श्रीराम जय राम जय जय राम, শ্ৰীৰাংজয়ৰাংজয়জয়ৰাং, শ্রীরাম জয় রাম জয় জয় রাম , શ્રીરામ જય રામ જયજય રામ, ಶ್ರೀರಾಮಜಯರಾಮಜಯಜಯರಾಮ, ശ്രിറാം ജയ് റാം ജയ്‌ ജയ് റാം, శ్రీరాంజయరాంజయజయరాం

श्रीराम जन्मभूमि मन्दिर के तथ्य

श्रीराम जन्मभूमि मन्दिर के तथ्य
01.          विवाद के बिन्दु
(1)          अयोध्या का विवाद सामान्य मन्दिर-मस्जिद का विवाद नहीं है।
(2)          यह भगवान की जन्मभूमि को प्राप्त करने का संघर्ष है, तथा यह जन्मस्थान स्वयं में एक देवता है और देवता का विभाजन नहीं हो सकता। जन्मस्थान पर विराजित रामलला विराजमान एक विधिक प्राणी है, शाश्वत नाबालिग हैं। भगवान की सम्पत्ति पर किसी दूसरे का स्वामित्व नहीं हो सकता।
(3)          सम्पूर्ण विवादित भूमि अधिकतम 1500 वर्गगज (अर्थात् 1500 ग् 9 त्र 13,500 वर्गफुट) है। भारत सरकार द्वारा अधिग्रहीत 67 एकड़ भूमि इससे अलग है, जिस पर कोई मुकदमा अदालत में लम्बित नहीं है।
(4)          अदालत में विचाराधीन सम्पूर्ण स्थल रामलला विराजमान का है। यह भगवान की जन्मभूमि है। स्कंद पुराण में इस स्थान के महत्व का वर्णन करते हुए लिखा गया है कि रामजन्म स्थान का दर्शन करने से मोक्ष प्राप्त होता है, पुनर्जन्म नहीं होता।
(5)          किसी भी समुदाय के आराध्य जनों के उपासना स्थल अनेक स्थानों पर बनाये जा सकते हैं, महापुरुषों की प्रतिमायें अनेक स्थानों पर स्थापित की जा सकती हैं, परन्तु महापुरुषों/देवी देवताओं का प्राकट्य स्थल/जन्मस्थान एक ही स्थान पर होगा और वह कभी बदला नहीं जा सकता, जन्मभूमि अपरिवर्तनीय है, यह बेची नहीं जा सकती और न ही दान दी जा सकती है।
(6)          हिन्दुओं के लिए अयोध्या का उतना ही महत्व है जितना मुस्लिमों के लिए मक्का का महत्व है।
(7)          इतिहास में हुए भारत के अपमान का स्मरण दिलाने वाला कोई भी नया केन्द्र अयोध्या में नहीं बन सकता।
02.          संघर्ष एवं आन्दोलनों का इतिहास
(1)          जन्मभूमि को प्राप्त करने का संघर्ष 1528 ई0 से (जिस दिन बाबर ने मन्दिर तोड़ने का आदेश दिया था) सतत् जारी है।
(2)          इस संघर्ष को सम्पूर्ण देश का हिन्दू समाज लगातार लड़ रहा है। अयोध्या के सन्तों व आसपास के राजा-महाराजाओं का इस संघर्ष में विशेष योगदान रहा है।
(3)          76 संघर्षों का वर्णन इतिहास के पन्नों में मिलता है।
(4)          संघर्ष बताते हैं कि हिन्दुओं ने इस स्थान से अपना दावा कभी नहीं छोड़ा।
(5)          इन संघर्षों से पता चलता है कि मुस्लिम आक्रमणकारी व उसके वंशजों का इस स्थान पर कब्जा कभी भी शान्तिपूर्ण, लगातार व निर्बाध नहीं रहा।
(6)          ईसवीं सन् 1885 में जन्मभूमि परिसर के बाहरी आंगन में स्थित रामचबूतरे पर छप्पर को पक्का करने के लिए एक प्रार्थनापत्र तत्कालीन सरकारी अधिकारी को निर्मोही अखाड़े के महंत के द्वारा व्यक्तिगत हैसियत से दिया गया था। इस विषय पर अन्तिम रूप से अंग्रेज न्यायाधीश कर्नल चेमियर ने महंत जी को अनुमति तो नहीं दी परन्तु अपने निर्णय में यह स्वीकार किया कि ‘‘यह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है कि एक मन्दिर को तोड़कर यहाँ पर मस्जिद बनाई गई’’
