओं द्वारा ग्रामों में जन जागरण किया गया।
* 30 दिसम्बर, 2007 रविवार को स्वर्ण जयन्ती (जापानी) पार्क, रोहिणी, नई दिल्ली में ऐतिहासिक महासम्मेलन सम्पन्न हुआ। देशभर से दस लाख रामभक्त दिल्ली पहुँचे।
परिणाम भी सामने आया कि सरकार नहर परियोजना के लिए वैकल्पिक मार्ग खोजने को तैयार हुई। रामसेतु तोड़े जाने से बच गया।
अवांछित गतिविधियों का विरोध

राजा भोज की भोजशाला –
मध्यप्रदेश की ऐतिहासिक नगरी धार में स्थित भोजशाला की प्राचीन सरस्वती प्रतिमा अंग्रेजी काल में ही लन्दन पहुँचा दी गई थी। कालान्तर में मुसलमानों द्वारा भोजशाला में नमाज पढ़ी जाने लगी तथा मांस बिक्री का केन्द्र बनाकर पवित्र मन्दिर के चिन्हों को नष्ट करने के षड्यंत्र रचे जाने लगे। 6 दिसम्बर, 1996 को बजरंग दल ने भोजशाला को मुसलमानों के चंगुल से मुक्त कराकर उसके शुद्धिकरण की घोषणा कर दी। भोजशाला के चारों ओर सरकार ने बैरीकेड लगाकर व्यापक प्रबन्ध किए परन्तु 450 बजरंग दल के कार्यकर्ता भोजशाला में पहुँच गए और गिरफ्तारी दी।
हिन्दू देवी-देवताओं के चित्रों का व्यावसायिक दुरुपयोग –
व्यावसायिक स्तर पर विभिन्न उत्पादों पर हिन्दू देवी-देवताओं के चित्रों का व्यापक स्तर पर दुरुपयोग होता है। बजरंग दल ने निर्णय किया कि बीड़ी, सिगरेट, तम्बाकू, पान-मसाला, लाटरी व बम पटाखों पर हिन्दू देवी-देवताओं के चित्रों का प्रयोग बन्द कराएंगे। केवल जागरण व प्रेरणा जगाकर ही बहुत से उत्पादकों ने इन चित्रों का प्रयोग बन्द कर दिया।
देवी-देवताओं की अश्लील सी.डी. –
अप्रैल, 2006 में पानीपत में हिन्दू देवी-देवताओं पर अश्लील सी. डी./कैसेट बनाने के विरुद्ध स्थानीय सी.जी.एम. की अदालत में कैसेट कम्पनियों के विरुद्ध एक याचिका दायर की गई। नामजद कैसेट कम्पनियों के मालिकों ने 10 हजार कैसेटों को संगठन के सामने रखकर उसकी होली जलाई और शपथ ली कि भविष्य में ऐसी कैसेटों का निर्माण नहीं करेंगे, जिनसे देवी देवताओं का अपमान हो।
सौंदर्य प्रतियोगिताओं का विरोध –
नारी शरीर के भौंड़े प्रदर्शन व उसके व्यवसायीकरण के लिए सौंदर्य प्रतियोगिताओं के आयोजन की होड़ लग गई थी। बजरंग दल के सशक्त विरोध के कारण देश में छोटी-बड़ी ऐसी 18 प्रतियोगिताएं रद्द हुईं, कइयों के स्वरूप बदलने पड़े।
शबरी मलाई के यात्रियों पर बढ़ाया गया टैक्स –
केरल में सबरीमलाई तीर्थयात्रा पर आनेवाले यात्रियों पर सरकार ने टैक्स बढ़ाया, इसके विरुद्ध आन्दोलन किया। तिरुवन्नतपुरम् में दस हजार लोग धरने पर बैठे, सरकार ने टैक्स हटाया।
बंगाल में तीर्थयात्रियों पर लगाया गया टैक्स –
कोलकाता के दक्षिणेश्वर मंदिर में देवी के दर्शन के लिए आनेवाले तीर्थयात्रियों पर पश्चिम बंगाल सरकार ने कर लगाया था, इसके विरुद्ध हुए आन्दोलन के कारण सरकार ने कर वापस लिया।
ब्रह्मवरदा (उड़ीसा) का मुस्लिम सम्मेलन और विश्व हिन्दू परिषद –
उड़ीसा के एक अति साधारण गाँव ब्रह्मवरदा में मुस्लिम संगठनों ने 7, 8 व 9 दिसम्बर, 1996 को विश्व मुस्लिम सम्मेलन करने की घोषणा की। यह कार्यक्रम हिन्दुओं का धर्मान्तरण करने, भोजन के लिए गोहत्या करने एवं हिन्दू विरोधी वातावरण तैयार करने के लिए आयोजित किया गया था। इसके विरुद्ध चेतावनी दी गई, जन जागरण किया। सरकार ने मुसलमानों को उनके सम्मेलन की पूर्ण सुरक्षा का आश्वासन देना चाहा परन्तु मुसलमानों ने सरकार के आश्वासन पर भरोसा न करके सीधे विश्व हिन्दू परिषद के पास बातचीत का प्रस्ताव भेजा। विश्व हिन्दू परिषद एवं मुस्लिम नेताओं के बीच प्रशासन की उपस्थिति में हुई वार्ता में सम्मेलन आयोजित करने के लिए निम्नलिखित शर्तें स्वीकार कीं:-
01. सम्मेलन में गोहत्या की बात तो दूर किसी भी प्रकार का मांसाहार नहीं होना चाहिए।
02. मुस्लिम सम्मेलन में किसी प्रकार का हिन्दू विरोधी वक्तव्य नहीं होना चाहिए।
03. सम्मेलन के माध्यम से किसी प्रकार का धर्मान्तरण नहीं होना चाहिए।
उपरोक्त शर्तों के अनुसार सम्मेलन सम्पन्न हुआ। मुसलमान यह मानने को बाध्य हुए कि उनकी सुरक्षा की गारन्टी हिन्दू समाज के साथ सद्भावनापूर्ण सम्बन्धों में ही निहित है।
‘हकीकत‘ पुस्तक पर प्रतिबन्ध –
ईसाई मिशनरी द्वारा संचालित संस्था द्वारा हिन्दू धर्म के विरुद्ध प्रकाशित पुस्तक ‘हकीकत‘ का विरोध किया गया। विरोध को देखते हुए पुलिस द्वारा संस्था के दो पदाधिकारियों को गिरफ्तार किया गया। राजस्थान सरकार ने अधिसूचना जारी कर इस पुस्तक पर प्रतिबन्ध लगाया। पंजाब में भी इस पुस्तक के विरुद्ध प्रदर्शन किए गए।
दत्तपीठ का प्रान्तीय सरकार द्वारा वक्फ बोर्ड को दिया जाना –
दत्तपीठ (चिकमंगलूर-कर्नाटक) एक हिन्दू स्थान है जो कालान्तर में किन्हीं कारणों से मुस्लिमों के हाथ में चला गया किन्तु वहाँ दत्तात्रेय भगवान की पूजा-अर्चना निरन्तर की जाती रही। 1960 में कर्नाटक सरकार ने इस स्थान का वक्फ बोर्ड द्वारा अधिग्रहण कर लेने का आदेश दिया था किन्तु उस समय हिन्दू विरोध के कारण ऐसा नहीं हो पाया। 1975 में सरकार ने पुनः प्रयास किया। स्थानीय हिन्दुओं ने इसके विरुद्ध न्यायालय में मुकदमा दायर किया, न्यायालय ने सरकार के आदेश को अनुचित और असंवैधानिक घोषित कर दिया, सरकार ने हाईकोर्ट में अपील की पर हाईकोर्ट द्वारा निचली अदालत के निर्णय को ही मान्य किया गया। उस स्थान की व्यवस्था सैय्यद पीर मोहम्मद शकादरी सज्जादे नशीन द्वारा की जाती रही है किन्तु 1975 के बाद व्यवस्था की आड़ में शकादरी द्वारा उस स्थान का इस्लामीकरण करने का प्रयास होता रहा। उस स्थान से दत्तात्रेय भगवान की मूर्ति, त्रिशूल और कमण्डल भी गायब कर दिया गया। साथ ही साथ हिन्दुओं को पूजा करने की सुविधा जो कि न्यायालय द्वारा प्रदत्त थी, वह भी बन्द कर दिया। पीठ से होने वाली आय का व्यक्तिगत उपयोग होने लगा। गुफा के बाहर स्थित आवासीय स्थान पर होटल खोल दिया गया जिसमें गोमांस परोसा जाने लगा। 1996 से बजरंग दल ने इस विषय को अपने हाथ में ले लिया। 1997 में सम्पूर्ण चिकमंगलूर जिले में जन-जागरण किया गया। 1998 में सम्पूर्ण प्रान्त में पांच यात्राएं निकाली गई जिसके फलस्वरूप उस वर्ष दत्त जयन्ती के दिन 25,000 से अधिक नवयुवक दत्त गुफा पर एकत्रित हो गए। यात्राओं में लगभग 6000 कि0मी0 की दूरी तय की गई, 700 से अधिक सभाएं हुईं जिनमें 3,50,000 लोगों ने सहभागिता रही। यात्राओं के दौरान एक भी स्थान पर कोई अप्रिय घटना नहीं हुई इससे सेक्युलर नेताओं की वे आशंकाएं निर्मूल हो गईं जिनमें वे यात्राओं के निकलने पर साम्प्रदायिक तनाव होने का आरोप लगा रहे थे।
ईसाई मिशनरियों द्वारा हो रहा धर्मान्तरण –
चंगाई सभाओं के माध्यम से ईसाई लोग हिन्दुओं का सामूहिक धर्मान्तरण करते रहे हैं। बजरंग दल द्वारा इसका विरोध किया गया। उसने पंजाब, हरियाणा, गुजरात, उत्तर प्रदेश, हिमाचल आदि प्रान्तों के कई स्थानों पर चंगाई सभा का विरोध करके ऐसे आयोजन होने नहीं दिए। इसके अतिरिक्त मिशनरी स्कूलों के द्वारा हिन्दू चिन्हों पर रोक लगाने, मातृभाषा का प्रयोग करने, ईसाई साहित्य बांटने आदि के माध्यम से हिन्दुत्व की भावना को कमजोर करने का जो प्रयास किया जाता रहा है उसको कई स्थानों पर बजरंग दल द्वारा रोका गया।
1999 का ईसाई मिशनरी पोल खोलो अभियान –
हिन्दुत्व के बढ़ते प्रभाव एवं ईसाई मिशनरियों की खुलती पोल से भयभीत ईसाई मिशनरी और चर्च द्वारा परिषद के विरुद्ध एक प्रचार युद्ध चला दिया गया। कोई भी छोटी-बड़ी घटना जिसका सम्बन्ध ईसाई समुदाय से होता था उसमें अकारण परिषद और बजरंग दल को बदनाम करने का कुचक्र चलाया गया। झाबुआ (म0प्र0), झज्जर (हरियाणा) और डांग (गुजरात) की घटना में परिषद और बजरंग दल का नाम जबरदस्ती घसीटा गया। बजरंग दल ने इस चुनौती को स्वीकार कर वास्तविकता की जानकारी समाज को देने व ईसाई मिशनरियों के षड्यंत्र की वास्तविकता से परिचित कराने हेतु सम्पूर्ण देश में पत्रक वितरण किए और सभाएं तथा गोष्ठियाँ आयोजित कीं। आजादी के बाद से अब तक का मिशनरी चेहरा जनता के सामने उजागर किया।
आई. एस. आई. के विरोध में चेतावनी सप्ताह –
पाकिस्तानी गुप्तचर संस्था ‘आई. एस. आई.‘ ने इस देश के आधे से अधिक जिले अपनी पकड़ में ले लिए हैं। इनकी व्यापकता व मजबूती का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि देश में कहीं भी विस्फोट या हत्या करने के बाद भी इनके एजेन्ट पकड़े नहीं जाते। इस संस्था व उसके सहयोगियों के कारण देश की आन्तरिक व बाह्य सुरक्षा खतरे में पड़ गई है। पाकिस्तान को चेतावनी देने व सरकार को चेताने के लिए बजरंग दल ने चेतावनी सप्ताह का आयोजन किया। सरकार को ज्ञापन देने, रैलियाँ निकालने, प्रदर्शन करने जैसे आयोजन किए गए। दिल्ली में 13 अगस्त को पाकिस्तान दूतावास पर प्रदर्शन का कार्यक्रम आयोजित किया गया। दिल्ली, हरियाणा के अतिरिक्त उत्तर प्रदेश व राजस्थान के निकटवर्ती जिलों के 8000 कार्यकर्ताओं ने प्रदर्शन में भाग लिया। महामहिम उपराष्ट्रपति को ज्ञापन व पाक दूतावास के अधिकारियों को चेतावनी पत्र दिया गया। चेतावनी सप्ताह में देश में छोटे-बड़े 140 कार्यक्रम किए गए, जिसमें 75,000 लोगों ने सहभागिता की।
पूज्य शंकराचार्य जी की गिरफ्तारी का विरोध
11 नवम्बर, 2004 की रात को दीपावली के अवसर पर कांची कामकोटि पीठ के जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी जयेन्द्र सरस्वती को तमिलनाडु की पुलिस द्वारा हिरासत में लिए जाने पर सम्पूर्ण देश का धर्मप्रेमी समाज स्तब्ध रह गया।
इस गिरफ्तारी का कारण कांचीपुरम के वरदराज मन्दिर के एक कर्मचारी की हत्या में शंकराचार्य जी की संलिप्तता को बताया गया। शंकराचार्य जी की गिरफ्तारी को भारत का सन्त समाज तथा उनके भक्तों और हिन्दू संस्थाओं ने इसे देश के राष्ट्रीय समाज के मानबिन्दुओं पर मर्मान्तक प्रहार माना। इस तथाकथित आरोप में कितनी सच्चाई रही यह तो निष्पक्ष जाँच से ही पता चल सकेगा परन्तु शंकराचार्य जी की गिरफ्तारी के समय के चयन, गिरफ्तारी की प्रक्रिया और न्यायिक हिरासत में जेल भेजने, पुलिस कस्टडी में देने तथा जमानत याचिका बार-बार खारिज किए जाने से हिन्दू समाज आक्रोशित हो उठा। सम्पूर्ण देश में विरोध प्रदर्शन किए गए।
विश्व हिन्दू परिषद, की अगुवाई में भारत व भारत के बाहर के विविध हिन्दू संगठन, अखाड़ा परिषद जैसे प्रतिनिधि साधु संगठन तथा सभी पीठों के शंकराचार्य, सभी परम्पराओं के जगद्गुरु आचार्यों सहित ख्यातनाम कथाकार आशाराम बापू, सुधांशु महाराज, श्री रविशंकर जी (आर्ट आफ लिविंग) तथा पूर्व राष्ट्रपति श्री वेंकटरमन व पूर्व प्रधानमंत्रीद्वय श्री अटलबिहारी वाजपेयी एवं श्री चन्द्रशेखर को भी सड़क पर उतरने को विवश होना पड़ा। देशव्यापी धरना-उपवास के अलावा, भारत बन्द का भी आयोजन करना पड़ा।
विरोध की कुछ उल्लेखनीय घटनाएं इस प्रकार रहीं
* विश्व हिन्दू परिषद ने सरकार से मांग की कि पूज्य शंकराचार्य जी के विरुद्ध दायर सारे मुकदमें बिना शर्त वापस लिए जाएं तथा शासन द्वारा उनसे क्षमायाचना भी की जाए।
* पंजाब के अमृतसर, जालन्धर, लुधियाना, कपूरथला, मोगा, होशियारपुर, पठानकोट, बटाला, गुरुदासपुर, पटियाला, भठिंडा सहित सभी जिलों एवं चण्डीगढ़ में विरोध प्रदर्शन किया गया।
* जोधपुर में वाहन रैली निकाल कर आक्रोश व्यक्त किया गया। 26 स्थानों पर 4600 व्यक्तियों ने गिरफ्तारी दी, जिनमें 290 सन्त भी थे।
* चेन्नई की विरोध सभा में तमिलनाडु के साथ-साथ हैदराबाद, केरल, कन्याकुमारी तक के 25,000 से अधिक हिन्दू पहुँच गए।
* दिल्ली में जन्तर-मन्तर पर धरना दिया गया। 20 नवम्बर को 3 स्थानों पर सभाएं की गईं जिनमें हरिद्वार, कुरुक्षेत्र, वृन्दावन, उज्जैन, इन्द्रप्रस्थ के 500 सन्तों ने भाग लिया। 21 नवम्बर को सभी सन्त रामलीला मैदान से एकत्रित रूप में पुरानी दिल्ली के प्रमुख बाजारों से पैदल चलते हुए गौरीशंकर मन्दिर पहुँचे। जहाँ उन्होंने गिरफ्तारी के विरोध में अपना रोष प्रकट किया।
* 15 नवम्बर, 2004 को चेन्नई में विरोध प्रदर्शन हुआ। इस प्रदर्शन में 5000 महिला-पुरुष उपस्थित थे। 26 नवम्बर, 2004 को 10 स्थानों पर मानव श्रृंखला बनाकर विरोध प्रदर्शन किया गया। 19 दिसम्बर, 2004 को एक दिवसीय उपवास का कार्यक्रम रखा गया। इसमें 1000 माताएं उपवास पर बैठीं। 01 दिसम्बर, 2004 को चेन्नई में एक विशाल विरोध सभा हुई। प्रान्त के सभी जिला केन्द्रों पर गिरफ्तारी के विरोध में प्रदर्शन किए गए। 13 दिसम्बर, 2004 को चेन्नई की सार्वजनिक विरोध सभा में 5000 की उपस्थिति थी।
सन्त शक्ति हिन्दू समाज का मार्गदर्शन करने को तत्पर हुई
हिन्दू समाज का मार्गदर्शन करने के लिए वरिष्ठ धर्माचार्यों का केन्द्रीय मार्गदर्शक मण्डल, हिन्दू समाज के लिए सामान्य आचार संहिता का निर्माण करने के लिए विद्वत परिषद का गठन तथा गाँव-गाँव सन्तों के साथ सतत सम्पर्क रखने के लिए धर्माचार्य सम्पर्क विभाग का गठन हुआ। समय-समय पर समाज का मार्गदर्शन करने के लिए सभी परम्पराओं के प्रमुख सन्तों के, सभी जिलों का प्रतिनिधित्व करते हुए, अखिल भारतीय सम्मेलन हुए, जिन्हें ‘धर्मसंसद’ नाम दिया गया। मार्गदर्शक मण्डल की बैठकें एक वर्ष में न्यूनतम दो बार तथा धर्मसंसद के 12 अधिवेशन आवश्यकतानुसार हुए।
प्रथम धर्मसंसद
7-8 अप्रैल, 1984 को नई दिल्ली के विज्ञान भवन में। अध्यक्षता तत्कालीन ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य पूज्य स्वामी शान्तानन्द जी महाराज ने की। प्रास्ताविक भाषण पूज्य स्वामी चिन्मयानन्द जी महाराज, सान्दीपनी साधनालय, चिन्मय मिशन, मुम्बई ने दिया। धर्मसंसद अधिवेशन में हिन्दुओं के 76 परम्पराओं के 558 धर्माचार्य सम्मिलित हुए थे।
आचार संहिता के निम्नलिखित 12 सूत्र निश्चित किए गए:-
01. वर्तमान युग के परिप्रेक्ष्य में हिन्दू समाज की एक सूत्रात्मकता की परिवृद्धि करने के लिए धर्म-व्यवस्था देना।
02. स्वस्थ समाज के निर्माण हेतु भ्रष्टाचार, अस्पृश्यता तथा दहेज जैसे रोगों के निवारण की व्यवस्था देना।
03. धर्म, संस्कृति, भाषा एवं महापुरुषों द्वारा निर्मित श्रेष्ठ परम्पराओं के प्रति उत्पन्न हुए भ्रमों का निवारण करते हुए उनमें गहन आस्था निर्माण करना।
04. सम्पूर्ण शिक्षा व्यवस्था में धर्म-शिक्षा को अनिवार्य स्थान प्राप्त कराते हुए उपयुक्त साहित्य-सृजन द्वारा समुचित व्यवस्था करना एवं संस्कृत को नित्य प्रयोग की भाषा के रूप में विकसित कर राष्ट्रभाषा के स्थान पर प्रतिष्ठित कराना।
05. समाज में श्रम के प्रति प्रतिष्ठा का भाव जागृत करते हुए उपेक्षित एवं पिछड़े हुए बन्धुओं को समता एवं एकात्मता की अनुभूति कराना।
06. अभावग्रस्त क्षेत्रों में व्यापक सम्पर्क स्थापित कर वहाँ की समस्याओं का निराकरण करने के लिए ‘दत्तक‘ योजना कार्यान्वित कराना।
07. विभिन्न सम्प्रदायों के तीर्थ, मठ-मन्दिरादि पूजा स्थानों को, हिन्दू एकता के शक्तिशाली संस्कार केन्द्रों के रूप में विकसित कराना तथा प्राचीन केन्द्रों का जीर्णोद्धार कराना।
08. हर हिन्दू पर्व के पीछे जो सांस्कृतिक धरोहर है उसके परिपालन के लिए वर्तमान संदर्भ में व्यवस्था देना।
09. विदेशस्थ हिन्दुओं में हिन्दू जीवन मूल्यों के प्रति जीवन्त सम्पर्क के अभाव में घटती हुई आस्थाओं को दृढ़ मूल कराना।
10. किसी कारणवश परकीय धर्म स्वीकार किए हुए बन्धु अपने हिन्दू धर्म में स्वेच्छा से वापस आने के इच्छुक हों तो उनका स्वागत करते हुए हिन्दू समाज में आत्मसात् करने की व्यवस्था देना।
11. हिन्दू समाज एवं उसके मान-बिन्दुओं पर विश्व में कहीं भी होने वाले आघात के प्रति चेतना जागृत कराते हुए उचित समाधान की व्यवस्था देना।
12. शासन को हिन्दू हितों की रक्षा के लिए कटिबद्ध करते हुए हिन्दू संख्याबल को घटाने के विधर्मियों के कुचक्र को हर संभव उपाय से विफल करना।
पारित किए गए 4 प्रमुख प्रस्ताव –
01. श्रीराम जन्मभूमि, काशी विश्वनाथ और श्रीकृष्ण जन्मस्थान हिन्दुओं को लौटाए जाएं।
02. बंगलादेश की सरकार द्वारा हिन्दू सम्पत्ति को हड़पने के उद्देश्य से बनाए गए शत्रु सम्पत्ति नियम का विरोध किया जाए
03. पंजाब में आतंकवादियों और उग्रवादियों द्वारा किए गए हत्याकाण्डों आदि के कारण जन-मानस में उत्पन्न अस्थिरता और अशान्ति के शमन करने का प्रयास किया जाए
04. अशिक्षित, दुर्बल और निर्धन वनवासियों, गिरिवासियों आदि के क्षेत्रों के पूर्ण विकास के लिए मठ-मन्दिरों द्वारा उनको गोद लिया जाएं
महत्वपूर्ण उपलब्धि – श्रीराम जानकी रथों की यात्राओं के माध्यम से श्रीराम जन्मभूमि के संदर्भ में जन-जागरण करने का निर्णय लिया गया।
द्वितीय धर्मसंसद
31 अक्टूबर और 01 नवम्बर, 1985 ई. को उडुप्पी (कर्नाटक) में। उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता जगद्गुरु मध्वाचार्य पूज्य स्वामी विश्वेशतीर्थ जी महाराज ने की। प्रास्ताविक भाषण ब्रह्मलीन सन्त पूज्य स्वामी चिन्मयानन्द जी महाराज-सांदीपनी साधनालय, मुम्बई ने किया था। देशभर से 851 सन्त सम्मिलित हुए थे।
उल्लेखनीय कार्य – हिन्दू समाज को चेतनायुक्त, सामथ्र्य सम्पन्न और सशक्त बनाने का संकल्प दोहराते हुए श्रीराम जन्मभूमि पर मन्दिर निर्माण के लिए घोषणा की गई कि आगामी शिवरात्रि तक मन्दिर पर लगा अवैध ताला यदि नहीं खोला गया तो इसके लिए आन्दोलन किया जाएगा। श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति आन्दोलन के संचालन के लिए सभी प्रान्तों के 34 धर्माचार्यों की एक समिति बनाई गई।
पारित किए गए प्रमुख प्रस्ताव –
01. राष्ट्र की एकता और अखण्डता की सतत दृढ़ता के लिए देवोत्थान एकादशी को ‘एकात्मता दिवस‘ के रूप में मनाया जाए और इसे ‘राष्ट्रीय दिवस‘ के रूप में स्वीकार कराया जाए।
02. विद्यालयों आदि में संस्कृत भाषा और अध्यात्म तथा योग की अनिवार्य शिक्षा की व्यवस्था कराई जाए।
