पर्व विशेष


जनक नन्दिनी – जानकी


“सिया राम मय सब जग जानी,
कर हुँ प्रणाम जोड जुग पानी” ।
संपूर्ण विश्व मे सिता व रामजी का दर्शन करनेवाले भारतीय संस्कृति को विश्व नमन करता है । यहाॅ हम भारत की आराध्या माता सीता से जुडे कुछ तथ्यों को सम सामायिक परि दृश्य मे जानने का प्रयास करेंगे ।
जनक नंदिनी सीता से जुड़ी विभिन्न कथाऍं, प्रसंग, काव्य, ग्रंथ, उपनिषद्, पुराण आदि साहित्य स्त्रोतों का अवलोकन करने से स्पष्ट सिद्ध होता हैं कि श्री राम व माता सीता अभिन्न तत्व हैं ।
गिरा अरथ जल बिची सम, कहियत भिन्न न भिन्न ।
सांसारिक दृष्टि से अवलोकन करे तो भूमिपुत्रि बाल्य- काल में ही शिवधनुष उठाकर अपनी शक्ति का परिचय देने वाली धैर्यशील, स्थिरचित्त, वन में तपस्विनी, ममतामयी नारी हैं ।
सीतोपनिषद् में माता सीता को शक्ति स्वरूपा बताया गया हैं, इस शक्तीस्वरुप में प्रथम वे शब्दब्रह्ममयी शक्ति हैं, द्वितीय में राजा जनक के हल के अग्रभाग से उत्पन्न स्वरुप में हैं, उनका तीसरा स्वरुप अव्यक्त स्वरुपा शक्ति का हैं । इन सीता माता की कृपा से ही श्रीराम सौभाग्य शाली बनते हैं ।
ऋग्वेद में ‘सीता’ शब्द को भूमि पर हल से अंकित रेखा बताया गया है इसके अनुसार उन्हे कृषि की अधिष्ठात्री देवी का स्वरुप या भूमिजा स्वीकार किया गया । वैदिक ऋषि व मिथिला नरेश जनक की पुत्री के स्वरुप में जानकी, वैदेही जाना गया । स्कंदपुराण में सीता को ब्रह्मविद्या कहा गया है ।
शौनकीय तंत्र के अनुसार सीताजी इच्छाशक्ति, क्रियाशक्ति, साक्षात शक्ति इन तीनो स्वरुपो में प्रकट होने वाली आदिशक्ति भगवती हैं । श्रीराम की सत्ता है, शक्ति है माता सीता । श्रीराम त्रिगुणातीत हैं, तदापि जगत में मर्यादा की स्थापना हेतु कर्म बद्ध हैं । सीतामाता भूमि पुत्री हैं अत: उनमें भूमि का गुण सहनशीलता है । कष्ट सहन कर व प्रतिफल मे जन साधारण को कुछ न कुछ प्रदान करती है । सीता जी भूमि पुत्री है अत: वे क्षमा के गुण से भूषित है विभिन्न प्रसंगों में उनके इस गुण को समझा जा सकता है । लंका विजय के पश्चात हनुमान माता सीता से निवेदन करते है, माते ! आपको जब बंधन मे रखा गया था तो राक्षस नारियों ने आपको बहुविध त्रास दिये, उन्हे कठोर दंड देने की आज्ञा आप मुझें दे । सिता जी की उदारता देखिये, वे कहती है, पुत्र रावण ने उन्हे यह आदेश दिया था, उनका कर्तव्य था,
‘इमां तु शीलसंपन्नां द्रष्टुमिच्छति राघव:’
हनुमान सीता माता के शील संपन्न स्वरुप को देख कर मन में विचार करते है यही वह शील संपन्न स्वरुप है जिसे राघव देखना चाहते है । जनकनन्दिनी के चारित्रिक गुणों के मूलतत्त्व हैं – पवित्रता, शुद्धता व दिव्यता । जनकनन्दिनी के इन्ही गुणों को प्रकट करता हुआ उनका संवाद रावण से है –
‘धिक् ते चारित्रमीदृशम्’ ऐसे तेरे चरित्र को धिक्कार है ।
यह अग्निशिखा सीता की प्रज्वलित वाणी का उद्घोष है । तप और पतिव्रत का तेज है जनकनन्दिनी के कठोर वचन उनके सतीत्व की गरिमा, नारीजाति के सम्मान को प्रकट करतें हैं । सीता, रावण जैसे त्रैलोक्यविजेता और शक्तिशाली अपहर्ता को धिक्कारते हुए भी निडर है यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि वह रावण सिता जी को दृष्टी भर के देखने मे भी असमर्थ अनुभव करता है ।
ऐसी साध्वी माता भगवती स्वरुपा सीता प्रत्येक काल एवं स्थान पर आदर्श हैं, प्रेरक हैं । वे स्वयम् श्रीराम को अपना स्वरुप बताते हुए स्वाभिमान पूर्ण वचन कहती है – ‘
‘अपदेशो मे जनकान्नोत्पत्तिर्वसुधातलात् । मम वृत्तं चं वृत्तज्ञ बहु ते न पुरस्कृतम् ।।’
