पर्व विशेष


छत्रपति शिवाजी महाराज राज्याभिषेक दिवस


शिवाजी महाराज का आत्मविश्वास

शिवाजी महाराज देश, धर्म का विचार करते थे। उस के लिये उन्होंने उद्यम किया। और कितना आत्मविश्वास!आपने पढा होगा कि देश के लिये शहीद होंगे ऐसा विचार लोग करते है। भगवान कहते है ‘तथास्तु’! देश के लिये शहीद हो जाओ! वे शहीद हो जाते है। वह भी बहुत बडी बात है। लेकिन पराक्रमी, विजिगीषु वृत्ति का मन कहता है की देश के लिये मैं लडूँगा और सब शत्रुओं को मार कर विजय संपादन करूंगा। क्या परिस्थिति थी? उत्तर में बादशाह का राज है, दक्षिण में पाँच सुलतान हैं। विजयनगर जैसा बलाढ्य साम्राज्य लुप्त हो गया है। लेकिन शिवाजी महाराज कहते है कि यहां पर मैं हिंदवी स्वराज्य की स्थापना करूंगा और वे कहते है कि ‘यह राज्य हो ये तो श्री की इच्छा है’ हमारा ईश्वरीय कार्य है। इसका सफल होना निश्चित है। इसका विजयी होना निश्चित है। उद्यम हम को करना है। पूर्व के संघर्षों का सारा इतिहास उन्होंने पढा होगा, सुना होगा। यह जो मै कहता हूँ कि शिवाजी महाराज का उद्यम तब तक के चले सारे प्रयासों का सम्मिलित उद्यम है, वह इसलिये कि शिवाजी महाराज का अष्टप्रधान मंडल जो बना वह पद्धति तो प्राचीन समय में भारत की परंपरा में थी, बीच के काल में लुप्त हो गयी थी। केवल विजयनगर साम्राज्य में अष्टप्रधान मंडल था और किसी के पास, सार्वभौम हिंदुराजा के पास अष्टप्रधान मंडल नहीं था। वह प्रथा तो लुप्त हो गयी थी। शिवाजी महाराज कहाँ से लाएँ? अपने प्रवास के दौरान निरीक्षण करते थे। वे सिखाने वाले थे। सब की सब बाते पूछकर सीखना, इतिहास सीखना, तुकाराम महाराज, रामदास स्वामी जैसे संतो से मुलाकते होती थी। समर्थ रामदास ने देशभ्रमण किया था। हम्पी में जाकर रामदास स्वामी तीन दिन रहे थे। वहाँ उन का स्थापन किया हुआ हनुमान भी है। विजिगीषा मृत है ऐसा दृश्य दिखता था। परन्तु समाज की स्मृति का लोप नहीं होता है। समाज का नेतृत्व आत्मविश्वासहीन हो जाता है लेकिन समाज के अंदर अंतर्मन में ज्योति जलती रहती है। समाज में क्या चल रहा है उस से बोध लेकर अनुभवोंका संग्रह कर गलतियाँ सुधारते हुए उद्यम करने का निश्चिय संकल्प करके शिवाजी महाराज ने आगे कदम बढाया। इतना आत्मविश्वास! मै जीतूंगा, मुझे जीतना है। यह कार्य हो यह श्री की इच्छा है। और इसलिये समाज का आत्मविश्वास जागृत करनेवाले काम उन्होने सब से पहले किये। एकदम लडाई नहीं शुरू की। अपनी (दी हुई) जागीर संभालने के लिये पुणे आ गये। पहले शहाजी राजा देखते थे वहाँ बैठ कर। उन्होंने निजाम को हाथ में लेकर स्वतंत्रता की लडाई लडी थी। गठबंधन चलता है कि नहीं देखा था। नहीं चला, टूट गया और शहाजी राजा के नेतृत्व में लडने वाले हिंदू को सबक सिखाने के लिये पुणे को जलाया गया। पुणे की जमीन को गधों के हल से जोता गया। उस में एक लोहे की सब्बल ठोक कर उस पर एक फटी चप्पल टांग दी गई। पुणे के लोग चुपचाप दिन में अपने घर का दरवाजा थोड़ा सा खोल कर उस को देख लेते थे तो दिल बैठ जाता था कि यह गति होनेवाली है, देश के लिये, धर्म के लिये लडनेवालों की। शिवाजी महाराज आये। पहला काम उन्होंने यह किया कि हमारी पंरपरा, संस्कृति के गौरव का प्रतीक गणेशजी का मंदिर खोज निकाला। उसकी प्रतिष्ठापना की, और पुणे की भूमि को विविधपूर्वक सुवर्ण के हल से जोता। उसी हिंदूसमाज ने यह भी देखा कि जहाँ पर लोहे के सब्बल पर फटी चप्पल टांग थी, वहां पर एक पराक्रमी युवा आता है और सोने के हल से जमीन को जोतता है। दिन बदल सकते है। किना आत्मविश्वास जागा होगा? अपनी जागीर में सुशासन दे कर लोगों को पहले उन्होंने समर्थ बनाया। कुछ और करने के लिये सारे समाज को जोडा।

