पर्व विशेष


स्वा. विनायक दामोदर सावरकर


(28 मई 1883 – 26 फरवरी 1966)
भारत को अंग्रेजी दासता से मुक्ति दिलाने के लिए सशस्त्र क्रांति की जरूरत है, ऐसा विचार रखने वाले प्रखर देशभक्त, साहित्यिक और समाज सुधारक विनायक दामोदर सावरकर की आज (28 मई) जयंती, सावरकर जी को ‘स्वातन्त्र्य वीर’ इस उपाधि से गौरवान्वित किया गया। इनका जन्म नासिक जिले के भगूर गांव में हुआ। उनके बड़े भाई का नाम गणेश और छोटे भाई का नाम नारायण था। वीर सावरकर जी की पढ़ाई भगूर, नासिक और मुंबई में हुई। एलएलबी करने के पश्चात ‘बॅरिस्टर’ की पढ़ाई के लिए वे लंदन गए। सावरकर जी को बचपन से ही विविध विषयों की पुस्तक पढ़ने का शौक था। बचपन से वे कविता लिखा करते थे। उनकी भाषणकला भी बहुत ही अच्छी थी। समाचार पत्र पढ़ने की आदत से उनको देश-विदेश में क्या चल रहा है, उसका आंकलन वे करते थे।
1897 में पुणे में प्लेग का प्रकोप फैला। अंग्रेज सिपाहियों ने घर-घर जाकर जांच करते हुए जनता पर जो अत्याचार किए, उसका बदला लेने के लिए चाॅफेकर भाइयों ने जांच दल के प्रमुख और कमिश्नर रॅण्ड की गोली मार कर हत्या कर दी। अंग्रेजों ने दोनों भाइयों को पकड़कर उन्हें फांसी की सजा सुनाई। इस घटना से वीर सावरकर व्यथित हुए और क्रोधित भी हुए। उन्होंने देश को स्वतंत्रता दिलाने के लिए सशस्त्र युद्ध करने की शपथ ली। 1899 में उन्होंने ‘राष्ट्रभक्त समूह’ के नाम से एक गुप्त संगठन बनाया। साथ में जनता को संगठित कर आंदोलन करने के लिए जनवरी 1900 में ‘मित्रमेला’ की स्थापना की। शिव जयंती, गणेशोत्सव यात्रा के दौरान लोगों में जन-जागृृति हो इसके लिए उनके कवि मित्र गोविंद की कविताओं का उन्होंने उपयोग किया। इन कविताओं के माध्यम से हजारों युवक उनके जुड़ने लगे। 1904 में उन्होंने ‘मित्र मेला’ का नाम बदलकर ‘अभिनव भारत’ यह नाम रखा। इटली के प्रसिद्ध क्रांतिकारी जोसेफ मॅझिनी से वे काफी प्रभावित थे।
यह कार्य करते-करते वह लेख, कविता लिखते थे, जो अलग-अलग समाचार पत्रों, पत्रिकाओं में छपते थे। पुणे के फग्र्युसन काॅलेज में शिक्षा प्राप्त कर रहे थे तब उन्होंने विदेशी वस्त्रों की होली का कार्यक्रम किया। इस पर उनको दंडित किया गया और हाॅस्टल से बाहर निकाल दिया गया।
एलएलबी करने के पश्चात् लंदन में बॅरिस्टर की पढ़ाई के लिए वे 9 जून 1906 को भारत से रवाना हुए। लंदन में श्याम जी कृष्ण वर्मा नाम के जो क्रांतिकारी थे उनकी सावरकर जी को बहुत मदद मिली। लंदन में पढ़ाई करते हुए उन्होंने जो काम किए उसको 1) साहित्य निर्मिती 2) जनआंदोलन व 3) गुप्त क्रांति कार्य, इन तीन भागों में बांटना होगा। क्रांतिकारी जोसेफ मेझिनी का चरित्र (1907) उन्होंने लिखा। ‘1857 का भारतीय स्वातन्त्र्य समर’ इस ग्रंथ को भी उन्होंने लिखा। लेकिन वह पुलिस की नजरों में आ गया, उसकी छपाई नहीं हो पाई।
1857 की लड़ाई का एक व्यापक आधार था। ब्रिटिश साम्राज्य इससे दल गया था। लंदन में सावरकर जी के साथ सेनापति बापट उनके सहकारी थे। उन्होंने बम तैयार करने की जानकारी रशियन क्रांतिकारियों से प्राप्त कर ली थी। इस जानकारी को भारत में स्थित क्रांतिकारियों तक पहंुचा दी गयी थी। सावरकर जी ने कुछ बंदूकें भी गुप्त रूप से भारत में भेजी थी। ब्रिटिश सत्ता के विरोध में विश्व स्तर पर षडयन्त्र करने की योजना भी सावरकर जी के मन में थी।