(7)          मार्च, 1983 को उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर शहर में आयोजित हिन्दू सम्मेलन में स्वर्गीय दाऊदयाल खन्ना ने रामभक्तों का आह्वान किया कि ‘‘अयोध्या,  मथुरा और काशी के स्थानों को मुक्त कराओ और हिन्दुस्तान का गौरव वापस लाओ।’’
(8)          7 व 8 अप्रैल, 1984 को दिल्ली के विज्ञान भवन में सन्तों का सम्मेलन हुआ (प्रथम धर्मसंसद)। श्रीराम जन्मभूमि को मुक्त कराने का संकल्प लिया गया, सन्तों के आदेश से विश्व हिन्दू परिषद ने 77वें संघर्ष को प्रारम्भ किया।
(9)          सर्वप्रथम जन्मभूमि पर लगे ताले को खोलने के लिए जन-जागरण का निश्चय हुआ। सीतामढ़ी में राम-जानकी रथ का पूजन हुआ। 7 अक्टूबर, 1984 को अयोध्या में सरयू के तट पर राम-जानकी रथ आया, हजारों रामभक्तों ने सरयू महारानी का जल हाथ में लेकर श्रीराम जन्मभूमि को मुक्त कराने की प्रतीज्ञा ली।
(10)        अक्टूबर, 1985 से सम्पूर्ण उत्तर प्रदेश में पुनः 6 रथों के द्वारा जन-जागरण प्रारम्भ हुआ। परिणामस्परूप श्रीराम जन्मभूमि पर वर्ष 1949 ईं. से लगा ताला अदालत के आदेश से 01 फरवरी, 1986 को खुल गया। रामलला के दर्शन-पूजन को रोकने के कई बार प्रयास हुए परन्तु अदालत ने उसे स्वीकार नहीं किया।
(11)        इसके पश्चात् जागरण अभियानों का एक क्रम प्रारम्भ हो गया। शिलापूजन का कार्यक्रम देशभर के लगभग तीन लाख गाँवों में आयोजित किया गया। देश विदेश से पूजित शिलायें अयोध्या पहुँच गईं। पूज्य साधु सन्तों की उपस्थिति में अनुसूचित जाति के एक कार्यकर्ता श्री कामेश्वर चैपाल द्वारा भावी रामजन्म भूमि मन्दिर का शिलान्यास हुआ, यह सामाजिक समरसता का एक अद्भुत उदाहरण है।
(12)        रामशिलापूजन, राम ज्योति, रामचरण पादुका पूजन, विजय मंत्र जाप अभियान जैसे अनेक कार्यक्रमों से देश में अद्वितीय जन-जागरण हुआ।
(13)        24 जून, 1990 को हरिद्वार में केन्द्रीय मार्गदर्शक मण्डल की बैठक में निर्णय किया गया कि 30 अक्टूबर, 1990 (देवोत्थान एकादशी) को कारसेवा करने के लिए अयोध्या जाएंगे। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने अयोध्या को चारों ओर से सुरक्षा बलों के द्वारा घेर दिया और घोषणा करी कि ’परिन्दा भी पर नहीं मार सकता’। हिन्दू समाज ने इस चुनौती को स्वीकार किया और सब प्रकार के दमनचक्रों के बावजूद हजारों लोग अयोध्या पहुँच गए। कारसेवकों ने निर्धारित समय पर गुम्बदों के ऊपर भगवा पताका फहरा दी। वहाँ गोलियाँ चलीं व कारसेवकों के बलिदान हुए। 02 नवम्बर, 1990 का गोली काण्ड सर्वविदित है। अन्ततः सरकार झुकी और सभी कारसेवकों को दर्शन करने की अनुमति मिली, तभी कारसेवक अपने घर गए।
(14)        दस दिन का सत्याग्रह हुआ,  हजारों लोग प्रतिदिन आते थे। कारसेवकों की अस्थियों का देशभर में पूजन कार्यक्रम सम्पन्न हुआ।
(15)        04 अप्रैल, 1991 को दिल्ली के बोट क्लब पर ऐतिहासिक जनसभा हुई। अनुमानतः 25 लाख रामभक्त इस सभा में आए। सभा समाप्त होते-होते उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री मुलायम सिंह यादव ने इस्तीफा दे दिया। उत्तर प्रदेश में पुनः चुनाव हुए, श्री कल्याण सिंह जी मुख्यमंत्री बने।
