श्रीराम जय राम जय जय राम, শ্ৰীৰাংজয়ৰাংজয়জয়ৰাং, শ্রীরাম জয় রাম জয় জয় রাম , શ્રીરામ જય રામ જયજય રામ, ಶ್ರೀರಾಮಜಯರಾಮಜಯಜಯರಾಮ, ശ്രിറാം ജയ് റാം ജയ്‌ ജയ് റാം, శ్రీరాంజయరాంజయజయరాం

श्रीरामजन्मभूमि संघर्ष का इतिहास

श्रीरामजन्मभूमि संघर्ष का इतिहास

किसी भी राष्ट्र का अस्तित्व और अस्मिता, स्वत्व और स्वाभिमान उस देश के श्रद्धा व आस्था केन्द्रों, महापुरुषों के स्मृतिस्थलों तथा सांस्कृतिक धरोहरों के संरक्षण व संवर्धन पर निर्भर करता है।

यह इतिहास का एक कड़वा सच है कि बर्बर विदेशी आक्रान्ताओं ने हमारे हजारों श्रद्धा, पुण्य और प्रेरणा केन्द्रों को ध्वस्त कर राष्ट्रीय स्वाभिमान को आहत करने का दुस्साहस किया था। उन्होंने हिन्दुस्थान में हजारों मंदिरों को तोड़ा और फिर अपने वर्चस्व का दंभ दिखाने के लिये उन्हीं मंदिरों के स्थान पर, उन्हीं मंदिरों के मलवे से मस्जिदें खड़ी कर दीं। देश के कोने-कोने में ऐसे अनगिनत स्थान हैं ।

काशी विश्वनाथ मन्दिर वाराणसी, श्री कृष्ण जन्मभूमि मथुरा, श्री राम जन्मभूमि अयोध्या तथा गुजरात का सोमनाथ का मंदिर भारत की राष्ट्रीय-सांस्कृतिक प्रवाहधारा के मुख्य स्त्रोत रहे हैं। अतः उनके ध्वंस का दंश हिन्दू समाज को हमेशा सालता रहा और इसीलिये उनकी पुनर्स्थापना एवं पुनर्प्रतिष्ठा की मांग और प्रयास निरंतर जारी रहे। विशेष रूप से श्री राम जन्मभूमि की मुक्ति के लिये तो अब तक हुए 76 संघर्षों में साढ़े तीन लाख से अधिक लोगों ने अपना बलिदान दिया।

बाबर के सेनापति मीर बाकी ने श्री रामजन्मभूमि पर बने मंदिर को ध्वस्त कर उसके बहुत से प्रतीक चिन्हों, स्तंभों, मूर्तियों आदि को क्षतिग्रस्त करके उनका मलवे के रूप में प्रयोग करते हुए उसी स्थान पर एक मस्जिदनुमा ढ़ांचे का निर्माण कराया। यदि ऐसा है तो इस प्रश्न को मंदिर-मस्जिद विवाद अथवा हिन्दू-मुस्लिम समस्या की चौखट से बाहर निकालकर एक स्वतंत्र राष्ट्र के नाते गुलामी के प्रतीक चिन्हों को मिटाने और राष्ट्र के स्वत्व व स्वाभिमान जगाने तथा अस्मिता और पहचान को प्रकट करने वाले स्मारक की पुनर्स्थापना के रूप में देखा जाना चाहिये। ऐसा होना सभी स्वतंत्र व स्वाभिमानी देशों व समाजों में होता आया है, और यह स्वाभाविक भी है।

भारत के लिये राम केवल पूजा के देव नहीं हैं। वे राष्ट्रीय अस्मिता, राष्ट्रीय गौरव, भारतभक्ति और मर्यादा के मानदंडों के अनुसार जीवन-व्यवहार करने वाले राष्ट्रपुरुष हैं। ऐसी स्थिति में अपमान के कलंक को धोने, गुलामी के चिन्हों को हटाने, सांस्कृतिक गुलामी से मुक्ति पाने, आस्था-श्रद्धा व मानबिन्दुओं की रक्षा करने, भावी पीढ़ियों को प्रेरणा देने, राष्ट्र की चेतना को जगाने और राष्ट्रीय पहचान को प्रकट करने के प्रतीक के रूप में  श्री रामजन्मभूमि पर मंदिर बनाया जाना अत्यंत स्वाभाविक है।

1.राम।

देश की आस्था के प्रतीक।  इतिहास के धीरोदात्त नायक। लोकजीवन में शील और मर्यादा को स्थापित कर बने पुरुषोत्तम । भारत के राष्ट्रपुरुष राम। राम राज्य, अर्थात शील का अनुगामी राज्य। लोककल्याण के लिये कृतसंकल्प। भारत के इतिहास में शासन-विधान का सर्वोच्च मापदंड। इसीलिये देश के संविधान की प्रथम प्रति पर पुष्पक विमान में विराजमान माता जानकी और श्री लक्ष्मण सहित अयोध्यानरेश श्री राम का रेखाचित्र अंकित किया गया।

2.आक्रमण

1526 ई. में फरगाना के क्रूर शासक बाबर ने भारत पर आक्रमण किया। रास्ते भर में सैकड़ों नगरों को लूटता, हजारों गांवों को जलाता और लाखों लोगों की हत्या करता हुआ 1528 ई.  में वह अयोध्या पहुंचा। बाबर के सेनापति मीर बाकी ने उसके आदेश पर अयोध्या पर आक्रमण किया। इतिहासकार कनिंघम के अनुसार 15 दिनों के घमासान युद्ध में 1 लाख 74 हजार हिन्दुओं के वीरगति प्राप्त करने के बाद ही मीर बाकी मंदिर को तोप के गोलों से गिराने में सफल हो सका। उसने रामजन्मभूमि मंदिर के मलवे से उस स्थान पर दरवेश मूसा आशिकान के निर्देश पर मस्जिद जैसा एक ढ़ांचा खड़ा कर दिया।

3.संघर्ष

अयोध्या सहित समूचे भारत के हिन्दुओं की आस्था के केन्द्र रामजन्मभूमि पर स्थित मंदिर का ध्वंस भक्तों के लिये असहनीय वेदना का कारण बन गया । इसने रामजन्मभूमि की मुक्ति के लिये संघर्ष की एक विरामहीन श्रंखला को जन्म दिया। 1528 से 1949 तक की कालावधि में जन्मभूमि को मुक्त कराने के लिये 76 युद्ध हुए जिनमें लाखों रामभक्तों ने बलिदान दिया। इनमें बाबर के काल में 4 बार, हुमायूं के काल में 10 बार, अकबर के काल में 20 बार, औरंगजेब के काल में 30 बार, अवध के नवाब सआदत अली के काल में 5 बार और नवाब नासिरुद्दीन हैदर  के काल में 3 बार संघर्ष हुआ।

4.रामलला का प्राकट्य

22 दिसम्बर 1949 की रात को एक चमत्कार घटित हुआ । रामजन्मभूमि पर सुरक्षा के लिये तैनात सिपाही ने बताया कि अचानक एक दिव्य प्रकाश से उसकी आंखें चौंधिया गयी और जब उसे भान हुआ तो उसने देखा कि बाल रूप में श्री राम उस भवन के भीतर विराजमान हैं और सैकड़ों लोग श्रद्धाभाव से उनके दर्शन कर रहे हैं। ढ़ांचे के बाहर स्थित राम चबूतरे पर अखण्ड कीर्तन प्रारंभ हो गया जो 6 दिसम्बर 1992 तक निरंतर चलता रहा। आक्रोषित कारसेवकों द्वारा विवादित ढ़ांचा ढ़हा दिये जाने के बाद उस स्थान को सरकार द्वारा कब्जे में ले लिया गया। इस कारण कीर्तन का स्थान बदल दिया गया किन्तु वह आज तक अखण्ड रूप से जारी है।

5.रामलला ताले में

रामलला के प्राकट्य की घटना पर मुस्लिम समाज की ओर से विरोध की संभावना को देखते हुए 29 दिसम्बर 1949 को तत्कालीन जिलाधिकारी श्री कृष्ण कुमार नैयर ने उस क्षेत्र को विवादित घोषित कर निषेधाज्ञा लागू कर दी।

ढ़ांचे के मुख्य द्वार को लोहे की सरियों से बंद कर ताला डाल दिया गया। एक छोटे द्वार से पूजा-अर्चना और भोग आदि के लिये केवल चार पुजारियों और एक भंडारी को प्रवेश की अनुमति दी गयी तथा फैजाबाद नगरपालिका अध्यक्ष श्री के के राम वर्मा को रिसीवर नियुक्त कर दिया गया। किसी भी प्रकार का संघर्ष टालने के लिये उस स्थान से 500 गज की परिधि में मुस्लिमों का प्रवेश वर्जित कर दिया गया।

6.हिन्दू सम्मेलन

1983 में उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में हिन्दू जागरण मंच के तत्वावधान में एक विराट हिन्दू सम्मेलन हुआ। इस सम्मेलन में भाग लेने के लिये पधारे उ.प्र. सरकार के पूर्व मंत्री श्री दाऊदयाल खन्ना, जो मुरादाबाद से पांच बार भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के विधायक रहे, ने श्री राम जन्मभूमि अयोध्या, श्री कृष्ण जन्मभूमि मथुरा तथा वाराणसी स्थिति काशी विश्वनाथ मंदिर पर बनी मस्जिदों को हिन्दू स्वाभिमान के लिये चुनौती बताते हुए उनकी मुक्ति का प्रयास किये जाने की मार्मिक अपील की। उपस्थित हिन्दू समाज ही नहीं अपितु आयोजकों को भी इस तथ्य की जानकारी नही थी। श्री खन्ना की अपील का गहरा असर हुआ और सम्मेलन में ही तीनों मन्दिरों की मुक्ति का प्रस्ताव पहली बार पारित हुआ।