03. समाज में फैली अस्पृश्यता, भ्रष्टाचार और दहेज जैसी कुरीतियों के निवारणार्थ अभियान चलाया जाए जिसमें धर्माचार्य, मठाधीश, सन्त-महात्मा आगे बढ़कर सहयोग करें।
04. सामान्य जीवन-यापन की निम्नतम सीमा रेखा से नीचे अवस्थित वनवासी, गिरिवासी और उपेक्षित बन्धुओं के उत्थान के कार्य में समाज के सभी वर्गों को जोड़कर उनमें यह विश्वास जगाया जाए कि वे हिन्दू समाज के अभिन्न अंग हैं।
05. विदेशस्थ हिन्दू छात्रों के हिन्दू संस्कार व संस्कृति की शिक्षा के लिए कार्य किया जाए।
06. पोप का भारत में आगमन यदि किसी सम्प्रदाय विशेष को प्रोत्साहन देने हेतु हो रहा है तो उसका राजकीय आमंत्रण रद्द करवाया जाए। वे एक मजहबी प्रमुख के नाते स्वतः ही भारत आएं, यही उनके लिए उचित होगा।
07. (अ) श्रीराम जन्मभूमि, श्रीकृष्ण जन्मस्थान और काशी विश्वनाथ मन्दिर, ये तीनों स्थान हिन्दू समाज को अविलम्ब सुपुर्द किए जाएं।
(ब) उत्तर प्रदेश सरकार यदि श्रीराम जन्मभूमि को अधिग्रहीत कर श्रीरामानन्दाचार्य जी को सुपुर्द नहीं करती है तो इसके लिए देशभर में एक प्रचण्ड आन्दोलन चलाया जाए।
08. धर्माचार्य द्वारा मठ-मन्दिरों से बाहर आकर मानव को मानव बनाकर भारत को विश्वगुरु बनाने के लिए सफल प्रयास किए जाएं।
महत्वपूर्ण उपलब्धि – श्रीराम जन्मभूमि पर लगा ताला खोलने के लिए निश्चित की गई तिथि से पूर्व ही सरकार ने ताला खोल दिया।
तृतीय धर्मसंसद
29 – 30 – 31 जनवरी, 1989 को महाकुम्भ के अवसर पर प्रयागराज में किया गया था। उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता कांची कामकोटि पीठ के जगद्गुरु पूज्य स्वामी शंकराचार्य जयेन्द्र सरस्वती जी ने की। देशभर से पधारे लगभग 3000 सन्त-महन्त, धर्माचार्य, धर्मगुरु सम्मिलित हुए। पूज्य देवराहा बाबा सम्मेलन में पधारे।
उल्लेखनीय निर्णय – हिन्दू समाज के लिए पंचसूत्री विधि-निषेध कार्यक्रम की घोषणा की गई, श्रीराम जन्मभूमि मन्दिर का प्रारूप स्वीकृत किया गया, श्रीराम जन्मभूमि के प्रश्न को अयोध्या और उत्तर प्रदेश की सीमा से बाहर निकालकर देशव्यापी बनाने तथा श्रीराम जन्मभूमि मन्दिर के शिलान्यास के लिए देश के प्रत्येक ग्राम से पूजित एक-एक श्रीरामशिला और प्रत्येक हिन्दू से सवा-सवा रुपया भेंट स्वरूप लेने का निर्णय किया गया एवं शिलान्यास की निश्चित तिथि एवं स्थान की घोषणा की गई।
पंचसूत्रीय विधि निषेध
प्रथम सूत्र-
* विधि – हिन्दू स्वत्व जागरण निषेध – आत्म विस्मृत एवं स्वार्थ परायण जीवन का।
द्वितीय सूत्र-
* विधि – हिन्दू सशक्तिकरण निषेध – ऊँच-नीच, छुआछूत एवं विघटनकारी मनोवृत्ति का।
तृतीय सूत्र-
* विधि – हिन्दू सदाचरण निषेध – दहेज, भ्रष्टाचार जैसी कुरीतियों का।
चतुर्थ सूत्र-
* विधि – हिन्दू संरक्षण निषेध- हिन्दू मानबिन्दुओं पर होने वाले प्रहारों के प्रति उदासीनता का।
पंचम सूत्र-
* विधि – राजनीति का हिन्दूकरण निषेध – राजनीति द्वारा हिन्दू समाज के भ्रष्टीकरण,
विदेशीकरण एवं विभक्तीकरण का।
पारित किए गए प्रमुख प्रस्ताव –
01. इलाहाबाद नगर के लिए सभी जगह ‘प्रयाग‘ नाम का प्रयोग किया जाए।
02. अक्षयवट को जनता के दर्शन, पूजन और अर्चन के लिए खोल दिया जाए।
03. नवरात्रों में सभी घरों, मन्दिरों और धार्मिक स्थानों पर भगवे ध्वजों का आरोहण किया जाए।
04. भाषा, पंथ, जाति के नाम पर होने वाले संघर्षों से समाज की रक्षा करने हेतु सन्त शक्ति आगे आए।
05. हिन्दू देवस्थानों का प्रबन्ध स्वायत्तशासी धार्मिक मण्डलों द्वारा हो और मन्दिरों से प्राप्त निधि को हिन्दू धार्मिक कार्यों में ही लगाया जाए।
06. विश्व में जहाँ-जहाँ भी हिन्दुओं पर अत्याचार हो रहे हैं, उनको संयुक्त राष्ट्र संघ के सम्मुख लाया जाए।
07. संसद और विधान मण्डलों में ऐसे चरित्रवान और निष्कलंक प्रतिनिधियों को भेजा जाए जो हिन्दू हित रक्षण की घोषणा अपने चुनाव घोषणा पत्र में करें।
08. श्रीराम मन्दिर निर्माण के लिए भारत के प्रत्येक ग्राम से पूजित एक-एक श्रीरामशिला मँगाई जाए एवं हर हिन्दू से मन्दिर – निर्माण के निमित्त सवा – सवा रूपया भेंट स्वरूप लिया जाए।
09. गाँव -गाँव में भग्न मन्दिरों का जीर्णोद्धार करने तथा पिछड़े क्षेत्रों में नवीन मन्दिरों के निर्माण का प्रयास करने के लिए भारत हिन्दू मन्दिर जीर्णोद्धार न्यास का गठन किया जाए।
महत्वपूर्ण उपलब्धि – ब्रह्मर्षि पूज्य देवरहा बाबा की उपस्थिति में स्वीकृत श्रीराम मन्दिर के प्रारूप के करोड़ों चित्र देशभर में वितरित हुए, छः करोड़ लोगों तक सम्पर्क हुआ, पौने तीन लाख ग्रामों में श्रीरामशिला पूजित होकर अयोध्या आईं, और 9 नवम्बर, 1989 को पूर्व निश्चित समय और स्थान पर श्रीराम जन्मभूमि मन्दिर के लिए शिलान्यास किया गया।
चतुर्थ धर्मसंसद
2 – 3 अप्रैल, 1991 को नई दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में। उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता जगद्गुरु शंकराचार्य ज्योतिष्पीठाधीश्वर पूज्य स्वामी वासुदेवानन्द सरस्वती जी महाराज ने की। देशभर से लगभग 4000 सन्त-महंत सम्मिलित हुए।
उल्लेखनीय कार्य – 30 अक्टूबर एवं 02 नवम्बर, 1990 को अयोध्या में हुए सन्तों के अपमान और हिन्दू वीरों के बलिदान को ध्यान में रखते हुए मई, 1991 के महानिर्वाचन में अपने मत का विवेकपूर्ण उपयोग करने के लिए जनता का आह्वान किया गया।
4 अप्रैल, 1991 को दिल्ली में 25 लाख लोगों की उपस्थिति का इस सदी का सबसे बड़ा किन्तु शान्त, सुव्यवस्थित और अभूतपूर्व महाप्रदर्शन किया गया। इसी दिन सायंकाल में उत्तर प्रदेश सरकार का पतन हो गया।
पारित किए गए प्रमुख प्रस्ताव –
01. महामहिम राष्ट्रपति जी से श्रीराम जन्मभूमि मन्दिर निर्माण हेतु मार्ग प्रशस्त करने के लिए उत्तर प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लागू करने एवं जन्मभूमि को न्यायालयीन नियंत्रण से मुक्त करके श्रीराम जन्मभूमि न्यास को सौंपने का अनुरोध किया गया।
02. आगामी महानिर्वाचन में अपनी मत शक्ति का विवेकपूर्ण ढंग से उपयोग करने के लिए जनता का आह्वान किया गया।
03. हिन्दू विनाश की देशव्यापी मुस्लिम योजना से सचेत और सावधान रहने और अपने धन, जन तथा महिलाओं के सम्मान की रक्षा के लिए हिन्दू जनता का आह्वान किया गया।
04. हिन्दू धर्मस्थानों के सरकार द्वारा किए जा रहे अधिग्रहण को रोकने की माँग की गई।
05. हिन्दू समाज में व्याप्त अस्पृश्यता, जातीय विद्वेष, दहेज, महिलाओं पर अत्याचार जैसी कुरीतियों को दूर कराने, उसमें फैले भ्रष्टाचार और सामाजिक अन्याय एवं उसके नैतिक मूल्यों में हुए ह्रास को रोकने के लिए सन्त शक्ति का आह्वान किया गया।
06. दूरदर्शन और आकाशवाणी द्वारा प्रस्तुत कार्यक्रमों को भारत के सामाजिक एवं राष्ट्रीय जीवन के लिए महान संकट मानते हुए उन्हें छोड़ने का आह्वान किया गया।
07. भारत की सीमा में गोवंश हत्या पर पूर्ण और प्रभावी प्रतिबन्ध लगाने का आग्रह किया गया।
पंचम धर्मसंसद
30-31 अक्टूबर, 1992 को दिल्ली के रानी झाँसी स्टेडियम, केशवपुरम में। उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी वासुदेवानन्द सरस्वती जी महाराज ने की। धर्मसंसद अधिवेशन में लगभग 5000 सन्त-महंत सम्मिलित हुए।
उल्लेखनीय निर्णय – 06 दिसम्बर, 1992 की तिथि से अनवरत कारसेवा द्वारा श्रीराम मन्दिर निर्माण का कार्य करने का निश्चय किया गया।
पारित किए गए प्रमुख प्रस्ताव-
01. 02 नवम्बर, 1990 को अयोध्या में पराभव, परोत्कर्ष और पराधीनता के चिन्ह् को हटाकर पराक्रम, स्वोत्कर्ष और स्वाभिमान की प्रतिष्ठापना करने के लिए जीवन की आहुति देने वाले धर्मवीरों की पावन स्मृति में श्रद्धांजलि।
02. 06 दिसम्बर, 1992 को श्रीराम जन्मभूमि परिसर में पुनः कारसेवा का शुभारम्भ करने की घोषणा। श्रीराम कारसेवा के पुनः शुभारम्भ के लिए कारसेवकों से निश्चित समय पर अयोध्या में उपस्थित रहने का आह्वान।
03. पिछड़े और पीडि़त हिन्दू बन्धुओं को धर्मान्तरित किए जाने के बाद भी केन्द्र शासन द्वारा विशेष सुविधाएँ प्रदान करने के अविवेकपूर्ण निर्णय को हिन्दू समाज के विघटन और विनाश के पथ को प्रशस्त करने वाला मानते हुए इसे अविलम्ब वापस लिए जाने की माँग।
04. विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा हिन्दुओं की धार्मिक शोभायात्राओं पर अपने ही देश में विशिष्ट मार्गों एवं मोहल्लों से निकालने पर प्रतिबन्ध लगाने जैसी पक्षपातपूर्ण दुर्नीति की निन्दा करते हुए उपद्रवी और अराजक तत्त्वों के कठोरतापूर्वक दमन का आग्रह।
05. अल कबीर पशु वधशाला पर तुरन्त रोक लगाने की माँग।
06. हिन्दुओं के पावन पर्व, यथा – रामनवमी, जन्माष्टमी, शिवरात्रि, बुद्ध जयंती आदि पर शराब की बिक्री पर रोक लगाने के लिए सरकार से अनुरोध।
महत्वपूर्ण उपलब्धि – 06 दिसम्बर, 1992 से प्रारम्भ अनवरत कारसेवा के परिणामस्वरूप इसी दिन 468 वर्ष पूर्व निर्मित ढाँचा ध्वस्त कर दिया गया।
षष्टम धर्मसंसद
यह अधिवेशन देशभर में अंचलानुसार पाँच अलग – अलग स्थानों पर आयोजित किया गया, यथा-
* पश्चिमांचल: इस अंचल का सम्मेलन 3 – 4 फरवरी, 1994 को नासिक में हुआ।
* दक्षिणांचल: इस अंचल का सम्मेलन 24 – 25 फरवरी, 1994 को तिरुपति में हुआ।
* मध्यांचल: इस अंचल का सम्मेलन 17 – 18 मार्च, 1994 को काशी में हुआ।
* पूर्वांचल: इस अंचल का सम्मेलन 23 – 24 मार्च, 1994 को गुवाहाटी में हुआ।
* उत्तरांचल: इस अंचल का सम्मेलन 3 – 4 अप्रैल, 1994 को हरिद्वार में हुआ।
धर्मसंसद के पश्चिमांचल अधिवेशन में 2500, दक्षिणांचल में 300, मध्यांचल में 3500, पूर्वांचल में 250 और उत्तरांचल में 4000 सन्तों ने सहभागिता की।
विचारणीय विषय – पाँचों स्थानों पर स्थानीय समस्याओं और श्रीराम जन्मभूमि मन्दिर निर्माण के संकल्प को दोहराने के साथ-साथ निम्नलिखित बिन्दुओं पर विचार किया गया –
01. भारत में धर्मराज्य की पुनः प्रतिष्ठापना। 02. मानव समाज को अध्यात्मिक अधिष्ठान पर खड़ा करना।
03. आध्यात्मिक संस्कार केन्द्रों की सुव्यवस्था। 04. भारत के हिन्दू राष्ट्र होने की घोषणा तथा भारत की समृद्ध अतीत परम्परा की वाहिका संस्कृत भाषा की अनिवार्य शिक्षा।
05. सामाजिक अस्पृश्यता के कलंक का सम्पूर्ण निषेध एवं सामाजिक समरसता की प्रतिष्ठा का संकल्प।
06. भारत में हिन्दुओं के मतान्तरण पर कानूनी रोक तथा मतान्तरित भारतीय की किसी भी हिन्दू जीवन पद्धति से वापसी। 07. गोवंश के वध पर पूर्ण प्रतिबन्ध, गोमांस के निर्यात पर रोक तथा यान्त्रिक कत्लखानों के निर्माण पर पाबंदी।
08. विश्व हिन्दू परिषद पर लगा प्रतिबन्ध तत्काल हटे एवं केन्द्र सरकार श्रीराम जन्मभूमि न्यास से छीनी गई भूमि के साथ सम्पूर्ण परिसर न्यास को वापस होे। 09. जाति, पंथ, भाषा, क्षेत्र एवं वर्गवाद से समाज को ऊपर लाकर हिन्दुत्व का बोध कराना। 10. स्वदेशी अर्थनीति। 11. सामाजिक कुरीतियों का उन्मूलन एवं व्यसन मुक्ति। 12.हिन्दू जनसंख्या घटाने के विधर्मियों के जागतिक षड्यंत्र एवं सरकार द्वारा किया जा रहा उनका तुष्टीकरण। 13. प्रचार माध्यमों द्वारा हिन्दू स्वाभिमान पर किए जा रहे आघात।
महत्वपूर्ण उपलब्धि – श्रीराम जन्मभूमि परिसर की भूमि का केन्द्र सरकार द्वारा किया गया अधिग्रहण अनधिकृत है अतः इस विषय पर जन जागरण के लिए 14 से 24 अक्टूबर, 1994 की अवधि में सन्त यात्राएँ निकाली गईं। सरकार द्वारा नियुक्त ट्रिब्यूनल ने विश्व हिन्दू परिषद से प्रतिबंध हटा दिया।
सप्तम धर्मसंसद
16-17 नवम्बर, 1996 को पंचवटी चैक, नई दिल्ली में। उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता पूज्य जगद्गुरु मध्वाचार्य स्वामी विश्वेशतीर्थ जी महाराज ने की। अधिवेशन में लगभग 3,000 सन्तों ने भाग लिया।
अधिवेशन में गंगाजी की पावनता, निरन्तरता और अक्षुण्णता को बनाए रखने के लिए संकल्प लिया गया।
जब तक भारतवर्ष रहेगा, जब तक मुझमें प्राण रहेंगे, तब तक मैं भागीरथी के पथ (प्रवाह) को नष्ट नहीं होने दूँगा। मैं भागीरथी का भक्त हूँ तथा गंगा स्रोत (मूल) का अवगाहक हूँ। मैं मुक्तिदात्री माता गंगा के बन्धन को कभी नहीं सहूँगा। जब तक मुझमें प्राण हैं, तब तक मैं गंगा पर बांध नहीं बनने दूँगा, यह मेरा दृढ़ संकल्प है, यह मेरा सुनिश्चय है। मुक्तिदात्री, भुक्तिदात्री, श्रेय एवं प्रेय की प्रदात्री गंगा को निश्चय ही मैं सब दिशाओं के दूषणों से रहित कर मुक्त करूँगा।  कामदेव के शत्रु भगवान शिव के मस्तक पर सुशोभित सब मनुष्यों के दुःखों को क्षणभर में नष्ट करने वाली एवं सुन्दर शैल-शिखरों से तरंगित गंगा को मैं नष्ट नहीं होने दूँगा।
पारित किए गए प्रस्ताव –
01. गंगोत्री से गंगासागर तक ‘गंगा बचाओ‘ अभियान में जुटने के लिए जनता का आह्वान।
02. गोवंश रक्षा हेतु सब प्रकार के बलिदान तथा लक्ष्य प्राप्ति तक सतत संघर्षरत रहने का अनुरोध।
03. श्रीराम जन्मभूमि, श्रीकृष्ण जन्मस्थान तथा काशी विश्वनाथ मन्दिर तीनों स्थानों से अपना दावा वापस लेने के लिए मुस्लिम नेताओं से आग्रह तथा हिन्दू समाज और सन्तों से इन स्थानों के लिए सर्वस्व बलिदान को सदैव तत्पर रहने का आह्वान किया गया।
04. प्रचार माध्यमों द्वारा लाए जाने वाले सांस्कृतिक प्रदूषण को रोकने, नारी को विलासिता की मूर्ति मात्र प्रदर्शित करने और आकाशवाणी तथा दूरदर्शन को अपनी काम – भोग परायण नीति में अविलम्ब सुधार करने को बाध्य करने के लिए महिला समाज से अनुरोध किया गया।
05. सामाजिक समरसता के पवित्र कार्य में एकजुट होकर लगने के लिए समाज के सभी बन्धुओं से आग्रह तथा पूज्य सन्तों से पिछड़े बन्धुओं के मध्य विशेष कार्य को लेकर समाज का मार्गदर्शन करने का अनुरोध किया गया।
06. दैनन्दिन जीवन में काम में आने वाली वस्तुओं का चाहे वे गुणवत्ता में विदेशी वस्तुओं की अपेक्षा हल्की ही क्यों न हों, प्रयोग करने के लिए देशवासियों से आग्रह तथा स्वदेशी वस्तु निर्माताओं से अपनी वस्तुएं विश्व मानक के अनुरूप तैयार करने का अनुरोध किया गया।
07. केन्द्रीय तथा प्रान्तीय सरकारों से धर्मान्तरण के राष्ट्रघाती अभियान को रोकने के लिए कानून बनाकर इसे संज्ञेय अपराध घोषित करने और विदेशी धन के विनियोग पर कड़ी निगाह रखने का आग्रह एवं सन्तों से इस राष्ट्र विरोधी वायुमण्डल को समाप्त करने के लिए सामाजिक समरसता का मधुर वातावरण बनाने का अनुरोध किया गया।
08. हिन्दू दलितों को मिलने वाली आरक्षण की सुविधा धर्मान्तरित दलित ईसाइयों को भी देने के लिए लाए जाने वाले बिल को संसद में न लाने के लिए सरकार को सन्त समाज द्वारा चेतावनी दी गई।
केरल से पधारे जगद्गुरु स्वामी सत्यानन्द जी द्वारा भी इसी संदर्भ में एक तथा केरल सरकार से ‘हरिवर्षनम्‘ परियोजना को तुरन्त कार्यान्वित करने और राष्ट्रपति से केरल सरकार द्वारा पारित अनुसूचित जनजातियों से सम्बंधित कतिपय विधेयकों को स्वीकृति प्रदान न करने के अनुरोध से सम्बंधित दो अन्य प्रस्ताव प्रस्तुत किए गए।
09. कन्या – भू्रण की हत्या के जघन्य पाप से अपने को बचाए रखने और संयत जीवन जीकर देश की बढ़ती जनसंख्या को नियंत्रित रखने में सहभागी होने के लिए सन्तों का हिन्दू समाज से अनुरोध।
10. श्रीकृष्ण जन्मस्थान की लीलाभूमि की घेराबन्दी करके तथा पूर्ण परिसर को परोक्ष रूप से पुलिस छावनी बनाकर सुरक्षा के नाम पर सन्तों, माताओं और बहनों को अपमानित करने के लिए सरकार की भत्र्सना करते हुए देवरहा बाबा की भविष्यवाणी को क्रियान्वित करने के लिए श्रीकृष्ण जन्मस्थान पर भव्य मन्दिर निर्माण हेतु सरकार से कानून बनाने का आग्रह।
11. तिब्बत में तैनात चीनी सैनिकों को हटाने, सम्पूर्ण तिब्बत को शान्ति एवं अहिंसा का क्षेत्र घोषित करने, तिब्बत के पर्यावरण को दूषित होने से बचाने तथा कैलास मानसरोवर की तीर्थयात्रा को बिना किसी प्रतिबन्ध के सुविधापूर्ण व्यवस्था करने के लिए सरकार से यथावश्यक व्यवस्था कराने के लिए अनुरोध।
12. मकबूल फिदा हुसैन द्वारा हिन्दू देवी-देवताओं के नग्न और अश्लील चित्रांकन करने की प्रवृत्ति और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर उसका समर्थन करने वालों की तीव्र भत्र्सना।
13. हिन्दू जीवन-मूल्यों में अहर्निश हो रहे अवमूल्यन पर चिन्ता प्रकट करते हुए पूज्य सन्तों से समाज का मार्गदर्शन करके, उसे उचित दिशा-बोध देकर आर्य परम्परा की निधि की रक्षा करने का अनुरोध।
14. हिन्दू धर्मस्थानों और मठ-मन्दिरों के देवस्व पर गिद्ध दृष्टि रखने तथा उनका अधिग्रहण करने की सरकारी प्रवृत्ति की तीव्र भत्र्सना करते हुए उन्हें सरकारी नियंत्रण से मुक्त करके सम्बंधित सम्प्रदाय के धर्माचार्यों का बोर्ड बनाकर उन्हें सौंपने का अनुरोध।
15. अयोध्या नगरी की सड़कों, नालियों, बिजली आदि की व्यवस्था के सुधार की दृष्टि से गठित विशेष विकास प्राधिकरण को तत्कालीन राज्यपाल श्री रोमेश भण्डारी द्वारा 09 नवम्बर, 1996 से समाप्त कर दिए जाने और अयोध्या के विकास को फैजाबाद विकास प्राधिकरण से जोड़ दिए जाने की तीव्र भत्र्सना।
16. सरकारों द्वारा हिन्दू मठ-मन्दिरों के अधिग्रहण का विरोध करने के लिए जन जागरण करने के लिए जनता का आह्वान।
17. देश में कोई भी प्राणी भूखा न रहे, इस दृष्टि से मठ-मन्दिरों के अधिष्ठाताओं, आचार्यों, महन्तों के साथ-साथ श्रद्धालु हिन्दू समाज से अन्नदान के माध्यम से अपने-अपने क्षेत्र में अन्न क्षेत्र चलाने का अनुरोध।
महत्वपूर्ण उपलब्धि – गंगाजी को प्रदूषणरहित बनाने तथा इस पर बनने वाले टिहरी बाँध के विरोध में जन-जागरण हेतु कोलकाता से प्रयाग तक की ‘गंगा यात्रा‘ निकालने के साथ-साथ घोषित अन्य कार्यक्रम।
अष्टम धर्मसंसद
6-7 फरवरी, 1999 को अहमदाबाद, लगभग 3,500 सन्तों ने भाग लिया।
निर्णय – सन्तों द्वारा हिन्दुओं के धर्मान्तरण को रोकने के लिए राष्ट्रव्यापी जन-जागरण पर निकलने का निश्चय किया गया।
मानवता के अभ्युदय एवं उत्कर्ष के लिए हिन्दू संस्कारों एवं हिन्दू चेतना के विस्तार को आवश्यक मानते हुए विश्व हिन्दू परिषद के हिन्दू एजेण्डे के प्रत्येक सूत्र के क्रियान्वयन के लिए किया गया आह्वान।
