छत्रपति शिवाजी महाराज राज्याभिषेक दिवस

Sant Namdev Maharaj

July 3, 1270

Sant Namdev spent his life propagating the bhakti movement in Maharashtra, composing abhangs both in Marathi and Hindi.
Namdev was a prominent bhakti poet amongst the earliest of those who wrote in the Marathi language. He was a companion of Lord Krishna and not a servant of the Lord. Namdev is said to be an incarnation of Uddhava who was one of the closest friends of Lord Krishna.
Namdev during his childhood went to the temple, placed the plate of eatables before Vithoba and asked Him to accept the naivedya. However, when Namdev did not find any evidence of acceptance by Vithoba, he cried so bitterly that Vithoba actually assumed a human form, appeared and accepted the offerings gratefully and such events got repeated. Namdev used to talk to the Lord frequently. But Namdev was innocent of the normal trade. Khechar explained to him that God was not only in the idols in the temples but was everywhere. There are many miracles associated with Namdev.
Namdev is said to be an incarnation of Uddhava who was one of the closest friends of Lord Krishna and at the same time a foremost devotee of the Lord. The 24 chapters in the eleventh skanda of Srimad Bhagavatam which constitute the Uddhava-gita is what the Lord spoke to Uddhava. It is one of the most authentic expositions next only to the Bhagavad-gita itself, of Hindu philosophy straight from the horse’s mouth. When Krishna was taking leave of Uddhava to leave his mortal coil, Uddhava refused to part with Him. But Krishna prevailed upon him to take things as they were and advised him to go to Badarika Asrama for doing penance till the end of his life which he did.
In response to Namdev’s invitation, Vittal attended the naming ceremony of Namdev’s child in the guise of a human being, named the child ‘Narayana’ and gave good gifts on the occasion. Namdev’s mother and wife abused Lord Krishna. Under the guise of Dharma Setti of Vaikunthapuram and the pretense of past friendship with Namdev, the Lord visited Namdev’s house, gave magnificent gifts to Radha Bai and disappeared.
The Mohamedan came with the cow and told them that he was going to slaughter the cow and if the God whom they considered as the Supreme Power, should make the cow come alive. Namdev immediately replied to him that Vitthal would take care of the cow. The Mohamedan then asked him how long he would take to bring back life to the cow. Namdev then told him that he would bring it alive in 3 days. On hearing this he slaughtered the cow and left the place with a big smile thinking that in 3 days time the people who were his followers would desert him and that they would not follow him. For 3 days Namdev was just singing and crying to Lord Vitthal blaming himself as the reason for the cow’s death. Namdev almost fainted on the third day as he refused to take food or water from the time the cow was slaughtered. Vitthal then came and consoled Namdev and asked him to observe the cow. Namdev saw the cow getting up and asked Vitthal why he had made him wait for 3 days, when he could have come immediately. Vitthal then told him that it was Namdev who promised the killer that he would make it come alive in 3 days and that he waited for 3 days only to make his words true.
There are many stories and miracles associated with Sant Namdev. Let us remember him on his birthday – July 3.