(16)        पुनः घोषणा हो गई कि 06 दिसम्बर, 1992 को कारसेवा करेंगे। श्री कल्याण सिंह जी ने घोषणा की कि गोली नहीं चलेगी। अयोध्या के चारों ओर सुरक्षा बल बैठा दिए गए। रामभक्तों के साथ हो रहे अत्याचारों के कारण समाज का गुस्सा फूट पड़ा और बाबरी ढाँचा ध्वस्त हो गया।
(17)        1984 से प्रारम्भ हुए इस श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ में करोड़ों रामभक्तों की सहभागिता हुई। रामभक्तों का संकल्प हर अभियान के साथ और दृढ़ होता गया।
03.          स्वतंत्र भारत में श्रीराम जन्मभूमि पर मुकदमों का इतिहास
(1)          22-23 दिसम्बर, 1949 की मध्यरात्रि में राम जन्मस्थान पर रामलला का प्राकट्य हो गया। प्रशासन ने शान्ति व्यवस्था के नाम पर ढ़ांचे के दरवाजों पर ताला लगवा दिया। समाज ने आपत्ति की तो न्यायालय ने प्रतिदिन प्रातः-सायं ताले खोलकर भगवान की पूजा आरती का आदेश दिया। आज भी उसी स्थान पर रामलला विराजमान हैं और निरन्तर पूजा हो रही है।
(2)          जनवरी, 1950 में गोपाल सिंह विशारद ने अदालत में अपना वाद दायर करके माँग की कि मैं भगवान का भक्त हूँ, नित्य दर्शन के लिए आता हूँ अतः मेरे दर्शन-पूजन में कोई व्यक्ति अथवा प्रशासन किसी प्रकार की बाधा न पहुंचाये। प्रशासन ने इस स्थान के प्रबन्धन के लिए एक रिसीवर नियुक्त कर दिया।
(3)          वर्ष 1959 में निर्मोही अखाड़ा ने फैजाबाद की अदालत में अपना वाद दायर करते हुये मांग की थी कि सरकार द्वारा नियुक्त रिसीवर हटाया जायें और हमें प्रबन्धन सौंपा जायें।
(4)          18 दिसम्बर, 1961 को उत्तर प्रदेश सुन्नी मुस्लिम वक्फ बोर्ड ने अपना मुकदमा दायर कर मांग की थी कि इस ढ़ांचे को सार्वजनिक मस्जिद घोषित किया जाये, और ढाँचे के अन्दर रखी पूजा सामग्री हटाई जाए।
(5)          जुलाई, 1989 में स्वयं भगवान रामलला विराजमान एवं स्थान जन्मभूमि को वादी बनाते हुये भगवान की ओर से मुकदमा दायर हुआ,  भगवान ने स्वयं अपना पक्ष रखा।
(6)          1989 में उपर्युक्त चारों वाद निचली अदालत से उठाकर इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ को सामूहिक सुनवाई के लिए सौंप दिए गए और इन चारों मुकदमों की सुनवाई एक साथ होने लगी।
(7)          ढाँचा गिरने के बाद तथाकथित विवादित भूमि और उसके चारों ओर फैली हिन्दू समाज की 67 एकड़ जमीन भारत सरकार ने 07 जनवरी, 1993 को कानून बनाकर (अधिनियम 33/1993) अधिग्रहीत कर ली थी।
(8)          उपर्युक्त अधिग्रहण के खिलाफ 1993 में इस्माइल फारुकी नामक एक मुस्लिम सज्जन सर्वोच्च न्यायालय में गये और माँग की कि मस्जिद की जगह का अधिग्रहण नहीं हो सकता। इसी कालखण्ड में राष्ट्रपति महोदय ने संविधान की धारा 143 के अन्तर्गत सर्वोच्च न्यायालय को एक प्रश्न का उत्तर देने का निवेदन किया। राष्ट्रपति महोदय का प्रश्न था कि ‘‘क्या विवादित स्थान पर वर्ष 1528 ई0 के पहले कोई हिन्दू उपासना स्थल था ?’’