नवम् धर्मसंसद
19-20-21 जनवरी, 2001 को प्रयाग में महाकुम्भ के अवसर पर। लगभग 6000 सन्तों ने भाग लिया।
निर्णय – केन्द्र सरकार श्रीराम जन्मभूमि मन्दिर निर्माण की समस्त बाधाओं को अविलम्ब हटाए। ताकि आगामी शिवरात्रि अर्थात 12 मार्च, 2002 के पश्चात किसी भी शुभ दिन से मन्दिर निर्माण का कार्य प्रारम्भ किया जा सके। इस अभियान के लिए आध्यात्मिक ऊर्जा का निर्माण करने तथा हिन्दुत्व का जागरण करने और मन्दिर निर्माण के कार्य को गति प्रदान करने की दृष्टि से तीन कार्यक्रमों की घोषणा की गई –  पुरुषोत्तम मास में भगवान शंकर का जलाभिषेक  विजयमहामंत्र ‘श्रीराम जय राम जय जय राम‘ का जप यज्ञ  अयोध्याजी से दिल्ली तक सन्त चेतावनी यात्रा
पारित किए गए प्रमुख प्रस्ताव –
01. धर्मसंसद ने कट्टरवादी मुस्लिम समाज और जेहादी प्रवृत्ति पर चिन्ता व्यक्त करते हुए उनसे आग्रह किया कि वे जेहाद और आतंकवाद का रास्ता छोड़कर भारत एवं भारतीय समाज के उत्थान के लिए किए जा रहे प्रयासों में सम्मिलित हों।
02. त्रिपुरा सहित समस्त उत्तर पूर्वांचल मंे चल रही अलगाववादी एवं आतंकवादी प्रवृत्ति के पीछे चर्च के समर्थन को देखते हुए धर्मसंसद ने मांग की कि, ‘धर्मान्तरण‘ पर प्रतिबन्ध लगाने का केन्द्रीय कानून बनाकर चर्च की राष्ट्र विरोधी गतिविधियों पर अंकुश लगाया जाए और त्रिपुरा में कड़े कदम उठाकर वहाँ राष्ट्रवादी एवं हिन्दू धर्मावलम्बियों की रक्षा की जाए।
03. टिहरी बांध की अनुपयोगिता तथा गंगा की उपयोगिता की महत्ता को सिद्ध करते हुए गंगाजी की पवित्रता बनाए रखने के लिए सरकार से मांग करते हुए धर्मसंसद ने हिन्दू समाज से प्रयाग की पवित्रता, संगम की शुद्धता तथा भगवती गंगा के पुण्य प्रवाह को साक्षी कर यह संकल्प लेने को कहा कि जब तक वे तथा उनका विश्वास अक्षुण्ण है तब तक गंगा की पवित्रता व प्रवाह पर कोई आंच नहीं आने देंगे। गंगा की निर्मलता और अविरलता के लिए वे अपना सर्वस्व न्योछावर करने के लिए तत्पर रहेंगे।
05. केन्द्र सरकार एवं प्रान्तीय सरकारों से मठ-मन्दिरों का प्रबन्ध वहाँ की सरकारों के नियंत्रण में न रखकर एक स्वायत्तशासी संगठन के माध्यम से कराने का अनुरोध किया गया और यह भी कहा गया कि स्वायत्तशासी संगठन में साधु-सन्त, सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति, सरकारी अधिकारी, समाजसेवी और धार्मिक जनप्रतिनिधि सम्मिलित किए जाएं।
दशम् धर्मसंसद
22-23 फरवरी, 2003 को रामलीला मैदान, दिल्ली में। लगभग 9 हजार सन्त सम्मिलित हुए।
निर्णय – धर्मसंसद ने विश्व वन्दनीया भारत माता की सनातन संतति हिन्दू जाति और उसकी महान धार्मिक एवं संास्कृतिक अस्मिता की उसकी अपनी ही मातृभूमि, पितृभूमि और पुण्यभूमि में हो रही घोर दुर्दशा के निराकरण हेतु आसेतु हिमाचल अखण्ड भारत में पूर्ण प्रभुता सम्पन्न अजेय, अभय, सक्षम, समर्थ, सम्पन्न, समृद्ध, अनाक्रमणकारी, विश्ववत्सल, धर्मनिष्ठ, सुसंस्कृत और स्वाभिमानी हिन्दू राष्ट्र की पुनप्र्रतिष्ठा का दृढ़ संकल्प व्यक्त करते हुए सभी भारतमूलीय दर्शनों, उपासना पद्धतियों, पंथों, मतों और सम्प्रदायों के अनुयायी विराट हिन्दू समाज का एवं उसके मार्गदर्शक आचार्यों, गुरुओं तथा सन्तों और भारत के सभी धार्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक एवं राजनैतिक संगठनों का सादर और सस्नेह आह्वान किया कि वे सब विश्वमानव परिवार के लिए कल्याणकारी इस पवित्र ईश्वरीय कार्य में, अपने पूर्वाग्रहों और सीमित स्वार्थों से मुक्त होकर अखण्ड मातृभूमि और महान हिन्दू राष्ट्र के अभ्युत्थान हेतु संलग्न और समर्पित हो।
पारित किए गए प्रमुख प्रस्ताव –
01. सभी दलों से अनुरोध किया गया कि वे निहित राजनीतिक स्वार्थों से ऊपर उठकर श्रीराम जन्मभूमि मन्दिर निर्माण के लिए अपेक्षित कदम उठाएं और भारतीय अस्मिता एवं आस्था का सम्मान करें। साथ ही भारत सरकार से अनुरोध किया गया कि वह आवश्यक और अनुकूल व्यवस्था सुनिश्चित करे जिससे आज जहाँ रामलला विराजमान हैं, उस स्थान सहित सम्पूर्ण श्रीराम जन्मभूमि परिसर ‘श्रीराम जन्मभूमि न्यास‘ को सौंपा जा सके। यदि ऐसा नहीं होता है तो-
 बाबर द्वारा श्रीराम जन्मभूमि मन्दिर ध्वंस के समय से लेकर विगत 27 फरवरी, 2002 को गोधरा में रचे गए षड्यंत्र तक बलिदान हुए रामसेवकों और श्रीराम जन्मभूमि मन्दिर निर्माण के संकल्प को पूरा करने के लिए आगामी 27 फरवरी, 2003 (गुरुवार) को देश के प्रत्येक नगर व प्रखण्ड में धरना एवं प्रदर्शन के आयोजन किए जाएंगे और मन्दिर निर्माण विरोधी समस्त व्यक्तियों की वास्तविकता को जनता के समक्ष उजागर किया जाएगा।
02. धर्मसंसद ने भारत सरकार को चेतावनी दी कि- टिहरी के अव्यवहारिक विशाल बांध के रूप में भारत माता के पश्चात गंगामाता की भी हत्या कर देने की इस दुरभि सन्धि से सम्पूर्ण हिन्दू जगत क्षुब्ध है। गंगा के बिना भारत के अस्तित्व की कल्पना भी नहीं की जा सकती। अतः गंगामाता के निर्मल स्वरूप को पुनप्र्रतिष्ठापित करने के लिए अविलम्ब युद्ध स्तरीय कार्यक्रम की घोषणा करे और उसे क्रियान्वित करे।
03. धर्मसंसद ने केन्द्र सरकार का आह्वान किया कि वह आतंकवाद को कुचलने के लिए अपनी दृढ़ इच्छा शक्ति प्रकट करे। आतंकवाद की जननी मदरसों पर प्रतिबन्ध लगाए। दारूल उलूम देवबन्द, तब्लीग, हले-हदीस, दावतें इस्लाम आदि पर रोक लगाए और जेहाद के विरुद्ध मृत्युदण्ड का कानून बनाए। साथ ही कश्मीर में पोटा लागू करके पाकिस्तान व बंगलादेश में चल रहे आतंकवादी प्रशिक्षण केन्द्रों को हमला करके नष्ट करे।
04. धर्मसंसद ने भारत में 03 करोड़ बंगलादेशी घुसपैठियों की विकराल समस्या पर गहन चिन्ता व्यक्त करते हुए कहा कि ‘भारत माँ के दुश्मन ये बंगलादेशी घुसपैठिए किसी रहम के हकदार नहीं हैं अतः जहाँ इन्हें पहचानकर भारत से बाहर धकेलने की आवश्यकता है वहीं ऐसी परिस्थिति निर्माण करने की आवश्यकता है जिससे कोई भी घुसपैठिया भारत में रह ही न सके। साथ ही बंगलादेशी घुसपैठियों को हटाने का समयवध कार्यक्रम घोषित करे। पश्चिम बंगाल सरकार को बर्खास्त करे, असम में लागू प्डक्ज् कानून को समाप्त करे तथा बंगलादेश एवं पाकिस्तान में हो रहे हिन्दुओं पर अमानवीय अत्याचारों को रोके।
05. धर्मसंसद ने असम में अवैध घुसपैठ निर्धारण पंचाट अधिनियम को अविलम्ब निरस्त करने के लिए मत व्यक्त किया। साथ ही यह भी कहा कि यदि आवश्यक हो तो एतदर्थ संसद का संयुक्त अधिवेशन भी बुलाया जाए अन्यथा जिन आतंकवादियों के मुख्यालय बंगलादेश में हैं, वे अपनी जिहादी गतिविधियों का विस्तार उत्तर-पूर्व तक करके हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा को अकल्पनीय संकट में डाल देंगे और इसके दोषी अल्पसंख्यक राजनीति के दृष्टिकोण से सोचने वाले व्यक्ति ही होंगे।
06. धर्मसंसद ने भारत सरकार एवं सभी राज्य सरकारों से आग्रह किया कि नियोगी कमीशन, रेगे कमीशन और वेणुगोपाल के जांच परिणामों को ध्यान में रखते हुए धर्मान्तरण पर रोक लगाने हेतु कानून बनाकर धर्मान्तरण को संगीन अपराध घोषित करे।
07. बंगलादेश में हिन्दुओं पर हो रहे अत्याचारों के संदर्भ में धर्मसंसद ने बंगलादेश सरकार को चेतावनी देते हुए कहा कि वहाँ के हिन्दू समाज को अनाथ न समझे, पूरे विश्व का हिन्दू समाज अपने सहोदरों पर होने वाले अत्याचारों को रोकने के लिए कृतसंकल्प है। धर्मसंसद ने भारत सरकार से मांग की कि बंगलादेश में हिन्दुओं पर हो रहे अत्याचारों को रोकने के लिए वहां की सरकार को विवश करे।
ग्यारहवीं धर्मसंसद
धर्मसंसद के 11वें अधिवेशन का आयोजन देशभर में 6 अलग-अलग स्थानों पर किया गया, यथा-
* उत्तर-हरिद्वार: 13-14 दिसम्बर, 2005 को हरिद्वार में। उŸारांचल, मेरठ, मध्यभारत, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल, पंजाब, हरियाणा, इन्द्रप्रस्थ, जयपुर, ब्रज प्रान्तों के 1294 सन्त सम्मिलित हुए।
* पश्चिम-बड़ताल: 21 और 22 जनवरी, 2006 को बड़ताल (गुजरात) में। चित्तौड़, मालवा, कोंकण, सौराष्ट्र, उत्तर गुजरात, दक्षिण गुजरात, विदर्भ, महाराष्ट्र, देवगिरि, जोधपुर प्रान्तों के 2199 सन्त।
* मध्य-प्रयागराज: 1 और 2 फरवरी, 2006 को प्रयागराज (उ0प्र0) में। महाकौशल, उत्तर बिहार, दक्षिण बिहार, अवध, गोरखपुर, काशी, कानपुर प्रान्तों के 1365 सन्त।
* उत्तर पूर्वांचल-गुवाहाटी: 10 और 11 फरवरी, 2006 को गुवाहाटी (असम) में। असम एवं उसके सभी उप-प्रान्तों के 439 सन्त।
* पूर्व-जगन्नाथपुरी: 18 और 19 फरवरी, 2006 को जगन्नाथपुरी (उड़ीसा) में। झारखण्ड, पू0 उत्कल, प0 उत्कल, उ0 बंगाल, द0 बंगाल, छत्तीसगढ़ प्रान्तों के 3194 सन्त।
* दक्षिण-तिरुपति: 4 और 5 मार्च, 2006 को तिरुपति (आन्ध्र प्रदेश) में। केरल, तमिलनाडु, उत्तर कर्नाटक, दक्षिण कर्नाटक, पूर्व आन्ध्र, पश्चिम आन्ध्र प्रान्तों के 1176 सन्त उपस्थित रहे।
उल्लेखनीय कार्य – 11वीं धर्मसंसद में संगम तट पर गंगा व गाय की रक्षा तथा श्रीराम जन्मभूमि पर भव्य मन्दिर और हिन्दू वोट बैंक बनाने के लिए संघर्ष करने का संकल्प लिया गया। विश्व हिन्दू परिषद के शीर्ष नेताओं और सन्तों की मौजूदगी में अगले साल तक मन्दिर निर्माण की राह में आने वाली हर बाधा को उखाड़ फेंकने का ऐलान किया गया। एक साल के दौरान हिन्दुत्व की धारा को और तेजी से फैलाने की हुंकार भरी गई।
पारित किए गए प्रस्ताव – 9 प्रस्ताव पारित किए गए जिसमें गाय, गंगा, श्रीराम जन्मभूमि, मठ-मन्दिरों के अधिग्रहण, हिन्दू वोट बैंक, धर्मान्तरण, इस्लामिक आतंकवाद के मुद्दे शामिल हैं।
केन्द्रीय मार्गदर्शक मण्डल
विश्व हिन्दू परिषद के विधान में उल्लिखित मार्गदर्शक मण्डल की धारा के अनुपालन की दृष्टि से प्रारम्भ में परमपूज्य स्वामी सत्यमित्रानन्दगिरि जी महाराज, भानुपुरा (मन्दसौर) तथा परमपूज्य प्रभुदत्त जी ब्रह्मचारी, झूसी (इलाहाबाद) को मार्गदर्शक मण्डल के सम्मानित सदस्य के रूप में मनोनीत किया गया। विश्व हिन्दू परिषद के माध्यम से सम्पूर्ण हिन्दू समाज को इन दोनों पूज्य सन्तों द्वारा मार्गदर्शन का यह पवित्र कार्य चल ही रहा था कि जनवरी, 1978 ई. में कर्णावती (गुजरात) में सम्पन्न प्रबन्ध समिति की बैठक में सान्दीपनी साधनालय के परमपूज्य स्वामी श्री चिन्मयानन्द जी महाराज, उडुप्पी के परमपूज्य जगद्गुरु मध्वाचार्य स्वामी विश्वेशतीर्थ जी महाराज और वैदिक परम्परा के महान उद्धारक परमपूज्य स्वामी गंगेश्वरानन्द जी महाराज को भी मार्गदर्शक रूप में मनोनीत किया गया। इस प्रकार पंच-परमेश्वर के रूप में भारत के परम प्रतिष्ठित पाँच परमपूज्य धर्माचार्यों को मार्गदर्शक मण्डल के सम्मानित सदस्यों के रूप में मनोनीत किया। बाद में भी समय-समय पर मार्गदर्शक मण्डल के सदस्यों की संख्या में वृद्धि होती रही। शनैः शनैः यह संख्या बढ़ती गई, वर्तमान में मार्गदर्शक मण्डल में सम्पूर्ण भारत के सभी प्रान्तों के सभी सम्प्रदायों, परम्पराओं के 400 सन्त धर्माचार्य सम्मिलित हैं। प्रान्तों में मार्गदर्शक मण्डल बनाए गए। प्रान्त मार्गदर्शक मण्डल के सम्मेलन होते हैं।
1982 ई. के मई मास में हरिद्वार में सम्पन्न केन्द्रीय मार्गदर्शक मण्डल की बैठक में तीन प्रस्ताव, यथा- (१) प्रत्येक राज्य में पूज्य सन्तों का मार्गदर्शन प्राप्त करने के लिए प्रान्तीय मार्गदर्शक मण्डलों का गठन किया जाए, (२) इनकी गतिविधियों की सूचना केन्द्र को दी जाए तथा (३) प्रान्तीय मार्गदर्शक मण्डलों के पूज्य सन्तों को केन्द्रीय धर्मसंसद का सदस्य मानकर भारत के विभिन्न स्थानों में धर्मसंसदों का आयोजन किया जाए, पारित किए गए। इस बैठक में उपस्थित सन्त इस प्रकार थे-
उत्तर प्रदेश: 01. आचार्य महामण्डलेश्वर स्वामी प्रकाशानन्द जी (हरिद्वार), 02. स्वामी बृजकिशोर जी पुरी (हरिद्वार), 03. आचार्य स्वामी जगदीशमुनि जी (हरिद्वार), 04. स्वामी अभयानन्द जी (हरिद्वार), 05. स्वामी हीरानन्द जी (हरिद्वार), 06. स्वामी विवेकानन्द जी (हरिद्वार), 07. स्वामी लक्ष्मणपुरी जी (हरिद्वार), 08. सेक्रेटरी श्री पंचायती अखाड़ा (हरिद्वार), 09. स्वामी गीतानन्द जी (हरिद्वार), 10. आचार्य श्री श्रीराम जी शर्मा (हरिद्वार), 11. महंत श्री गिरधरनारायणपुरी जी (हरिद्वार), 12. स्वामी सुन्दरदास जी (हरिद्वार), 13. स्वामी सत्यमित्रानन्द जी (निवृत्त शंकराचार्य) (हरिद्वार), 14. स्वामी हरिहरानन्द जी (हरिद्वार), 15. डाॅ0 स्वामी श्यामसुन्दरदास जी शास्त्री (हरिद्वार), 16. ऋषि केशवानन्द जी (हरिद्वार), 17. स्वामी परमानन्द जी (हरिद्वार), 18. स्वामी महेश्वरदेव जी (हरिद्वार), 19.महामण्डलेश्वर स्वामी सच्चिदानन्द जी महाराज (हरिद्वार), 20.महन्त कर्णपुरी जी (हरिद्वार), 21. स्वामी सुरेश्वरानन्द जी (हरिद्वार), 22. स्वामी सूर्यदेव जी आचार्य (हरिद्वार), 23. महंत अवेद्यनाथ जी महाराज (गोरखपुर) 24. महामण्डलेश्वर स्वामी रामदास शास्त्री (वृन्दावन) 25. जगदाचार्य स्वामी नारदानन्द जी (सीतापुर) 26. स्वामी पुरुषोत्तमाचार्य, गौडेश्वराचार्य (वृन्दावन), 27. स्वामी ब्रह्मानन्द जी, (सहारनपुर) पश्चिम बंगाल: 28. स्वामी देवानन्द जी (हुगली) 29. स्वामी सुमेयानन्द जी (हुगली) बिहार: 30. स्वामी जयराम प्रपन्न महाराज (राँची), उड़ीसा: 31. महंत अयोध्यादास जी (पुरी), राजस्थान: 32. स्वामी शालिग्रामदास जी (रेवासा), 33. महामण्डलेश्वर स्वामी महेशानन्द जी महाराज (आबू पर्वत), मध्यप्रदेश: 34. स्वामी सत्यकामानन्द जी (भोपाल), 35. स्वामी अमरानन्द जी, (रायगढ़) पंजाब: 36. स्वामी हिममुनि जी (फरीदकोट), 37. स्वामी त्रिलोकीनाथ बाबा जी (कपूरथला), 38. महन्त मुरारीलाल जी (नाभा), 39. महामण्डलेश्वर स्वामी निरंजनानन्द जी महाराज (जालन्धर), दिल्ली: 40. स्वामी राघवानन्द जी, 41. स्वामी विजयानन्द जी, (नई दिल्ली ), बम्बई: 42. पूज्य ब्रह्मचारी विश्वनाथ जी, (बम्बई)।

महिला सन्तों के मध्य संगठन एवं उनके द्वारा सेवा कार्याें का प्रारम्भ करने के लिये साध्वी शाक्ति परिषद का गठन हुआ, लगभग 400 साध्वियाँ साध्वी शक्ति परिषद के सम्पर्क में है हरिद्वार में साध्वियों की ओर से निराश्रित बालिकाओं का एक केन्द्र 2001 में प्रारम्भ हुआ, आज मातृ आंचल नामक इस केन्द्र में 75 बालिकाएं हैं, जिनके आवास, भोजन, शिक्षण, वस्त्र, चिकित्सा आदि सम्पूर्ण व्यवस्थाएं समाज के सहयोग से साध्वी करती है।
यात्राएँ-जिनके कारण अभूतपूर्व जनजागरण हुआ
यात्राओं का महत्व-
जन-जागरण का मुख्य आधार जन-सम्पर्क और जन-सम्पर्क का सशक्त माध्यम है धर्मयात्राएँ। यात्राओं के दौरान असंख्य लोगों से सम्पर्क आता है। भारत तो तीर्थयात्राओं का ही देश है अतः यहाँ जन-सम्पर्क के लिए यात्राएँ और भी अधिक महत्त्वपूर्ण एवं उपयोगी हैं। आसेतु हिमाचल बसे हिन्दू समाज में राष्ट्रीयता की भावना भरने, सांस्कृतिक स्वाभिमान जगाने और धर्म के प्रति आस्था पैदा करने के लिए यात्राएँ मेरुदण्ड सिद्ध हैं। इसी दृष्टिकोण के कारण समय-समय पर विभिन्न यात्राओं की योजना बनी। फलतः हिन्दू समाज में नई चेतना जागृत हुई।
प्रमुख यात्राएं इस प्रकार रहीं:-
01. 1982 की तमिलनाडु ज्ञान रथम् यात्रा
रथ यात्रा जून, 1982 में निकाली गई थी। रथ में भगवान मुरुगन की मूर्ति प्रतिष्ठित थी। यह यात्रा 18 मास तक चली। 20825 किलोमीटर चलकर लगभग 900 ग्रामों में भ्रमण किया। 418 दिनों में 970 स्थानों पर 4 लाख से भी अधिक अभिषेक के कार्यक्रम हुए। यात्रा की अवधि में 6 लाख से अधिक लोगों से सम्पर्क हुआ।
इसे पिछड़े इलाकों में जहाँ हरिजन तथा अन्य पिछड़े वर्गों के लोग बहुतायत में रहते थे विशेष रूप से ले जाया गया। जिन लोगों को स्वामी मुरुगन के दर्शनों का कभी सौभाग्य ही नहीं मिला था, उनकी खुशी का कोई ठिकाना नहीं था। उनकी भक्ति-भावना का उद्वेग सभी सीमाओं को लांघ गया था। पूजा के लिए भक्तों का तांता लगा रहता था। कहीं-कहीं पूजा का कार्यक्रम आधी रात तक चलता था। इस क्रम को शक्ति रथम् और ज्ञान दीपक रथम् ने आगे बढ़ाया। तमिलनाडु में इस परियोजना का बड़ा दूरगामी प्रभाव पड़ा।
02. 1983 की केरल धर्मयात्रा
मार्च, 1983 में धर्माचार्यों ने धर्मयात्रा के नाम से यात्रा निकाली। केरल की दक्षिण और उत्तरी सीमाओं से एक साथ दो रथ निकाले गए। रथों में क्रमशः कन्याकुमारी और मुकाम्बिका मन्दिरों से प्राप्त दैवी ज्योति स्थापित की गई। रथों ने 25 दिनों की अवधि में 14 जिलों का परिभ्रमण किया। परिभ्रमण के दौरान सन्तों ने मुख्य रूप से हरिजन और गिरिजन बस्तियों का दौरा किया। उनकी झोपडि़यों में जाकर उनके द्वारा बनाया गया भोजन ग्रहण किया। उन लोगों का प्रेम और स्नेहपूर्ण व्यवहार तथा उनकी निश्छलता को देखकर सन्तों के नेत्र अश्रुपूरित हो गए। यात्रा विवरण- सहभागी सन्त-52, परिभ्रमित ताल्लुके-52, परिभ्रमित स्थान-798, हरिजन-गिरिजन बस्तियाँ-580, सहभागी व्यक्ति-2,10,000, जनसभाएं-60, शोभायात्राएं-24, कुल दूरी-7000 किलोमीटर।
03. 1983 की प्रथम एकात्मता यज्ञ यात्रा
युगाब्द 5085 (विक्रमी संवत् 2040, 1983 ई.) में आयोजित एकात्मता-यज्ञ-यात्रा अपने उद्देश्य में पूर्ण सफल रही। यात्रा ने सिद्ध किया कि सम्पूर्ण भारत का हिन्दू समाज गंगा माता के प्रति अपार श्रद्धा रखता है। ‘हिन्दू हम सब एक’ का जयघोष इस यात्रा ने साकार कर दिखाया, यह भी स्पष्ट हो गया कि देश में हिन्दुत्व ही राष्ट्रीयता का पर्याय है।
परिषद के तत्कालीन अध्यक्ष महाराणा श्री भगवत सिंह मेवाड़ तथा महामंत्री श्री हरमोहन लाल जी ने सभी सम्बंधितों को सर्वप्रथम पत्र लिखकर यात्रा की योजना का परिचय देते हुए इसके उद्देश्य से परिचित कराया। देशभर में 150 से अधिक प्रेस सम्मेलनों, भेंटवार्ताओं, वक्तव्यों और भाषणों से बार-बार यात्रा के उद्देश्यों को उद्घोषित किया। धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक कार्य करने वाले व्यक्तियों/संस्थाओं से सम्पर्क साधा गया और उनसे सहयोग की अपेक्षा की गई।