सावरकर जी के अनेक कार्यक्रमों पर ब्रिटिश सत्ता की कड़ी नजर थी। उनके बड़े भाई बाबाराव सावरकर भी क्रांतिकारी थे। अंग्रेजों ने बाबाराव सावरकर पर राजद्रोह का मुकदमा लगाया और उनको 14 वर्षों की सजा सुनाई गई। उनकी सारी सम्पत्ति को भी जब्त करने का आदेश दिया गया। लंदन में अभिनव भारत के एक सदस्य मदनलाल धींगरा ने कर्जन वायली की गोली मारकर हत्या कर दी।
इस दरमियान नासिक के कलेक्टर जैक्शन की भी गोली मारकर हत्या कर दी गयी। इस हत्या के लिए जिस बंदूक का प्रयोग किया गया, वह बंदूक सावरकर जी ने भारत में भेजी थी। इस वजह से सावरकर जी के जो मित्र थे उनको पुलिस ने सताना शुरू किया। 13 मई 1910 को उनको गिरफ्तार किया गया। अधिक जांच के लिए उन्हें एक जहाज में बैठाकर भारत की ओर ले जाने का फैसला अंग्रेजों ने किया लेकिन जहाज से कूदकर वे मार्से बंदरगाह पहंुचे, यह फ्रांस में स्थित था। ब्रिटिश पुलिस ने उन्हें वहां जाकर फिर से गिरफ्तार किया। सावरकर जी को भारत में लाने के पश्चात उन पर दो गुनाहों की सजा सुनाई गयी। यह सजा 50 वर्ष की थी। उनकी सारी संपत्ति जब्त की गयी।
(24 दिसंबर 1910 व 30 जनवरी 1911)
सावरकर जी को अंदमान कारागार में 4 जुलाई 1911 को लाया गया। वहां पर उन्हें काफी कठोर काम कराए जाते थे। ऐसी परिस्थिति में भी उन्होंने ‘कमला’ नामक दीर्घकाव्य लिखा। अंदमान में जो अन्य कैदी थे, उनकी समस्याओं पर उन्होंने आवाज उठाई। ग्रंथाभ्यास की अनुमति मिलने पर उन्होंने अलग-अलग तत्वज्ञान की पुस्तकों को पढ़ा और अपने सहयोगी कैदी मित्रों को भी पढ़ने के लिए प्रेरित किया।
सावरकर जी हिंदी भाषा के अभिमानी थे। हिन्दी भाषा के प्रचार के लिए उन्होंने अंदमान में काम किया। वहां के कैदियों को वे पढ़ाते भी थे।
1921 में सावरकर जी को कांेकण के रत्नागिरी कारागार में रखा गया। वहां पर उन्होंने हिन्दुत्व (1925) और माझी जन्मठेप (1927) यह दो ग्रंथ लिखे। 1924 में दो शर्तों पर सावरकर जी को कारागार से मुक्त किया गया। पहली शर्त थी रत्नागिरी जिले में वह स्थानबद्ध रहेंगे और दूसरी शर्त थी पांच वर्षों तक राजनीति से दूर रहेंगे। लगभग साढ़े तेरह वर्ष सावरकर जी रत्नागिरी में थे लेकिन इन वर्षों में उन्होंने जो सामाजिक कार्य किए वह बहुत ही महत्वपूर्ण हैं-अस्पृश्यता निवारण, धर्मान्तरित हिंदुओं को फिर से हिन्दू धर्म में लेना, भाषाशुद्धि और लिपीशुद्धि इन क्षेत्रों में काफी काम किया। अछूतों को मंदिर में प्रवेश नहीं दिया जाता था, यह देखकर उन्होंने वहां के भागो जी सेठ कीर नाम के दानशूर व्यक्ति को पतित पावन मंदिर (1931) बांधने के लिए कहा, जिससे कि सभी हिन्दू इस मंदिर में प्रवेश कर पूजा कर सकें। हम सब एक हैं, यह संदेश लोगों को देकर, सहभोजन का आयोजन, महिलाओं के लिए हल्दी कुंकुम समारंभ, साथ में पढ़ना ऐसे अनेक कार्यक्रमों का आयोजन कर समाज को जोड़ने का बहुत बड़ा कार्य किया, उनको विनम्र अभिवादन !