(9)          अधिग्रहण को चुनौती देने वाली याचिका और राष्ट्रपति महोदय के प्रश्न का उत्तर खोजने के लिए सर्वोच्च न्यायालय में पाँच न्यायाधीशों की संविधान पीठ बनी। लगभग 22 माह की सुनवाई के पश्चात् संविधान पीठ ने राष्ट्रपति महोदय का प्रश्न बिना उत्तर दिए वापस कर दिया और लिखा कि 1528 ई0 के पूर्व की इस स्थिति का उत्तर विज्ञान और पुरातत्व के आधार पर ही दिया जा सकता है।
(10)        साथ ही साथ सर्वोच्च न्यायालय ने बहुमत के आधार पर विवादित भूमि का अधिग्रहण रद्द कर दिया और विवादित भूमि से सम्बन्धित सभी मुकदमों को पुनः प्रारम्भ करने का आदेश दिया। यह भी कहा कि भारत सरकार इस विवादित भूमि की यथास्थिति बनाये रखेगी, सुरक्षा करेंगी। विवादित भूमि छोड़कर शेष सम्पूर्ण 67 एकड़ जमीन का अधिग्रहण सर्वोच्च न्यायालय ने स्वीकार कर लिया। इसी मुकदमें को इस्माइल फारूखी के नाम से जाना जाता है, यह निर्णय अक्टूबर, 1994 में हुआ।
(11)        वर्ष 1995 में लखनऊ उच्च न्यायालय में श्रीराम जन्मभूमि से सम्बंधित सभी वादों की सुनवाई के लिए तीन न्यायाधीशों की पीठ ने 15 वर्षों तक ट्रायल कोर्ट के रूप में मुकदमा सुना।
(12)        1528 ईं. से पूर्व की स्थिति जानने के लिए ही उच्च न्यायालय लखनऊ पीठ ने उस स्थान पर राडार तरंगों से भूमि के अंदर की फोटोग्राफी सन् 2003 में कनाडा के विशेषज्ञों से कराई थी और फोटोग्राफी रिपोर्ट की सत्यता जानने के लिए भारत सरकार के पुरातत्व विभाग से उत्खनन कराया था।
(13)        उच्च न्यायालय लखनऊ पीठ ने राडार फोटोग्राफी और उत्खनन रिपोर्ट के आधार पर 30 सितम्बर, 2010 को अपने घोषित निर्णय में स्पष्ट कर दिया कि विवादित भूमि पर 1528 ईं. से पहले भी एक हिन्दू मंदिर था।
(14)        उच्च न्यायालय ने निर्मोही अखाड़ा और सुन्नी वक्फ बोर्ड के वाद पूर्णरूप से निरस्त करते हुए लिखा कि इन्हें कोई राहत नहीं दी जा सकती। इसके विपरीत रामलला विराजमान के वाद को स्वीकार किया परन्तु विवादित भूमि का तीनों पक्षों में समान बंटवारे का आदेश दे दिया जो न्याय संगत नहीं है। इसी कारण सर्वोच्च न्यायालय में अपील लेकर जाना आवश्यक हो गया।
(15)        सभी अपीलें दिसम्बर 2010 में दायर हुईं। जुलाई, 2017 तक तो अपील सुनने का नम्बर ही नहीं आया। अगस्त, 2017 में पहली बार सुप्रीमकोर्ट ने केस देखा तो पता चला कि हिन्दी, संस्कृत, फारसी,  उर्दू व फ्रंच भाषाओं के दस्तावेजों का अंग्रेजी में अनुवाद होना आवश्यक है। उत्तर प्रदेश सरकार ने 4 महीने में लगभग 14,000 पृष्ठों का अंग्रेजी में अनुवाद करवा दिया।
(16)        अक्टूबर, 2018 को सर्वोच्च न्यायालय में अपील की सुनवाई के दौरान अदालत ने टिप्पणी की कि यह अपील हमारी प्राथमिकता में नहीं है, अपील की सुनवाई जनवरी, 2019 तक के लिए टल गई। अदालत ने यह भी आदेश दिया कि मुकदमा पाँच न्यायधीशों की पीठ सुनेगी।