छत्रपति शिवाजी महाराज राज्याभिषेक दिवस – हिंदू साम्राज्य दिवस

शिवाजी महाराज का आत्मविश्वास

शिवाजी महाराज देश, धर्म का विचार करते थे। उस के लिये उन्होंने उद्यम किया। और कितना आत्मविश्वास!आपने पढा होगा कि देश के लिये शहीद होंगे ऐसा विचार लोग करते है। भगवान कहते है ‘तथास्तु’! देश के लिये शहीद हो जाओ! वे शहीद हो जाते है। वह भी बहुत बडी बात है। लेकिन पराक्रमी, विजिगीषु वृत्ति का मन कहता है की देश के लिये मैं लडूँगा और सब शत्रुओं को मार कर विजय संपादन करूंगा। क्या परिस्थिति थी? उत्तर में बादशाह का राज है, दक्षिण में पाँच सुलतान हैं। विजयनगर जैसा बलाढ्य साम्राज्य लुप्त हो गया है। लेकिन शिवाजी महाराज कहते है कि यहां पर मैं हिंदवी स्वराज्य की स्थापना करूंगा और वे कहते है कि ‘यह राज्य हो ये तो श्री की इच्छा है’ हमारा ईश्वरीय कार्य है। इसका सफल होना निश्चित है। इसका विजयी होना निश्चित है। उद्यम हम को करना है। पूर्व के संघर्षों का सारा इतिहास उन्होंने पढा होगा, सुना होगा। यह जो मै कहता हूँ कि शिवाजी महाराज का उद्यम तब तक के चले सारे प्रयासों का सम्मिलित उद्यम है, वह इसलिये कि शिवाजी महाराज का अष्टप्रधान मंडल जो बना वह पद्धति तो प्राचीन समय में भारत की परंपरा में थी, बीच के काल में लुप्त हो गयी थी। केवल विजयनगर साम्राज्य में अष्टप्रधान मंडल था और किसी के पास, सार्वभौम हिंदुराजा के पास अष्टप्रधान मंडल नहीं था। वह प्रथा तो लुप्त हो गयी थी। शिवाजी महाराज कहाँ से लाएँ? अपने प्रवास के दौरान निरीक्षण करते थे। वे सिखाने वाले थे। सब की सब बाते पूछकर सीखना, इतिहास सीखना, तुकाराम महाराज, रामदास स्वामी जैसे संतो से मुलाकते होती थी। समर्थ रामदास ने देशभ्रमण किया था। हम्पी में जाकर रामदास स्वामी तीन दिन रहे थे। वहाँ उन का स्थापन किया हुआ हनुमान भी है। विजिगीषा मृत है ऐसा दृश्य दिखता था। परन्तु समाज की स्मृति का लोप नहीं होता है। समाज का नेतृत्व आत्मविश्वासहीन हो जाता है लेकिन समाज के अंदर अंतर्मन में ज्योति जलती रहती है। समाज में क्या चल रहा है उस से बोध लेकर अनुभवोंका संग्रह कर गलतियाँ सुधारते हुए उद्यम करने का निश्चिय संकल्प करके शिवाजी महाराज ने आगे कदम बढाया। इतना आत्मविश्वास! मै जीतूंगा, मुझे जीतना है। यह कार्य हो यह श्री की इच्छा है। और इसलिये समाज का आत्मविश्वास जागृत करनेवाले काम उन्होने सब से पहले किये। एकदम लडाई नहीं शुरू की। अपनी (दी हुई) जागीर संभालने के लिये पुणे आ गये। पहले शहाजी राजा देखते थे वहाँ बैठ कर। उन्होंने निजाम को हाथ में लेकर स्वतंत्रता की लडाई लडी थी। गठबंधन चलता है कि नहीं देखा था। नहीं चला, टूट गया और शहाजी राजा के नेतृत्व में लडने वाले हिंदू को सबक सिखाने के लिये पुणे को जलाया गया। पुणे की जमीन को गधों के हल से जोता गया। उस में एक लोहे की सब्बल ठोक कर उस पर एक फटी चप्पल टांग दी गई। पुणे के लोग चुपचाप दिन में अपने घर का दरवाजा थोड़ा सा खोल कर उस को देख लेते थे तो दिल बैठ जाता था कि यह गति होनेवाली है, देश के लिये, धर्म के लिये लडनेवालों की। शिवाजी महाराज आये। पहला काम उन्होंने यह किया कि हमारी पंरपरा, संस्कृति के गौरव का प्रतीक गणेशजी का मंदिर खोज निकाला। उसकी प्रतिष्ठापना की, और पुणे की भूमि को विविधपूर्वक सुवर्ण के हल से जोता। उसी हिंदूसमाज ने यह भी देखा कि जहाँ पर लोहे के सब्बल पर फटी चप्पल टांग थी, वहां पर एक पराक्रमी युवा आता है और सोने के हल से जमीन को जोतता है। दिन बदल सकते है। किना आत्मविश्वास जागा होगा? अपनी जागीर में सुशासन दे कर लोगों को पहले उन्होंने समर्थ बनाया। कुछ और करने के लिये सारे समाज को जोडा।