एकात्मता यज्ञ यात्रा में 300 से भी अधिक रथों ने देश के सभी राज्यों में गंगा कलश और भारत माता की प्रतिमा के साथ संयुक्त रूप में लगभग 1000 दिनों तक अपनी परिभ्रमण परिक्रमा पूर्ण की थी। सभी प्रान्तों से कई मुख्य यात्राएँ और कई उपयात्राएँ निकाली गई किन्तु काठमाण्डु से रामेश्वरम् (पशुपति रथ), हरिद्वार से कन्याकुमारी (महादेव रथ) और गंगासागर से सोमनाथ (कपिल रथ) , ये तीन यात्राएँ सबसे बड़ी यात्राओं के रूप में रहीं। इन तीनों यात्राओं का संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है:-
(क) काठमाण्डु से रामेश्वरम् तक ‘पशुपति रथ’ यात्रा
इस रथ ने 5500 किलोमीटर से अधिक की यात्रा की थी। इस यात्रा का मार्ग अन्य रथों से 1500 किलोमीटर अधिक लम्बा था। इसीलिए अन्य रथों की यात्राओं के प्रारम्भ होने से 18 दिन पहले ही अर्थात 28 अक्टूबर, 1983 को इस रथ ने काठमाण्डु से यात्रा प्रारम्भ की। रथ की विदाई नेपाल नरेश महाराजाधिराज वीरेन्द्र वीर विक्रम शाह देव व महारानी ऐश्वर्य राजलक्ष्मी ने निर्जल व्रत रखकर गंगाकलश का पूजन करके की। विभिन्न प्रान्तों से गुजरते हुए रथ ने 02 दिसम्बर, 1983 को आन्ध्र प्रदेश में प्रवेश किया, आन्ध्र में 1300 किलोमीटर की यात्रा पूरी करके 11 दिसम्बर, 1983 को तिरूपति पहुँचा, 16 दिसम्बर, 1983 को अपने गंतव्य स्थान रामेश्वरम् पहुँचा। इसी दिन रथ में स्थापित गंगा कलश के जल से वहाँ भगवान आशुतोष शिव का अभिषेक किया गया।
(ख) हरिद्वार से कन्याकुमारी तक ‘महादेव रथ’ यात्रा
रथ ने हर की पैड़ी हरिद्वार से 16 नवम्बर, 1983 को देवोत्थान एकादशी की पावन बेला में घण्टे-घडि़यालों के तुमुल निनाद और गंगा माता की जय-जयकार के साथ यात्रा प्रारम्भ की। इस रथ में स्थापित कलश में ब्रह्मकुण्ड से जल संभरण का कार्य 15 नवम्बर, 1983 को समारोहपूर्वक सम्पन्न हो चुका था। यात्रा से पूर्व प्रातः हर की पौड़ी पर यज्ञ किया गया और सायंकाल गंगा आरती की गई। विभिन्न अखाड़ों के साधु, धर्माचार्य व सन्यासी उपस्थित थे।

‘महादेव रथ‘ उत्तर प्रदेश से चलकर हरियाणा, राजस्थान, मध्यप्रदेश, विदर्भ और महाराष्ट्र तक 1200 किलोमीटर की यात्रा करके 03 दिसम्बर, 1983 को आदिलाबाद (आन्ध्रप्रदेश) पहुँचा। यहां हिन्दुओं के साथ-साथ ईसाइयों तथा मुस्लिमों ने भी रथ का स्वागत किया। 8 दिसम्बर, 1983 की रात्रि को आन्ध्र प्रदेश के ताडपत्री नामक स्थान पर रथ पहुँचा, सौ ग्रामों से आए हुए 50 हजार से भी अधिक नर-नारियों ने भारतमाता एवं गंगामाता का पूजन किया। सौभाग्य था कि गंगामाता स्वयं ही अनुग्रह करके अपना दर्शन व आशीर्वाद देने पहुँची।
आन्ध्र के विभिन्न नगरों से हिन्दूपुर से कर्नाटक से कन्याकुमारी के लिए दिनांक 10 दिसम्बर, 1983 को चला। 18 दिसम्बर, 1983 को कन्याकुमारी जिले की सीमा पर सायंकाल में पहुँचा। 19 दिसम्बर, 1983 को रथ राधाकृष्णपुरम से चलकर गणपतिपुरम पहुँचा। अगला पड़ाव नागरकोइल था। नागरकोइल से रथ सुचित्रम् पहुँचा। 20 दिसम्बर, 1983 को कन्याकुमारी के भगवती अम्बा मन्दिर में एकात्मता यज्ञ की पूर्णाहुति के रूप में गंगाजल तथा अन्य पवित्र नदियों से लाए गए जल से, जिसमें मानसरोवर से लाया गया जल भी था, भगवती का अभिषेक किया गया।
(ग) गंगासागर से सोमनाथ तक ‘कपिल रथ’ यात्रा
15 नवम्बर, 1983 की प्रातः 08.30 बजे वेद मंत्रों की ध्वनि के बीच अनेक साधु-सन्तों एवं गणमान्य व्यक्तियों की उपस्थिति में कपिलमुनि के आश्रम के सामने से गंगासागर तीर्थ (पश्चिम बंगाल) से पवित्र जल ग्रहण करके कलश का विमोचन किया गया। कलश को कचुबेरिया लाया गया, वहाँ से नौका द्वारा कर्क द्वीप लाया गया, जहाँ रात भर कीर्तन होता रहा। 16 नवम्बर, 1983 को कलश डायमण्ड हार्बर और वहाँ से रथ कोलकाता पहुँचा, एक विशाल सभा हुई। ब्रह्मदेश का शिष्टमण्डल ‘इरावदी‘ नदी का जल लेकर कोलकाता में ‘कपिल रथ‘ की यात्रा में सम्मिलित हुआ। सभा में बौद्ध भिक्षु पूज्य भन्ते ज्ञानजगत जी सहित अनेक सन्त उपस्थित थे। इस यात्रा का समापन विश्व हिन्दू परिषद के तत्कालीन अध्यक्ष महाराणा भगवतसिंह मेवाड़ के द्वारा सोमनाथ मन्दिर में भगवान शिव के महाभिषेक के लिए गंगाजल कलश के समर्पण के बाद हुआ।
तीनों यात्राएँ प्रतिदिन लगभग 100 किलोमीटर की दूरी पार करती थीं। प्रति 25 किलोमीटर या उसके आसपास की दूरी पर उसका पड़ाव होता था और वहाँ दो घण्टे का कार्यक्रम होता था। इन कार्यक्रमों में आसपास के नगरों और ग्रामों के प्रतिनिधि भाग लेते थे। वे अपने साथ अपने पवित्र स्थानों का जल लाते थे। उस जल को जल-कलश में डाल देते थे और उसके स्थान पर कुछ गंगाजल अपने देवी-देवताओं के अभिषेक के लिए ले लेते थे। जब ये यात्राएँ अपने गन्तव्य स्थान रामेश्वरम्, कन्याकुमारी और सोमनाथ पहुँची तो उनके कुम्भों में सभी पावन स्थलों अर्थात चारों धामों, बारह ज्योतिर्लिंगों, बावन शक्तिपीठों, मानसरोवर, नानक सागर, हेमकुण्ड और सैंकड़ों पावन नदियों, झीलों और कूपों से एकत्रित पवित्र जल था।
सभी यात्राओं ने 50,000 किलोमीटर की दूरी तय की। यात्राएँ सभी प्रान्तों के सभी विकास खण्डों से होकर निकलीं। हिमालय से हिन्द महासागर तक फैला समूचा देश ‘भारत माता की जय‘, ‘गंगा माता की जय, ‘हिन्दू धर्म की जय‘ के जयघोषों से गूँज उठा।
भूटान से आया उपरथ यात्रा में सम्मिलित हुआ। मौरिशस के रामसर का जल लेकर वहां के भू0पू0 मंत्री श्री दयानन्द वसंतराय जी दिल्ली आए तो कटाक्षराज (पाकिस्तान) का जल लेकर गोस्वामी गिरधारीलाल जी पधारे। मानसरोवर एवं बंगलादेश के कोने-कोने से हिन्दू तीर्थों का जल इस यात्रा का वैशिष्ट्य था। यह सिद्ध कर दिया गया कि नेपाल, भूटान, ब्रह्मदेश सभी की राजनैतिक सीमाएं भले ही भिन्न हो किन्तु भारत सहित इन सब देशों की सांस्कृतिक आत्मा एक ही है।
‘इण्डिया टुडे‘ की यह पंक्ति कि गोरखपुर की उच्च वर्ग की ठकुरानी एवं कथित निम्न वर्ग की महतरानी साथ-साथ खड़ी होकर पूजा करके राजनेताओं को शिक्षा दे रही थीं कि यह भेदभाव, राजनीति ने ही अधिक बढ़ाए हैं, अन्यथा धर्म के क्षेत्र में तो ‘जो हरि को भजे सो हरि का होई‘ का ही प्रचलन है। पांढरकोणा में अग्रपूजा वाल्मीकि समाज के एक सदस्य ने की, रामेश्वरम् में अभिषेक कुम्भ पिछड़े समाज के सदस्य द्वारा ले जाया गया। मणिपुर के उपमुख्यमंत्री कार्यक्रम के मुख्य अतिथि थे। फतहगढ़ में राजपूत (वाहिनी) रेजीमैण्ट ने यात्रा को मान वन्दना (गार्ड आॅफ औनर) प्रदान की।
नागपुर में 29 नवम्बर, 1983 को अभूतपूर्व दृश्य था। उस दिन सभी मार्ग नागपुर जा रहे थे। तीनों यात्राओं का त्रिवेणी संगम बना था। नागपुर में एक दिन पूर्व ही विश्वकर्मा के वरद पुत्र कलाकार भारत माँ की मूर्ति निर्माता दम्पत्ति तथा जगाधरी के कुम्भ निर्माता युगल बन्धुओं को उनकी कला के सम्मानार्थ पूज्य सरसंघचालक श्री बालासाहेब देवरस द्वारा सम्मानित किया गया था।
कर्नाटक में इस यात्रा की रूपरेखा एक ही स्थान ‘धर्मस्थल‘ पर की गई थी। धर्मस्थल सचमुच एकात्मता का जीवन्त प्रतीक है जहाँ देवालय तो भगवान शिव का है और पुजारी होता है वैष्णव और धर्माधिकारी (प्रबन्धक) होता है जैन। यही एकात्मता-चिन्तन वस्तुतः हिन्दू जीवन-पद्धति है। विश्व में ऐसा अपूर्व उदाहरण विरल है।
प्रथम एकात्मता यज्ञ यात्रा के आंकड़े –
मुख्य यात्राएँ-3, उपयात्राएं-312, रात्रि विश्राम स्थल-974, कुल कार्यक्रम-4,323। 38,526 स्थानों से 77,440 जल कलश पूजन हेतु समाज के द्वारा लाए गए। सम्पर्कित जिले एवं महानगर-531, सम्पर्कित प्रखण्ड-4,432, सम्पर्कित ग्राम एवं बस्ती-1,84,592, कुल चली गई दूरी-85,874, सहभागी व्यक्तियों का संख्या अनुमान-7,28,00,000।
श्रीराम जानकी रथ यात्राएँ
04. 1984 की सीतामढ़ी – श्रीराम जानकी रथ यात्रा –
श्रीराम जन्मभूमि पर लगे ताले को खुलवाने के लिए श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति की अयोध्या में आयोजित बैठक के निर्णय के अनुसार 25 सितम्बर, 1984 को माता जानकी के जन्मस्थान सीतामढ़ी से श्रीराम जानकी रथ यात्रा प्रारम्भ हुई।
रथ यात्रा सीतामढ़ी से चलकर पुपरी, बेनीपट्टी, मधुबनी, दरभंगा, समस्तीपुर, मुजफ्फरपुर, छपरा, सीवान, देवरिया (देवराहा बाबा के आश्रम में आशीर्वाद लेकर), गोरखपुर होते हुए 06 अक्टूबर, 1984 की संध्या को अयोध्या पहुँची। 07 अक्टूबर, 1984 का दिन अयोध्या के लिए स्मरणीय रहा। वहाँ ‘श्रीराम जन्मभूमि मुक्त हो‘ जयघोष से बाल-वृद्ध-नर-नारी सबमें अपूर्व उत्साह भर गया। 07 अक्टूबर, 1984 को सरयू किनारे संकल्प कार्यक्रम में हजारों सन्तों और श्रीरामभक्तों ने सम्मिलित रूप से संकल्प लिया और श्रीराम जन्मभूमि पर लगे अवैध ताले को खोलने की माँग की।
08 अक्टूबर, 1984 को श्रीराम जानकी रथ यात्रा अयोध्या से लखनऊ के लिए चल पड़ी। जैसे-जैसे आगे बढ़े अपार भीड़ मिली। यात्रा का पहला पड़ाव था ‘‘सोहावल‘‘। संदेह था कि आठ-नौ हजार लोगों को खाना कैसे मिलेगा ? परन्तु जब यात्रा उस पड़ाव से चली तो रास्ते भर लोग चाय, जलपान, भोजन लिए खड़े थे।
लखनऊ पहुँचने के पूर्व अन्तिम पड़ाव ‘‘चिनहट‘‘ का दृश्य तो देखने लायक था। वहाँ पक्का खाएँ तो पूडि़याँ मिल रही थी, कच्चा खाएँ तो भोजन मिल रहा था। उस इलाके से ग्वाले सैंकड़ों लीटर दूध लेकर लखनऊ के बाजारों में जाते थे। उस दिन यह सोचकर कि हमारे भाग्य से ही इस स्थान पर श्रीराम जानकी रथ यात्रा आ रही है – भगवान आ रहे हैं, वे सभी वहीं रुक गए। उस दिन बाजार के लिए एक छटांक दूध भी नहीं गया, यात्रियों को सारा दूध पिला दिया। कैसा विचित्र और अदम्य उत्साह था ?
14 अक्टूबर, 1984 को लखनऊ में यात्रा के स्वागत के लिए उर्मिला वाटिका (बेगम हजरत महल पार्क) में एक सभा का आयोजन था। पत्रकारों ने भी स्थान-स्थान पर ‘गेट‘ (द्वार) बनाए हुए थे। उर्मिला वाटिका (बेगम हजरत महल पार्क) में सभा प्रारम्भ होने से 2 घण्टे पूर्व से ही छोटे-छोटे जुलूसों में लोग ‘‘आगे बढ़ो, जोर से बोलो, जन्मभूमि का ताला खोलो‘‘ नारे लगाता हुआ नाचता-गाता हुआ वहाँ जुटने लगा। श्रीराम जानकी रथ के साथ लक्षावधि जनता उमड़ पड़ी। सभा के स्वागताध्यक्ष सेवानिवृत्त पुलिस महानिरीक्षक श्री श्रीशचन्द्र दीक्षित का स्वागत भाषण सुनकर लोगों को सुखद आश्चर्य हुआ। मार्मिक शब्दों में उन्होंने कहा कि लक्षावधि श्रीराम भक्तों के आगमन से यह लक्ष्मण नगरी धन्य हो गई है क्योंकि ‘‘श्रीराम भक्तों के चरणों में श्रीराम की लीलाभूमि की रज लगी है। उन्होंने कहा कि हम अयोध्या, मथुरा और काशी के पावन स्थलों को दासता के अवशेष के रूप में नहीं देखना चाहते। अतः सभी लोग इन्हें मुक्त कराने के इस अभियान मंे सब प्रकार से सहयोग करें।
दीप प्रज्ज्वलन करके सम्मेलन का उद्घाटन करने के बाद महामण्डलेश्वर स्वामी प्रकाशानन्द जी (हरिद्वार) ने अपने उद्बोधन में कहा कि रामजन्मभूमि का ताला खुलेगा, इसके शुभ संकेत स्पष्ट दीख रहे हैं। क्योंकि सन्यासी अग्नि नहीं छू सकते परन्तु जब मैंने दीपक की तीन मोटी -मोटी बत्तियों को जलाया और वे तुरन्त जल उठीं तो हमें विश्वास हो गया कि अब वह दिन दूर नहीं जब श्रीराम जन्मभूमि की मुक्ति होगी।
श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति के महामंत्री श्री दाऊदयाल खन्ना ने अपने प्रस्तावित भाषण में कहा कि हमारी तीन माँगे हैं- (1) श्रीराम जन्मभूमि मन्दिर अयोध्या का ताला हिन्दुओं के लिए खोला जाय। (2) मथुरा में श्रीकृष्ण जन्मभूमि पर बनी ईदगाह मन्दिर को लौटाई जाय तथा (3) काशी में विश्वनाथ मन्दिर पर बनी मस्जिद मन्दिर ट्रस्ट को सौंप दी जाय। श्री खन्ना ने नौजवानों से अपील की कि वे बड़ी संख्या में ‘‘बजरंग दल’’ के सदस्य बनें और प्रतिज्ञा पत्र भरें।
केरल के तेजस्वी महात्मा स्वामी भूमानन्द ने हिन्दू जन शक्ति का साक्षात्कार कराते हुए कहा कि राजनीति की शक्ति के मुकाबले में श्रीराम की शक्ति सौ गुना बड़ी होती है परन्तु आज यहाँ वह हजार गुना बड़ी दीख रही है। स्वामी जी ने सरकार से एक अध्यादेश लाकर लखनऊ का नाम लक्ष्मणपुरी एवं बेगम हजरत महल पार्क का नाम ‘‘उर्मिला वाटिका’’ घोषित करने का भी आग्रह किया।
हरिद्वार के भारत माता मन्दिर के संस्थापक और निवृत्तमान शंकराचार्य स्वामी सत्यमित्रानन्द गिरि जी ने बलिदानियों की सूची में लिखने के लिये सर्वप्रथम अपना नाम प्रस्तुत किया और कहा कि बलिदानी कभी घाटे में नहीं रहता। लखनऊ से यह यात्रा दिल्ली जानी थी किन्तु यात्रा के दिल्ली पहुँचने से पूर्व ही प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गांधी की अचानक ही अस्वाभाविक रूप से हत्या कर दी गई। अतः यात्रा को रोक देना पड़ा।
05. 1984-85 की 200 श्रीराम जानकी रथों की यात्राएँ –
1985 में उडुप्पी में आयोजित द्वितीय धर्मसंसद में अन्य महत्वपूर्ण विषयों के साथ-साथ श्रीराम जन्मभूमि के सम्बन्ध में स्पष्ट रूप में एक प्रस्ताव पारित किया गया था, जिसमें कहा गया था कि वहाँ पर अवैध रूप में लगा ताला खोला जाए। यदि 08 मार्च, 1986 को शिवरात्रि के दिन तक ताला नहीं खुला तो सन्तगण गिरफ्तारियाँ देंगे। इसी के साथ धर्मसंसद ने यह भी निर्णय लिया कि देश के हर प्रान्त में और प्रान्तों के गाँव-गाँव में श्रीराम जानकी रथ निकाले जाएं, जिससे हिन्दू जनता के साथ अयोध्या के श्रीराम मन्दिर के संदर्भ में हो रहे अन्याय की जानकारी समस्त हिन्दू समाज को हो सके।
धर्मसंसद के इस निर्णय के अनुपालन में पूरे भारत में श्रीराम, जानकी और हनुमान जी के विग्रहों के 200 रथ निकाले गए। यद्यपि श्रीराम जन्मभूमि पर लगा ताला 01 फरवरी, 1986 को ही खुल गया था तथापि श्रीराम जानकी रथों का देश के सभी प्रान्तों के ग्रामों में अलग-अलग समय पर प्रवास चलता ही रहा। अनुमान है कि इसमें 40 करोड़ जनता सहभागी बनी थी।
द्वितीय धर्मसंसद के निर्णय के अनुसार श्रीराम जानकी रथों का प्रवास विभिन्न प्रदेशों में तीन वर्षों तक चलता रहा। इस यात्रा में जनता ने बड़े उत्साह से भाग लिया। जहाँ-जहाँ भी रथ गए उनका भव्य स्वागत किया गया।
06. 1984 की बिहार की ज्ञान रथ यात्रा –
तत्कालीन बिहार के आदिवासी प्रधान जिले छोटा नागपुर के क्षेत्रों में 7 अप्रैल से 11 मई, 1984 तक एक मास से भी अधिक समय में ज्ञान रथ ने भ्रमण किया। यह रथ 50 से भी अधिक ग्रामों में गया। ज्ञान रथ पर रामेश्वर के मन्दिर की आकृति की भगवान श्रीराम और भगवान शिव की प्रतिमाएँ थीं। उक्त अवधि में 10 हजार से भी अधिक लोगों ने इन प्रतिमाओं की पूजा की।
07. 1984 की तमिलनाडु की शक्ति रथम् यात्रा –
तमिलनाडु के मदुरई जिले में मई, 1984 में शक्ति रथम् की यात्रा निकाली गई। रथ ने 250 से अधिक ग्रामों का परिभ्रमण किया। 3 लाख से अधिक लोगों की सहभागिता रही। रामनाथपुरम जिले में 205 स्थानों पर कार्यक्रम हुए और 2.5 लाख से अधिक लोगों की उपस्थिति रही।
1985 में इसी रथ ने इरोड, दक्षिण आरकोट, नीलगिरि, कोयम्बटूर, बेल्लौर, तिरुबन्नमलाई जिलों में भी यात्रा की। रथ यात्रा में 746 कार्यक्रम सम्पन्न हुए, जिनमें 934000 से अधिक लोगों ने भाग लिया। रथ में स्थापित मूर्ति का अभिषेक 228000 से अधिक व्यक्तियों ने किया।

08. 1984 की आन्ध्र की सत्य रथ यात्रा –
आन्ध्र के जिन स्थानों पर प्रथम एकात्मता यज्ञ यात्रा नहीं पहुँच सकी थी, उन-उन स्थानों के लिए सत्य रथ यात्रा 18 नवम्बर, 1984 से प्रारम्भ की गई। रथ में अन्नावरम के श्री सत्यनारायण स्वामी और रमादेवी की मूर्तियाँ स्थापित करके जिलों में घुमाया। अन्नावरम से चली सत्य रथ यात्रा ने आन्ध्र प्रदेश के लगभग सभी जिलों में भ्रमण डेढ़ वर्ष में पूरा किया। बाद में इस रथ को समीपस्थ राज्यों के वनवासी बन्धुओं के बीच भी ले जाया गया।
09. 1984 की असम की भागवत रथ यात्रा –
असम में 1984 ई. में भागवत पदयात्रा रथ का कार्यक्रम रखा गया। रथ में श्रीमद्भागवत को प्रतिष्ठापित किया गया। रथ को भक्तगणों ने रस्सियों के माध्यम से स्वयं खींचा। कीर्तन मण्डली कीर्तन करती हुई पीछे-पीछे चल रही थी। रथ सन्त श्रीमद् शंकरदेव की जन्मस्थली बरदावा से उनकी कर्मभूमि बरपेटा तक ले जाया गया। मार्ग में रथ को 22 स्थानों पर कार्यक्रम हुए।
10. 1985 की गुजरात की जगन्नाथ रथ यात्रा –
अहमदाबाद में साम्प्रदायिक दंगे 1985 में शुरू हो गए थे। पूरे शहर में आग, लूट और खून का खेल खेला जाने लगा था। शहर सेना को सौंप दिया गया और संचार साधन बन्द कर दिए गए। आषाढ़ सुदी 2 को रथ यात्रा के दिन सरकार ने मन्दिर के महंत को साथ लेकर ‘‘रथ यात्रा नहीं निकाली जाएगी‘‘ ऐसी घोषणा करवाई। हिन्दू समाज इससे नाराज हो उठा। 300 युवक प्रातः मन्दिर पहुँचे, जुलूस निकालने का प्रबन्ध किया, धीरे-धीरे 10 हजार की संख्या में जनता एकत्रित हो गई। जय-घोष के साथ यात्रा का प्रारम्भ हुआ। यात्रा में 12 हाथी, 80 ट्रक, 30 रथ, महंत जी की जीप और धीरे-धीरे हजारों से लाखों की ओर बढ़ती हुई जनता। किसी भी स्थान पर कुछ नहीं हुआ। पूर्ण शान्ति से सब कुछ चलता रहा लेकिन मुस्लिम विस्तार क्षेत्र आते ही गड़बड़ी प्रारम्भ हो गई। व्यायामशाला के 500 वीर और अन्य लोगों ने संघर्ष करके यात्रा को मन्दिर में पहुँचाया। यह हिन्दुओं के लिए गौरव और प्रसन्नता की बात रही।
11. 1986 की तमिलनाडु की ज्ञान दीपक रथ यात्रा –
फरवरी, 1986 में ज्ञान दीपकम् रथम् नाम से एक रथ यात्रा निकाली। यात्रा ने तीन जिलों के 200 ग्रामों का भ्रमण किया, जहाँ लगभग 300 कार्यक्रमों में एक लाख व्यक्तियों ने भाग लिया। 25 से अधिक सन्यासियों ने भाग लिया।
12. 1987 की उड़ीसा की जगन्नाथ रथ यात्रा –
वर्षा के उपरान्त उड़ीसा में जब जगन्नाथ रथ पुनः प्रारम्भ हुआ तो ईसाईयों के कहने पर 18 नवम्बर, 1987 को उसे ब्रह्मपुर में रोक दिया गया था परन्तु प्रबल जनमत के दबाव के कारण सरकार को यह पाबन्दी हटानी पड़ी। तत्पश्चात फुलवाड़ी एवं गंजाम जिले में उसका प्रवास निर्बाध रूप से चला।