04.          वार्तालाप का इतिहास (हिन्दू-मुस्लिम के मध्य)
विश्व हिन्दू परिषद ने वार्तालाप के सभी माध्यमों द्वारा यह प्रयास किया कि भारत के मुस्लिम नेता हिन्दू समाज की भावनाओं को जानें, समझें व आदर करें। अनुभव हुआ कि मुस्लिम नेतृत्व इस संघर्ष को समाप्त करके परस्पर विश्वास और सद्भाव का नया युग प्रारम्भ करने के लिए इच्छुक नहीं है।
श्री राजीव गाँधी के प्रधानमंत्री काल में श्री बूटा सिंह जी एवं श्रीमती शीला दीक्षित मध्यस्थता करती थीं। दिल्ली में ही अनेक बार आमने-सामने बैठकर बातचीत हुई। एक बार पूज्य स्वामी सत्यमित्रानन्द जी महाराज भी वार्तालाप में थे, दोपहर का समय था, शुक्रवार का दिन था, नमाज का समय हो गया था, मुस्लिम पक्ष के महानुभाव नमाज पढ़कर जब वापस लौटे तो पूज्य स्वामी सत्यमित्रानन्द जी महाराज ने खड़े होकर अपना वस्त्र फैलाकर कहा कि ‘नमाज के बाद जकात करनी चाहिए। मैं श्रीराम जन्मभूमि की भीख माँगता हूँ।’  सब चुप रहे। महाराज श्री बैठ गए। एक अन्य वार्ता के समय सैय्यद शहाबुद्दीन ने कहा था कि ‘यदि सिद्ध हो जाए कि मन्दिर तोड़कर मस्जिद बनाई गई तो हम स्वेच्छा से समर्पित कर देंगे’। यह वाक्य भारत सरकार ने अपने श्वेतपत्र में अंकित किया है। 1994 में इस्माइल फारूखी निर्णय में भी इस तथ्य का उल्लेख है।
श्री चन्द्रशेखर जी के प्रधानमन्त्रित्व काल में भारत सरकार की पहल पर द्विपक्षीय वार्ता प्रारम्भ हुई। तत्कालीन गृह राज्यमंत्री श्री सुबोधकान्त सहाय, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र व राजस्थान के तत्कालीन मुख्यमंत्री क्रमशः श्री मुलायम सिंह यादव, श्री शरद पवार व श्री भैरोंसिंह शेखावत भी इन बैठकों में उपस्थित रहते थे। 01 दिसम्बर, 1990 को दोनों पक्षों के प्रतिनिधियों ने वार्ता की।
सुझाव आया कि विवाद के सौहार्दपूर्ण समाधान के लिए एक समय सीमा निर्धारित कर ली जाए। इस पर निर्णय हुआ कि:-
01.          दोनों पक्ष 22 दिसम्बर, 1990 तक अपने साक्ष्य गृह राज्यमंत्री को उपलब्ध कराएं।
02.          साक्ष्यों की प्रतिलिपियाँ सभी सम्बंधित व्यक्तियों को 25 दिसम्बर, 1990 तक उपलब्ध करायी जाएं।
03.          साक्ष्यों के सत्यापन के पश्चात् दोनों पक्ष पुनः 10 जनवरी, 1991 को प्रातः 10.00 बजे मिलें। द्विपक्षीय वार्ता का एक औपचारिक दस्तावेज गृह राज्यमंत्री के कार्यालय में तैयार हुआ।