7.प्रथम धर्म संसद

उक्त जानकारी के आधार पर विश्व हिन्दू परिषद का एक प्रतिनिधि मण्डल श्री अशोक सिंहल के नेतृत्व में तीनों स्थानों के तथ्यान्वेषण के लिये गया। मुजफ्फरनगर में पारित प्रस्तावों पर देश के शीर्षस्थ संतों-महंतों से परामर्श कर अप्रेल 1984 में दिल्ली के विज्ञान भवन में एक राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया गया जिसे धर्म संसद नाम दिया गया। यहां पुनः उक्त तीनों प्रस्ताव पारित किये गये ।

धर्म संसद में ही श्री राम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति का गठन किया गया । समिति के तत्वावधान में जन्मभूमि पर लगे ताले को खुलवाने की मांग को लेकर बिहार के सीतामढ़ी से श्रीराम-जानकी रथयात्रा प्रारंभ करने तथा देश भर में जनजागरण करने का भी निर्णय किया गया।

8.ताला खुला

श्री राम-जानकी रथों के माध्यम से व्यापक जन-जागरण हुआ। किन्तु वे रथ दिल्ली पहुंच पाते, इससे पूर्व ही प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या हो गयी। इसके साथ ही राजधानी दिल्ली सहित देश के अनेक भागों में सिख बन्धुओं के नृशंस नरसंहार का सिलसिला शुरू हो गया। श्री रामजन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति ने इन परिस्थितियों में अपने आंदोलन को एक वर्ष के लिये रोक दिया। अक्तूबर 1985 में कर्नाटक के उडुपि में द्वितीय धर्म संसद का आयोजन किया गया जहां सरकार को जन्मभूमि पर लगा ताला खोलने के लिये चेतावनी दी गयी। फैजाबाद के जिला न्यायाधीश श्री के एम पाण्डेय ने 01 फरवरी 1986 को ताला खोलने का आदेश दे दिया। ज्ञातव्य है कि इस समय जहां केन्द्र में कांग्रेस की सरकार थी जिसके प्रधानमंत्री राजीव गांधी थे वहीं उत्तर प्रदेश की कांग्रेस सरकार के मुख्यमंत्री वीरबहादुर सिंह थे।

9.मन्दिर का प्रारूप

अब प्रश्न मंदिर के निर्माण का था। इसके लिये आवश्यक था मंदिर का प्रारूप। सोमनाथ मंदिर का प्रारूप बनाने वाले श्री सोमपुरा के पौत्र तथा मंदिर शिल्प के प्रख्यात विशेषज्ञ श्री चन्द्रकान्त सोमपुरा को श्री रामजन्मभूमि पर बनने वाले मंदिर का प्रारूप तैयार करने का काम सौंपा गया। श्री सोमपुरा ने 270 फीट लम्बे, 135 फीट चौड़े और 125 फीट ऊंचे दो तल वाले भव्य मंदिर का प्रारूप तैयार किया।

10.श्री रामशिला पूजन

जनवरी 1989 में प्रयाग में कुम्भ के अवसर आयोजित तृतीय धर्म संसद में एक लाख से अधिक संतों और रामभक्तों के बीच पूज्य देवरहा बाबा की उपस्थिति में 9-10 नवम्बर को श्री रामजन्मभूमि पर मंदिर के शिलान्यास की घोषणा की गयी। मंदिर निर्माण का संदेश गांव-गांव तक पहुंचाने के लिये शारदीय नवरात्रि के प्रथम दिन 30 सितम्बर 1989 को देश भर में रामशिलाओं के पूजन की योजना बनायी गयी। इस दिन लगभग 2 लाख 75 हजार गांवों में रामशिलाओं का पूजन कर अयोध्या भेजा गया। विदेशों में निवास कर रहे भारतीयों ने भी मन्दिर निर्माण के लिये रामशिलायें अयोध्या भेजीं।

11.शिलान्यास

घोषित कार्यक्रम के अनुसार 9 नवम्बर 1989 को प्रातः निर्धारित समय पर पू. महंत अवैद्यनाथ, पू. वामदेव जी तथा महंत रामचन्द्रदास परमहंस के नेतृत्व में भूमि उत्खनन कार्य हुआ। शंखध्वनि और मंत्रोच्चार के बीच शिलान्यास सम्पन्न हुआ। बिहार के दलित समाज के रामभक्त श्री कामेश्वर चौपाल ने राम मंदिर की पहली शिला रखी। शिलान्यास से पूर्व ही उत्तर प्रदेश की कांग्रेस सरकार ने घोषणा कर दी थी कि शिलान्यास स्थल विवादित भूमि नहीं है। किन्तु 11 नवंबर को जब 7 हजार से अधिक सन्त तथा रामभक्त निर्माण हेतु कारसेवा के लिये आगे बढ़े तो उन्हें जिलाधिकारी की आज्ञा से रोक दिया गया। इस समय राज्य के मुख्यमंत्री श्री नारायणदत्त तिवारी थे।

12.अल्पविराम

केन्द्र और राज्य सरकारें जहां अल्पसंख्यक तुष्टीकरण के कीर्तिमान बना रही थीं वहीं हिन्दू समाज की रामजन्मभूमि के प्रति आस्था का भी मखौल बनाया जा रहा था। इससे उत्पन्न रोष की बाढ़ में दोनों ही सरकारें बह गयीं।

नवंबर 1989 में उत्तर प्रदेश विधानसभा और लोकसभा के चुनाव साथ-साथ हुए जिनमें कांग्रेस को मुंह की खानी पड़ी।

नवनिर्वाचित प्रधानमंत्री श्री विश्वनाथ प्रताप सिंह से भेंट कर राम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति के प्रतिनिधियों ने सारे ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक प्रमाण उनके समक्ष रखे। प्रधानमंत्री द्वारा शीघ्र ही निर्णय का आश्वासन दिया गया। फरवरी माह में उन्होंने पुनः चार महीने का समय मांगा जो जून में समाप्त हो गया।

13.प्रथम कारसेवा

सरकार द्वारा फिर भी कोई सकारात्मक उत्तर न मिलने पर 01 अगस्त 1990 को संतों ने वृंदावन में मंदिर निर्माण में आने वाली चुनौतियों से संघर्ष हेतु तन-मन-धन अर्पण करने का संकल्प किया। अगस्त मास में देश भर में श्री राम कारसेवा समितियों का गठन किया गया। 15 अगस्त को घंटे-घड़ियाल और शंख बजा कर चेतावनी दिवस मनाया गया।

सन्तों ने ज्योतिर्पीठ के शंकराचार्य स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती की अध्यक्षता में श्री राम कारसेवा समिति का गठन किया तथा 30 अक्तूबर 1990 को देवोत्थान एकादशी के दिन मंदिर निर्माण के लिये कारसेवा प्रारंभ करने की घोषणा कर दी। समिति का संयोजक विहिप के महामंत्री श्री अशोक सिंहल को बनाया गया।

14.रामज्योति

मंदिर निर्माण का संकल्प घर-घर तक पहुंचाने के लिये रामज्योति को माध्यम बनाया गया। 01 सितंबर 1990 को अयोध्या में पूर्ण विधि-विधान से मंत्रोच्चार के बीच अरणि मंथन द्वारा अग्नि का आह्वान किया गया। इस अग्नि से ही 18 अक्तूबर को दीपावली के दीप प्रज्ज्वलित करने का संदेश संतों ने दिया। 400 बड़ी और सैकड़ों छोटी-छोटी यात्राओं के माध्यम से देश के लाखों गावों तक यह ज्योति पहुंची, साथ ही मंदिर निर्माण का संकल्प भी।

15.परिंदा भी पर नहीं मार सकता

उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने घोषित किया कि वे 30 अक्तूबर को अयोध्या में कारसेवा नहीं होने देंगे। अयोध्या की ओर जाने वाली सभी सड़कें बंद कर दी गयीं और सभी रेलगाड़ियां रद्द कर दी गयीं। श्री रामजन्मभूमि को पुलिस और अर्धसैनिक बलों ने घेर लिया और अयोध्या को छावनी में बदल दिया गया। मुख्यमंत्री ने अहंकारपूर्वक घोषणा की कि उनकी इजाजत के बिना अयोध्या में कारसेवक तो क्या, परिंदा भी पर नहीं मार सकेगा।

कारसेवकों को रोकने के लिये उत्तर प्रदेश की पुलिस और अर्धसैनिक बलों के अतिरिक्त केन्द्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल, भारत-तिब्बत सीमा पुलिस, रेलवे सुरक्षा बल तथा केन्द्रीय रिजर्व पुलिस के 1 लाख 80 हजार सशस्त्र जवान भी केन्द्र से मंगा कर तैनात किये गये थे। उत्तर प्रदेश से मिलने वाली मध्य प्रदेश और राजस्थान की सीमाओं पर सड़कों में 10-10 फीट चौड़ी खाइयां खोद दी गयीं थीं। इटावा में चंबल नदी के पुल पर दस फुट ऊंची और तीन फीट चौड़ी कंक्रीट की दीवार ही खड़ी कर दी गयी थी। अनेक स्थानों पर लोहे की रेलिंग लगा कर उनमें करंट प्रवाहित कर दिया गया था।

इतनी जबरदस्त सुरक्षा व्यवस्था के बाद दुनियां भर से आये पत्रकारों को भी यह विश्वास हो गया था कि कारसेवा असंभव है। 29 अक्तूबर को अज्ञात स्थान से जब श्री अशोक सिंहल का बयान जारी हुआ – “पूर्व घोषणा के अनुसार 30 अक्तूबर को ठीक 12.30 बजे कारसेवा होगी”, तो सहसा कोई भी इस पर विश्वास न कर सका।