13. 1984 की हरियाणा की ‘एकात्मता मास’ यात्रा –
18 नवम्बर, 1984 को हरियाणा के मेवात क्षेत्र में यात्रा चली। यात्रा में सींखचों में बन्द दिखाए हुए भगवान श्रीराम जी का एक विशाल चित्र था। यात्रा मेवात के बीवां ग्राम से प्रारम्भ होकर हुई फिरोजपुर झिरका, साकरस, सीसौनाजाट, मांडीखेड़ा, नगीना, मादस, मालन, नूंह, उजीना, रणसीका, विधावली, मण्डकोला, मंढनाका, जनाधौली, घर्रोट, हथीन, गहलब, कौंडल, मानपुर, पहाड़ी, बहीन, नांगल, सौदहद, आलीब्राह्मण, अन्धोप, बिछोर, सिंगार, पुन्हाना, बीसरु, शाहचोरबा होते हुए 27 नवम्बर, 1984 को पिनगंवा में समाप्त हुई।
14. 1984-85 की हरियाणा की चार धर्म जागरण यात्राएँ –
1984-85 में ब्रज क्षेत्र में चार महत्त्वपूर्ण यात्राओं का आयोजन हुआ।
(क) उजीना यात्रा -यात्रा का स्वरूप पदयात्रा का था। स्वामी अवधेश ब्रह्मचारी जी के नेतृत्व में इस पदयात्रा 09 जून, 1984 से 19 जून, 1994 तक रही। यात्रा प्रतिदिन 15-20 किलोमीटर प्रवास करती थी। दो या तीन ग्रामों में धर्म सम्मेलन किया जाता था। यात्रा 09 जून, 1984 को उजीना से प्रारम्भ होकर 19 जून, 1984 को फिरोजपुर-झिरका में समाप्त हुई।
(ख) जगाधरी यात्रा – 04 जून, 1985 से 14 जून, 1985 तक छछरौली प्रखण्ड में एकादश दिवसीय धर्म जागरण पदयात्रा प्रखण्ड के 66 गाँवों में गई और इस दौरान 170 कि.मी. की दूरी तय की गई।
(ग) फिरोजपुर-झिरका यात्रा – दिनांक 10 जून, 1985 से 30 जून, 1985 तक 22 दिन की पदयात्रा का शुभारम्भ भगवान आशुतोष की वरद् छाया में शिव मन्दिर फिरोजपुर झिरका से और समापन 30 जून, 1985 को पुन्हाना में हुआ।
(घ) महिला ब्रज यात्रा – हरियाणा के ब्रज मण्डल जिले में 10 दिन की महिला यात्रा का आयोजन दिनांक 22 सितम्बर, 1985 से 01 अक्टूबर, 1985 तक की अवधि में किया गया। 40 महिलाएँ और 20 पुरुषों ने यात्रा में भाग लिया।
15. 1988 की जम्मू की जल यात्रा –
श्री रूद्र महायज्ञ के अवसर पर आयोजित इस कार्यक्रम में 2000 से 2500 माताओं ने भाग लिया। वे अपने-अपने कलश में तवी नदी से जल भरकर जुलूस के रूप में श्री रणवीरेश्वर मन्दिर र्गइं जहाँ वेद मंत्रों द्वारा रूद्री पाठ के साथ रूद्राभिषेक किया गया।
16. 1990 की बजरंग दल की धर्म जागरण यात्रा –
08 फरवरी, 1990 को प्रधानमंत्री की अपील पर श्रीराम जन्मभूमि मन्दिर निर्माण का कार्यक्रम चार मास के लिए स्थगित कर दिया गया था। इस अवधि में सरकार को सचेत करने एवं श्रीराम मन्दिर निर्माण हेतु निरन्तर हिन्दू दबाव बनाए रखने के उद्देश्य से ही बजरंग दल द्वारा दिनांक 16 अप्रैल से 21 अप्रैल, 1990 तक धर्म जागरण यात्रा का आयोजन महंत नृत्यगोपालदास जी महाराज के नेतृत्व में हुआ। लगभग 100 जीपों, कारों एवं लगभग 1000 कार्यकर्ताओं सहित अयोध्या से 16 अप्रैल, 1990 को सायंकाल धर्मसभा के पश्चात यात्रा प्रारम्भ होकर काशी, प्रयाग, चित्रकूट, कानपुर, कन्नौज, मैनपुरी, आगरा होती हुई 21 अप्रैल, 1990 को प्रातः मथुरा पहुँच कर विशाल सभा के पश्चात पूर्ण हुई।
17. 1995 की द्वितीय एकात्मता यात्रा –
समाज की एकता और देश की अखण्डता को सुरक्षित बनाए रखने की दृष्टि से पहला प्रयास 1983 ई. में एकात्मता यात्रा युगाब्द 5085 के माध्यम से किया था। उस यात्रा में भारतमाता और गंगामाता जैसे हिन्दू समाज के मानबिन्दुओं को सामने रखकर व्यक्ति-व्यक्ति के अन्तःकरण में उनके प्रति श्रद्धा-भक्ति का भाव जगाने का प्रयास किया गया था। 12 वर्ष पश्चात पुनः भारत माता, गंगा माता एवं गोमाता की प्रतिमाओं के साथ वर्ष 1995 में देवोत्थानी एकादशी से गीता जयन्ती तक द्वितीय एकात्मता यज्ञ यात्रा का आयोजन किया गया।
यात्रा के अन्तर्गत देश में स्थित दस प्रमुख मानबिन्दु केन्द्रों से दस प्रमुख तथा अन्य भिन्न-भिन्न प्रमुख और पावन स्थानों से 135 उप तथा 1,581 लघु यात्राएँ निकाली गईं। इन्होंने 15,25,000 किलोमीटर की दूरी तय की। इस अवधि में 43,817 धर्मसभाएँ हुईं और 5,210 स्थानों पर सामाजिक समरसता के प्रतीक के रूप में श्रीरामखिचड़ी के कार्यक्रम हुए। विभिन्न सभाओं, श्रीरामखिचड़ी और स्वागत कार्यक्रमों, जुलूसों आदि में कुल मिलाकर 9 करोड़ 39 लाख लोगों ने भाग लिया।
इन यात्राओं में से परशुराम कुण्ड यात्रा का समापन कोलकाता में हो गया था और गंगासागर तथा जगन्नाथपुरी की यात्राएँ सम्बलपुर (उड़ीसा) से सम्मिलित रूप में चलकर रामटेक में पहुँची। 19-20 अक्टूबर, 1995 को द्वितीय एकात्मता यज्ञ यात्रा का समापन समारोह नागपुर में सम्पन्न हुआ।
दीक्षा भूमि पर एकात्मता यात्रा का स्वागत
द्वितीय एकात्मता यात्रा के समापन समारोह के पश्चात नागपुर में 20 अक्टूबर, 1995 को साधु-सन्तों के साथ दीक्षाभूमि पर पहुँचे, डाॅ. अम्बेडकर जिन्दाबाद, भगवान बुद्ध जिन्दाबाद, जय श्रीराम, सन्तों की जय हो आदि उद्घोषों से सम्पूर्ण वातावरण गूँज उठा। यहाँ डाॅ. अम्बेडकर स्मारक समिति की ओर से यात्रा का भव्य स्वागत करते हुए सभी सन्तों-महंतों का अभिनन्दन किया गया।
18. 1997 से 2000 तक चलीं गो-जागरण रथ यात्राएँ –
1997 में दिल्ली की धर्मसंसद में धर्माचार्यों द्वारा आगामी 3 वर्षों तक गोसंवर्धन के लिए कार्य करने का निर्देश हुआ। सन्तों का कहना था कि बूढ़ा गोवंश भी आर्थिक भार नहीं है। यदि किसान को यह ज्ञात हो जाए तो वह बूढ़े गोवंश को भी पालेगा।
जैन मुनियों की प्रेरणा से समाजसेवी बन्धुओं ने रथ प्रदान किए। गोपाष्टमी से गो-जागरण रथ यात्राएँ प्रारम्भ हुईं। 100 रथ यात्राएँ सन् 2000 तक पूरे देश में निकाली गईं। इन यात्राओं के माध्यम से लोक जागरण, लोक प्रशिक्षण हुआ। गाय के गोबर व गोमूत्र से तैयार औषधि, खाद, कीटनाशक, विद्युत निर्माण का प्रत्यक्ष प्रदर्शन हुआ।

19. 2004 की श्रीरामजानकी विवाह बारात यात्रा –
भारत एवं नेपाल के बीच सांस्कृतिक, धार्मिक सम्बन्धों को और अधिक सुदृढ़ करने, बिहार राज्य में व्याप्त जातीय दूरियों को घटाने एवं सामाजिक कुरीतियों को समाप्त करके ऊँच-नीच के भेदभाव को कम करने के उद्देश्य से श्रीरामजानकी विवाह बारात यात्रा का अनोखा धार्मिक आयोजन निश्चित किया गया।
07 दिसम्बर, 2004 को अयोध्या में वैदिक विद्वानों द्वारा यज्ञ के पश्चात तिलकोत्सव कार्यक्रम सम्पन्न हुआ। महाराजा जनक के प्रतिनिधि के रूप मंे जानकी मंदिर जनकपुर के श्रीमहंत रामतपेश्वर दास जी महाराज की ओर से विवाह की मंगलपावती व तिलक अपने ब्राह्मण व नाई के द्वारा अयोध्याजी भेजी गई थी। जानकी जी के भाई के रूप में गोलाघाट अयोध्या स्थित आश्रम के महंत पूज्य सियाकिशोरी शरण जी महाराज ने तिलक चढ़ाया और राजा दशरथ की भूमिका में मणिरामदास छावनी के महंत पूज्य श्री नृत्यगोपालदास जी महाराज ने तिलक स्वीकार किया।
08 दिसम्बर प्रातःकाल महर्षि वशिष्ठ की भूमिका में बड़े भक्तमाल आश्रम के महंत पूज्य श्री कौशल किशोर दास जी महाराज के नेतृत्व में बारात ने अयोध्या से जनकपुर के लिए प्रस्थान किया। बारात में 25 बड़ी गाडि़यों (टाटा सूमो) में अयोध्या के संत एवं देश के विभिन्न भागों से आए भक्त बाराती के रूप में चले।
अयोध्या से चलकर बारात बदलापुर (सुल्तानपुर), जौनपुर, काशी (प्रथम रात्रि पड़ाव), फलाहारी बाबा की तपःस्थली गाजीपुर, बक्सर (दूसरा रात्रि पड़ाव), आरा, पटना (तीसरा रात्रि पड़ाव), मुजफ्फरपुर, सीतामढ़ी (चैथा रात्रि पड़ाव), बेनीपट्टी, दरभंगा (पाँचवा रात्रि पड़ाव), उमगाँव (भारत सीमा पर दोपहर भोजन) होते हुए नेपाल सीमा के प्रथम ग्राम मटिहानी में पहुँचकर रात्रि भोजन-विश्राम (छठा रात्रि पड़ाव) किया। बाद में बारात ने मटिहानी से चलकर दोपहर को महाराजा जनक की राजधानी जनकपुर में 14 दिसम्बर, 2004 दोपहर को प्रवेश किया, 15, 16 व 17 दिसम्बर को जनकपुर में विवाह सम्बन्धी विविध आयोजन सम्पन्न हुए। 16 दिसम्बर को विवाह पंचमी पर विवाह का मुख्य कार्यक्रम सम्पन्न हुआ। विवाह में अयोध्या के संत मानस कोकिल रामदास जी महाराज ने विश्वामित्र की भूमिका का निर्वाह किया।
इस अवसर पर उपस्थित भक्तजनों की संख्या का अनुमान लगभग 5 लाख का लगाया गया। नेपाल नरेश इस अवसर पर विशेष रूप से उपस्थित रहे। जनकपुर में बारात तीन दिन तक ठहरी। बारात की विदाई जनकपुर से 18 दिसम्बर प्रातःकाल को हुई। वीरगंज (नेपाल सीमा) से बिहार के मोतिहारी गोपालगंज और गोरखपुर होकर 19 दिसम्बर रात्रि को बारात अयोध्या वापस लौट आई।
नेपाल राज्य के मंत्री द्वारा अत्यन्त उत्साहपूर्वक यह निवेदन किया गया कि प्रतिवर्ष ऐसी बारात अयोध्या से जनकपुर आए तो भारत नेपाल के सम्बन्ध और अधिक मजबूत होंगे। इस सम्पूर्ण यात्रा में विश्व हिन्दू परिषद के साथ धर्मयात्रा महासंघ का महत्वपूर्ण योगदान रहा। यह बात स्वयं सिद्ध हो गई कि धर्म ही समाज को जोड़ता है। उत्तर बिहार के जाति-बिरादरी के सब बंधन टूट गए और संपूर्ण क्षेत्र राममय हो गया। विवाह का रथ समाज के नियन्त्रण में हो गया। आयोजकों की भूमिका दर्शकों जैसी बन गई।
20. 2005 की तिरुपति (तमिलनाडु) छतरी यात्रा –
चेन्नई के एक विशेष परिवार से सम्बंधित लोग ब्रह्मोत्सव के दिनों में वहाँ से सजी-धजी छतरियों के साथ भगवान वेंकटेश्वर की मूर्तियाँ तिरुपति देवस्थानम् में समर्पित करने को ले जाते थे। छतरियों को पदयात्रा के माध्यम से ले जाया जाता था। मार्ग में लाखों की संख्या में लोग उनके पूजन-अर्चन के लिए सम्मिलित हो जाते थे।
अनेक कारणों से यह कार्यक्रम कुछ वर्ष सम्पन्न नहीं हो सका। वर्ष 2005 में परिषद कार्यकर्ताओं ने कार्यक्रम को करने का निश्चय किया और कार्यक्रम 5, 6, 7 अक्टूबर, 2005 को सफलतापूर्वक सम्पन्न किया। चेन्नई के पुलिस कमिश्नर ने यात्रा का शुभारम्भ किया। तिरुमला में छतरियों का समर्पण जगद्गुरु शंकराचार्य पूज्य स्वामी जयेन्द्र सरस्वती जी द्वारा किया गया। छतरियों की यात्रा के दौरान मार्ग में लगभग 10 लाख लोगों ने भगवान वेंकटेश्वर के दर्शन किए।
प्रदर्शनी
जन सम्पर्क के लिए सम्मेलन, यात्राएँ, बैठकें, चिन्तन वर्ग किए जाते हैं। समाज प्रबोधन के लिए प्रदर्शनी भी उपयोगी है। गम्भीर विषयों को भी चित्र, मानचित्र के माध्यम से सरलता से समझा जा सकता है, इसी कारण समय-समय पर विभिन्न विषयों पर प्रदर्शनियाँ तैयार की गईं, लगाई गईं। कुछ का विवरण प्रस्तुत है-
* जोरहाट प्रदर्शनी 1970 – असम की धार्मिक एवं सांस्कृतिक जीवन की झांकी प्रदर्शित की गई।
* धर्म प्रदर्शनी, 1970 – हाड़ौती सम्मेलन, कोटा के अवसर पर हिन्दू धर्म और हिन्दू संस्कृति की विशिष्टता दर्शाने के लिए प्रदर्शनी लगाई गई।
* हिन्दू विश्व प्रदर्शनी, 1971 – प्रयाग में प्रान्त सम्मेलन के अवसर पर प्रदर्शनी लगाई गई।
* धर्म गंगा प्रदर्शनी, 1979 – जनवरी, 1979 में द्वितीय विश्व हिन्दू सम्मेलन के अवसर पर लगाई गई यह प्रदर्शनी सम्मेलन का प्रमुख आकर्षण बनी। 20 वर्गफूट क्षेत्रफल में लगी, देश के 40 कलाकारों ने दो मास तक प्रयाग में रहकर अहर्निश परिश्रम करके इसे बनाया।
* भारत गौरव प्रदर्शनी 1982 – किशनगंज, बिहार में अप्रैल, 1982 में हिन्दू सम्मेलन के अवसर पर इसे लगाया गया।
* हिन्दू-इन्दु-मुन्दु प्रदर्शनी, 1983 – धर्मस्थल, कर्नाटक में 1983 में आयोजित प्रान्त सम्मेलन में लगाई गई प्रदर्शनी में प्राचीनकाल से लेकर वर्तमान काल तक की भारत की उत्थान-पतन की परिस्थितियों का आकर्षक दर्शन इसमें था।
* प्रथम एकात्मता यात्रा के अवसर पर महापुरुषों के चित्रों की एक प्रदर्शनी सम्पूर्ण भारत में दर्शायी गई थी।
* कला प्रदर्शनी, 1984 – न्यूयार्क में आयोजित अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दू कान्फ्रेन्स के अवसर पर लगाई गई प्रदर्शनी में कला के क्षेत्र में भारतीयों के योगदान को चित्रित किया गया था। 150 कलाकारों ने इसे बनाया था।
* कोपेनहेगन प्रदर्शनी, 1985 – कोपेनहेगन, डेनमार्क में आयोजित यूरोपियन हिन्दू सम्मेलन के अवसर पर लगाई गई प्रदर्शनी में विश्व संस्कृति के संदर्भ में हिन्दू चिन्तन को दर्शाया गया था।
* जगद्गुरु भारत प्रदर्शनी, 1986 – राँची में आयोजित हिन्दू सम्मेलन के अवसर पर यह प्रदर्शनी लगाई गई थी।
* गौतम बुद्ध प्रदर्शनी, 1986 – बर्मा के हिन्दुओं ने इस प्रदर्शनी को तैयार किया था।
* धर्म गंगा प्रदर्शनी, 1988 – जम्मू कश्मीर में रूद्र महायज्ञ के अवसर पर यह प्रदर्शनी लगाई गई।
* वेद प्रदर्शनी, 1992 एवं 1998 – फरवरी, 1992 में प्रयागराज में तथा दिसम्बर, 1998 में दिल्ली में सम्पन्न हुए विश्व वेद सम्मेलन के अवसर पर इस प्रदर्शनी में वेद मंत्रों को चित्रों के द्वारा दर्शाया गया था। 1998 में बनाई गई प्रदर्शनी विश्वभर में पहुँची।
* काशी हिन्दू बौद्ध प्रदर्शनी, 2006 – हिन्दू बौद्ध सम्मेलन (धर्म-संस्कृति संगम) के अवसर पर इस प्रदर्शनी का आयोजन काशी विद्यापीठ और काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के ललित कला विभाग के सहयोग से किया गया था।
* श्रीराम जन्मभूमि प्रदर्शनी, 2010 – श्रीराम जन्मभूमि पर उच्च न्यायालय का निर्णय आने की संभावनाएं होने पर मई, 2010 में तैयार की गई इस प्रदर्शनी में साहित्यिक, ऐतिहासिक, पुरातात्विक, वैज्ञानिक तथ्यों को चित्रित किया गया था।
* गऊरक्षा के प्रति हिन्दू समाज की भावनाओं को प्रकट करने के लिए तथा जिस निर्दयता के साथ कत्लखानों में गोवंश की हत्या की जाती है, उससे समाज को परिचित कराने के लिए प्रदर्शनी तैयार की गई थी।
तीर्थ एवं धर्मयात्राओं में कार्य
हमारा लक्ष्य –
तीर्थ, तीर्थयात्राओं, धर्मयात्राओं, तीर्थयात्रियों, को केन्द्र मानकर कार्य करना प्रमुख लक्ष्य है। घोष वाक्य –
‘‘भारत की आत्मा तीर्थो में वास करती है।
तीर्थो का विकास, भारत का विकास।।’’
हमारे तीर्थ स्थलों पर पराधीनता के काल में तो आक्रमण हुए ही, स्वतंत्रता के पश्चात् भी तीर्थ सरकारों द्वारा भी उपेक्षित ही किये गए। दो प्रतिशत पर्यटकों के लिए सरकारों द्वारा भारी भरकम बजट व स्वतंत्र प्रभार वाला पर्यटन मंत्रालय, दूसरी तरफ 98 प्रतिशत तीर्थयात्रियों के लिए न कोई विभाग है न कोई बजट जबकि सम्पूर्ण राष्ट्रीय एकता और सामाजिक समरसता की प्रेरणा सर्वाधिक हमारे तीर्थ प्रदान कर रहे हैं।
पृष्ठभूमिः-
हरिद्वार से गंगाजल ले जाकर अपने-अपने स्थानों पर भगवान शंकर का अभिषेक करने वाले लाखों कांवड़ यात्रियों के विशाल समूह को देखकर उनकी सेवा, सुरक्षा और व्यवस्था के लिए स्थायी रूप से कुछ किया जाए, इस प्रेरणा से 1995 ईÛ के श्रावण मास में हरिद्वार (मायापुरी) की अधिष्ठात्री देवी भगवती माया देवी मंदिर के प्रांगण से यह कार्य प्रारम्भ हुआ।
14 जनवरी 1995, मकर संक्रान्ति, हरिगिरि सन्यास आश्रम कनखल में कांवड यात्रियों के बीच सेवा व संगठन कार्य करने हेतु विधिव्त ‘‘कांवड़ सेवा समन्वय समिति’’ की घोषणा की।
कुछ ही दिनों पश्चात कांवड सेवा समन्वय समिति का नाम परिवर्तित हुआ ‘कांवड एवं धर्मयात्रा महासंघ’ तत्पश्चात कार्यक्षेत्र की व्यापकता को समझते हुए धर्मयात्रा महासंघ नाम निश्चित हुआ।
26 दिसम्बर 1995 को धर्मयात्रा महासंघ के नाम से विधिवत एक न्यास पंजीकृत कराया गया।
किए जा रहे कार्य –
1. 8 जून 1995, से प्रति वर्ष हरिद्वार में हर की पौड़ी पर श्री गंगा अवतरण महोत्सव परम दिव्यता एवं भव्यता पूर्वक सम्पन्न। इस अवसर पर हरिद्वार की अधिष्ठात्री देवी भगवती माया देवी के पूजनोपरान्त महिलाओं द्वारा दुग्ध कलश लेकर हर की पौड़ी तक भव्य शोभायात्रा, माँ गंगा का पूजन एवं दुग्धाभिषेक।
2. नदियों को प्रदूषण मुक्त कराने, मां गंगा की निर्बाध धारा प्रवाह को बनाए रखने का अभियान प्रारम्भ किया।
3. सम्पूर्ण पश्चिमी उत्तर भारत (उत्तर प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान, गुजरात व पंजाब) से हरिद्वार आने वाले कांवड़ यात्रियों की सुविधा हेतु उत्तर प्रदेश से दिल्ली पर्यन्त विशिष्ट व्यवस्थाएं कराई गई।
4. दिल्ली सरकार द्वारा धर्मयात्रा महासंघ के सुझाव एवं प्रार्थन पर 1995-1996 मंे कांवरिया समिति का गठन व विशिष्ट बजट की स्वीकृति के साथ सराहनीय योगदान। पुनः ‘तीर्थ समिति विकास’ के गठन को भी दिल्ली सरकार द्वारा स्वीकृति प्रदान की गई।
5. धर्मयात्रा महासंघ के तत्वावधान में कैलाश मानसरोवर यात्रियों के विभिन्न दलों का अभिवादन एवं उन्हें मंगलमय भावभीनी विदाई दी जाती है एवं यात्रियों के लिए केन्द्र सरकार द्वारा अनुदान राशि 3,000 रुपया तथा दिल्ली सरकार द्वारा दिल्ली प्रान्त के निवासी तीर्थयात्रियों को प्रति यात्री 5,000 रुपए की राशि स्वीकृत कराई गई।
6. अन्य प्रान्तों के कैलाश मानसरोवर यात्रियों के लिए दिल्ली में निवास हेतु निर्धारित ‘अशोक यात्री निवास ‘अशोक रोड़ में रहने की व्यवस्था स्वरूप लगभग 1200 (एक हजार दो सौ रूपये) की राशि की स्वीकृति एवं सभी कैलास मानसरोवर यात्रियों के मार्ग में चिकित्सा हेतु ‘चिकित्सा किट्स’ भी विदेश मंत्रालय को दिल्ली प्रान्त सरकार की ओर से प्रदान की गई।
7. उत्तर प्रदेश सरकार ने उत्तर प्रदेश के कैलाश मानसरोवर तीर्थ यात्रियों के लिए प्रति यात्री 5 हजार रूपये, पांडिचेरी सरकार ने प्रति यात्री 5 हजार रूपये तथा तमिलनाडु सरकार ने प्रति यात्री अनुदान की घोषणा की।
8. चीन के राष्ट्रपति के साथ कैलाश मानसरोवर तीर्थ यात्रियों से लिए जाने वाले भारी शुल्क को कम कराने हेतु पत्र व्यवहार हुआ।
9. 84 कोस की ब्रज परिक्रमा यात्रा में सहयोग तथा गोवर्धन परिक्रमा के सौन्दर्यकरण हेतु कार्यरत संस्था ‘तीर्थ संरक्षण एवं विकास ट्रस्ट (मथूरा)’ के साथ सहभागिता की गई।
10. 1996 में श्री जगन्नाथ पुरी में भगवान श्री जगन्नाथ के नवकलेश्वर महोत्सव के अवसर पर तीर्थ यात्रियों की सेवा हेतु निःशुक्ल अल्पाहार की व्यवस्था की गई।
11. पूज्य देवी-देवताओं का अपमान करने वाले कार्यक्रमों का विरोध किया गया।