एक-दूसरे के साक्ष्यों का प्रत्युत्तर 06 जनवरी, 1991 तक देना था। विश्व हिन्दू परिषद ने बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के दावों को निरस्त करते हुए प्रत्युत्तर दिया। जबकि बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी ने केवल अपने पक्ष को और अधिक प्रमाणित करने के लिए कुछ अतिरिक्त साक्ष्यों की फोटो प्रतियाँ दीं। मुस्लिम पक्ष की ओर से प्रत्युत्तर के अभाव में सरकार के लिए यह निर्णय करना कठिन हो गया कि सहमति और असहमति के मुद्दे कौन-कौन से हैं ? 10 जनवरी, 1991 को गुजरात भवन में बैठक हुई,  निर्णय हुआ कि प्रस्तुत दस्तावेजों का ऐतिहासिक, पुरातात्विक, राजस्व व विधि शीर्षक के अन्तर्गत वर्गीकरण किया जाए, दोनों पक्ष अपने विशेषज्ञों के नाम दें जो सम्बंधित दस्तावेजों का अध्ययन करके 24 व 25 जनवरी, 1991 को मिलकर वार्ता करें और अपनी टिप्पणियाँ 05 फरवरी, 1991 तक दे दें। तत्पश्चात् दोनों पक्ष इन विशेषज्ञों की रिपोर्ट पर फिर से विचार करेंगे। बाबरी मस्जिद कमेटी ने अचानक पैंतरा बदलना शुरू कर दिया,  कमेटी ने अपने विशेषज्ञों के नाम नहीं दिए, वे अपने विशेषज्ञों की सूची में निरन्तर परिवर्तन करते रहे, 24 जनवरी, 1991 को जो विशेषज्ञ आए उनमें चार तो बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी की कार्यकारिणी के पदाधिकारी थे व डा0 आर. एस. शर्मा, डा0 डी. एन. झा, डा0 सूरजभान व डा0 एम. अतहर अली विशेषज्ञ थे। परिषद की ओर से न्यायमूर्ति गुमानमल लोढ़ा, न्यायमूर्ति देवकीनन्दन अग्रवाल, न्यायमूर्ति धर्मवीर सहगल व वरिष्ठ अधिवक्ता श्री वीरेन्द्र कुमार सिंह चैधरी सरीखे कानूनविद् तथा इतिहासकार के रूप में डा0 हर्ष नारायण, श्री बी. आर. ग्रोवर, प्रो0 के. एस. लाल, प्रो0 बी. पी. सिन्हा, प्रो0 देवेन्द्रस्वरूप अग्रवाल तथा पुरातत्वविद् डा0 एस. पी. गुप्ता उपस्थित थे। बैठक प्रारम्भ होते ही बाबरी कमेटी के विशेषज्ञों ने कहा कि हम न तो कभी अयोध्या गए और न ही हमने साक्ष्यों का अध्ययन किया है। हमें कम से कम छः सप्ताह का समय चाहिए। यह घटना 24 जनवरी, 1991 की है।
25 जनवरी की बैठक में बाबरी कमेटी के विशेषज्ञ आए ही नहीं। जबकि हिन्दू पक्ष के प्रतिनिधि और विशेषज्ञ दो घण्टे तक उनकी प्रतीक्षा करते रहे। इसके पश्चात् की बैठक में भी ऐसा ही हुआ। अन्ततः वार्तालाप बन्द हो गई।
अक्टूबर, नवम्बर 1992 में भी विश्व हिन्दू परिषद एवं बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के बीच पत्राचार हुआ है। परिणाम कुछ नहीं निकला।
05.          सर्वोच्च न्यायालय की प्रक्रिया
(1)          फरवरी 2019 को अदालत ने इच्छा व्यक्त की कि सभी पक्ष आपसी वार्तालाप के आधार पर विवाद का समाधान खोजें। मार्च, 2019 में सर्वोच्च न्यायालय ने तीन सदस्यों की समिति बनाई। (1) सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति इब्राहिम कलीफुल्ला (चेन्नई), (2) मद्रास उच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता श्री श्रीराम पंचू, (3) आर्ट आॅफ लिविंग के श्री श्री रविशंकर जी। सात चक्रों में वार्ता हुई, मध्यस्थता समिति ने 13 मार्च, 2019 से प्रारम्भ करके 01 अगस्त, 2019 तक सात चक्रों में सभी पक्षों से अलग-अलग बातचीत की। समस्त वार्ता गोपनीय रखी गई।