16.सत्ता का दर्प चूर हुआ

देवोत्थान एकादशी की भोर। अयोध्या नगरी में कर्फ्यू लागू था, सुरक्षा बलों को देखते ही गोली मारने के आदेश दिये गये थे।

नगर की सड़कों पर सशस्त्र जवानों के अतिरिक्त कोई नजर नहीं आता। सच में, परिन्दा पर न मार सके, ऐसी ही स्थिति थी।

प्रातः नौ बजे। अचानक मणिरामदास छावनी के द्वार खुले और पूज्य वामदेव जी और महंत नृत्यगोपाल दास जी बाहर निकले। ठीक इसी समय वाल्मीकि मंदिर का कपाट खोल कर विहिप के महामंत्री श्री अशोक सिंहल प्रकट हुए। उनके साथ थे उ.प्र. पुलिस के पूर्व पुलिस महानिरीक्षक श्री श्रीशचन्द्र दीक्षित।

उन्हें देख कर सभी चौंक गये। एक सप्ताह से आन्दोलन के इन नेताओं की तलाश में पुलिस ने अयोध्या का चप्पा-चप्पा छान मारा था लेकिन उनकी हवा भी न पा सकी थी। आश्चर्यचकित पत्रकार भी हुए थे। वे सोच रहे थे कि यह लोग अकेले पहुंचने में सफल भी हो गये तो इतनी सुरक्षा व्यवस्था के सामने क्या कर सकेंगे। लेकिन अभी तो रोमांच का क्षण आना बाकी था।

इन नेताओं ने जयश्री राम का उदघोष कर जैसे ही हनुमान गढ़ी की ओर कदम बढ़ाये, घरों के दरवाजे खुल लगे और हर घर से कारसेवक पुरुषों, महिलाओं और बच्चों की टोलियां निकलने लगीं। देखते ही देखते भगवा पटके सर से बांधे हजारों लोगों का काफिला बढ़ चला। सबसे आगे संत, फिर महिलायें और बच्चे, सबसे अंत में पुरुष। निहत्थे, निर्भीक कारसेवक रामनाम का संकीर्तन करते श्री राम जन्मस्थान की ओर आगे बढ़ रहे थे। प्रशासन हतप्रभ था। परिंदा भी पर न मार सके, ऐसी सुरक्षा का दावा करने वालों के होश उड़ गये।

हनुमान गढ़ी के पास पहुंचते ही बौखलाये प्रशासन ने निहत्थे कारसेवकों पर लाठी बरसाना प्रारंभ कर दिया। श्री अशोक सिंहल के सिर पर लाठी का प्रहार हुआ, रक्त की धार बह चली। उनके मुख से निकले जय श्री राम के घोष ने कारसेवकों के पौरुष को जगा दिया। 64 वर्षीय श्रीश चन्द्र दीक्षित ढ़ांचे के बाहर बनी आठ फीट ऊंची दीवार और उस पर लगी कंटीले तारों की बाड़ पार कर कब और कैसे रामलला के सामने जा पहुंचे, वे भी नहीं समझ सके।

उनके साथ ही सैकड़ों कारसेवक भी प्रांगण के अंदर थे। देखते ही देखते वे सभी बन्दरों की भांति ढ़ांचे के गुम्बद पर चढ़ गये। कोलकाता के रामकुमार और शरद कोठारी ने बीच में स्थित मुख्य गुम्बद पर हिन्दू राष्ट्र का प्रतीक भगवा ध्वज फहरा दिया। फैजाबाद के एक नौजवान और एक साधु महाराज ने शेष दोनों गुम्बदों पर भी ध्वज लगा दिया। यह दोनों लोग ही गुम्बद से फिसल कर नीचे गिरे और रामकाज में बलिदान हो गये। उस रात अयोध्या सहित साकेत में अभूतपूर्व दीवाली मनायी गयी।

यह समाचार सुनते ही कि विवादित ढ़ांचे पर कारसेवकों का कब्जा हो गया है, सुरक्षा के अहंकारपूर्ण दावे करने वाले मुख्यमंत्री मुलायम सिंह स्तब्ध रह गये। दूसरी ओर बलिदानी कारसेवकों के शोक तथा उनके शवों के अंतिम संस्कार के लिये 31 अक्तूबर और 01 नवम्बर को कारसेवा बन्द रही। 02 नवम्बर को रामदर्शन कर कारसेवकों के वापस जाने की घोषणा की गयी।

17.खून की होली

अभी दो दिन पहले ही अयोध्या ने दीवाली मनायी थी। कौन जानता था कि महाकाल की इच्छा होली की है, वह भी खून की होली। आज कारसेवक रामलला के दर्शन कर अपने-अपने घरों को लौटने के लिये तैयार थे। प्रातः 11 बजे दिगम्बरी अखाड़े से परमहंस रामचन्द्र दास, मणिराम छावनी से महंत नृत्यगोपाल दास और सरयू के तट से बजरंग दल के संयोजक श्री विनय कटियार तथा श्रंगारहाट से सुश्री उमा भारती के नेतृत्व में कारसेवकों के जत्थे राम जन्म भूमि की ओर बढ़े।

अपमान की आग में जल रहे मुख्यमंत्री ने प्रतिशोध लेने की ठान ली थी। विनय कटियार और उमा भारती के नेतृत्व में चल रहे निहत्थे कारसेवकों पर बर्बर लाठीचार्ज किया गया। दिगम्बरी अखाड़े की ओर से परमहंस रामचन्द्र दास के नेतृत्व में आ रहे काफिले पर पीछे से अश्रुगैस के गोले फेंके गये और कारसेवक कुछ समझ पाते इससे पहले ही बिना किसी चेतावनी के गोलियों की वर्षा होने लगी।

कारसेवकों के शरीर जयश्री राम के उच्चारण के साथ कुछ क्षण तड़पते और फिर शांत हो जाते।

30 अक्तूबर को मुख्य गुंबद पर भगवा फहराने वाले शरद कोठारी को भीड़ में से खोज कर गोली मारी गयी। उसका छोटा भाई रामकुमार कोठारी जब उसे बचाने के लिये आगे बढ़ा तो उसे भी गोलियों से भून दिया गया। अपने माता-पिता के यह दो ही पुत्र थे। दोनों रामकाज में समर्पित हो गये। मां की गोद सूनी हो गयी।

18.अस्थिकलश

बलिदानी कारसेवकों के अस्थिकलशों को देश भर में ले जाया गया। स्थान-स्थान पर उनका भावपूर्ण स्मरण कर नागरिकों ने उन्हें श्रद्धा-सुमन चढ़ाये। 1991 की मकर संक्रांति को माघमेला के अवसर पर उनकी अस्थियां प्रयागराज संगम में विसर्जित कर दी गयी। कारसेवकों के इस बलिदान ने मन्दिर निर्माण के संकल्प को और दृढ़ कर दिया।

19. संतों की सिंहगर्जना

2-3 अप्रेल 1991 को दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में चतुर्थ धर्मसंसद सम्पन्न हुई। 04 अप्रेल को दिल्ली के वोट क्लब पर ऐतिहासिक रैली हुई जिसमें देश भर से पच्चीस लाख से भी अधिक रामभक्त एकत्र हुए। इस रैली में संतों ने सिंह गर्जना की कि मंदिर वहीं बनेगा। सरकार अपनी भूमिका स्वयं तय करें। उन्हें इस जनज्वार के आगे झुकना होगा या हटना होगा। रैली अभी समाप्त भी नहीं हुई थी कि सूचना मिली कि उत्तर प्रदेश में श्री मुलायम सिंह ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। केन्द्र की राष्ट्रीय मोर्चा सरकार इससे पूर्व 17 सितम्बर को ही विश्वास मत में पराजित हो चुकी थी। कारसेवकों ने सरकारी अत्याचार के विरुद्ध नारा दिया था – “दिल्ली की गद्दी डुबो सके, सरयू में इतना पानी है”, वह नारा सच साबित हुआ।

20.धरती से निकले मंदिर के प्रमाण

इससे पूर्व सरकार ने तीर्थयात्रियों हेतु सुविधाएं विकसित करने के लिये स्वयं भी 2.77 एकड़ भूमि अधिगृहीत की। जून 1991 में जब सरकार की भूमि पर समतलीकरण का कार्य प्रारंभ हुआ तो दक्षिण-पूर्वी कोने से अनेक पत्थर प्राप्त हुए जिनमें शिव-पार्वती की खंडित मूर्ति, सूर्य के समान अर्धकमल, मन्दिर के शिखर का आमलक सहित उत्कृष्ट नक्काशी वाले पत्थर व मूर्तियां थी। यह सभी प्रस्तर खण्ड पुरातात्विक महत्व के थे और मन्दिर की ऐतिहासिकता के स्वयं सिद्ध प्रमाण थे।

21.फिर फहराया भगवा

31 अक्तूबर 1991 को एक बार पुनः कारसेवक अयोध्या में जुटे। समिति ने यद्यपि प्रतीकात्मक कारसेवा का ही निश्चय किया था किन्तु कुछ उत्साही कारसेवक एक बार पुनः गुम्बद पर जा चढ़े और भगवा लहरा दिया। गुम्बदों को कुछ नुकसान भी पहुंचा किन्तु प्रदेश सरकार ने उसकी मरम्मत करा दी। बाद में ढ़ांचे की रक्षा के लिये इसके चारों ओर दीवार का निर्माण किया गया।

22.प्रधानमंत्री से भेंट

आंदोलन के नेता स्वामी वामदेव, परमहंस रामचन्द्र दास, महंत अवैद्य नाथ, युगपुरुष परमानंद, स्वामी चिन्मयानंद आदि ने प्रधानमंत्री नरसिम्हाराव से भेंट कर राम मंदिर निर्माण में आने वाली बाधाओं को दूर करने का आग्रह किया।