12. अगस्त 1996 में अमरनाथ तीर्थ यात्रियों की सेवा हेतु भण्डारें की व्यवस्था की गई। अमरनाथ तीर्थ यात्रा त्रासदी पर तत्काल राहत एवं सेवा कार्य किया गया।
13. 6 सितम्बर 1996 को ताल कटोरा स्टेडियम में अमरनाथ त्रासदी के दिवंगत तीर्थ यात्रियों हेतु श्रृद्धांजलि सभा तथा उसी अवसर पर दुर्घटना जांच समिति का गठन किया गया।
14. 1997 मंे जम्मू-कश्मीर सरकार द्वारा अमरनाथ यात्रियों पर लगाये गए 650 रूपये के टैक्स का विरोध किया गया तथा निर्णय को वापिस करवाया गया।
15. तीर्थ एवं तीर्थ यात्रियों को राजकीय सुविधा प्रदान करने हेतु केन्द्रीय सरकार तथा विभिन्न प्रान्तीय सरकार से पृथक तीर्थाटन मंत्रालय बनाने के लिए पत्र व्यवहार किया गया।
16. टिहरी बांध के कारण गंगा की पवित्रता नष्ट हो जायेगी। परिणामस्वरूप गंगा सागर पर्यन्त गांगेय तीर्थ लुप्त हो जायंगे। इस विषय पर जन-जागरण हेतु करपत्र कांवडि़यों के बीच वितरित।
17. 10 अक्टूबर 1997 को लेह (लद्दाख) से 8 कि.मी. दूर ‘‘शे’’ नामक गांव के समीप सिंधु नदी का पूजन किया गया। इसके तट पर वेदों की रचना होने से इसका विशेष महत्व है। वर्ष 1998 मंे भी सिंधु दर्शन कार्यक्रम आयोजित किया गया। अब प्रतिवर्ष यह कार्यक्रम अन्य लोग करते हैं।
18. हिन्दू धर्म की महत्ता की अभिव्यक्ति हेतु 20 से 22 अक्टूबर 1997 में तीर्थ राज हरिद्वार की पावन भूमि पर विराट हिन्दू सम्मेलन हुआ। उसमें महाराजाधिराज नेपाल श्री 5 विरेन्द्र वीर विक्रमशाह देव, महारानी ऐश्वर्यराज लक्ष्मी शाह, कांचीकाकोटि पीठ के जगद्गुरू शंकराचार्य जयेन्द्र सरस्वती जी महाराज, जगद्गुरू शंकराचार्य विजेन्द्र सरस्वती जी महाराज एवं अन्य व्यवस्था में धर्मयात्रा महासंघ का विशेष सहयोग रहा।
19. अप्रैल 1998 को अखिल भारतीय तीर्थ प्रतिनिधि सम्मेलन, हरिद्वार में कुम्भ के अवसर पर आयोजित किया गया।
20. दिसम्बर 1997 में जिलाधिकारी-एटा, उत्तर प्रदेश के साथ मिलकर वार्षिक कुंभ मेला मार्गशीर्ष के अवसर ‘‘शूकर क्षेत्र महोत्सव’’ सोरो नाम से एक पखवारे तक भव्य कार्यक्रम आयोजित किये गये।
21. बिलासपुर (छत्तीसगढ़) में कांवड़ यात्रा प्रतिवर्ष आयोजित की जाती है।
22. वर्ष 1998 से प्रत्येक वर्ष द्वादश ज्योतिर्लिंग में से किसी एक ज्योतिर्लिंग पर महारूद्राभिषेक का आयोजन किया जा रहा है।
23. कांचिकामकोटि पीठ के शंकराचार्य जयेन्द्र सरस्वती के गिरफ्तारी के विरोध में 19 नवम्बर, 2004 को जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन किया गया।
24. अयोध्या से जनकपुर (नेपाल) तक 7-19 दिसम्बर 2004 को श्रीराम जानकी विवाह बारात यात्रा का आयोजन किया।
25. दिसम्बर 2004 को दक्षिण भारत में आये विनाशकारी सूनामी तुफान से प्रभावित लोगों की सहायता हेतु राहत शिविर 1 से 3 जनवरी, 2005 तक आयोजित किया।
26. बिहार में आयी भीषण बाढ़ में धर्मयात्रा महासंघ द्वारा तुरन्त राहत सामग्री भिजवाई।
27. वर्ष 2010 में तीर्थपुरोहित महासंघ का विधिवत पंजीकरण करवाया गया।
मठ-मन्दिर हमारी दृष्टि और व्यवहार
विश्व में जहाँ कहीं पूजा-उपासना है, वहाँ किसी न किसी रूप में पूजा केन्द्र भी है। हिन्दू परम्परा में इन्हें ही ‘‘मठ अथवा मन्दिर अथवा गुरुद्वारा‘‘ कहा जाता है। ये हमारी संस्कृति के मूलाधार हैं। छोटे गांव से लेकर बड़े शहर में, ऊँचे गिरि शिखरों पर, वनों में भी सर्वत्र प्राचीनकाल से निर्मित। निर्धन, सम्पन्न, निरक्षर, विद्वान, मजदूर, उद्योगपति सभी मठ-मन्दिरों में बिना किसी भेदभाव के जाते हैं। व्यक्ति और समाज दोनों की मर्यादाओं की रक्षा और दोनों के लिए प्रेरणा के केन्द्र हैं। प्राचीनकाल से पाठशाला, व्यायामशाला, आरोग्यशाला, गोशाला, प्रवचन एवं धार्मिक अनुष्ठानों के केन्द्र, सार्वजनिक, सामाजिक, पारिवारिक कार्यों के लिए मठ-मन्दिरों का उपयोग होता आया है। संगीत और कला के केन्द्र भी थे। मठों में अन्न क्षेत्र (निःशुल्क भोजन) तथा बाहर से कस्बे में आए किसी भी अपरिचित व्यक्ति के रात्रि विश्राम के लिए बेरोकटोक व्यवस्था रहती थी। एक मन्दिर आसपास के न्यूनतम 100 परिवारों की गतिविधियों का केन्द्र होता था।
मठ मन्दिर हिन्दुधर्म, संस्कृति और परम्पराओं के अजेय दुर्ग हैं। इन्हीं के बल पर घोर संकट काल में भी हिन्दू समाज ने अपनी श्रेष्ठ संस्कृति की रक्षा की। मठ मन्दिरों की यह महान परम्परा हमें अपने पूर्वजों से विरासत में मिली है।
भारत में मन्दिरों की चार श्रेणियाँ हैं – (1) व्यक्तिगत मन्दिर – इन मन्दिरों में चढ़ावा, दानपात्र की कोई व्यवस्था नहीं होती है। पास-पड़ोस के लोग इन मन्दिरों में पूजा पाठ के लिए जा भी सकते हैं पर उनका अधिकार नहीं है। (2) समाज द्वारा कोई समिति बनाकर निर्मित और संचालित मन्दिर (3) सन्त-महात्माओं के द्वारा संचालित मन्दिर (उदाहरण- अखाड़ों के मठ-मन्दिर) (4) शासन व्यवस्था के अन्तर्गत मन्दिर – पूर्व काल में राजाओं ने अपने-अपने राज्यों में बड़े-बड़े मन्दिर बनवाए, धनाढ्य लोगों ने मन्दिर बनवाए। निर्माण कराने वाले व्यक्तियों अथवा राजाओं ने मन्दिर के रख-रखाव के लिए बड़ी-बड़ी सम्पतियाँ मन्दिरों को दान में दी। परन्तु कालान्तर में ये उपेक्षित हो गए अथवा व्यवस्था का अभाव हो गया।
मुस्लिम आक्रमण काल में हिन्दुओं के असंख्य मन्दिर तोड़ दिए गए और वहाँ मस्जिदें बना दी गईं। स्वतंत्र भारत में मठ मन्दिरों के साथ जुड़ी सम्पत्ति अथवा इनको मिलने वाले चढ़ावे के प्रति सरकारों में लालच पैदा हो गया। जिससे अव्यवस्था का बहाना बनाकर सरकारों ने इनको अधिग्रहण करना प्रारम्भ किया। इनकी सम्पत्तियों को अनेक जगह बेच दिया गया और बिक्री से प्राप्त धन सरकारी खजाने का हिस्सा बन गया। चढ़ावे के धन का सरकार मन-माना उपयोग/ दुरुपयोग करने लगी। अनेक मन्दिर अपनी पहले से भी खराब अवस्था को पहुँच गए। अनेक की स्थिति सरकारी दफ्तर जैसी हो गई और समाज जागरण की अपनी मौलिक भूमिका से हट गए।
आज भी 35 से 40 लाख मठ मन्दिर अस्तित्व में हैं। उन पर आश्रित व्यक्तियों और सेवकों की संख्या भी करोड़ों में होगी। उन सबकी धार्मिक, आध्यात्मिक, सांस्कृतिक भूख को मिटाना शासन का कर्तव्य है। दक्षिण भारत में अधिकांश मन्दिरों का सरकारी अधिग्रहण हो गया। उत्तर भारत में भी सरकार का लालच बढ़ रहा है। केरल में न्यायपालिका ने कह दिया कि मन्दिर व्यवस्थापक के मन में मन्दिर और भगवान के प्रति आस्था होना आवश्यक नहीं है अतः घोर नास्तिक और धर्म विरोधी भी मन्दिर का व्यवस्थापक बन सकता है परन्तु यही विचार मस्जिद और चर्च पर लागू नहीं होता। परिषद चाहता है कि मन्दिर संचालन में शासन या राजनीतिक दलों का हस्तक्षेप बिल्कुल नहीं होना चाहिए। इसके लिए स्वायत्तशासी मन्दिर के आसपास रहने वाले भक्तों की भक्तमण्डली, व्यवस्था टोली बनाई जाए, जिसके सदस्य धार्मिक प्रवृत्ति के चरित्रवान लोग हों।
शासकीय स्वामित्व एवं देखरेख वाले मठ-मन्दिरों के चैकाने वाले तथ्य-
01. मन्दिरों की सम्पत्ति तो बहुत है परन्तु देवता गरीब हैं।
02. कुछ मन्दिरों में दीपक नहीं है तो कुछ में भोग चढ़ाने लायक पैसे भी नहीं हैं।
03. भरपूर जायदाद होने पर भी वह खस्ता हालत में है। कुछ पर किसी ने कब्जा कर लिया है तो कुछ में चोरी व गुप्त रूप से जमीन की अवैध बिक्री।
04. अहिन्दुओं को नाममात्र किराए पर देना, सस्ते में बेचना, किरायेदारों से किराया प्राप्त नहीं होता।
05. व्यवस्थापकों में भ्रष्टाचार व्याप्त है। व्यवस्थापक राजनीतिक कारणों से नियुक्तियाँ करता है। व्यवस्थापक के पद रिक्त पड़े रहते हैं।
06. भक्ति का दिखावा होता है, दृष्टि मुख्यतः जायदाद व आय पर रहती है, उसे अपनी जागीर बनाने की सोचते हैं। दर्शनार्थियों की सुविधा नहीं देखी जाती, उनसे मात्र पैसे उगाहने के तरीके सोचे जाते हैं।
07. अनेक मन्दिरों के कलात्मक एवं सुन्दर अवशेष गायब हो गए हैं। जेवरात तथा मूल्यवान सामान की चोरी अथवा हड़पने की कोशिश की जाती है। मूर्तियों की चोरी अथवा अवैध बिक्री। असली सामान की जगह नकली सामान रख देना।
08. कागजातों में हेराफेरी करके सम्पत्ति हड़पने सम्बन्धी अनेक दोष संस्था संचालकों में घुसे हैं।
हम क्या करें ?
पास-पड़ोस के किसी मन्दिर से जुड़ें। मन्दिर की कोई न कोई एक सेवा पास-पड़ोस के परिवार अपने जिम्मे लें। आसपास रहने वाले श्रद्धालु लोगों की एक भक्त मण्डली बनाएं।
मन्दिर और आसपास की स्वच्छता, नियमित आरती की ओर ध्यान देना।
आसपास के लोग आरती के समय मन्दिर में अधिक इकट्ठे हों। मासिक महाआरती के लिए प्रयत्न करना।
मन्दिरों में सामूहिक त्योहार की परम्परा विकसित करना। जैसे- रामनवमी, कृष्ण जन्माष्टमी, शिवरात्रि, नवरात्रि पूजन आदि आदि।
मठ-मन्दिरों में सत्संग प्रारम्भ कराएं। बच्चों को मन्दिर जाने की प्रेरणा देना।
मन्दिर जिस प्रकार पूर्व काल में समाज की अनेक गतिविधियों के केन्द्र हुआ करते थे अर्थात वे समाज जागरण के केन्द्र थे, वैसा ही वह पुनः बनने की ओर अग्रसर हो, ऐसे प्रयास हम करें।
मन्दिरों के प्रति हमारी दृष्टि श्रद्धा और विनम्रता की चाहिए। निन्दा अथवा आलोचना की नहीं।
इन्हीं कार्या के लिए हम प्रयासरत है।
संस्कृत, अर्चक-पौरोहित्य, योग एवं वेद शिक्षण
भारतीय संस्कृति धर्म प्रधान है। विश्व की महान शक्ति बनने का भारत का स्वप्न यदि साकार करना है तो धर्म और संस्कृति का आश्रय लेना ही होगा। भारतीय संस्कृति से जुड़ा सम्पूर्ण तत्वज्ञान संस्कृत भाषा में लिखा है। प्रान्त, भाषा, जाति, सम्प्रदाय आदि भेदों के साथ-साथ सबको एकसूत्र में पिरोने का सामथ्र्य संस्कृत में ही है, इसी विचार से संस्कृत कार्य विश्व हिन्दू परिषद में प्रारम्भ हुआ।
सन् 1979 में प्रयाग में सम्पन्न द्वितीय विश्व हिन्दू सम्मेलन के अवसर पर विश्व संस्कृत सम्मेलन का आयोजन किया गया था, ‘विश्व संस्कृत प्रतिष्ठानम्’ की स्थापना हुई, संस्था का केन्द्र पांडेचेरी रखा गया, काशी नरेश विभूतिनारायण सिंह जी प्रथम अध्यक्ष बने और परिषद के तत्कालीन महामंत्री श्री राजाभाऊ डेग्वेकर (पुणे) इस संस्था के भी महामंत्री बने। कालान्तर में ‘भारत संस्कृत परिषद’ के नाम से एक स्वतंत्र संस्था माघ शुक्ल पंचमी संवत् 2044 विक्रमी (1987 ई0) में गठित हुई।
संस्था के कार्य – संस्कृत व्यवहार शिविर आयोजन, संस्कृत अध्ययन केन्द्रों की स्थापना, वेद विद्याओं के शिक्षण-प्रशिक्षण के लिए कार्य करना, मौलिक ग्रन्थों का प्रकाशन करना, पौरोहित्य प्रशिक्षण शिविर का आयोजन करना।
सम्पन्न उल्लेखनीय कार्यक्रम – दस दिवसीय सम्भाषण वर्ग हुए। लोकसभा सदस्यों से संस्कृत में शपथ लेने का अनुरोध किया गया, परिणामस्वरूप अगस्त, 1991 लोकसभा में तथा 1992 राज्यसभा में अनेक सांसदों ने संस्कृत में शपथग्रहण की। 1991 से 1994 तक दिल्ली, बड़ौदा, लखनऊ, बेलडांग में संस्कृत प्रशिक्षण वर्ग लगे। संस्कृत व्यवहार शिविर प्रतिवर्ष दिल्ली में किया जाता है। ‘अभिव्यक्ति’ शोध पत्रिका का प्रकाशन प्रारम्भ हुआ। प्रयाग, बरेली, मेरठ में संस्कृत कवि सम्मेलन आयोजित कराए गए। विभिन्न राज्य सरकारों के सहयोग संस्कृत शिविर किए। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा संस्कृत के पक्ष में निर्णय की पुस्तिका प्रकाशित की।
मेरठ में आयोजित व्यवहार शिविर में 400 प्रशिक्षार्थी थे। युवा सन्त चिन्तन वर्ग में संस्कृत सम्भाषण की कक्षाएं सन्तों के बीच चलाई। आगरा में संस्कृत चेतना रैली में 4000 ग्रामवासियों ने भाग लिया, ऐसी रैलियाँ प्रयाग में भी हुईं। संस्कृत में पत्र व्यवहार, शुभकामना सन्देश को प्रेरित किया गया। दूरदर्शन, आकाशवाणी में भी संस्कृत को स्थान मिला। दिल्ली में केन्द्रीय स्तर पर एवं राजस्थान में प्रान्त स्तरीय दस दिवसीय संस्कृत व्यवहार शिविर प्रतिवर्ष किए जाते हैं।
वर्ष 2011 में एक केन्द्रीय प्रशिक्षण वर्ग, 12 प्रान्त प्रशिक्षण वर्ग, 55 संस्कृत व्यवहार शिविर एवं 02 प्रवर्तक प्रशिक्षण वर्ग लगे, त्रैमासिक व्याख्यानमाला, शोध संगोष्ठी, संस्कृत प्रेमियों की मासिक गोष्ठी संस्कृत संध्या के नाम से, संस्कृत शिक्षक सम्मान आयोजन एवं काशी, लखनऊ, इलहाबाद, हरिद्वार में विद्वत् संगोष्ठी आयोजित की गई। ऐसे आयोजन विगत अनेक वर्षों से किए जा रहे हैं। प्रतिवर्ष श्रीनिधि वैदिक पंचांग प्रकाशित करते हैं।
उत्तर प्रदेश में 9 स्थानों पर अर्चक-पुरोहितों के समारोह आयोजन किए गए। अर्चक पुरोहित परिवार में संस्कारों की रक्षा करता है। भावी पीढ़ी के मन में हिन्दू परम्पराओं के प्रति श्रद्धा निर्माण करने में अर्चक-पुरोहित की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। योग्य पुरोहित समाज को मिले, इस दृष्टि से प्रशिक्षण की व्यवस्था की प्रारम्भ की। अर्चकों के संगठन के लिए ‘अर्चक अभिनन्दन’ आयोजित किए। राजघाट, वृन्दावन में योग प्रशिक्षण वर्ग किए।
विश्व के सबसे प्राचीन ग्रन्थ वेद हैं। वेद मंत्रों में मंत्रदृष्टा ऋषियों ने जो कुछ मार्गदर्शन किया है वही इस समाज की परम्परा व संस्कृति का आधार है। महर्षि व्यास ने वेद को चार भागों में व्यवस्थित किया। प्रज्ञाचक्षु स्वामी गंगेश्वरानन्द जी महाराज ने चारों वेदों को एक खण्ड में छपवाया। विश्व हिन्दू परिषद के संस्थापक महामंत्री दादा साहब आपटे ने वर्ष 1974-75 में स्वामी जी के साथ मिलकर थाईलैण्ड, फिलिपिन्स, सिंगापुर, मलयेशिया, इण्डोनेशिया, माॅरीशस, इंग्लैण्ड, स्वीटजरलैण्ड, इटली, अमेरिका, कनाडा, सूरीनाम, गुयाना, त्रिनिदाद का भ्रमण कर अनेक धार्मिक स्थलों, विश्वविद्यालयों में 88 स्थानों पर वेद मन्दिर की स्थापना कराई। कन्याकुमार, तमिलनाडु में 1983 में वेद पाठशाला प्रारम्भ की, जिसकी आर्थिक व्यवस्था बिड़ला फाउण्डेशन ने स्वीकार की।
प्रथम विश्व वेद सम्मेलन, 1992 प्रयागराज –
वेदज्ञों को सम्मानित करने तथा वेद ज्ञान को विश्व में प्रचारित करने की योजना बनाने के लिए प्रयाग में 10 से 16 फरवरी, 1992 की अवधि में प्रथम ‘‘विश्व वेद सम्मेलन‘‘ किया गया। देश के मूर्धन्य वेदज्ञ सम्मेलन में पधारे, उनका अभिनन्दन किया गया। वेद सम्बद्ध 11 विषयों पर विशेषज्ञ विद्वानों की संगोष्ठियाँ की गईं। वेदमंत्रों पर आधारित प्रदर्शनी लगाई गई।
वेद पाठशाला का प्रारम्भ –
गुरुपूर्णिमा 1994 से संकट मोचन आश्रम, रामकृष्णपुरम, सेक्टर-6, नई दिल्ली में 11 बालकों के साथ वेद पाठशाला गुरु-शिष्य परम्परा के अन्तर्गत प्रारम्भ की। इस परम्परा में वेदज्ञ अध्यापक बालक को वेदमंत्र, मंत्र का स्वर, मंत्रोच्चारण के समय बैठने की स्थिति, मुखाकृति एवं हस्तसंचालन का अभ्यास कराता है। परिषद ने शुक्ल यजुर्वेद की माध्यन्दिनी शाखा के मंत्रों को कंठस्थ कराने की पाठशाला प्रारम्भ की। इस माध्यन्दिनी शाखा में 40 अध्यायों के अन्तर्गत 1975 मंत्र आते हैं, उत्तर भारत में हमारे जीवन में जितने भी प्रकार के संस्कार, पूजन, अनुष्ठान होते हैं, उनमें माध्यन्दिनी शाखा के मंत्रों का ही प्रयोग होता है। 12 वर्ष की आयु के बालक को पाठशाला में प्रवेश दिया जाता है। एक ही ध्यान रखा जाता है कि बालक हकलाता न हो, तुतलाता न हो, स्मरण शक्ति अच्छी हो, जन्मना कोई गम्भीर रोग न हो। कालान्तर में संकट मोचन आश्रम में प्रारम्भ हुई पाठशाला श्री बद्रीभगत झण्डेवाला टेम्पल सोसायटी ने पूर्णरूप से अंगीकार कर ली, आज भी यह पाठशाला चलती है, इस पाठशाला में 60 से अधिक छात्र वेदाध्ययन कर रहे हैं।
इसी पाठशाला के छात्रों ने अयोध्या, इलाहाबाद, कानपुर, काशी, हरिद्वार एवं जम्मू में वेद पाठशालाएं प्रारम्भ की। काशी, हरिद्वार एवं जम्मू की पाठशालाओं की आर्थिक व्यवस्था पूज्य स्वामी गोविन्ददेव गिरि जी महाराज की प्रेरणा से की जा रही है। सामान्यतया 6 वर्ष में बालक 1975 मंत्रों को कंठस्थ कर लेता है। इसके पश्चात इन मंत्रों को ठीक से समझने के लिए वेदांग की शिक्षा दी जाती है। वेदांग के अन्तर्गत 6 विषय पढ़ाए जाते हैं – व्याकरण, ज्योतिष, छन्द, शिक्षा, कल्प एवं निरुक्त। वेदांग शिक्षण का विद्यालय भी इलाहाबाद में प्रारम्भ किया गया है। इलाहाबाद में चलने वाले वेदांग शिक्षण केन्द्र और वेद पाठशाला की आर्थिक व्यवस्था भारत संस्कृत परिषद द्वारा की जाती है। वर्तमान तक लगभग 100 छात्र वेदमंत्र कंठस्थ करके समाज जीवन में स्थापित हैं, प्रतिष्ठित हैं। 50 छात्र किसी न किसी विश्वविद्यालय में अध्ययन कर रहे हैं अथवा कहीं न कहीं वेद अध्यापक हैं। इसी के साथ-साथ लगभग 200 छात्र आज इन पाठशालाओं में अध्ययन कर रहे हैं। ये छात्र नेपाल, मणिपुर, असम, बिहार, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, उत्तराखण्ड, हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान व जम्मू कश्मीर के हैं।
द्वितीय विश्व वेद सम्मेलन 1998, दिल्ली –
09 से 13 दिसम्बर, 1998 तक दिल्ली में आयोजित हुआ। सम्मेलन में पधारे वेदज्ञों की संख्या का प्रान्तशः विवरण इस प्रकार है:- तमिलनाडु-84, केरल-43, पश्चिम आन्ध्र-66, कर्नाटक-55, महाराष्ट्र-220, गुजरात-22, मध्यप्रदेश-3, काशी-68, ब्रज क्षेत्र-18, बिहार-2, बंगाल-3, उड़ीसा-19, असम-7, दिल्ली-18, हरियाणा-2, नेपाल-7। इनके अतिरिक्त सम्मेलन में 3 अग्निहोत्री परिवार एवं विष्णु महायाग के निमित्त पधारे 5 वैदिक विद्वान और भी थे।
सम्मेलन के मुख्यतः 6 अंग रहे, यथा- वेद मंत्रों का सामूहिक सस्वर पाठ, पंचकुण्डीय विष्णु महायज्ञ, अग्निहोत्र यज्ञ, वैदिक विषयों पर संगोष्ठियाँ, वेद कथा तथा प्रदर्शनी। चारों वेदों की विभिन्न संहिताओं का सस्वर सुमधुर दिल्लीवासियों ने पाठ प्रथम बार सुना। प्रतिदिन प्रातः 09 से 12 बजे तथा अपराह्न 03 से 04.30 बजे तक 20 वेदियों पर वेदों की 10 शाखाओं के वेदज्ञों द्वारा वेद मंत्रों का पारायण हुआ। इसी अवधि में विष्णु महायज्ञ एवं तपोनिष्ठ वैदिकों द्वारा प्रातः-सायं अग्निहोत्र यज्ञ किया गया। सामान्यतः सभी आयोजन एक साथ चले।