(2)          02 अगस्त को सर्वोच्च न्यायालय ने 6 अगस्त से अपीलों की नियमित सुनवाई का आदेश दिया, यह भी कहा कि सोमवार से शुक्रवार तक सप्ताह में 5 दिन तथा प्रतिदिन प्रातःकाल 10.30 बजे से सायंकाल 4.00 बजे तक कार्य होगा। मौखिक रूपसे कहा कि आवश्यकतानुसार शनिवार को भी कार्य करेंगे, अथवा सायंकाल 4.00 बजे के बाद एक घंट अतिरिक्त कार्य करेंगे।
(3)          6 अगस्त, 2019 से प्रारम्भ होकर 16 अक्टूबर तक कुल 40 दिन वकीलों के तर्क सुने गए। अन्त के 11 कार्यदिवस एक घंटा अतिरिक्त कार्य हुआ। 40 दिन में कुल 170 घंटे कार्य हुआ।
(4)          16 अक्टूबर सायंकाल संविधान पीठ ने सुनवाई पूर्ण घोषित कर दी और लिखित आदेश दिया कि वैकल्पिक राहत के सम्बन्ध में सभी पक्ष अपना सुझाव आगामी तीन दिन में लिखित रूप में दें।
06.          सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय का सारांश:
(1)          08 नवम्बर, 2019 रात्रि 9.00 बजे के लगभग अनायास टी.वी. पर समाचार आया कि कल 09 नवम्बर को प्रातः 10.30 बजे सर्वोच्च न्यायालय के पाँच न्यायाधीशों की पीठ श्रीराम जन्मभूमि वाद से सम्बंधित अपीलों पर अपना निर्णय घोषित करेगी।
(2)          मुख्य न्यायाधीश श्री रंजन गोगोई जी ने निर्णय पढ़ना प्रारम्भ किया। निर्णय के मुख्य अंश निम्नलिखित हैं:-
·         श्रीरामलला विराजमान के विधिक प्राणी तत्त्व का किसी पक्ष ने भी विरोध नहीं किया है।
·         श्रीरामलला विराजमान के अभिन्न मित्र के विरुद्ध दिए गए तर्क में कोई तथ्य नहीं है।
·         निर्मोही अखाड़ा भगवान का सेवायत नहीं है। सर्व स्वीकार्य सेवायत के अभाव में प्राण प्रतिष्ठित मूर्ति को स्वतंत्र रूप से अपने अभिन्न मित्र के माध्यम से मुकदमा दायर करने का अधिकार है और कोई भी उपासक मूर्ति के हितों की रक्षा और सुरक्षा कर सकता है। इसलिए भगवान का मुकदमा स्वीकार्य है।
·         श्रीरामलला विराजमान को पूर्व में दायर किए गए किसी भी वाद में प्रतिवादी नहीं बनाया गया। इसलिए भगवान की ओर से दायर वाद समय सीमा के भीतर आता है।
·         सभी साक्ष्य यह संकेत करते हैं कि हिन्दुओं की आस्था व विश्वास सदैव बना रहा कि गर्भगृह ही भगवान राम का जन्मस्थान है।
·         पुरातत्व विशेषज्ञों द्वारा प्रस्तुत उत्खनन रिपोर्ट की तुलना हस्तलेखन जाँच रिपोर्ट से करना गलत है।
·         पुरातत्व विभाग द्वारा प्रस्तुत तथ्यों को स्वीकार करना, एक व्यवस्था के पालन करने के समान है और उसे काल्पनिक मानना व्यवस्था और उत्खनन प्रक्रिया को नकारना माना जाएगा, जो ठीक नहीं होगा।