23.सर्वदेव अनुष्ठान व नींव ढ़लाई

09 जुलाई 1992 से 60 दिवसीय सर्वदेव अनुष्ठान प्रारंभ हुआ। जन्मभूमि के ठीक सामने शिलान्यास स्थल से भावी मंदिर की नींव के चबूतरे की ढ़लाई भी प्रारंभ हुई। 15 दिनों तक इसके लिये कारसेवा चली और नींव ढ़लाई का काम होता रहा ।

शांतिपूर्ण ढ़ंग से चल रही इस कारसेवा को रोकने के लिये धर्मनिरपेक्षतावादियों ने पूरे देश में कोहराम मचाया । लोकसभा में अभूतपूर्व हंगामा हुआ जिसके चलते एक सप्ताह तक लोकसभा की कार्यवाही ठप्प रही। प्रधानमंत्री श्री नरसिम्हाराव ने संतों से तीन माह का समय मांगा और निर्धारित समय सीमा में अयोध्या विवाद का सर्वमान्य हल निकालने का विश्वास दिलाया। संतों ने प्रधानमंत्री का आग्रह स्वीकार कर लिया तथा नींव ढ़लाई का काम बन्द कर दिया ।

जिस नीव की ढ़लाई की जा रही थी वह 290 फीट लम्बी, 155 फीट चौड़ी और 2-2 फीट मोटी एक के ऊपर एक तीन परत ढ़लाई करके कुल छः फीट मोटी थी।

24.पादुका पूजन

नन्दी ग्राम में भरत जी ने 14 वर्ष तक वनवासी रूप में रह कर अयोध्या का शासन भगवान की पादुकाओं के माध्यम से चलाया था। इसी स्थान पर 26 सितम्बर 1992 को श्रीराम पादुकाओं का पूजन हुआ। अक्तूबर मास में देश के गांव-गांव में इन पादुकाओं के पूजन द्वारा जन-जागरण हुआ। रामभक्तों ने मंदिर निर्माण का संकल्प लिया।

25.द्वितीय कार सेवा

29-30 अक्तूबर 1992 को नयी दिल्ली में पंचम धर्मसंसद आहूत की गयी। संतों ने सरकार के रवैये पर रोष जताते हुये समाधान न होने पर गीता जयंती 06 दिसम्बर 1992 से अयोध्या में पुनः कारसेवा प्रारंभ करने की घोषणा की।

निर्धारित समय सीमा में सरकार विवाद का हल ढ़ूंढ़ने में विफल रही। परिणामस्वरूप गीता जयंती की घोषित तिथि पर कारसेवा की घोषणा कर दी गयी। कई दिन पहले से ही पूरे देश से कारसेवक पहुंचने प्रारंभ हो गये थे

न्यायालय के निर्देशों को ध्यान में रखते हुए उन सभी को परिचय-पत्र दिये जा रहे थे। न्यायालय के निर्देशानुसार प्रचार माध्यमों द्वारा निरंतर उसके निर्देशों की उदघोषणा भी की जा रही थी।

26.न्यायिक प्रक्रिया

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा उत्तर प्रदेश सरकार से कारसेवा के संबंध में आश्वासन मांगा गया। मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने शपथ-पत्र दाखिल कर न्यायालय को आश्वासन दिया कि अधिग्रहीत 2.77 एकड़ भूमि पर लम्बित विवाद का फैसला होने तक किसी निर्माण की अनुमति नहीं दी जायेगी, क्षेत्र में निर्माण सामग्री और उससे संबंधित यंत्र नहीं आने दिये जायेंगे तथा धार्मिक गतिविधियों के तहत प्रतीकात्मक कारसेवा की जायेगी। इस आश्वासन के पश्चात उच्चतम न्यायालय ने सांकेतिक कारसेवा की अनुमति प्रदान कर दी। अयोध्या में न्यायिक पर्यवेक्षक की नियुक्ति कर दी गयी जिसे कारसेवा के दौरान इसपर नजर रखनी थी कि शपथ-पत्र में दिये गये आश्वासनों का उल्लंघन न हो।

समिति को यह विश्वास था कि प्रयाग उच्च न्यायालय की लखनऊ खण्डपीठ का 2.77 एकड़ भूमि पर निर्माण संबंधी फैसला गीता जयंती से पूर्व आ जायेगा। इस वाद की सुनवाई 4 नवंबर को ही पूरी हो चुकी थी और निर्णय प्रतीक्षित था। इसका अनुमान लेते हुए ही कारसेवा की तिथि गीता जयंती पर तय की गयी थी। यह बात न्यायालय के संज्ञान में भी थी। किन्तु फिर भी न्यायालय ने कारसेवा से तीन दिन पूर्व अपना निर्णय 11 दिसम्बर तक के लिये सुरक्षित कर दिया।

वस्तुतः यह भूमि श्रीराम जन्मभूमि न्यास की अपनी भूमि थी जिसे मुलायम सिंह सरकार ने अधिग्रहीत कर लिया था। न्यास ने न्यायालय से इस अधिग्रहण को अवैध घोषित करते हुए न्यास को भूमि वापस सौंपे जाने की प्रार्थना की थी। इसी भूमि पर कारसेवा प्रस्तावित थी।

11 दिसंबर को सुनाये अपने फैसले में न्यायालय  ने न्यास के दावे को उचित मानते हुए भूमि के अधिग्रहण की अधिसूचना को अवैध ठहरा दिया।

27.गीता जयंती (06 दिसम्बर 1992)

इस बीच अयोध्या में लगभग चार लाख कारसेवक पहुंच चुके थे। समिति के सामने समस्या थी कि इतनी बड़ी संख्या में उपस्थित कारसेवकों को क्या समझाया जाय। फिर भी कारसेवकों को सम्बोधित करते हुए नेताओं ने ‘जोश में होश न खोने’, ‘संयम बरतने’, ‘अनुशासन में रहने’, ‘मर्यादा न भंग होने’, ‘साधु-संतों के निर्देश का पालन करने’ आदि के निर्देश दिये। कारसेवा का स्वरूप पंक्तिबद्ध रूप से दोनों मुठ्ठियों में सरयू की रेत लाकर निर्माणस्थल पर डालने तक सीमित कर दिया।

गीता जयंती की ठंडी सुबह कारसेवक सरयू में स्नान कर निर्धारित समय पर रामकथा कुंज में जुटने लगे। लगभग 10 बजे औपचारिक कार्यक्रम प्रारंभ हुआ। संतों तथा आंदोलन के नेताओं ने कारसेवकों को संबोधित करना शुरू किया। इसी मध्य कुछ कारसेवक अधिग्रहीत भूमि, जिस पर कारसेवा प्रस्तावित थी, की ओर बढ़ गये। मंच संचालक ने कारसेवकों से प्रस्तावित कारसेवास्थल तुरंत खाली कर देने की अपील की। साथ ही व्यवस्था में लगे कार्यकर्ताओं को निर्देश दिया कि जो कारसेवक परिसर खाली न कर रहे हों उन्हें उठा कर बाहर कर दिया जाय।

28.धैर्य टूट गया

कारसेवकों से बलपूर्वक कारसेवास्थल खाली कराने का प्रयास जैसे ही शुरू हुआ, उनके धैर्य का बांध टूट गया। स्वयंसेवकों को परे धकेल कर बैरीकेटिंग को लांघते हुए कारसेवकों का समूह अंदर घुस गया।

यह देख कर अन्य कारसेवक भी उस ओर दौड़ पडे और सारे वातावरण में जयश्रीराम के नारे गूंजने लगे। उनमें से कुछ कारसेवक विवादित ढ़ांचे तक भी जा पहुंचे थे।

मंच पर उपस्थित नेताओं ने पहले मंच से ही स्थिति को नियंत्रित करने का प्रयास किया जिसमें उन्हें सफलता नहीं मिली। ढांचे की ओर बढ़ने वाले अधिकांश कारसेवक दक्षिण भारतीय हैं, यह देख सबसे पहले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह (महासचिव) श्री हो वे शेषाद्रि ने कन्नड़, तमिल, तेलुगू और मलयालम में कारसेवकों से वापस आने की अपील की। इसका कोई असर न देख कर भाजपा अध्यक्ष श्री लालकृष्ण आडवाणी और सुश्री उमा भारती ने इसका प्रयास किया। यह प्रयास भी बेकार गया।

अपने प्रयास निष्फल होते देख अनेक नेता मंच से उतर कर स्वयं ढ़ांचे तक गये और कारसेवकों को निकालने का प्रयास करने लगे। इनमें श्री अशोक सिंहल और श्री आडवाणी भी थे। यद्यपि वे लोग कुछ मात्रा में कारसेवकों को बाहर भेजने में सफल हुए किन्तु उससे अधिक संख्या में लोग निरंतर ढ़ांचे की ओर बढ़ रहे थे। उस अफरा-तफरी में कोई किसी को नहीं पहचान रहा था। स्थित नियंत्रण से परे हो चुकी थी। आंदोलन के नेता ही नहीं, सुरक्षा बल भी कुछ कर सकने की स्थिति में नहीं थे।

29.विवादित ढ़ांचा ध्वस्त

कारसेवकों में उत्साह तो अपरिमित था किन्तु अपना मनोरथ पूरा करने के लिये उनके पास कोई औजार नहीं था। प्रारंभ में तो वे ढ़ांचे को केवल हाथों से ही पीट रहे थे और धक्का दे रहे थे। किन्तु शीघ्र ही कुछ नौजवानों ने सुरक्षा के लिये लगाये गये बैरीकेटिंग के पाइपों को निकाल लिया और उससे ढ़ांचे पर प्रहार करने लगे। दोपहर 01.30 बजे ढ़ांचे की एक दीवार को कारसेवकों ने ढ़हा दिया।