संगोष्ठी के विषय – ‘वेद मंत्रों के ऋषि एवं देवता‘, वेदों में प्रतिपादित जीवन दर्शन, ‘वेदों में राष्ट्र की अवधारणा‘ ‘वेद और शरीर रचना विज्ञान तथा आयुर्वेद‘ ‘वेद और विज्ञान‘।
हंसराज माॅडल स्कूल के छात्रों ने स्वामी दयानन्द जी के जीवन चरित्र पर आधारित सुन्दर नृत्य नाटिका ‘वेद भगवान एवं वेदभक्त‘ प्रस्तुत की।
अयोध्या में क्षेत्रीय वैदिक सम्मेलन 2010 – नवम्बर मास में सम्पन्न हुआ। सम्मेलन में भारत सरकार की संस्था महर्षि सांदीपनी वेद विद्या प्रतिष्ठान उज्जैन की पूर्ण सहभागिता रही। अनेक राज्यों के वैदिक विद्वान तीन दिवसीय इस सम्मेलन में पधारें। परिषद की ओर से चलने वाली सभी वेद पाठशालाओं के वर्तमान छात्र, अध्यापक एवं पुरातन छात्र तथा बालकों के माता-पिता सम्मेलन में पधारें।
15 दिवसीय वेद शिविर का आयोजन – यह शिविर प्रतिवर्ष प्रयागराज में माघ माह में मेला क्षेत्र में अयोजित किया जाता है सभी पाठशालाओं के वेद छात्र एवं अध्यापक शिविर में आते है यही पर नये छात्रों का यज्ञोपवीत संस्कार भी किया जाता है शिविर में योगासन, खेलकूद, राष्ट्रीय सामाजित एवं सांस्कृतिक विषयों पर चर्चा, सन्तों के प्रवचन, स्वाध्याय एवं परीक्षा के आयोजन होते है।

समन्वय मंच (हिन्दू बौद्ध एक्य)
विश्व में आज आक्रमणकारी शक्तियों का प्रभाव बढ़ा है, परिणामस्वरूप असहिष्णुता, आतंकवाद एवं भौतिकवाद बढ़ा है। विभिन्न देशों की प्राचीन संस्कृतियाँ अपनी अस्मिता के संरक्षण के लिए जागरूक भी हुई हैं। वे इस कार्य में भारतीय संस्कृति का सहयोग भी चाहती हैं। इस विचार में से समन्वय मंच का कार्य प्रारम्भ हुआ।
सम्पूर्ण समाज मिलकर भगवान् महावीर जयन्ती, श्री बुद्ध जयन्ती, सन्त कबीरदास जयन्ती, गुरुपूर्णिमा, रक्षाबन्धन, नारायणगुरु समाधि दिवस, वाल्मीकि जयन्ती, गुरुनानक जयन्ती, दत्त जयन्ती, जीजाबाई जयन्ती, रविदास जयन्ती एवं गौरांग महाप्रभु जयन्ती मनाए, ऐसी प्रेरणा देना प्रारम्भ किया। सद्भावना बैठकों का क्रम प्रारम्भ किया। उत्सव, पर्वों में परस्पर सहभागिता, एक दूसरे के धार्मिक स्थानों पर आना-जाना, नियमित चिन्तन बैठकें, संकट के समय में सबका सहयोग लेना, मिलकर सेवा कार्य करना आदि कार्यों को प्रोत्साहन दिया जाता है।
कौन सी संस्कृति पुरानी है, कौन सी नई, कौन प्रदाता है, कौन याचक है, कौन सी संस्कृति ऊँची और कौन सी नीची, कौन सी गहरी और कौन सी उथली, इसकी चर्चा से समाज को बचाते हैं। अपना मत दूसरों पर जबरदस्ती लादा न जाए इसकी प्रेरणा देते हैं। संघर्ष नहीं सहयोग की भावना से काम करने की प्रेरणा देते हैं। इसी विचार के अन्तर्गत हुए कुछ कार्यक्रमों का विवरण निम्न प्रकार है –
हिन्दू बौद्ध एकात्मता के कार्य – आयोजित सम्मेलन
स्थान विचारार्थ विषय
01. 1994 सारनाथ (उ0प्र0-भारत)- हिन्दू बौद्ध मौलिक एकता
02. 1996 क्योटो (जापान)- अहिंसा की अवधारणा एवं व्यवहार
03. 1997 मोदीपुरम (उ0प्र0-भारत)- सत्य की अवधारणा एवं व्यवहार
04. 1999 लुम्बिनी (नेपाल)- करूणा की अवधारणा एवं व्यवहार
05. 2004 सिक्किम हिन्दू बौद्ध सम्मेलन- बौद्ध समाज में व्याप्त व्यसनों के प्रति
समाज को सचेत करना
05. 2006 काशी (उ0प्र0)-धर्म संस्कृति संगम विश्व शान्ति और समन्वय की धारा को
पुनः प्रबल करने हेतु संवाद
जनवरी, 1979 में प्रयागराज, उत्तर प्रदेश में संगम तट पर सम्पन्न हुए द्वितीय विश्व हिन्दू सम्मेलन में हमारे निमन्त्रण पर परमपावन दलाई लामा जी पधारे एवं तत्कालीन ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य पूज्य स्वामी शान्तानन्द जी महाराज ने परमपावन का स्वागत किया। 2001 ई0 में पूर्ण कुम्भ के अवसर पर परिषद के आमंत्रण पर परमपावन दलाई लामा जी पुनः प्रयाग पधारे और अन्य समस्त वरिष्ठ धर्माचार्यों के साथ चर्चा की तथा कांची पीठाधीश्वर पूज्य जयेन्द्र सरस्वती जी महाराज के साथ संयुक्त वक्तव्य जारी किया।
विश्व हिन्दू परिषद ने पूज्य भन्ते ज्ञानजगत जी महाराज के मार्गदर्शन में कुछ अन्य संस्थाओं के साथ मिलकर हिन्दू बौद्ध मैत्री के लिए एशिया के 21 देशों की यात्रा तीन चरणों में सम्पन्न की। 1999 में 40 दिन की यात्रा में दक्षिण पूर्व एशिया के 10 देशों का भ्रमण। 2005 में 33 दिन की यात्रा में ब्रह्मदेश, बंगलादेश, भूटान और नेपाल का भ्रमण। 2006 में 71 दिनों की यात्रा में 8 देशों का भ्रमण। हिन्दू बौद्ध समन्वय इन यात्राओं का मुख्य बिन्दु था। हिन्दू और बौद्ध दोनों में ही आध्यात्मिक तत्त्व विद्यमान हैं, इसलिए विश्व कल्याण हेतु दोनों का समन्वय आवश्यक है, यह विचार विकसित हुआ। 1999 में वैदिक और बौद्ध परम्पराओं में समन्वय की दृष्टि से एक संयुक्त वक्तव्य पर 125 धर्माचार्यों की सहमति के हस्ताक्षर कराए गए।
सन् 2002 से 2004 के मध्य विश्व बौद्ध संस्कृति फाउण्डेशन के माध्यम से भारत सरकार के पर्यटन एवं सांस्कृतिक मंत्रालय के साथ मिलकर 3 अथवा 4 दिन के बौद्ध महोत्सव जम्मू कश्मीर के जन्सकार में, किन्नौर (हिमाचल), गंगटोक (सिक्किम), जयगाँव (पश्चिम बंगाल) एवं अरूणाचल प्रदेश के तवांग में किए गए। सैंकड़ों लामाओं एवं भक्तों ने इन उत्सवों में भाग लिया। सेवा कार्य भी प्रारम्भ कराए।
भारत-नेपाल सांस्कृतिक सम्बन्धों को और अधिक प्रगाढ़ करने के लिए कांची कामकोटि पीठ के वरिष्ठ जगद्गुरु शंकराचार्य पूज्य जयेन्द्र सरस्वती जी महाराज के निमन्त्रण पर नेपाल नरेश वीरेन्द्र वीर विक्रम शाह देव भारत तीर्थयात्रा के लिए पधारे। पुण्यभूमि हरिद्वार में अक्टूबर, 1997 को हिंदू सम्मेलन आयोजित हुआ। उपस्थिति लगभग 80,000।

सेवा
हमारा समाज अनेक भेदों के कारण विघटन और शोषण का शिकार है। करोड़ों का समाज ऐसा है जो समाज की दौड़ में पीछे रह गया है। छुआछूत गहराई तक अनुभव होती है। यह समाज अपने को उपेक्षित भी अनुभव करता है। यदि किसी देश की करोड़ों आबादी निरक्षर हो, अपने को उपेक्षित, शोषित अथवा पिछड़ी अनुभव करती हो तो उस देश की प्रगति की कल्पना नहीं की जा सकती। हमारी ही कमजोरियों का लाभ उठाकर पहले मुस्लिमों और बाद में ईसाई मिशनरियों ने हिन्दू समाज का धर्मान्तरण किया और अपने संस्कारों से उन्हें हमसे दूर कर दिया, हमारे पूर्वजों से भी सम्बन्ध विच्छेद करा दिया, पूर्वजों की सभी परम्पराएं उनके लिए पराई हो गईं। इसी कारण 1947 में देश का विभाजन भी हुआ।
इसलिए बिखरे हुए, असहाय बने, निरक्षर, अपने को शोषित, निरीह अथवा पिछड़ा मानने वाले बन्धुओं को शेष समाज से जोड़ने, उन्हें सामाजिक न्याय दिलाने व सुरक्षा प्रदान करने, उनमें जागरूकता लाकर सामाजिक सम्मान दिलाने के लिए शिक्षा, आरोग्य, स्वावलम्बन, संस्कार के क्षेत्र में सम्पूर्ण समाज के सहयोग से परिषद के प्रारम्भ काल से ही कार्य प्रारम्भ हुआ।
1967 ई0 में महाराष्ट्र के तलासरी में छात्रावास, धीरे-धीरे रोजगार प्रशिक्षण केन्द्र व चिकित्सा केन्द्र प्रारम्भ हुआ। 1972 में उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले के घोरावल गाँव में छात्रावास व प्राथमिक विद्यालय प्रारम्भ हुआ। 1974 में बंगाल के खड़गपुर शहर के पास गोपाली आश्रम प्रकल्प गुरुकुल पद्धति पर प्रारम्भ हुआ। 1976 में गोवा के फोण्डा में निराश्रित बालक-बालिकाओं के लिए मातृछाया प्रकल्प प्रारम्भ किया। राजस्थान के बांसवाड़ा का प्रकल्प भी 1967 में प्रारम्भ हुआ था। 1981 में इसी क्षेत्र में घाटोल गाँव में एकलव्य आश्रम तथा 1982 में मोहकमपुरा गाँव में एक आश्रम प्रारम्भ हुआ। बांसवाड़ा जनपद के इन वनवासी बालकों को प्रारम्भ में शिक्षा, भोजन, आवास, पुस्तकें निःशुल्क उपलब्ध कराई गई थीं। बांसवाड़ा प्रकल्प आज देश में प्रतिष्ठित प्रकल्प है। असम का हाॅफलांग प्रकल्प, तमिलनाडु का हिन्दू बाल छात्रावास एवं स्वामी विवेकानन्द मेडिकल मिशन, कर्नाटक का अश्विनी अस्पताल एवं आन्ध्र का गिरिजन विकास केन्द्र परिषद कार्यकर्ताओं ने प्रारम्भ किया। आत्मनिर्भरता के लिए सिलाई केन्द्र, कम्प्यूटर प्रशिक्षण केन्द्र, रोजगार के अन्य शिक्षण कार्य प्रारम्भ हुए। निराश्रित बालक-बालिकाओं के लिए बाल आश्रम खोले गए। संस्कारों को पुष्ट करने के लिए सत्संग प्रारम्भ किए गए, छोटे-छोटे मन्दिरों का निर्माण किया गया। आज समाज में इनका अच्छा प्रतिफल प्राप्त हुआ है।
1980 के दशक में तमिलनाडु के मीनाक्षीपुरम गाँव में सामूहिक धर्मान्तरण कर लिए जाने के कारण मुस्लिमों ने गाँव का नाम भी बदल दिया। देश में भयंकर आक्रोश पैदा हुआ, इस आक्रोश को परिषद ने रचनात्मक दिशा दी। संस्कृति रक्षा योजना प्रारम्भ हुई। सेवा को परिषद का महत्वपूर्ण कार्य माना गया। स्थान-स्थान पर सेवा कार्यों के लिए स्वतंत्र संस्थाओं का पंजीकरण कराया गया। 1994 ई0 तक देशभर में 74 सेवा संस्थाओं के माध्यम से सेवा कार्य प्रारम्भ कर दिए गए थे। आन्ध्र में विज्ञान पीठम् के माध्यम से अनाथाश्रम, बाद में चिकित्सालय, विद्यालय, वाचनालय विकसित हुए। महाराष्ट्र में नागपुर के देवलापार गाँव में वनवासी विद्यार्थी वसतिगृह प्रारम्भ हुआ। राजस्थान में भारतीय जनसेवा प्रतिष्ठान का गठन हुआ।
वर्तमान में हमारे सेवा कार्यों का विवरण अत्यन्त विशाल है, जिसको सम्पूर्णता के साथ लिखा जाना शायद कठिन होगा। आज प्रमुख प्रकल्पों में कटक का जशोदा सदन, बंगाल का बादामी देवी शिशु कल्याण केन्द्र-हावड़ा, प्लेटफार्म ज्ञान मन्दिर निवासी पाठशाला, नागपुर, गंगा अम्मा चिकुम्भी मठ बाल कल्याण केन्द्र, बेलगाँव-कर्नाटक, कारूण्यसिन्ध बाल कल्याण आश्रम, आन्ध्र प्रदेश, मातृ आँचल कन्या विद्यपीठ-हरिद्वार, वात्सल्य वाटिका-हरिद्वार, मातृछाया गोवा, श्री दत्त बालसेवा आश्रम, गंगापुर-कर्नाटक एवं महिला आश्रम-कोंकण हैं। समय-समय पर भिन्न प्रकार से सेवा क्षेत्र में प्रशिक्षण वर्ग, शिविर किए जाते हैं। वर्ष 2011-12 में देश में 11 स्थानों पर शिविर आयोजित किए गए जिसमें छात्रावास एवं बाल आश्रमों के 65 प्रकल्पों के 599 बालकों ने भाग लिया।
शिक्षा क्षेत्र में बाल संस्कार केन्द्र, प्राइमरी पाठशाला, सेकेण्डरी स्कूल, सीनियर सेकेण्डरी स्कूल, पुस्तकालय एवं संस्कृत विद्यालय चलते हैं। आरोग्य क्षेत्र में चिकित्सालय, प्राथमिक चिकित्सा केन्द्र, एम्बुलेन्स व चिकित्सा शिविर आयोजित किए जाते हैं। स्वावलम्बन के लिए सिलाई, कम्प्यूटर प्रशिक्षण, महिलाओं के लिए स्वयं सहायता समूह व अन्य ग्रामीण उद्योग के प्रशिक्षण केन्द्र चलते हैं। सामाजिक क्षेत्र में निराश्रित बालक-बालिकाओं के लिए आश्रम, विवाह मिलन केन्द्र, महिलाओं को कानूनी सहायता देने का कार्य और कामकाजी महिलाओं के छात्रावास चलाए जाते हैं। आवश्यकता पड़ने पर मेलों में, तीर्थयात्राओं में चिकित्सा, भोजन, जल व आश्रय प्रदान करने के लिए सेवा कार्य किए जाते हैं। भारत के प्रत्येक राज्य में हमारे सेवा कार्य हैं। 2012 ई0 में इन कार्यों का संचालन 200 ट्रस्टों के माध्यम से किया जा रहा है।
शिक्षा क्षेत्र के सेवा कार्य- बालवाड़ी-162, बाल संस्कार केन्द्र-334, प्राथमिक विद्यालय-86, सेकेण्डरी स्कूल-54, सीनियर सेकेण्डरी स्कूल-29, आवासीय विद्यालय-17, छात्रावास (बालक-बालिका)-76, रात्रि विद्यालय-9, कोचिंग सेन्टर-41, पुस्तकालय-95, संस्कृत एवं वेद पाठशाला-12, अन्य शिक्षा प्रकल्प-34 – कुल शैक्षिक सेवा कार्य-949
चिकित्सा क्षेत्र के सेवा कार्य – होस्पिटल-17, डिस्पेन्सरी-85, मोबाइल डिस्पेन्सरी-12, एम्बुलेन्स-17, प्राथमिक चिकित्सा केन्द्र-353, औषधि संग्रह केन्द्र-18, पंचगव्य औषधि केन्द्र-8, अन्य चिकित्सा कार्य-211 – कुल चिकित्सा सेवा कार्य-731
स्वावलम्बन क्षेत्र के सेवा कार्य – सिलाई प्रशिक्षण केन्द्र-76, कम्प्यूटर प्रशिक्षण केन्द्र-31, महिला सहायता केन्द्र-875, मैकेनिकल प्रशिक्षण केन्द्र-2, मधुमक्खी पालन केन्द्र-1, ग्राम उद्योग केन्द्र-2, पशु चिकित्सा केन्द्र-10, अन्य स्वावलम्बन केन्द्र-22 – कुल स्वावलम्बन सेवा कार्य-1019
सामाजिक क्षेत्र के सेवा कार्य – निराश्रित बालक-बालिकाओं के आश्रम-44, हिन्दू विवाह मिलन केन्द्र-15, कानूनी सहायता केन्द्र-20, महिला संरक्षण केन्द्र-4, कामकाजी महिलाओं के छात्रावास-2, अन्य सेवा कार्य-38 – कुल सामाजिक सेवा कार्य-123
अन्य सेवा कार्य – चिकित्सा एवं स्वास्थ्य केन्द्र-94, संस्कृत सम्भाषण वर्ग-5, वृक्षारोपण-546, पेयजल केन्द्र-105, धार्मिक यात्राओं में सेवा कार्य-51, प्राकृतिक आपदा में सेवा-38, ग्राम विकास केन्द्र-19, मन्दिर निर्माण-193, अन्य सामाजिक कार्य-55 – कुल अन्य सेवा कार्य-1106

विशेष सम्पर्क विभाग
वर्ष 1990 में जब अयोध्या में प्रथम कारसेवा की घोषणा हुई तो सम्पूर्ण भारत को उत्तर प्रदेश में प्रवेश करना था। विचार हुआ कि प्रशासन, पुलिस, न्यायपालिका, चिकित्सा क्षेत्र के प्रमुख पदाधिकारियों से प्रत्येक जिले में मिलकर सही जानकारी दी जाए और उन्हें बताया जाए कि देश से उत्तर प्रदेश में आने वाले कारसेवक अपने-अपने क्षेत्रों के सुसभ्य नागरिक हैं, रामभक्त हैं। उनके साथ उचित व्यवहार किया जाए। इस सम्पर्क अभियान का प्रभावी परिणाम सामने आया।
29-30 अप्रैल, 2003 को पुनः निर्णय हुआ कि सन्तों और परिषद के पदाधिकारियों का एक प्रतिनिधि मण्डल सभी राजनीतिक दलों के सांसदों, विधायकों तथा अन्य विशिष्ट व्यक्तियों से मिलकर श्रीराम जन्मभूमि के सम्बन्ध में सही जानकारी दे और उनसे आग्रह करे कि वे सब श्रीराम जन्मभूमि के लिए संसद में एक विधेयक लाएं और श्रीराम जन्मभूमि पर मन्दिर निर्माण का रास्ता बनाएं। वैसे देश के प्रमुख राजनीतिक दलों के प्रमुख नेताओं और सरकार के प्रमुखों से सम्पर्क बनाने के लिए इससे पूर्व में भी सन्तों की एक समिति बनाई गई थी और इस समिति ने विभिन्न राजनेताओं सहित प्रधानमंत्री श्री नरसिंहराव से भेंट भी की थी।
परिषद के कार्य की दृष्टि से सम्पर्क की आवश्यकता और महत्ता को देखते हुए इस कार्य को नियमित रूप में चलाने की दृष्टि से 2003 में विश्व हिन्दू परिषद ने अलग से ‘विशेष सम्पर्क विभाग‘ की संरचना की।
सम्पर्क के क्षेत्र को व्यापक बनाते समय इस बात का विशेष ध्यान रखा गया कि यह कार्य देश के राजनेताओं के साथ-साथ क्षेत्र, भाषा, उपासना, सांस्कृतिक परम्परा, जाति-बिरादरी आदि के कारण निर्मित समाज के विविध वर्गों के सामाजिक कार्यकर्ताओं, छात्रनेताओं, व्यावसायिक नेताओं, कृषकों, कर्मचारियों, उद्योगपतियों, प्रशासनिक अधिकारियों, चिकित्सकों, अधिवक्ताओं, अभियन्ताओं, व्यवसाइयों से भी सम्पर्क करके उन्हें हिन्दुत्व की उत्कृष्ट विशेषताओं के साथ-साथ परिषद के संगठनात्मक, जन-जागरणात्मक, आन्दोलनात्मक और रचनात्मक कार्यों से अवगत कराकर उन्हें हिन्दुत्व का पोषक बनाने का प्रयास करें। यह भी निश्चय हुआ कि यह कार्य अभियान के रूप में न होकर संगठन के कार्यकर्ता की स्वाभाविक प्रवृत्ति बननी चाहिए। सम्पर्क करने का उसका नित्य का स्वभाव बने। समाज के विशिष्टजनों की सूची बनाकर सम्पर्क किया जाए।
वर्ष में दो बार जब संसद का बजट एवं वर्षाकालीन सत्र चल रहा हो तब भिन्न-भिन्न प्रान्तों के प्रमुख दो तीन कार्यकर्ता दिल्ली आते हैं और अपने-अपने प्रान्तों के लोकसभा एवं राज्यसभा सांसदों से समय लेकर उनके घर अथवा पार्टी कार्यालय में भेंट करते हैं, पारिवारिक वातावरण में वार्तालाप होता है। यह कार्य दिल्ली में एक सप्ताह तक चलता है। सम्पर्क काल में जो विषय देश के सामने महत्वपूर्ण होते हैं, उन विषयों पर सांसदों को आवश्यक जानकारी लिखित में दी जाती है, मौखिक वार्तालाप होता है ताकि सांसद अवसर मिलने पर अपने दल की बैठक में अथवा संसद में विषय का सही प्रस्तुतिकरण कर सके। 2008 गंगा रक्षा के विषय में दिल्ली मंस गोष्टी 23 सांसद उपस्थित। 2009 सेतु समुद्रम परियोजना के सम्बन्ध में 340 सांसदों से, 2010 अमरनाथ आन्दोलन के सम्बन्ध में 360 सांसदों से, 2011 प्रस्तावित साम्प्रदायिक एवं लक्षित हिंसा रोकथाम विधेयक 2011 के सम्बन्ध में 403 सांसदों से एवं जम्मू कश्मीर पर वार्ताकारों की रिपोर्ट 2012 व असम राज्य के कोकराझार क्षेत्र में बंगलादेशी मुस्लिम घुसपैठियों के कारण उत्पन्न हुई समस्या पर 363 सांसदों से व्यापक सम्पर्क हुआ।
पुस्तक प्रकाशन- विभाग द्वारा ‘‘बढ़ती हुई मुस्लिम जनसंख्या से हिन्दुत्व एवं देश को संकट‘‘ नाम से एक पुस्तक का प्रकाशन किया गया है। पुस्तक में आंकड़ों एवं रेखाचित्रों के माध्यम से जहाँ मुस्लिम आबादी का विस्फोट समाज के ध्यान में लाया गया है वहीं हिन्दू समाज को आसन्न संकट से सचेत करने का प्रयास किया गया है।
विधायकों से भेंट- प्रत्येक प्रान्त के कार्यकर्ता भी योजना बनाकर श्रीराम जन्मभूमि आदि के सम्बन्ध में विशिष्ट जानकारी देने के लिए अपने-अपने प्रान्त के विधायकों से मिलने का कार्यक्रम बनाते हैं। सांसदों की भांति ही प्रान्तों में चलने वाले विधानसभा के सत्रों में विधायकों और विधान परिषद के सदस्यों से विश्व हिन्दू परिषद के कार्यकर्ता मिलते रहते हैं।
प्रशासनिक अधिकारियों से भेंट- राजनीतिज्ञों के साथ-साथ देश का प्रशासन चलाने में प्रशासनिक अधिकारियों का भी महत्त्वपूर्ण योगदान रहता है। अतः श्रीराम जन्मभूमि आन्दोलन तथा हिन्दुत्व के विचार को समाज में प्रभावी बनाने में देश के प्रशासनिक अधिकारी कैसे सहयोगी बन सकते हैं, इस पर विचार करके इन अधिकारियों से विश्व हिन्दू परिषद के कार्यकर्ता मिलते हैं और जन्मभूमि आदि के बारे में अद्यतन जानकारी देकर उनका सहयोग प्राप्त करने का प्रयास करते हैं।
वर्ष प्रतिपदा (नव वर्ष) की शुभकामनाएं- सम्पर्क की दृष्टि से सांसदों, विधायकों, प्रशासनिक अधिकारियों आदि विशिष्ट व्यक्तियों को वर्ष प्रतिपदा (नव वर्ष) की शुभकामनाएं भेजना भी एक अच्छा माध्यम हो सकता है अतः उक्त सभी व्यक्तियों को हर वर्ष प्रतिपदा के अवसर पर नव वर्ष की शुभकामनाएं भेजकर उनको बधाई दी जाती है और उनसे सम्पर्क रखा जाता है। प्रान्तीय स्तरों पर विशेष सम्पर्क विभाग की ओर से अपने-अपने विधायकों और विशिष्ट व्यक्तियों को भी वर्ष प्रतिपदा के अवसर पर शुभकामना संदेश भेजा जाता है।