रणनीतिज्ञ शिवाजी महाराज

शिवाजी महाराज जानते थे की एक नेता, एक सत्ता ये समाज के भाग्य को सदा के लिये नहीं बदल सकते। तात्कालिक विजय संपादन कर फिर इतिहास की पुनरावृत्ति होगी। इस लिये पहले समाज में विजिगीषा जगानी है। समाज में आत्मविश्वास जगाना है, समाज का संगठन करना है। सब प्रकार के लोगों को उन्होंने जोडा। उनके अनुयायियों में कितने प्रकार के लोग थे। मराठी में जिसको कहते है ‘अठरा पगड जाति’! अठारह प्रकार की पगडी बांधने वाले, समाज के अठारह वर्गों के लोग बडे बडे सरदार, पुरोहितों से लेकर तो बिल्कुल छोटा, उस समय जिनको हलका, हीन माना जाता था ऐसे जाति के लोग भी शिवाजी महाराज के ‘जीवश्च कंठश्च’ मित्र थे। उन के लिये प्राण देने के लिये तत्पर, और केवल उनके लिये नहीं, स्वराज्य और स्वधर्म के लिये जीने मरने के लिये तत्पर। शिवाजी महाराज के पास उस समय शस्त्र नहीं थे। बहुत ज्यादा साधन नहीं थे। हाथी घोडे नहीं थे। जब उन्होंने एक एक वीर को खडा किया उनकी आगे चलकर स्वतंत्र कहानियाँ बनी। समाज में एक लोककथा चलती है कि कुतुबशाह को मिलने के लिये शिवाजी महाराज स्वयं गये। उसने व्यंग्य से पूछा ‘आपके पास हाथी कितने है?’ उसको मालूम था, शिवाजी महाराज के पास हाथी नहीं है। शिवाजी महाराज ने कहा-

‘हाथी बहुत है हमारे पास’,

‘साथ में नहीं लाये?’

‘लाये है!’

‘कहाँ है?’

‘पीछे खडे है,’

पीछे उनके मावले सैनिक खडे थे। तो व्यंग्य से कुतुबशहा पूछता है,

‘ये हमारे हाथीयों से लडेंगे क्या?’

तो बोले, ‘उतारिये मैदान में कल।’

दूसरे दिन कुतुबशाह का सबसे खूँखार हाथी लाया गया। सुलतान ने गोलकुंडा में मैदान में उसे उतारा और शिवाजी महाराज ने अपने एक साथी येसाजी कंक से कहा हाथी से लडो। अपना कंबल जमीन पर पटक कर नंगी तलवार हाथ में लेकर वह मैदान में कूद पडा। हाथी की सूंड काटकर उस को मार दिया। हृदय में निर्भयता लेकर देश-धर्म की इज्जत के लिये मदमस्त हाथीयों से लड़नेवाले वीरों की फौज महाराज ने खड़ी की और समूचे समाज में जोश की भावना उत्पन्न की। इसी लिये तो शिवाजी महाराज के जाने के पश्चात जब राजाराम महाराज को दक्षिण में जाकर रहना पडा, एक तरह से बंद से हो गये वे एक किले में, उस समय भी न राजा है, न खजाना है, न सेना है, न सेनापति है, ऐसी अवस्था में भी हाथ में कुदाल, फावडा और हँसिया लेकर महाराष्ट्र की प्रजा बीस साल तक लडी और स्वराज्य को मिटाने के लिये आनेवाले औरंगजेव को दल बल के साथ यहीं पर अपने आप को दफन करा लेना पडा। समाज की इस ताकत को शिवाजी महाराज ने उभार तथा कार्यप्रणित किया। स्वयं के जीवन तक की परवाह नहीं की। पचास साल की उनकी आयु, अखंड परिश्रम की आयु रही है। आप लढो और मैं केवल आदेश दूँगा यह उनका स्वभाव नहीं था, वे स्वयं कूद पडते, कर दिखाते और बादमें कुछ कहते थे। शाहिस्त खाँ को शास्ति (दंड, सजा) सिखाने के लिये स्वयं सामना किया। कारतलबखाँ को शरण लाने के समय वहाँ शिवाजी महाराज अपने सारे शस्त्र धारण कर वीरोचित गणवेष में मौजूद थे। स्वयं आगे होकर अपने साहस का परिचय देते थे। अनुयायियों में कितनी हिंमत जगती थी। विवेक भी रखते थे। ‘धृती उत्साह सम्न्वितः’ ऐसी उनकी रणनीति थी। इस धृति, उत्साह व साहस के बलपर ही वे अफजलखाँ से लडकर सफल हुए।

शिवाजी महाराज का सुशासन

बहुत सी बाते उन्होंने ऐसी की जो यदि आज की जाती है तो लोग कहेंगे कि ये पुरोगामी कदम है। उस जमाने में जब समाजवाद, साम्यवाद का दूर दूर तक नाम नहीं था शिवाजी महाराज ने जमींदारो को, वतनदारी को रद्द कर दिया। समाज के संपत्ति पर हम लोग ट्रस्टी रह सकते है। हम लोग अधिकारी नहीं बन सकते। यह समाज की संपत्ति है, समाज की व्यवस्था देखनेवाले राज्य के अधीन रहे किसी व्यक्ति को यह नहीं दी जायेगी। संभालने के लिये दी जायेगी। ओहदा रहेगा, सत्ता नहीं रहेगी। वतनदारी को रद्द कर दिया। उस समय के सरदार जागीरदारोंकी निजी सेनाएँ होती थी। शिवाजी महाराज ने यह पद्धति बदल दी व सेना को स्वराज्य के केन्द्रीय प्रशासन से वेतन देना प्रारम्भ कर सैनिको की व्यक्तिपर निष्ठाओंको राष्ट्रपर बनाया। उनके राज्य में सभी सैनिकों के अश्वों का स्वामित्व स्वराज्य के केन्द्रीय प्रशासन के पास था। गरीब किसानों को उनके जमीन का स्तर व फसल के उत्पादन के आधारपर राहत देनेवाली द्विस्तरीय वित्तीय करप्रणाली उन्होंने लागू की। तालाब, जलकूप खुदवाये, जंगल लगवाये, धर्मशालाएँ, मंदिर व रास्तोंका निर्माण करवाया।