इससे उनमें नया जोश भर गया और वे और अधिक तीव्रता से प्रहार करने लगे। कारसेवकों का सैलाब वहां हर पल बढ़ रहा था।

बड़ी संख्या में कारसेवक गुम्बदों पर भी चढ़ गये थे। 2.45 बजे वे पहला गुम्बद गिराने में सफल हो गये। इसने उनके जोश को दोगुना कर दिया। गुम्बद के साथ ही उस पर चढ़े बीसियों कारसेवक भी नीचे गिरे। जो कारसेवक उस गुम्बद को नीचे से गिराने की कोशिश कर रहे थे वे उसके नीचे ही दब गये। वातावरण में गूंज रहे जोशीले नारों में आहों और कराहों के स्वर भी जुड़ गये। 4.30 बजे दूसरा गुम्बद भी धराशायी हो गया।

लगभग 4.45 बजे अचानक तीव्र आवाज के साथ धूल का एक बादल उठा और आसमान में छा गया। कुछ पल के लिये लगा मानो सब कुछ ठहर गया। धूल का गुबार कम होने पर देखा कि ढ़ांचे का तीसरा गुम्बद भी नीचे आ चुका था। विवादित ढ़ांचे का नामो-निशान भी न बचा था। इतिहास का चक्र 464 वर्षों बाद अपनी परिक्रमा पूरी कर वहीं लौट आया था।

30.अस्थायी मंदिर का निर्माण

कारसेवकों ने विवादित स्थल को समतल करने का काम प्रारंभ कर दिया। अब यह असली कारसेवा हो रही थी जिसके लिये कारसेवक आये थे। समतलीकरण का काम 6 दिसम्बर की सारी रात और 7 दिसम्बर के पूरे दिन चलता रहा। समतल भूमि पर ईंट, मिट्टी और गारे से एक चबूतरे का निर्माण कर उस पर रामलला को स्थापित कर दिया गया और पूजा-अर्चन प्रारंभ हो गया। 8 दिसम्बर की भोर में केन्द्र सरकार के निर्देश पर वहां सुरक्षा बलों ने पहुंच कर सब कुछ अपने नियंत्रण में ले लिया। रामलला के नवनिर्मित मंदिर की पूजा-अर्चना नियमित रूप से चलती रही।

31.सुरक्षा बलों की भूमिका

आंदोलन का नेतृत्व जब कारसेवकों को विवादित ढ़ांचे ही नहीं, प्रस्तावित कारसेवा के स्थान से भी बाहर करने का प्रयत्न कर रहा था तो उसके पीछे दो उद्देश्य कार्य कर रहे थे। पहला, वे अपने कार्यक्रम को उसी प्रकार शांति पूर्ण ढ़ंग से पूरा करना चाहते थे और दूसरा, न्यायालय में दिये शपथ-पत्र का सम्मान बनाये रखने की उनकी मंशा थी। अभी तक का सारा आंदोलन संवैधानिक मर्यादा के भीतर रह कर ही चलाया गया था और वे उसे बनाये रखना चाहते थे।

लेकिन कानून और व्यवस्था का प्रश्न उस समय प्रशासन को हल करना था जिसने समय पर अपनी भूमिका ठीक तरह से नहीं निभायी। पुलिस सूत्रों के अनुसार जिला प्रशासन ने बाहर से आयी सीआरपीएफ और रैपिड एक्शन फोर्स से लगभग 02 बजे सहायता मांगी थी किन्तु उन्हें आदेश करने के लिये मजिस्ट्रेट स्तर का पदाधिकारी चाहिये था जो उन परिस्थितियों में उपलब्ध नहीं हो सका।

सायं 5.30 पर राज्य के मुख्यमंत्री ने अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करते हुए त्यागपत्र दे दिया। 8.30 बजे राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया था। इसके साथ ही सारी शक्तियां केन्द्र सरकार के हाथ में आ गयीं थी। इसके बावजूद वहां निर्माण कार्य चलता रहा। केन्द्रीय सुरक्षा बल विवादित स्थल से केवल 15 किमी की दूरी पर फैजाबाद में थे। वे 08 दिसम्बर को प्रातः 3.50 बजे फैजाबाद से चले और 04.10 पर विवादित स्थल पर पहुंच गये। लेकिन केन्द्र द्वारा उन्हें वहां पहुंचने के लिये आदेश देने में 38 घंटे का समय लगा जो आश्चर्यचकित करता है।

33.अधिग्रहण

27 दिसम्बर 1992 को केन्द्र सरकार ने विवादित क्षेत्र और उसके आस-पास की 67 एकड़ भूमि के अधिग्रहण और इस मुद्दे पर सर्वोच्च न्यायालय से राय लेने का फैसला लिया। सर्वोच्च न्यायालय की राय मिलने के बाद 07 जनवरी को राष्ट्रपति द्वारा जारी किये गये एक अध्यादेश से उक्त भूमि का अधिग्रहण कर लिया गया।

34.दर्शन की अनुमति

अयोध्या में विवादित क्षेत्र पर सुरक्षा बलों के अधिकार के बाद 08 दिसम्बर 1992 को नगर में कर्फ्यू लागू कर दिया गया। हरिशंकर जैन नाम के एक वकील ने उच्च न्यायालय में गुहार लगायी कि भगवान भूखे हैं अतः उनके राग, भोग, पूजन की अनुमति दी जाय। 01 जनवरी 1993 को न्यायमूर्ति हरिनाथ तिलहरी ने दर्शन-पूजन की अनुमति प्रदान की।

बाबरी ढ़ांचे के विध्वंस के बाद विश्व हिन्दू परिषद, बजरंग दल और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध लगा दिया गया। यह प्रतिबंध न्यायालय में नहीं टिक सका और उसे हटाना पड़ा। कुछ ही समय पश्चात श्रीराम मंदिर के निर्माण को लक्ष्य कर गतिविधियां पुनः प्रारंभ हो गयीं जिनकी संक्षिप्त जानकारी निम्नवत है।

महत्त्वपूर्ण तिथियां

o   11 मई, 1998 को बाबरी मस्जिद मूवमेंट समन्वय समिति के संयोजक सैयद शहाबुद्दीन ने कहा कि उसे विवादित स्थल के करीब मन्दिर निर्माण में कोई आपत्ति नहीं है।

o   21 मई, 1998 को उच्च न्यायालय की लखनऊ खण्डपीठ ने सी.बी.आई. के विशेष न्यायाधीश जे. पी. श्रीवास्तव को निर्देश दिया कि वह अगस्त के महीने में आरोपियों के खिलाफ आरोप तय कर दें।

o   25 मई, 1998 को विशेष अदालत ने 10 अगस्त की तारीख निश्चित कर दी और श्री लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी तथा उमा भारती सहित 49 लोगों के खिलाफ आरोप तय कर दिए।

o   7 जून, 1998 को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने सोनिया गांधी को एक पत्र लिखा, जिसमें उन्होंने कहा कि चूंकि अयोध्या मुद्दा अदालत में है, इसलिए सरकार किसी को भी धर्मस्थल की पवित्रता का उल्लंघन नहीं करने देगी।

o   10 जून, 1998 को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तत्कालीन सरसंघचालक प्रो. राजेन्द्र सिंह ने स्पष्ट रूप में कहा कि संघ अयोध्या मामले को लेकर किसी प्रकार का टकराव नहीं चाहता। हाँ, मन्दिर अयोध्या में हर हाल में उसी स्थान पर बनाया जाएगा।

o   6 जुलाई, 1998 को केन्द्रीय मार्गदर्शक मण्डल ने केन्द्र सरकार से आग्रह किया कि वह मन्दिर स्थल को श्रीराम जन्मभूमि न्यास को सौंप दे जिससे वहाँ मन्दिर बनाया जा सके।

o   3 दिसम्बर, 1998 को अयोध्या में विवादित स्थल पर दैनिक पूजा-अर्चना के अलावा बाकी अन्य कार्यक्रमों पर उत्तर प्रदेश सरकार ने रोक लगा दी।

o   15 दिसम्बर, 1998 को ढाँचा गिराने में शामिल 49 लोगों के आरोप तय करने के लिए विशेष अदालत ने 20 जनवरी, 1999 की तारीख रखी।

o   1 फरवरी, 1999 को अयोध्या के दिगम्बर अखाड़े में आयोजित सन्त सम्मेलन ने श्रीराम जन्मभूमि पर भव्य मन्दिर निर्माण की प्रतिबद्धता दोहराते हुए तीन प्रस्ताव पारित किए।

o   4 जून, 1999 को लखनऊ में विशेष अदालत के न्यायाधीश ने श्री लालकृष्ण आडवाणी, एम. एम. जोशी, उमा भारती, कल्याण सिंह और बाल ठाकरे को व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित होने का आदेश दिया। अदालत ने कुल 48 लोगों को तलब किया।

o   7 दिसम्बर, 1999 को प्रधानमंत्री वाजपेयी ने लोकसभा में गृहमंत्री आडवाणी सहित तीन केन्द्रीय मंत्रियों के इस्तीफे की माँग को नामंजूर कर दिया। तीनों मंत्रियों, यथा- आडवाणी, जोशी और उमा भारती ने अपने इस्तीफे प्रधानमंत्री को सौंप दिए थे।

o   21 जून, 2000 को लिब्राहन आयोग ने ढाँचा गिराए जाने में पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह को मुख्य रूप से जिम्मेदार ठहराया और उनसे 20 जुलाई को पेश होने को कहा।