अर्थात ‘सदाचार के मर्म को जानने वाले देवता ! राजा जनक की यज्ञभूमि से प्रकट होने के कारण ही मुझे जानकी कहा जाता है । वास्तव मे मेरी उत्पत्ति जनक से नही हुई है । मै भूतल से प्रकट हुई हूँ, अर्थात साधारण मानव से विलक्षण हूँ, दिव्य हूँ, उसी प्रकार मेरा आचरण भी अलौकिक एवं दिव्य हैं, मुझ में चरित्र बल विद्यमान है, किंतु आपने मेरी इन विशिष्टताओं को महत्व नही दिया।’
मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम लोक-मान्यताओं और नृप के अनुरुप आचरण की मर्यादा मे बॅंध कर सिता की अग्निपरिक्षा लेते हैं ।
अपनी परम्पराओं के अनुरूप आचरण करने की शिक्षा हमे सीता जी के चरित्र से अनेक प्रसंगों से मिलती है । अत्रि ऋषी की पत्नी अनसूया जी एवं सिता जी का एक प्रसंग उल्लेख किया जा सकता है । अनसूया की कहती हैं, हे पुत्री तुमने चौदाह वर्ष का वनवास स्वीकार कर पतिव्रत धर्म की पालना कि है, मेरी इच्छा है मै तुम्हे कुछ दूॅ तुम्हारी जो इच्छा हो माॅग लो । सिताजी उत्तर देती है, माते ! मै क्षत्रिय कन्या हूॅं, मैं वर नही माँग सकती, क्षत्रिय का हाथ सदैव दान देता हैं, ग्रहण करने के लिए नीचे नही आता । स्वयं की परंपरा की रक्षा का संदेश, वर्तमान जीवन के लिये पाथेय है ।
सीता जी के चरित्र के गुणों का आख्यान करना कठीण है, आत्मबल, वाणी का ओज प्रकट करने वाले एक प्रसंग का उल्लेख करने का लोभ संवरण नही किया जा रहा है । रावण सीता जी को वश मे करने के अनेक उपाय कर हताश हो जाता है । उसका एक मंत्री सजीव आकृति बनाने मे सिद्धहस्त होता है वह सुझाव देता है कि श्रीराम की मुखाकृती बनाकर सीता जी को इस संदेश के साथ भेजें कि श्री राम युद्ध मे मृत्यु को प्राप्त हुए उनका कटा सिर इस का प्रमाण है, रावण ऐसा ही करता है, सीता जी सावधानी पूर्वक मुख का निरीक्षण करती है नेत्र, केश सब सजीव रामरुप तुल्य है । निराश रावण से कहती है तात ये मेरे स्वामी का सिर है, मेरे पिता जनक तो बहुत दूर है, आप मेरे पिता तुल्य है, मेरे स्वामी के साथ मेरे जाने का प्रबंध करे । निष्ठुर रावण लज्जित होकर पराजित सा महल चला जाता है । यह है भारतीय नारी का आत्मबल, दुष्ट को भी हरा देने वाला ।
सीता त्रिकारात्मक है ऐसा सीतोपनिषद् में उल्लेख है सकार- सत्य, अमृत और प्राप्ति नाम की सिद्धी, बुद्धी की अधिष्ठात्री देवी हैं । तकार – महालक्ष्मी रुप हैं इससे ही लीला का विस्तार होता है । ईकार – माया रुप हैं, ब्रह्म के साथ संबंध बनता है ।
विनय पत्रिका मे तुलसीदासजी भी माता सीता से प्रार्थना करते हैं कि कभी श्रीराम से मेरी बात कहिये, ‘कबहुक अम्ब अवसर पर पाई’ श्रीराम की कृपा प्राप्त करने के लिए भी माता सीता ही मार्ग हैं ।
“सिय सोभा नहीं जाई बरवानी ।
जगदम्बिका रूप गुण रवानी ।।
उपमा सकल मोहि लघु लागी ।
प्राकृत नारि अंग अनुरागी ।।”
सीता जगत् जननी हैं, उनकी उपमा लौकिक स्त्रीयों को दी जाने वाली उपमाओं से नही दी जा सकती । श्रीराम की शक्ति स्वरूपा माता सीता स्त्रियों के लिए आदर्श प्रस्तुत करती हैं । सीता राम की अनुगामिनी हैं , वन गमन के प्रसंग मे कहती है –
जिय बिनु देह नदी बिनु वारी ।
तैसिअ नाथ पुरुष बिनु नारी ॥
तुलसीदास कृत मानस में उपर्युक्त भाव है तो वाल्मिकी कृत रामायण में सिता कहती है, हे राम! मैं आपका भार नही बनूँगी, कुश – कंटक को हटाती हुई आगे-आगे चलूंगी ।
अग्रवस्ते गमिष्यामि, मृद्नन्ती कुशकन्टकान्
जनकनन्दिनी सीता जी का पावन चरित्र अनुकरणीय है क्योंकि यह नीति और शिक्षा का भंडार है । तेजस्वी, पराक्रमी राजा की पुत्री, प्रतापी लोकप्रिय राजा की पुत्रवधू को जनसाधारण मात अम्बे कहकर सम्बोधित करता है । जब तक इस धरा पर सूर्य व चन्द्र का अस्तित्व है, सीता जी के अद्वितीय अलौकिक चरित्र के कारण विश्व पटल पर भारत भू का मस्तक उन्नत रहेगा । साभार – डॉ रजनी शर्मा, जयपूर प्रांत बौद्धिक प्रमुख, राष्ट्रसेविका समिती