वैदिक पंचाग – भारतीय कालगणना का स्वरूप

इस संसार में सभी कार्यों में सर्वत्र काल की ही आवश्यकता प्रतीत होती है। सर्वप्रथम मन में यह जिज्ञासा उत्पन्न होती है कि यह काल क्या है, भारतीय परिवेश में काल दो प्रकार का माना गया है। एक काल वह है जो भू-भुर्वादि चतुर्दश लोकों का अन्त करने वाला है तथा दूसरा वह है जो कलनात्मक अर्थात् गणनात्मक है। यह गणनात्मक काल भी दो प्रकार का माना गया है, स्थूल और सूक्ष्म जो व्यवहार योग्य काल और अमूर्ति रूप में परिभाषित किया है।

भास्काराचार्य ने आँख की पलक झपकने को निमेष कहा है। निमेष के 30 वें भाग को तत्पर एवं 100 वें भाग को त्रुटि कहा है। पाश्चात्य काल मापन के साथ तुलना करने पर ज्ञात होता है कि एक त्रुटि 1 सैकेण्ड का 3240000 वां भाग होता है। जबकि एक प्राण में आधुनिक दृष्टि से 4 सैकेण्ड का काल वैज्ञानिक है। अतः ज्ञात होता है कि भारतीय काल गणना की पद्धति बहुत ही सूक्ष्म और वैज्ञानिक है। भारतीय मनु एवं कल्प के रूप में उत्तरोत्तर क्रम में एक वैज्ञानिक विधि से परिभाषित किया गया है। जैसे चन्द्र के राशि चक्र के एक भ्रमण को मास तथा भू सापेक्ष सूर्य के राशि चक्र, भ्रमण को एक वर्ष कहा जाता है। इसी प्रकार सभी काल की इकाइयों को आचार्यों ने परिभाषित किया है।

संसार का अभिप्राय ही संसरतीति यः सः संसारः होता है। अर्थात् जो परिवर्तनशील है वही जीवन है इसलिए ग्रह नक्षत्रों के परिवर्तन से काल होता है। प्रत्येक पिण्ड या वस्तु का काल अपना होता है। जैसे हम पृथ्वी के निवासी है इसीलिए हम प्रत्येक काल को पृथ्वी के सापेक्ष ही देखते हैं। यह नहीं हो सकता हम भू में रहे और काल अन्य ग्रह का प्रयोग करे। भारतीय पृथ्वी के काल का सावनमान के रूप में स्वीकार करते है। यह आज से ही नहीं अपितु आदि काल से ही हमारी काल गणना का आधार है। ज्योतिष की दृष्टि से समग्र काल को सावन दिन या मान के धरातल में ही देखा जाता है। भारतीय परिप्रेक्ष्य में दिन का प्रारम्भ मध्यरात्रि से नहीं अपितु सूर्योदय से हेाता हे। एक सूर्योदय के द्वितीय सूर्योदय के मध्यवर्ती काल को दिन अर्थात् सावन दिन कहा गया हैं। इसी धरातल में सभी नवविध काल मानों का आकलन किया जाता है। इन नौ कालमानों में से भी चार मान व्यवहार के लिए प्रमुख है जो इस प्रकार है।

सौरमान सूर्य की गति पर आधिरित मान ही सौरमान होता है। पृथ्वी के सापेक्ष सूर्य की एक राशि चक्रभ्रमण ही एक वर्ष होता है।

सावनसूर्योदय से सूर्योदय तक का काल सावन मान होता है। इस काल को एक सावन दिन कहा जाता है।

चन्द्र- के कक्षीय भ्रमण से संबधित मान को चान्द्रमान कहा गया है। तिथियों को भोगफल चान्द्र दिन और सूर्यचन्द्र के मध्य 180 अंश का अन्तर पूर्णिमा कही जाती है। इस आधार पर अमान्त चान्द्रमास एक पूर्णिमान्त चान्द्रमास दोनों ही प्रचलित है। दक्षिण भारत में अमान्त चान्द्र मास और उत्तर भारत में पूर्णिमान्त चान्द्रमास प्रचलित है। नक्षत्र के उदय से पुनः द्वितीय उदय तक के कालमान को नक्षत्रदिन कहा गया है, यहीं मान नाक्षत्र मान है। पृथ्वी में सौर, चान्द्र, नाक्षत्र और सावन, इन चार मानों का सर्वाधिक व्यवहार तिथ्यादि व्रत, पर्व-निर्णयों में होता है। बार्हस्पत्य मान से संवत्सर गणना होती है। शुक्ल में चार (ब्राह्म, पित्र्य ,दिव्य, प्राजापत्य) मानों की नित्य आवश्यकता नहीं पड़ती है। सूर्य सिद्धान्तादि ग्रन्थों के आधार पर 1972949112 वर्ष पूर्व कल्पारम्भ अश्विनी में ही थे। वसन्त सम्पात् भी अश्विनी के आरम्भ में ही था। इस स्थिति को महत्वपूर्ण मानते हुए आज भी वर्षारम्भ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को ही माना जाता है। भारतीय संस्कृति में अचल राशिचक्र को ही व्रत पर्व का आधार माना गया है। जबकि ऋत्वादिका परिवर्तन चलचक्र से किया जाता है। इसी आधार पर नक्षत्रों में अश्विनी नक्षत्र को राशियों में मेष राशि को तथा मासों में चैत्रमास को प्रथम माना जाता है। कल्पारम्भ में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा थी इसीलिए इसे ही वर्ष प्रतिपदा माना जाता है।

इसलिए आज तक भारतीय काल गणना के अनुसार वर्ष का प्रथम दिन चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को ही माना जाता है।

प्रो0 देवी प्रसाद त्रिपाठी – प्रधान सम्पादक

 

भूत-भविष्य तथा वर्तमान को सटीक परिभाषित करने वाला शास्त्र है ज्योतिष-शास्त्र। ज्योतिष-शास्त्र एक सम्पूर्ण विज्ञान है, भारतीय विद्याओं में ज्योतिष-शास्त्र ही एक ऐसा शास्त्र है जो प्रत्यक्ष फल देने वाला तथा भविष्य-बताने वाला शास्त्र है- प्रत्यक्षं ज्योतिषं शास्त्रम्।

वेद के छः अंगो में ज्योतिष की गणना की गई है अतः यह वेदांग के रूप में जाना जाता है। हमारे पूज्य ऋषि-मुनियों ने अपनी पवित्र मेधा से ब्रह्माण्ड के रहस्यों को खोजा अतः हमको अपनी कालगणना एवं जीवनमूल्यों पर गर्व है। मैं पाठकों से निवेदन करती हूँ कि वे प्रतिदिन पचांग को अवश्य ही पढ़ें जिससे कालगणना के अनुरूप अपने समस्त शुभकर्मों का सम्पादन कर सकें। पंचांग में प्रकाशित नवग्रह स्तोत्र का प्रतिदिन पाठ करें। ईश्वर पर विश्वास करने वाले जन अपने हर कार्य में निष्ठावान होते हैं, अतः उनके प्रत्येक-शुभकर्मों का परिणाम भी अच्छा होता है।

तुषा शर्मा स्वयंप्रभा – प्रबन्ध-सम्पादिका

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