o   17 जुलाई, 2000 को अयोध्या प्रकरण के विशेष न्यायाधीश एस. के. शुक्ल ने लखनऊ में बाबरी मस्जिद ध्वंस के आपराधिक वाद में 47 अभियुक्तों की हाजिरी माफी का आवेदन खारिज करते हुए लालकृष्ण आडवाणी, बाल ठाकरे, कल्याण सिंह सहित सभी अभियुक्तों को 15 सितम्बर, 2000 को आरोप तय किए जाने हेतु व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित होने का आदेश दिया।

o   27 जुलाई, 2000 को अयोध्या ने उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह को आयोग के समक्ष पेश होने के वास्ते जमानती वारण्ट जारी किया।

o   16 सितम्बर, 2000 को लखनऊ में विशेष सत्र न्यायाधीश एस. के. शुक्ल ने सुनवाई की तिथि 15 नवम्बर, 2000 रखी।

o   3 अक्टूबर, 2000 को उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने लम्बित मामलों के स्थानान्तरण के लिए सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर की।

o   31 अक्टूबर, 2000 को भाजपा ने कहा कि श्रीराम मन्दिर निर्माण उनकी पार्टी के कार्यक्रम में नहीं है। इसलिए इस मामले में किसी को सहयोग देने का सवाल ही नहीं उठता।

o   9 नवम्बर, 2000 को बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी ने सरकार से मस्जिद के पुनर्निर्माण की अपील की। उसने संघ परिवार द्वारा दिए जा रहे बयानों पर रोक लगाने की भी माँग की।

o   3 दिसम्बर, 2000 को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य सरकार विवादित ढाँचे के बारे में कुछ नहीं कर सकती।

o   6 दिसम्बर, 2000 को प्रधानमंत्री वाजपेयी ने कहा कि अयोध्या में मन्दिर निर्माण राष्ट्रीय भावनाओं का प्रकटीकरण है। भाजपा अध्यक्ष बंगारु लक्ष्मण ने कहा कि पार्टी 6 दिसम्बर, 1992 को हुए बाबरी मस्जिद के ध्वंस को लेकर किसी भी समुदाय से माफी नहीं माँगेगी, क्योंकि उसने कोई गलती नहीं की है।

o   12 दिसम्बर, 2000 को केन्द्र सरकार ने अयोध्या मुद्दे पर नियम 184 के तहत लोकसभा में चर्चा कराने की सहमति दे दी, जिसको लेकर 7 दिनों से लोकसभा में गतिरोध बना हुआ था।

o   19, 20, 21 जनवरी, 2001 को प्रयाग में महाकुम्भ के अवसर पर आयोजित नवम् धर्मसंसद में सन्त समाज ने केन्द्र सरकार का आह्वान करते हुए 12 मार्च, 2002 तक श्रीराम जन्मभूमि मन्दिर निर्माण के मार्ग में आने वाली सभी प्रकार की बाधाएँ दूर करने को कहा। साथ ही यह भी कहा कि इसके बाद किसी भी दिन मन्दिर निर्माण का कार्य प्रारम्भ कर दिया जाएगा और अयोध्या से दिल्ली तक की सन्त चेतावनी यात्रा का आयोजन किया जाएगा।

o   20-21 जून, 2001 को श्रीराम जन्मभूमि मन्दिर निर्माण समिति ने अपनी दिल्ली की बैठक में जन-प्रतिनिधियों से मिलकर उन्हें श्रीराम जन्मभूमि से सम्बंधित सभी तथ्य समझाने का निर्णय लिया।

o   प्रधानमंत्री ने लखनऊ में पत्रकारों से कहा कि 12 मार्च, 2002 तक श्रीराम जन्मभूमि का हल खोज लिया जाएगा। इसी प्रकार के वाक्य प्रधानमंत्री द्वारा 10 अक्टूबर को पूज्य महंत परमहंस रामचन्द्रदास जी से भी भेंट के समय दिल्ली में कहे गए।

o   श्रीराम जन्मभूमि पर दर्शनार्थियों को श्रीरामलला के सार्थक दर्शन कराने के उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ के स्पष्ट आदेशों के बावजूद ऐसा नहीं हो रहा था। 17 अक्टूबर, 2001 को श्री अशोक सिंहल एवं श्री श्रीशचन्द्र दीक्षित लोहे की बेरिकेटिंग को पार कर गर्भगृह के बाहर दर्शन करने के लिए कुछ फीट अन्दर चले गए, इसे अपराध माना गया।

o   21 जनवरी, 2002 को अयोध्या से चलकर लखनऊ, कानपुर और इटावा होते हुए 26 जनवरी, 2002 रात्रि तक सन्त यात्रा दिल्ली पहुँची। पूरे मार्ग में स्थान-स्थान पर सन्तों के स्वागत और प्रवचनों के कार्यक्रम होते रहे। इस यात्रा में 6500 सन्त सम्मिलित हुए।

o   27 जनवरी, 2002 को रामलीला मैदान, दिल्ली में बृहद् धर्मसभा का आयोजन हुआ। यह धर्मसभा 4 अप्रैल, 1991 को दिल्ली के वोट क्लब पर हुए विशालतम प्रदर्शन के समान ही ऐतिहासिक रही।

o   27 जनवरी, 2002 को दोपहर को सन्तों के प्रतिनिधि मण्डल ने प्रधानमंत्री से भेंट की। प्रधानमंत्री ने सन्तों से कह दिया कि उन्होंने 12 मार्च तक श्रीराम जन्मभूमि का हल निकालने के लिए कोई वायदा नहीं किया था।

o   10 फरवरी, 2002 को अयोध्या में पूज्य महंत परमहंस रामचन्द्रदास जी ने घोषणा कर दी कि वे मन्दिर निर्माण के लिए क्रेन से पत्थर ले जाएंगे।

o   15 फरवरी, 2002 को परमहंस जी ने प्रधानमंत्री को न्यास की भूमि को वापस करने के लिए पत्र लिखा।

o   17 फरवरी, 2002 को वसन्त पंचमी के दिन रामघाट स्थित कार्यशाला में शिलाओं का पूजन हो जाने के बाद श्रीराम महायज्ञ प्रारम्भ हुआ। यह यज्ञ 24 फरवरी, 2002 तक चला।

o   24 फरवरी, 2002 को प्रातः 8000 रामसेवकों ने यज्ञ में पूर्णाहुति दी।

o   25 फरवरी को 6000 की संख्या में रामसेवक और आ गए।

o   26 फरवरी, 2002 से रामसेवकों के अयोध्या जाने वाले मार्ग प्रशासन द्वारा अवरुद्ध किए जाने लगे। अयोध्या की सीमाएँ सील कर दी गईं। वाहनों को रोका जाने लगा।

o   27 फरवरी, 2002 को गोधरा में रेल के डिब्बे में बर्बरतापूर्ण ढंग से 57 से अधिक रामसेवकों को जला डाला गया।

o   27 फरवरी, 2002 को गठबन्धन सरकार ने श्रीराम जन्मभूमि आन्दोलन को पूरी शक्ति से कुचलने की घोषणा की। अयोध्या में 20,000 अर्द्ध सैनिक बलों की तैनाती कर दी गई।

o   3 मार्च, 2002 को अयोध्या में चलाए जा रहे दमन चक्र की जानकारी लिखित रूप में केन्द्रीय गृहमंत्री को पहुँचाई गई किन्तु दमन चक्र बढ़ता ही गया।

o   3 मार्च, 2002 को श्री अशोक सिंहल ने जनता से देश में शान्ति बनाए रखने और देश की आन्तरिक एवं बाह्य सुरक्षा के लिए मिल रही चुनौती के प्रति सजग रहने की अपील की।

o   4 मार्च, 2002 को कांची कामकोटि पीठ के पूज्य जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी जयेन्द्र सरस्वती ने श्रीराम जन्मभूमि के हल के संदर्भ में प्रयास शुरू किए।

o   4 मार्च, 2002 को दिल्ली में सर्वश्री पूज्य परमहंस जी, स्वामी प्रकाशानन्द जी (बोस्टन), अवेद्यनाथ जी, नृत्यगोपाल दास जी, सत्यमित्रानन्द जी, युगपुरुष परमानन्द जी, स्वामी चिन्मयानन्द जी, रामविलासदास वेदान्ती जी, सन्तोषी माता जी आदि सन्त एकत्रित हुए। केन्द्र सरकार से कहा गया कि अयोध्या में खड़ी सभी बाधाओं को हटाया जाए, अयोध्यावासियों पर लगाए गए प्रतिबन्ध हटाए जाएं। अविवादित भूमि पर 15 मार्च को निर्माण सामग्री ले जाने की अनुमति दी जाए। 2 जून, 2002 के पूर्व ही अविवादित भूमि श्रीराम जन्मभूमि न्यास को हस्तान्तरित कर दी जाए और न्यायालय का निर्णय दस्तावेजी साक्ष्य के आधार पर शीघ्र कराया जाए।

o   7 मार्च, 2002 को उत्तर प्रदेश के 14 सांसद दिल्ली में एकत्रित हुए। स्वामी चिन्मयानन्द जी पैड पर उन्होंने अपनी अयोध्या की पीड़ा को लिखित रूप प्रदान करके प्रधानमंत्री जी को पत्र लिखा।

o   7 मार्च, 2002 को असलम भूरे नामक व्यक्ति ने सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर की कि अयोध्या में 15 मार्च को कोई शिलादान न हो।

o   8 मार्च, 2002 को प्रधानमंत्री जी की ओर से पूज्य जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी जयेन्द्र सरस्वती को रात्रि भोज पर मौखिक आश्वासन दिए गए कि अयोध्या में सभी बाधाएँ हटा ली जाएंगी। 15 मार्च, 2002 का कार्यक्रम होने दिया जाएगा, 2 जून तक अविवादित भूमि न्यास को दे दी जाएगी। प्रधानमंत्री के आश्वासनों से सभी आश्वस्त हो गए।