·         जन्मभूमि के नीचे उत्खनन में प्राप्त दीवार को ईदगाह अथवा कनाती मस्जिद कहना, बाद में उत्पन्न हुआ विचार है, जबकि 1961 ई0 में दायर मुस्लिम वक्फ बोर्ड के वाद में वैसा नहीं लिखा है। इस प्रकार ईदगाह मस्जिद कहना प्राथमिक तर्क कि ‘मस्जिद बंजर भूमि पर बनाई गई’ पर लीपा-पोती करने के समान है।
·         बाबरी मस्जिद खाली बंजर जमीन पर नहीं बनाई गई।
·         जमीन की नीचे प्राप्त ढाँचा इस्लामिक नहीं है।
·         विवादित भवन की नींव भूमि के नीचे प्राप्त भवन की दीवारों पर टिकी हुई है।
·         यह तथ्यों पर आधारित है कि भूमि के नीचे प्राप्त मन्दिर 12वीं शताब्दी का है।
·         उत्खनन से प्राप्त तथ्यों के आधार पर यह स्पष्ट होता है कि वहाँ जो कुछ प्राप्त हुआ है, वह ईसा के दो शताब्दी पूर्व का है अर्थात् 2200 वर्ष से अधिक पुराना है।
·         हिन्दू अयोध्या को भगवान राम का जन्मस्थान मानते हैं। हिन्दू शास्त्र और धार्मिक ग्रन्थ अयोध्या को धार्मिक महत्व का मानते हैं।
·         हिन्दुओं की आस्था व विश्वास है कि तीन गुम्बदों वाले ढाँचे के मध्य गुम्बद के नीचे ही भगवान का जन्म हुआ, वही गर्भगृह है।
·         हिन्दुओं की यह आस्था और विश्वास निर्विवाद है कि भगवान राम अयोध्या में पैदा हुए। मुस्लिम गवाहों की भी यही स्वीकारोक्ति है।
·         विवादित क्षेत्र का बाहरी आँगन, जहाँ रामचबूतरा है, कभी भी मुस्लिम समुदाय के निवासियों द्वारा अपने धार्मिक उपयोग में नहीं लाया गया। इसलिए बाहरी आँगन वक्फ सम्पत्ति नहीं हो सकती।
·         विपरीत कब्जे के लिए आवश्यक कानूनी बाध्यताओं को सिद्ध करने में सुन्नी मुस्लिम वक्फ बोर्ड असफल रहा।
·         विवादित परिसर के बाहरी आँगन पर मुस्लिमों के अधिकार को स्वीकार करना असंभव है। इसके विपरीत बाहरी आँगन पर हिन्दुओं का दावा स्पष्ट रूप से स्थापित है।
·         बाहरी और भीतरी आँगन को विभाजित करने वाली दीवार 1857 में बनाई गई और बाहरी आँगन में हिन्दुओं की पूजा सदैव-निर्बाध चलती रही।
·         प्रमाण उपलब्ध है कि 1857 ई0 में अवध पर ब्रिटिश राज्य स्थापित होने के पहले तक भीतरी आँगन में हिन्दू पूजा करते थे। मुस्लिम पक्ष कोई प्रमाण प्रस्तुत नहीं कर सका जिससे यह पता लगे कि उनका 1528 ई0 से लेकर 1857 ई0 तक भीतरी आँगन पर एकाधिकार था।
·         जब भारत में मुगल राज्य करते थे, उस समय की हिन्दू उपासना स्थलों के विरुद्ध की गई सभी गलतियों (Wrongs) को न्यायालय नहीं सुधार सकता है।
सर्वोच्च न्यायालय द्वारा घोषित राहत
गोपाल सिंह विशारद द्वारा 1950 ई0 में दायर वाद तथा भगवान रामलला विराजमान द्वारा 1989 ई0 में दायर वाद पूर्ण रूप से स्वीकार किए जाते हैं, सुन्नी मुस्लिम वक्फ बोर्ड द्वारा 1961 ई0 में दायर वाद आंशिक रूप से स्वीकार किया जाता है और निर्मोही अखाड़ा द्वारा 1959 ई0 में दायर वाद निर्धारित समय सीमा के पश्चात् दायर किए जाने के कारण रद्द किया जाता है।