सांस्कृतिक गौरव संस्थान
सांस्कृतिक गौरव संस्थान की स्थापना, जून, 1997 में कुछ विद्वानों और प्रतिष्ठित व्यक्तियों की उपस्थिति में भारत के संविधन के अनुच्छेद 51 (क) में वर्णित भारत के नागरिकों के कर्तव्यों के आलोक में देश की एकता, अखण्डता और संप्रभुता के लिए कार्य करने के लिए की गई, न्यास का पंजीयन दिल्ली में 17 दिसम्बर, 1997 को हुआ। परिषद कार्य में एक नए अध्याय का आरंभ था जब एक ऐसे संस्थान की स्थापना हुई जिसका मुख्य कार्य भारत के नागरिकों के मौलिक कत्र्तव्यों के संबंध में चिन्तकों और विचारकों के मध्य जागृति पैदा करना था।
राष्ट्रीय शिविर: कार्य को गति देने, नए कार्यकर्ताओं को जोड़ने तथा कार्य से जुड़े विद्वानों से वार्तालाप के लिए चार चिन्तन शिविर झिंझोली, पुणे, बंगलूरु और चण्डीगढ़ में आयोजित किए गए। संगठन के प्रसार हेतु प्रवास कार्य होता रहा है। देश के कुछ नगरों में संस्थान की शाखाएं हैं।
उपसंस्थान: अमृतसर, चण्डीगढ़, पठानकोट, देहरादून, लखनऊ, इलाहबाद, पटना, मुजफ्फरपुर, कोलकाता, त्रिपुरा (अगरतला) बंगलूरु, कोच्चि, एर्णाकुलम्, मुम्बई, पुणे, अजमेर, जयपुर, जोधपुर, भोपाल, अहमदाबाद, इन्दौर, रायपुर, मुजफ्फरनगर, मेरठ, रुड़की में प्रान्तीय उपसंस्थानों की स्थापना हुई और वहाँ बैठकें, गोष्ठियाँ, प्रतियोगिताएं, सम्मेलन और चिन्तन-सत्र आदि होते रहे हैं।
भोपाल चैप्टर की ओर से समय-समय पर विभिन्न प्रकार के कार्यक्रम होते रहे हैं। वहाँ अग्निमित्र और ’अग्निशिखा’ नाम से दो मंच क्रमशः युवकों और युवा महिलाओं के लिए संचालित हो रहे हैं।
प्रयाग में अक्षयवट क्षेत्र की मुक्ति के प्रयास सहित अनेक सांस्कृतिक कार्यक्रम किए गए।
चण्डीगढ़ चण्डीगढ़ चैप्टर की ओर से हर महीने राष्ट्रीय महत्त्व के किसी विषय पर गोष्ठी आयोजन की परम्परा रही है। भ्रष्टाचार की रोकथाम के संबंध में एक विशेष पुस्तक प्रकाशित की थी।
संस्कृति रक्षा-मंच
(क) भारत में पोप के आगमन के अवसर पर सितम्बर, 1999 में संस्कृति रक्षा-मंच नाम से एक मंच स्थापित किया गया। मंच ने चर्च के विस्तारवाद संबंधी कुटिल प्रयासों के बारे में सारे देश में विचार-मंथन का सृजन किया। 230 पृष्ठों की एक बड़ी पुस्तक तैयार की गई जिसमें चर्च की खतरनाक गतिविधियों का विवरण था। उसे भारत में कार्यरत विभिन्न देशों के राजदूतों को उनसे भेंट के दौरान दिया गया। संपूर्ण भारत में अनेक पत्रकारों से संपर्क किया गया, प्रदर्शन किए गए और विभिन्न राज्यों के राज्यपालों को ज्ञापन दिए गए। एक रथ-यात्रा भी निकाली गई। पूरा अभियान सफल सिद्ध हुआ और इसके फलस्वरूप वांछित लक्ष्य की उपलब्धि हुई। कुछ बड़े अंग्रेज़ी समाचार-पत्रों ने, जैसे हिन्दुस्तान टाइम्स, टाइम्स आफ इण्डिया और इण्डियन एक्सप्रैस, जो भारत की सनातन संस्कृति पर कीचड़ उछालने से नहीं चूकते थे, मतान्तरण के विरुद्ध लेख लिखवाना आरंभ कर दिया।
(ख) वर्ष 2001 और वर्ष 2002 के दौरान राम जन्म भूमि मंदिर निर्माण के लिए व्यापक अभियान छेड़ा गया है, जिसके अधीन मेजर जनरल विश्वास जोगलेकर जी, डाॅ शिवा सुब्रह्मण्यम जी ने ‘‘फैक्ट’’ नाम की एक बड़ी पुस्तक। हिन्दी और अंग्रेजी मेें ‘‘श्री राम जन्मभूमि का सच जानिए’’ पुस्तक प्रकाशित की। इन पुस्तकों को सभी राजदूतों, अनेक संसद् सदस्यों, अनेक पत्रकारों और गणमान्य व्यक्तियों को देश, विदेश में भेजा गया।
विश्व वेद सम्मेलन
दिसम्बर, 1998 में दिल्ली में भव्य विश्व वेद सम्मेलन हुआ। उसमें संस्थान के कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों के एक समूह ने उसकी सफलता के लिए 05 दिसम्बर से 13 दिसम्बर, 1998 तक अहर्निश कार्य किया।
हिन्दू-बौद्ध सम्मेलन
नवम्बर, 1999 में लुम्बिनी नेपाल में एक बड़ा हिन्दू-बौद्ध सम्मेलन में संस्थान ने पूर्ण सहभागिता की।
कुंभ मेला
संस्थान के कुछ पदाधिकारियों ने अपनी सेवाएं प्रयागराज कुंभ मेला 2001 में 20 दिन तक अपनी सेवाएं प्रदान कीं।
प्रशिक्षण
संस्थान की ओर से सन् 2001 में कार्यालय में एक महीने का कंप्यूटर उपकरणों पर कार्य करने का प्रशिक्षण आरंभ किया, जिसमें देश के विभिन्न नगरों से 25 युवकों ने भाग लिया।
विद्वत परिषद की बैठकें: संस्थान की विद्वत् परिषद की 20 बैठकें 27 मई 2000 के बाद हुई, जिनमें अनेक महत्त्वपूर्ण विषयों पर चर्चा के पश्चात् निष्कर्ष निकाले गए। अधिकारियों व यथावश्यक केन्द्र/राज्य सरकारों को निष्कर्षों के आधार पर कार्रवाई के लिए पत्र लिखे गए।
चिकित्सा सेवा कार्य
वर्ष 2004-05 में दिल्ली में द्वारका में गरीब लोगों के लिए पिछड़े वर्ग के व्यक्तियों के लिए चिकित्सा व्यवस्था की गई, और उसमें अनेक रोगियों की चिकित्सा की गई। साथ-साथ आधे दिन का एक चिकित्सा शिविर भी उसी क्षेत्र में लगाया गया, 150 रोगियों को औषधियां दी गईं।
पिछड़े और कमज़ोर वर्ग के बच्चों के लिए परीक्षापूर्व विशेष पढ़ाई की व्यवस्था भी कुछ महीनों के लिए की गई।
बद्रीनाथ जी की तीर्थयात्रा के दौरान सोढानी फाउंडेशन (यू.एस.ए.) के सौजन्य से पीपलकोटि में 13 नवम्बर 2005 तक की अवधि के लिए चिकित्सा सुविधाओं की व्यवस्था हुई।
श्रीमाँ की 125 वीं जयन्ती: सांस्कृतिक गौरव संस्थान ने स्वयं, अपनी इकाइयों तथा स्वैच्छिक संस्थाओं के माध्यम से भारत के विभिन्न राज्यों – दिल्ली, पंजाब, जम्मू-कश्मीर, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखण्ड, बंगाल, असम, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ आदि में श्रीमाँ की 125 वीं जयन्ती के उपलक्ष्य में अनेक कार्यक्रम किए।
संत गुरु श्री रविदास चेतना यात्रा: 27 नवम्बर, 2005 से 8 दिसम्बर, 2005 तक चित्तौड़गढ़ से वाराणसी तक संत गुरु श्री रविदास चेतना यात्रा के आयोजन में सांस्कृतिक गौरव संस्थान का भी सक्रिय योगदान रहा।
विशेष व्याख्यानमालाएं एवं संगोष्ठियां: विशिष्ट विद्वानों के व्याख्यान के क्रम में डेविड फ्राउले (श्री वामदेव शास्त्री), श्री भूरेलाल, श्री स्वराज प्रकाश गुप्ता, श्री हर्ष कुमार अग्रवाल, श्री टी.सिंह आदि के व्याख्यान दिल्ली में आयोजित हुए और यह क्रम जारी है। कुछ महत्त्वपूर्ण कार्यक्रमों/गोष्ठियों का विवरण निम्नलिखित है:-
दिनांक वक्ता विषय
31.12.2003 श्री सत्यनारायण गोयन्का जी ’’विपश्यना-भारत की कल्याणकारी धरोहर’’
16.8.2004 सुश्री संध्या जैन, पत्रकार ’’आर्यों का भारत के बाहर से आगमन- एक गप्प’’
8.11.2004 श्री जगदीश प्रसाद पाण्डेय ’’रामराज्य जैसा लोकतंत्र और प्रशासन तंत्र’’
26 फरवरी 05 — वीर सावरकर फीचर-फिल्म का प्रदर्शन
18-19 फरवरी,05 डॉ.केशवरघुनाथ कान्हेरे ’’छत्रपति शिवाजी महाराज: एक विलक्षण संगठनकर्ता’’
30 अगस्त, 2004 को रक्षाबंधन पर्व आयोजन में विदेशी राजनयिकों को आमंत्रित किया गया।
श्रीरामसेतु के बारे में सच्चाई को जनता तक पहँुचाने के लिए सांस्कृतिक गौरव संस्थान की ओर से डेढ़ दिन की संगोष्ठी दिनांक 1 दिसम्बर 2007 को की गई।
सांस्कृतिक गौरव संस्थान के तत्त्वावधन में ‘उठो और रामराज्य की स्थापना करो’ विषय पर देश के अनेक नगरों में संगोष्ठियों के माध्यम से एक जागरूकता यज्ञ आरंभ किया गया। पहली संगोष्ठी 5 अप्रैल 2008 को कांस्टीट्यूशन क्लब, नई दिल्ली में की गई।
इसके पश्चात् 35 संगोष्ठियाँ भोपाल, मुजफ्फरनगर, मुंबई, कोच्चि, हापुड़, दिल्ली, देहरादून, मेरठ, गाजि़याबाद, डासना, सोनीपत, चाँदपुर, देवबन्द, मिरगपुर, अलीगढ़, छुटमलपुर, काशीपुर, ठाकुरद्वारा, हरिद्वार, रायपुर (देहरादून), उझानी (बदायूं), ग्राम साढौली (बेहट सहारनपुर) नगरों में हुईं।
स्वामी अखण्डानन्द जी महाराज ने रामराज्य की स्थापना हेतु वेदों के अध्ययन और स्वाध्याय पर ज़ोर दिया। हरिद्वार में पावन कुंभ के अवसर पर दिनांक 10-11 अप्रैल 2010 को दो दिवसीय संगोष्ठी तथा जोशीमठ में वेद-वेदांग महाविद्यालय में 27 मई 2010 को एवं हलद्वानी में गोष्ठी 11 जुलाई 2010 को हुई।
उठो और रामराज्य की स्थापना करो विषय पर मेरठ में विजयादशमी, 2010 के दिन कवि सम्मेलन हुआ।
संस्कृति बचाओ सम्मेलन
3-4 मार्च 2012 को कुरुक्षेत्र में ‘संस्कृति बचाओ’ सम्मेलन आयोजित किया गया।
28 अप्रैल 2012 को ब्रजघाट में ‘संस्कृति बचाओ’ सम्मेलन आयोजित किया गया।
28 मई 2012 को वीर सावरकर जयन्ती के उपलक्ष्य में मेरठ में विचार गोष्ठी का आयोजन।
31 मई तथा 1 जून को पटना के पास आरा तथा गाँव बिरसनवन (भोजपुर) नामक स्थान पर ‘संस्कृति बचाओ’ संगोष्ठियों का आयोजन।
उत्तराखण्ड में सेवा कार्य: उत्तराखण्ड में ऋषिकेश से लगभग 90 कि.मी. दूर बद्रीनाथ की ओर जाने वाले मार्ग पर लक्षमोली बाज़ार में सड़क के किनारे 0.430 हेक्टेयर भूमि दिनांक 10.12.2003 को चिकित्सालय, पुस्तकालय, मंदिर, जड़ी-बूटी प्रशिक्षण केन्द्र और धर्मशाला (आवास-व्यवस्था) कार्य हुआ।
सरकारों को पत्र: केन्द्रीय व राज्य सरकारों को लिखे गए कुछ पत्रों के विषय इस प्रकार रहे:-
1. महाप्रबंधक उत्तर रेल को ‘अंबाला’ एवं ‘कुरुक्षेत्र’ के विषय में शताब्दी रेलगाडि़यों में की जा रही घोषणा कि ‘यह स्थान थल एवं वायु सेना का मुख्य केन्द्र है’ सुरक्षा की दृष्टि से आपत्तिजनक बताकर घोषणा में यह स्थान मां ‘अम्बा’ से संबंधित है की उद्घोषणा तथा कुरुक्षेत्र में महाभारत के युद्ध संबंध स्थान की जानकारी देने के लिए पत्र लिखा, जिसे मान लिया गया।
2. सूचना एवं प्रसारण मंत्री को डी.डी.-1 पर प्रसारित हो रहे ‘‘एयरटेल क्रेजी किया रे’’ शीर्षक के कार्यक्रम में साधु-संन्यासियों का अपमान की जानकारी देते हुए इसे तुरंत बंद किए जाने की मांग की।
3. प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह, कृषि मंत्री और दिल्ली की मुख्यमंत्री को राष्ट्रमण्डल खेलों के दौरान खिलाडि़यों आदि को गौमाँस परोसने को रोकने के लिए पत्र लिखे। प्रधानमंत्री कार्यालय एवं कृषि मंत्री के कार्यालय से पत्रोत्तर भी आए तथा आश्वासन दिया गया कि ऐसा नहीं होगा।
4. उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री को ‘उत्तराखण्ड राज्य का पर्यटन साहित्य हिन्दी में सुलभ न होना’ विषय पर पत्र।
5. श्रीमती ताजदार बाबर, उपाध्यक्ष, नई दिल्ली नगर-पालिका परिषद को दिल्ली की सड़कों पर यातायात संबंधी निर्देश केवल अंग्रेज़ी में होने पर पत्र।
6. जाॅकी कंपनी के निदेशक श्री रवि उप्पल को उनकी कंपनी द्वारा दिखाए जा रहे अश्लील विज्ञापनों पर तुरंत रोक लगाने हेतु पत्र। प्रतिलिपि सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को भी दी।
7. हज के नाम पर हर राज्य की राजधानी में महंगे भू-खण्डों पर सरकारी खर्चे से हज हाउस निर्मित हो रहे हैं, जिनका प्रयोग व्यावसायिक कार्यों हेतु होता है। इसको रोकने हेतु पत्र भेजे गए।
8. पंजाब की स्वास्थ्य मंत्री डाॅ. लक्ष्मीकांता चावला को पंजाब में आयुर्वेद चिकित्सालय एवं अनुसंधान केन्द्र खोलने का सुझाव।
9. पंजाब के मुख्यमंत्री को पंजाब में चर्च द्वारा सिख समुदाय के मतान्तरण की जानकारी देते हुए कार्रवाई का अनुरोध।
10. प्रधनमंत्री डाॅ. मनमोहन सिंह को ‘वाराणसी (काशी) के भारत माता मंदिर की उपेक्षा विषय पर पत्र।
11. रक्षा मंत्री, भारत सरकार को नई दिल्ली में प्रधनमंत्री निवास के निकट वायुेसना के ओल्ड विलिंग्डन कैंप और न्यू विलिंग्डन कैंप के नाम बदलना।
12. वसंत विहार में डी ब्लाॅक पहाड़ी पर रक्षा मंत्रालय की 45 एकड़ भूमि पर मस्जिद और इस्लामी प्रशिक्षण केन्द्र का निर्माण की जानकारी कराते हुए रक्षा मंत्रालय को पत्र, स्मरण पत्र, संसद प्रश्न।
13. वायुसेना क्षेत्र सुब्रतो पार्क, नई दिल्ली के निकट पटरी पर मजार खड़ी करने की जानकारी संबंधी पत्र।
14. वसंत विहार थाने के बगल में बड़े अवैध खानकाह निर्माण की जानकारी संबंधी पत्र।
15. देहरादून के रास्ते में रेल पटरियों के मध्य मजारों व खानकाहों का अवैध निर्माण।
16. विभिन्न समाचार पत्रों में प्रकाशित हो रहे अनेक फ्रेण्डशिप-क्लबों और शरीर की मालिश आदि के विज्ञापनों के माध्यम से प्रसारित अनैतिकता और भ्रष्टाचार पर तत्काल छापों और दण्ड की व्यवस्था के लिए राज्यों के मुख्यमंत्रियों, राज्यपालों और सूचना-प्रसारण मंत्रालय को अनेक पत्र, स्मरण पत्र।
17. राष्ट्रपति भवन के अंतर्गत दासता के प्रतीक ‘मुगल उद्यान’ का नाम बदलने हेतु महामहिम राष्ट्रपति को 11 नाम के सुझाव-युक्त पत्र।
18. गृहमंत्री को भूतपूर्व राजाओं और महाराजाओं की भांति अर्काट (तमिलनाडु) के भूतपूर्व नवाब के प्रीविपर्स और सलामी आदि की प्रथा को समाप्त करने के लिए पत्र।
19. प्रधनमंत्री को समझौता एक्सप्रेस रेलगाड़ी, लाहौर, मुजफ्फराबाद तक जाने तथा वहाँ से वापस आने वाली बसें तथा बंगलादेश में ढाका जाने वाली बसों से देश को होने वाले भारी नुकसान/आतंकवाद के दृष्टिगत बंद करने के संबंध में पत्र।
20. प्रधनमंत्री को देश में कृषि भूमि के कम होने की स्थिति की पृष्ठभूमि में वक्फ बोर्डों के कब्जे की भूमि के राष्ट्रीयकरण की हेतु पत्र।
21. पाकिस्तान में नष्ट हो रहे भारतीय साहित्य को भारत लाने हेतु विदेश मंत्री/संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री एवं प्रतिपक्ष के नेता श्री लालकृष्ण आडवाणी को पत्र।
22. ‘लविंग जेहाद’ के नाम पर हिन्दू युवतियों के शोषण पर पर रोक हेतु उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री को तथ्यों से युक्त पत्र।
23. विभिन्न राज्यों के पुलिस आयुक्तों को मुस्लिम बंगाली बाबाओं की गिरफ्तारी हेतु अनेक पत्र।
24. आई.एम.ए. (देहरादून) के निकट मदरसे के लिए बीस एकड़ भूमि की स्वीकृति को रद्द करने हेतु उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री को पत्र।
25. ऋषिकेश से आगे गंगा के पावन तटों पर सैलानियों के लिए बनाए गए सैरगाहों में हो रहे दुष्कृत्यों के प्रति केन्द्रीय और राज्य सरकारों को अनेक पत्र।
26. बंगाली-तांत्रिक नाम से दिल्ली और लखनऊ में विज्ञापन देने वाले अनेक छद्म तांत्रिकों के दुष्कृत्यों का पर्दाफाश करने के लिए पुलिस और आयकर विभाग को अनेक पत्र भेजे गए हैं।
27. एड्स बीमारी के नाम पर देशी रक्त बैंकों के रक्त को दूषित सिद्ध करने और विदेशी औषधियों के प्रयोग को बढ़ाने के साथ-साथ हिन्दुओं को उक्त बीमारी के लगने के भय का वातावरण बनाने में लगी हुई संस्थाओं और कंपनियों के विरुद्ध पत्राचार।
28. दिल्ली नगर-निगम आयुक्त को नई दिल्ली स्थित वसंतकुंज में सड़क का नाम ‘माता अमृतानंदमयी मार्ग’ रखने हेतु अनेक पत्र।
29. टी.वी.चैनलों पर बढ़ती अश्लीलता के विरोध में सूचना-प्रसारण मंत्री (भारत सरकार) को अनेक पत्र।
30. सूचना-प्रसारण मंत्री (भारत सरकार) को – मीडिया द्वारा शब्दों से किए जा रहे संस्कृति पर प्रहार (’फैशन का महाकुंभ’)- रोकने संबंधी पत्र।
31. प्रेस क्लब आॅफ इंडिया में पाकिस्तानियों के पद-धारण को रोकने के लिए अनेक पत्र।
भारत सरकार के विदेश मंत्रालय की ओर से संस्थान की पुस्तक ‘विश्वव्यापी भारतीय संस्कृति’ की 175 प्रतियां ‘हमारे मूल कर्तव्य’ की 116 प्रतियां तथा ‘स्मृतियों में भारतीय जीवन पद्धति’ की 150 प्रतियां विदेशों में स्थित भारतीय दूतावासों में भेजने के लिए खरीदी गईं।
पुस्तकें जिनका हिन्दी अनुवाद किया/कराया गया
श्री अनवर शेख द्वारा लिखित पुस्तक प्ेसंउ ेमग – टपवसमदबम का हिन्दी अनुवाद ‘इस्लाम कामवासना और हिंसा’ शीर्षक से कराया गया। प्रो. जी.सी.असनानी की ।चचमंस जव भ्पदकन ैंकीने पुस्तक का हिन्दी अनुवाद कराया गया।
चार छात्रों को पीएच.डी के लिए रजिस्टर कराने का यत्न किया गया जिन्हें लगभग 1 वर्ष तक छात्रवृत्ति भी दी गई।
‘‘गौरव घोष’’ संस्थान द्वारा ‘गौरव-घोष’ नाम से एक द्वैमासिक पत्रिका सितम्बर, 1999 से आरंभ की गई। पत्रिका सब उपसंस्थानों, मुख्य पत्राकारों/संपादकों, विदेशी राजदूतों, प्रोपेफसरों, महाविद्यालयों, उच्चतम न्यायालयों के न्यायमूर्तियों, केन्द्रीय मंत्रालयों, 800 मुख्य पुस्तकालयों और संसद सदस्यों, विद्वानों आदि को निःशुल्क भेजी जाती हैं। इसकी 3000 तक प्रतियां छपती हैं।
अरुन्धती वसिष्ठ अनुसंधान पीठ: संस्थान के अंतर्गत महर्षि वसिष्ठ और उनकी धर्मपत्नी भगवती अरुन्धती के नामों से अनुसंधान पीठ की स्थापना सन् 2005 में इलाहाबाद में हुई।
अरुन्धती वसिष्ठ अनुसंधान पीठ प्रयाग के तत्त्वावधान में प्रयाग में 15-16 दिसम्बर 2007 को दो-दिवसीय ‘विश्वव्यापी आपदा के दौर में नवीन प्रतिमानों की खोज’’ विषय पर संगोष्ठी हुई।
अनुसंधान पीठ की ओर से विभिन्न महत्वपूर्ण विषयों पर वर्षभर में दो बार सेमिनार किए जाते हैं। विद्वानों के लेखों को प्रकाशित किया जाता है।

प्रचार
सभी स्थानीय प्रान्त इकाइयों की ओर से प्रान्त भाषा में पत्रिका का प्रकाशन होता है। केन्द्रीय स्तर पर विश्व हिन्दू परिषद कार्यों की जानकारी देने के लिए ‘‘हिन्दू विश्व’’ पाक्षिक पत्रिका, गोसेवा क्षेत्र में काम करने वाले कार्यकर्ताओं के लिए ‘‘गोसम्पदा’’ मासिक पत्रिका, सन्तों को निःशुल्क भेजी जाने वाली ‘‘हिन्दू चेतना’’ पाक्षिक पत्रिका, विश्व हिन्दू परिषद विशेष सम्पर्क विभाग के कार्यकर्ताओं द्वारा मुम्बई से प्रकाशित ‘‘विश्व हिन्दू सम्पर्क’’ मासिक पत्रिका प्रकाशित की जाती हैं। धर्म प्रसार, सेवा व अन्य सभी अपने-अपने कार्यों का विवरण प्रकाशित कर कार्यकर्ता व समाज को निःशुल्क देते हैं। विश्व हिन्दू परिषद वर्षभर की गतिविधियों को पुस्तिका रूप में प्रतिवर्ष प्रकाशित किया जाता है।
अनेक वर्षों तक परिषद कार्यकर्ताओं को पत्रकारिता क्षेत्र की विधाओं का प्रशिक्षण दिया गया। ये प्रशिक्षण शिविर सामान्यतः 10 दिन के होते थे। ऐसे शिविर दिल्ली, गाजियाबाद, गुड़गाँव में सम्पन्न हुए।