o   8 मार्च, 2002 को केन्द्रीय गृह राज्य मंत्री आई. डी. स्वामी अयोध्या पहुँचे। वे अनेक जगह गए और अनेक लोगों से मिले। उनके रुख से आशा बंधी कि राहत मिलेगी किन्तु सरकारी दमन चक्र कठोर से कठोरतम होता गया।

o   11 मार्च, 2002 को प्रातः पूज्य महंत रामचन्द्रदास परमहंस जी अखाड़ा छोड़कर कार्यशाला में पहुँच गए और 15 मार्च तक वहीं रहने की घोषणा कर दी क्योंकि अखाड़े में उन्हें अपनी नजरबन्दी का अन्देशा था।

o   12 मार्च, 2002 को दिन में कार्यशाला पर ताला डाल दिया गया। चारों ओर अर्द्ध सैनिक बल तैनात कर दिया गया। परमहंस जी ने घोषणा कर दी कि यदि मुझे यहाँ से नहीं निकलने दिया तो मैं रसायन खाकर शरीर त्याग दूँगा। उनका कहना था कि मैं अपनों से ठगा गया हूँ। 92 वर्ष की आयु में अपनों से नहीं लड़ सकता।

o   12 मार्च, 2002 को शिवरात्रि थी। अयोध्या में कोई भी पूजा करने के लिए मन्दिर न आ सका। रात्रि को पुलिस महानिरीक्षक सरदार हरभजन सिंह की पहल पर शिवजी की बारात निकली। कहीं, कोई अशान्ति नहीं फैली।

o   13 मार्च, 2002 को सर्वोच्च न्यायालय ने 15 मार्च के शिलादान पर रोक लगा दी किन्तु लिखित में आदेश कुछ और ही कह रहा था।

o   14 मार्च, 2002 को सर्वोच्च न्यायालय ने बिना किसी दूसरे के प्रार्थना किए स्वयं ही अपना निर्णय पुनः लिखाया। न्यायपालिका के इतिहास में यह घटना अभूतपूर्व मानी जाएगी।

o   समाचार पत्रों के माध्यम से अयोध्या के बारे में देशभर में आतंक का वातावरण खड़ा कर देने के बाद भी रामसेवक अयोध्या आते रहे और घर वापस जाते रहे। 14 मार्च को 130 कि. मी. पैदल चलकर पुणे की एक माता अयोध्या पहुँची थी। इसी दौरान ग्रामीण जनता का इस कार्य में पूरा सहयोग रहा।

o   14 मार्च, 2002 को सन्तों को अयोध्या बुलाया गया किन्तु साधनों के अभाव में वे न पहुँच सके। कुछ लखनऊ तक पहुँचे भी तो उन्हें अयोध्या की सीमा पर ही रोक दिया गया। अयोध्या एक जेल में परिवर्तित हो चुकी थी। परमहंस जी की शरीर त्याग की घोषणा से ही सरकार कुछ हिली।

o   14 मार्च, 2002 को लखनऊ से एक अधिकारी आए और महंत जी से कई बार मिले। रात्रि तक यह स्पष्ट हो गया कि सरकार शिलादान स्वीकार करेगी। शिलादान महंत जी के इच्छित स्थान पर होगा।

o   15 मार्च, 2002 को यह तय हुआ कि शिलादान के लिए पहली टोली में पूज्य परमहंस जी और अशोक जी के साथ कुछ 25 लोग चलेंगे। शिलादान होने के पश्चात 25-25 की टोलियों में सभी को जन्मभूमि के दर्शनों के लिए भेजा जाएगा, भले ही रात्रि के 12.00 ही क्यों न बज जाए।

o   15 मार्च, 2002 को परमहंस जी ने कार्यशाला में शिलाओं का पूजन किया। शिलाएँ जैसे ही आगे बढ़ीं, भीड़ एकत्रित हो गई और जैसे-जैसे शिलाएँ आगे चलती गईं, भीड़ बढ़ती ही गई। अनियंत्रित भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पुलिस को बल प्रयोग करना पड़ा।

o   15 मार्च, 2002 को एक समाचार फैजाबाद के कमिश्नर के वक्तव्य के रूप में छपा कि वे आयुक्त के रूप में शिलाएँ प्राप्त करेंगे जन्मभूमि के रिसीवर के रूप में नहीं। यह बात नितान्त आपत्तिजनक थी। अतः यह निर्णय हुआ कि शिलाएं भारत सरकार के अयोध्या सेल के प्रमुख को दी जाएगी। उनके दिल्ली से आने में देरी हो जाने से जनता की उत्तेजना चरम पर पहुँच गई और आशंका होने लगी कि कहीं 2 नवम्बर, 1990 की पुनरावृत्ति न हो जाए। फैजाबाद के कमिश्नर ने जनता को दर्शन करने के लिए जाने से स्पष्ट इन्कार कर दिया। सरकार की यह वायदा खिलाफी थी।

o   अन्ततोगत्वा 15 मार्च, 2002 को भारत सरकार के अयोध्या सेल के प्रमुख शत्रुघ्न सिंह ने शिलादान स्वीकार किया।

o   16 मार्च, 2002 को प्रातः लोग दर्शन के लिए आए किन्तु रोका गया। अयोध्या के विधायक प्रतिबन्धों के विरुद्ध अनशन पर बैठ गए। इसी दिन अशोक जी ने गृहमंत्री को फोन से सूचित किया कि 24 घण्टे में रेलगाड़ियों और बसों का आवागमन प्रारम्भ नहीं हुआ तो वे भी अनशन पर बैठ जाएंगे।

o   17 मार्च, 2002 को रात्रि को राजनाथ सिंह श्री अशोक जी से मिलने आए। सरकार दबाव में आई और यातायात व्यवस्था पूर्ववत हो गई। धीरे-धीरे अर्द्ध सैनिक बल भी वापस चले गए।

o   25 अप्रैल, 2002 को दोपहर बाद जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी जयेन्द्र सरस्वती जी ने अयोध्या आकर मुसलमान नेताओं से बातचीत की।

o   26 अप्रैल, 2002 को प्रेस कान्फ्रेन्स हुई। तत्पश्चात वे सन्तों से मिले। सन्त अपने पूर्व मत पर दृढ़ रहे। बातचीत समाप्त हो गई। शंकराचार्य जी वापस चले गए।

o   31 मई, 2002 को पूर्णाहुति से पूर्व 58 मजिस्ट्रेट सुरक्षा के बहाने बुलाए गए। अखबारों के माध्यम से प्रशासन ने पुनः आतंक का वातावरण बनाया।

o   1 जून, 2002 को आयोजित सार्वजनिक सभा में 1000 सन्त और 4000 रामसेवक उपस्थित रहे।

o   2 जून, 2002 को सरयू जी में अवभृथ स्नान किया गया। इसी दिन 100 दिवसीय यज्ञ सम्पूर्ण हुआ।

Ø सत्याग्रह आन्दोलन

दिल्ली में आयोजित दशम धर्मसंसद में यह निर्णय किया गया था कि श्रीराम जन्मभूमि के संदर्भ में आगे धर्मसंसद नहीं बुलाई जाएगी तथा जन्मभूमि हिन्दू समाज को प्राप्त होने तक श्रीराम जन्मभूमि मन्दिर निर्माण आन्दोलन उच्चाधिकार समिति के तत्त्वावधान में ही चलाया जाए। उच्चाधिकार समिति ने निर्णय किया कि एक मास के बाद यदि केन्द्र सरकार जन्मभूमि परिसर की 67 एकड़ की अविवादित भूमि ‘श्रीराम जन्मभूमि न्यास‘ को नहीं सौंपती है तो परिसर को प्राप्त करने के लिए 27 मार्च से 02 अप्रैल, 2003 तक दिल्ली में सत्याग्रह किया जाए।

o   उच्चाधिकार समिति के निर्णयानुसार दिनांक 27 मार्च से 02 अप्रैल, 2003 कुल 7 दिन तक गांधी मार्किट मैदान, दिल्ली में सत्याग्रह आन्दोलन का आयोजन किया गया। प्रतिदिन सत्याग्रह के लिए अलग-अलग प्रान्तों को समय दे दिया गया था। प्रान्तों ने अपनी-अपनी तिथि अनुसार सत्याग्रह में भाग लिया। एक सप्ताह तक चले सत्याग्रह में कुल 1,73, 548 रामभक्तों ने निम्नलिखित रूप में सहभागिता कीः-

o   गुरुवार – 27 मार्च, 2003 को हरियाणा, इन्द्रप्रस्थ, पूर्व आन्ध्र, उड़ीसा, महाराष्ट्र, महाकौशल, उत्तर बिहार, जयपुर, उत्तर गुजरात, ब्रज और कानपुर प्रान्तों के कुल 37,193 रामभक्तों ने सत्याग्रह किया।

o   शुक्रवार – 28 मार्च, 2003 को इन्द्रप्रस्थ, पंजाब, पश्चिम आन्ध्र, केरल, दक्षिण बिहार, उत्तर असम, दक्षिण बंगाल, कोंकण, छत्तीसगढ़, सौराष्ट्र, जोधपुर, मेरठ और अवध प्रान्तों के कुल 30,447 रामभक्तों ने सत्याग्रह किया।

o   शनिवार – 29 मार्च, 2003 को हिमाचल प्रदेश, उत्तर कर्नाटक, झारखण्ड, उत्तर बंगाल, विदर्भ, मध्यभारत, दक्षित गुजरात, चित्तौड़, ब्रज, उत्तरांचल, गोरखपुर, इन्द्रप्रस्थ प्रान्तों के कुल 20,581 रामभक्तों ने सत्याग्रह किया।

o   रविवार – 30 मार्च, 2003 को हरियाणा, जम्मू, पूर्व आन्ध्र, उड़ीसा, उत्तर बिहार, महाराष्ट्र, महाकौशल, जयपुर, उत्तर गुजरात, मेरठ, कानपुर, काशी, इन्द्रप्रस्थ प्रान्तों के कुल 23,927 रामभक्तों ने सत्याग्रह किया।

o   सोमवार – 31 मार्च, 2003 को पंजाब, पश्चिम आन्ध्र, तमिलनाडु, दक्षिण असम, दक्षिण बिहार, कोंकण, छत्तीसगढ़, सौराष्ट्र, जोधपुर, ब्रज, अवध, इन्द्रप्रस्थ प्रान्तों के कुल 19,035 रामभक्तों ने सत्याग्रह किया।

o   मंगलवार – 01 अप्रैल, 2003 को हिमाचल प्रदेश, उत्तर कर्नाटक, झारखण्ड, उत्तर बंगाल, विदर्भ, मध्यभारत, दक्षिण गुजरात, जयपुर, मेरठ, गोरखपुर, इन्द्रप्रस्थ प्रान्तों के कुल 22,332 रामभक्तों ने सत्याग्रह किया।

o   बुधवार – 02 अप्रैल, 2003 को हरियाणा, जम्मू, दक्षिण कर्नाटक, दक्षिण बंगाल, उत्तर गुजरात, चित्तौड़, उत्तरांचल, काशी, इन्द्रप्रस्थ, तमिलनाडु प्रान्तों के कुल 20,043 रामभक्तों ने सत्याग्रह किया।

