पर्व विशेष


परमपूज्य श्रीगुरुजी – माधव सदाशिव गोलवलकर


बात 1951 की है, पूज्य श्रीगुरु जी का आगमन प्रयाग हुआ,उनका कार्यक्रम एक कालेज में था। हमारे प्रान्त संघचालक माननीय बैरिस्टर साहब भी कार्यक्रम हेतु आए थे। मैं उस समय काशी में संघ के प्रचारक के नाते कार्य कर रहा था। श्री गुरुजी को कालेज तक ले जाने और वापस लाने का कार्य मुझे दिया गया था। जब लौटकर आए तो बैरिस्टर साहब ने कहा, ‘अशोक जी ! आप आज बहुत धीरे-धीरे कार चला कर ले गए।‘ श्रीगुरु जी ने कहा, पहुँचाया तो बिल्कुल ठीक समय पर।फिर बोले कम से कम अशोक ने कोई एक्सीडेन्ट तो नहीं किया। बैरिस्टर साहब बोले मैं भी जब कार से लम्बे रास्ते पर जाता हूँ तो दीखना बन्द होने लगता है। श्रीगुरु जी ने कहा वह ‘‘तन्द्रा‘‘ है, मैं जो कह रहा हूँ वह ‘‘तन्द्रा‘‘ नहीं है।
मैं सोचने लगा आँख खुली हो और दीखना बन्द हो जावे, यह तो समाधि की अवस्था है। प्रज्ञा स्थिर होने पर ही दीखना बन्द हो सकता है। मेरे लिए यह एक नई बात थी। श्रीगुरुजी एक आध्यात्मिक पुरुष हैं, यह तो प्रत्येक स्वयंसेवक जानता था किन्तु उनकी आध्यात्मिक उपलब्धि छात्रावस्था से ही स्पष्ट दिखाई देती थी। निश्चित ही पूर्व संस्कारों के साथ वे उसे लेकर आए थे। उसके लिए उन्हें कोई विशेष साधना शायद करने की आवश्यकता नहीं पड़ी। यह अपने जीवन का एक दृष्टान्त उन्होंने मुझे अपनी ‘जीवन लक्ष्य की दिशा-निर्देश‘ हेतु दिया था और यह पत्थर की लकीर की तरह मेरे भीतर तक अंकित हो गई। भारत माँ श्रीगुरुजी के लिए चैतन्यमयी माँ के रूप में नित्य हृदय में स्थित थी। उस पर हो रही और होनेवाली आपदा उनसे छिपी नहीं रह सकती थी। उसकी प्रत्यक्ष अनुभूति उन्हें होती थी।

गुलवणि महाराज से श्रीगुरु जी की अन्तरंगता
एक बार पुणे के संघ-शिक्षा-वर्ग में श्रीगुरुजी ने अचानक कहा कि श्री गुलवणि जी महाराज के यहाँ आज अपना निमन्त्रण है। श्री आबाजी थत्ते इस सोच में पड़े थे कि इस निमन्त्रण की उनको तो सूचना नहीं थी, कब आया ? किन्तु कुछ अधिकारियों के साथ वे श्री गुलवणि जी महाराज के यहाँ पहुँचे। प्रसाद परोसा जा रहा था और उसी समय गुलवणि महाराज ने कहा आप सब लोगों को यह रहस्य नहीं मालूम है कि यह निमन्त्रण श्रीगुरुजी को कब दिया गया ? श्री गुलवणि जी एक सिद्ध पुरुष थे। वे जब बताने लगे, तब श्रीगुरुजी ने उनको संकेत किया कि वे न बतावें किन्तु उन्होंने सबके सामने एक बड़ा रहस्य खोल दिया। उन्होंने कहा गुरुजी कहीं भी हों, हमारी उनकी मूकवार्ता हो जाती है और उसी में ही यह निमन्त्रण श्रीगुरुजी ने स्वीकार किया था। सबके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा। इन्ही श्री गुलवणि जी महाराज के शिष्य श्री तरानेकर जी थे जिनसे श्री दत्तोपंत जी ठेंगड़ी (अब स्वर्गीय) ने दीक्षा ली थी। यह विषय श्री भैयाजी कस्तूरे (अब स्वर्गीय) ने मुझे बताया। श्री कस्तूरे जी 24 वर्ष नर्मदा के क्षेत्र में घूमते रहे और 24 लाख गायत्री का जप किया। उनके छोटे भाई विष्णु जो बाद में प्रकाशानन्द हुए उन्होंने चित्रकूट के श्री अखण्डानन्द जी से साधना ग्रहण की। उनकी लौकिक शिक्षा भी उन्होंने पूर्ण कराई और आध्यात्मिक साधना भी उनको दी।

विहिप के प्रथम अधिवेशन की सफलता के आधार बने गुरुजी
विश्व हिन्दू परिषद के प्रथम अधिवेशन में श्रीगुरुजी पूरे समय उपस्थित रहे। उसमें सामाजिक अस्पृश्यता जैसी रूढि़यों को कालबाह्य कहकर उससे समाज को मुक्त करने की बात पर पूज्य श्री निरंजन देव जी तीर्थ क्रुद्ध हो गए और धर्मशास्त्र और मान्यताओं को कोई परिवर्तन नहीं कर सकता, इस पर गर्मागरम बहस छिड़ गई, लगा यह अधिवेशन असफल हो जावेगा। श्रीगुरुजी ने रात्रि में पूज्य निरंजनदेव जी से व्यक्तिगत चर्चा की और वे प्रसन्न होकर आए और गोरक्षा के लिए 7 नवम्बर, 1966 को एक बड़ा प्रदर्शन करने के लिए उन्होंने स्वयं को और पूरे श्रोताओं को शामिल होने का संकल्प कराया। यह सब पूज्य श्रीगुरुजी की कृपा से ही हुआ।
कोई ऊंचा-नीचा नहीं
1950 पुणे के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शिक्षा वर्ग का प्रसंग है। 1300 के आस-पास स्वयंसेवक थे। भोजन के समय जलेबी भी बनायी गई थी। उसके वितरण की अधिकारी वर्ग की देखरेख में योजना बनी। श्री मोरोपन्त पिंगले, श्री सीताराम पंत, अभ्यंकर आदि अन्य अधिकारी निरीक्षण कर रहे थे। संघ के द्वितीय संरसंघचालक (श्री गुरुजी) श्री माधव राव सदाशिव गोलवलकर उनके पीछे-पीछे थे। कई स्वयंसेवकों का नाम लेकर आग्रहपूर्णक उन्हें खिला रहे थे।
जब श्री गुरु जी सहित अधिकारी भोजन के लिये बैठे तो दूसरी पंक्ति में अधिकारी वर्ग भोजन के लिये बैठा। आठ-नौ स्वयंसेवक वितरण करने लगे तो एक स्वयंसेवक वितरण न करके, वैसे ही बैठा रहा। गुरुजी का ध्यान उसकी तरफ गया। भोजन शुरु होने के पूर्व ही वे उसके पास गए और कहा-तू कैसे बैठा है? वितरण करो।उस स्वयंसेवक को बहुत संकोच हो रहा था। जब उसने गुरुजी को बताया तो गुरूजी को बहुत खराब लगा। गुरूजी ने उसका हाथ पकड़ के जलेबी की थाली हाथ में दी। सर्वप्रथम अपनी थाली में परोसने को गुरु जी ने कहा, फिर सब स्वयंसेवकों को देने के लिये कहा। यह प्रसंग है छोटा परन्तु जीवन भर याद रहेगा, एक अत्यंत कठिन समस्या का अत्यंत सरल समाधान अपने आचरण से देने वाला।
आसन्न संकट को भाँप लेते थे श्रीगुरु जी
7 नवम्बर, 1966 का दिन बहुत बड़ी संख्या में सन्त व जनता भाग लेने के लिए दिल्ली आई। यह आश्चर्य हुआ कि सभी प्रमुख आ गए हैं परन्तु श्री गुरुजी क्यों अनुपस्थित हैं ? थोड़ी ही देर में इसका रहस्य खुल गया, गोहत्या के समर्थकों ने एक बड़ा षड्यंत्र रचा। संसद भवन से लगे जो भी वाहन खड़े थे उनको आग लगाकर इस आन्दोलन पर पुलिस बल द्वारा अश्रु गैस के गोले तथा रायफल की गोली चलाकर आए पूज्य महात्माओं को मारने का षडयंत्र बनाया गया था और उनके पहले शिकार श्रीगुरुजी को ही करने की योजना थी। उनके इस कार्यक्रम में भाग न लेने से उनकी यह योजना असफल हो गई। आने वाले संकट को श्रीगुरुजी पहले ही देख लेते थे।
जब माँ भगवती से प्रत्यक्ष साक्षात्कार हुआ
पूज्य निरंजनदेव जी तीर्थ के पूर्व गोवर्धन पीठ के शंकराचार्य पूज्य श्री भारती कृष्ण तीर्थ जी एक बार नागपुर प्रवचनों के लिए आए थे, श्रीगुरुजी उन्हें सुनने के लिए नित्य जाते थे। उन्हें लगा श्रीगुरुजी एक अच्छे श्रोता हैं अतः उनसे भेंट करने की इच्छा हुई। श्रीगुरुजी ने उन्हें कार्यालय आने को कहा। श्रीगुरुजी से अध्यात्म विषयक चर्चा होते होते उन्हें लगा कि श्रीगुरुजी की साधना उनसे बहुत आगे है। वे विस्मित होकर यह पूछ ही बैठे गुरुजी क्या आपने भगवान के दर्शन किए हैं ? श्रीगुरुजी कुछ बोले नहीं। उनके आग्रह पर श्री गुरुजी ने कहा आप वचन दें कि इसे किसी से आप कभी नहीं कहेंगे, तो मैं कुछ कह सकता हूँ।
वचन मिलने पर श्रीगुरुजी ने कहा कि संघ पर प्रतिबन्ध के समय जब मैं बैतूल कारागार में बन्द था, वहाँ मैंने करुण स्वर में भगवान से प्रार्थना की थी कि परमपूज्य श्री डाक्टर साहब ने संघ का भार मुझे सौंपा है परन्तु आज इसके असंख्य स्वयंसेवक कार्यकर्ता देश की विभिन्न जेलों में बन्द हैं, संघ शाखाएं बन्द हैं। क्या संघ की समाप्ति मेरे ही कार्यकाल में होगी ? तो वहाँ मुझे माँ भगवती के साक्षात् दर्शन हुए। उनका शुभाशीष प्राप्त हुआ। बैतूल के जेलर श्रीगुरुजी को यह बताने आए कि समाचार पत्रों को पढ़कर ऐसा लग रहा है कि केन्द्र सरकार संघ का प्रतिबन्ध न हटाकर और कठोर कार्रवाई करने वाली है। श्रीगुरुजी के मुख से निकला, मैं कल ही छूटने वाला हूँ, जेलर को आश्चर्य हुआ। रिलीज वारन्ट दूसरे दिन आ गए। पूज्य श्रीगुरुजी के शरीर छोड़ने के उपरान्त ही यह रहस्य खुल सका।
हिन्दू विश्व – अभिलेखासे साभार
परमपूज्य श्रीगुरुजी संस्मरण – अशोक सिंहल, अध्यक्ष-विश्व हिन्दू परिषद