Ø सत्याग्रह में गिरफ्तारी देने वालों में प्रमुख रूप से पूज्य महंत परमहंस रामचन्द्रदास जी, पूज्य स्वामी सत्यमित्रानन्द जी, पूज्य स्वामी वासुदेवाचार्य जी, पूज्य स्वामी रामविलासदास वेदान्ती आदि तथा विश्व हिन्दू परिषद के श्री विष्णुहरि डालमिया, श्री अशोक सिंहल, आचार्य गिरिराज किशोर, डॉ. प्रवीणभाई तोगड़िया, श्री श्रीशचन्द्र दीक्षित, केन्द्रीय मंत्री, सहमंत्री आदि रहे।

Ø अयोध्या के श्रीराम मन्दिर पर आतंकवादी हमला

05 जुलाई, 2005 प्रातःकाल 09.00 बजे अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि परिसर में पाँच आतंकवादी घुसे। सुरक्षाबलों ने उन्हें बहादुरी से मार गिराया। परिसर में घुसने के पूर्व आतंकवादियों ने अधिग्रहीत परिसर के उत्तरी कोने पर जैन मन्दिर के पास एक मार्शल जीप का विस्फोट कर अधिग्रहीत क्षेत्र की लोहे की ‘बैरिकेटिंग‘ को उड़ा दिया था। इसी विस्फोट से दूर-दूर तक लोग चौकन्ने हो गए। अल्प समय में ही घुसपैठियों के घुसने की बात सबके ध्यान में आ गई। सुरक्षाकर्मियों ने जनता के सहयोग से सभी को मार गिराया। मारे गए आतंकवादियों  के पास से ए.के. 47, ए.के. 56, टैंकभेदी हैण्डग्रेनेड (चीन निर्मित), राकेट लांचर, पिस्तौल, 9 एम.एम. की मैग्जीन मिले। ‘पोस्टमार्टम‘ में एक आतंकवादी के पेट से जहर के लक्षण मिले।

Ø दिनांक 06 जुलाई को दुर्घटना स्थल देखने के लिए दिल्ली से श्री जार्ज फर्नांडीज, गृहमंत्री श्री शिवराज पाटिल एवं उत्तर प्रदेश के राज्यपाल अयोध्या पहुँचे। 06 जुलाई को ही श्री अशोक सिंहल एवं डॉ. मुरलीमनोहर जोशी भी अयोध्या पहुँच गए। अयोध्या में सन्तों के आह्वान पर उसी दिन सायंकाल 5 बजे कारसेवकपुरम में एक सभा हुई। सभा में बड़ी संख्या में स्थानीय सन्त और जनता सहभागी हुए। जगद्गुरु रामानन्दाचार्य स्वामी रामभद्राचार्य जी महाराज नैमिषारण्य से विशेष रूप से चलकर सभा में पहुँचे।

Ø दिनांक 07 जुलाई को प्रातःकाल श्री अशोक सिंहल, डॉ. मुरलीमनोहर जोशी एवं पूज्य रामभद्राचार्य महाराज ने दुर्घटना स्थल पर जाकर परिस्थितियों का प्रत्यक्ष अवलोकन किया। ज्ञात हुआ कि आतंकवादी रामलला तक पहुँच गए थे। उन्होंने ‘हैण्डग्रेनेड‘ भी फैंके थे परन्तु भगवान की ही कृपा से वे फट नहीं पाए। दिनांक 15 जुलाई, 18 जुलाई एवं 20 जुलाई, 2005 को भी बिना फटे बम रामलला के पीछे के उन स्थानों से पाए गए जहाँ ‘पुरातत्त्व विभाग‘ द्वारा उच्च न्यायालय के आदेश पर उत्खनन किया गया था।

Ø हमले के विरोध में गृहमंत्री/राष्ट्रपति से प्रतिनिधि मण्डल की भेंट

श्रीराम जन्मभूमि पर हुए इस हमले के विरोध में सन्तों का एक प्रतिनिधि मण्डल 19 जुलाई, 2005 को जगद्गुरु रामानन्दाचार्य स्वामी रामभद्राचार्य जी महाराज के नेतृत्व में भारत सरकार के गृहमंत्री श्री शिवराज पाटिल से एवं महामहिम राष्ट्रपति श्री ए.पी.जे. अब्दुल कलाम से मिलने के लिए उनके स्थानों पर गए और अयोध्या में ‘श्रीराम जन्मभूमि‘ पर हुए आतंकवादी हमले से सम्बंधित एक प्रतिवेदन उन्हें प्रस्तुत किया। दोनों ही स्थानों पर सन्तों की बात बड़ी गम्भीरता से सुनी गई। प्रतिनिधि मण्डल में पूज्य रामभद्राचार्य जी महाराज-चित्रकूट, महंत नृत्यगोपालदास जी महाराज-अयोध्या, महंत कौशलकिशोर दास जी महाराज-बड़ा भक्तमाल, अयोध्या, डॉ रामविलासदास वेदान्ती जी महाराज-अयोध्या, महंत फूलडोल दास जी महाराज- वृन्दावन, स्वामी हंसदास जी महाराज-हरिद्वार, महामण्डलेश्वर स्वामी विश्वेश्वरानन्द जी महाराज-सन्यास आश्रम, मुम्बई, श्री अशोक सिंहल-अध्यक्ष, विश्व हिन्दू परिषद, श्री राजेन्द्र सिंह पंकज-केन्द्रीय मंत्री, विश्व हिन्दू परिषद थे।

Ø जन्मभूमि पर हुए आतंकी हमले के विरोध में हुईं प्रतिक्रियाएँ

Ø अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि पर जेहादी आतंकवादियों के हमले का देशभर में बन्द और प्रदर्शन के माध्यम से प्रतिकार हुआ-

o   उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ, त्रिपुरा सहित पूर्वोत्तर राज्य, कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल, आन्ध्र, गुजरात, महाराष्ट्र, हरियाणा, पंजाब में हुए बन्द का जनता पर व्यापक असर पड़ा।

o   इन्दौर में हवाई जहाज की उड़ान व रेलगाड़ियाँ रोकी गईं।

o   नई दिल्ली में संसद मार्ग पर विश्व हिन्दू परिषद के सलाहकार मण्डल के सदस्य आचार्य गिरिराज किशोर, केन्द्रीय संयुक्त महामंत्री श्री ओंकार भावे व केन्द्रीय मन्त्री श्री प्रेम सिंह ‘शेर‘ के नेतृत्व में हजारों विश्व हिन्दू परिषद, बजरंग दल, शिवसेना, आर्यसमाज व अन्य हिन्दू संगठनों के कार्यकर्ताओं व जनता ने प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों पर पुलिस ने पानी की तेज बौछार, अश्रुगैस के गोले छोड़ने के साथ ही हल्का लाठीचार्ज भी किया।

o   प्रख्यात कथावाचक राष्ट्रसंत मोरारी बापू ने कहा श्रीराम जन्मभूमि पर हुआ आतंकी हमला सत्य, प्रेम और करुणा पर हमला है। सम्पूर्ण राष्ट्र को संगठित होकर इसका मुकाबला करना चाहिए।

o   जगद्गुरु रामानुजाचार्य स्वामी पुरुषोत्तमाचार्य जी महाराज ने कहा कि अब समय आ गया है कि हिन्दू समाज अपने आस्था के केन्द्रों की रक्षा के लिए स्वयं आगे आए।

o   श्रीराम जन्मभूमि मंदिर पर आतंकवादी हमले के विरोध में दिल्ली में जंतर-मंतर पर जनता द्वारा एक विशाल प्रदर्शन किया गया।

o   श्रीराम जन्मभूमि पर हुए हमले में घायल हुए सुरक्षाकर्मी श्री नंदकिशोर व श्री सुल्तान सिंह को मिलने के लिए कार्यकर्ता ऑल इण्डिया मेडिकल इन्स्टीटयूट पहुंचे।

Ø इसके बाद भी श्री राम मंदिर के मुद्दे को स्मृति में बनाय रखने के लिये समय-समय पर समाज के बीच विविध प्रकार की गतिविधियाँ आयोजित की जाती रहीं किन्तु मुख्य रूप से उच्च न्यायालय और बाद में सर्वोच्च न्यायालय के सम्मुख वाद मह्तवपूर्ण स्थिति में होने के कारण इसे सड़ के आंदोलन के रूप में नहीं लिया गया।