रणनीतिज्ञ शिवाजी महाराज

शिवाजी महाराज जानते थे की एक नेता, एक सत्ता ये समाज के भाग्य को सदा के लिये नहीं बदल सकते। तात्कालिक विजय संपादन कर फिर इतिहास की पुनरावृत्ति होगी। इस लिये पहले समाज में विजिगीषा जगानी है। समाज में आत्मविश्वास जगाना है, समाज का संगठन करना है। सब प्रकार के लोगों को उन्होंने जोडा। उनके अनुयायियों में कितने प्रकार के लोग थे। मराठी में जिसको कहते है ‘अठरा पगड जाति’! अठारह प्रकार की पगडी बांधने वाले, समाज के अठारह वर्गों के लोग बडे बडे सरदार, पुरोहितों से लेकर तो बिल्कुल छोटा, उस समय जिनको हलका, हीन माना जाता था ऐसे जाति के लोग भी शिवाजी महाराज के ‘जीवश्च कंठश्च’ मित्र थे। उन के लिये प्राण देने के लिये तत्पर, और केवल उनके लिये नहीं, स्वराज्य और स्वधर्म के लिये जीने मरने के लिये तत्पर। शिवाजी महाराज के पास उस समय शस्त्र नहीं थे। बहुत ज्यादा साधन नहीं थे। हाथी घोडे नहीं थे। जब उन्होंने एक एक वीर को खडा किया उनकी आगे चलकर स्वतंत्र कहानियाँ बनी। समाज में एक लोककथा चलती है कि कुतुबशाह को मिलने के लिये शिवाजी महाराज स्वयं गये। उसने व्यंग्य से पूछा ‘आपके पास हाथी कितने है?’ उसको मालूम था, शिवाजी महाराज के पास हाथी नहीं है। शिवाजी महाराज ने कहा-

‘हाथी बहुत है हमारे पास’,

‘साथ में नहीं लाये?’

‘लाये है!’

‘कहाँ है?’

‘पीछे खडे है,’

पीछे उनके मावले सैनिक खडे थे। तो व्यंग्य से कुतुबशहा पूछता है,

‘ये हमारे हाथीयों से लडेंगे क्या?’

तो बोले, ‘उतारिये मैदान में कल।’

दूसरे दिन कुतुबशाह का सबसे खूँखार हाथी लाया गया। सुलतान ने गोलकुंडा में मैदान में उसे उतारा और शिवाजी महाराज ने अपने एक साथी येसाजी कंक से कहा हाथी से लडो। अपना कंबल जमीन पर पटक कर नंगी तलवार हाथ में लेकर वह मैदान में कूद पडा। हाथी की सूंड काटकर उस को मार दिया। हृदय में निर्भयता लेकर देश-धर्म की इज्जत के लिये मदमस्त हाथीयों से लड़नेवाले वीरों की फौज महाराज ने खड़ी की और समूचे समाज में जोश की भावना उत्पन्न की। इसी लिये तो शिवाजी महाराज के जाने के पश्चात जब राजाराम महाराज को दक्षिण में जाकर रहना पडा, एक तरह से बंद से हो गये वे एक किले में, उस समय भी न राजा है, न खजाना है, न सेना है, न सेनापति है, ऐसी अवस्था में भी हाथ में कुदाल, फावडा और हँसिया लेकर महाराष्ट्र की प्रजा बीस साल तक लडी और स्वराज्य को मिटाने के लिये आनेवाले औरंगजेव को दल बल के साथ यहीं पर अपने आप को दफन करा लेना पडा। समाज की इस ताकत को शिवाजी महाराज ने उभार तथा कार्यप्रणित किया। स्वयं के जीवन तक की परवाह नहीं की। पचास साल की उनकी आयु, अखंड परिश्रम की आयु रही है। आप लढो और मैं केवल आदेश दूँगा यह उनका स्वभाव नहीं था, वे स्वयं कूद पडते, कर दिखाते और बादमें कुछ कहते थे। शाहिस्त खाँ को शास्ति (दंड, सजा) सिखाने के लिये स्वयं सामना किया। कारतलबखाँ को शरण लाने के समय वहाँ शिवाजी महाराज अपने सारे शस्त्र धारण कर वीरोचित गणवेष में मौजूद थे। स्वयं आगे होकर अपने साहस का परिचय देते थे। अनुयायियों में कितनी हिंमत जगती थी। विवेक भी रखते थे। ‘धृती उत्साह सम्न्वितः’ ऐसी उनकी रणनीति थी। इस धृति, उत्साह व साहस के बलपर ही वे अफजलखाँ से लडकर सफल हुए।

शिवाजी महाराज का सुशासन

बहुत सी बाते उन्होंने ऐसी की जो यदि आज की जाती है तो लोग कहेंगे कि ये पुरोगामी कदम है। उस जमाने में जब समाजवाद, साम्यवाद का दूर दूर तक नाम नहीं था शिवाजी महाराज ने जमींदारो को, वतनदारी को रद्द कर दिया। समाज के संपत्ति पर हम लोग ट्रस्टी रह सकते है। हम लोग अधिकारी नहीं बन सकते। यह समाज की संपत्ति है, समाज की व्यवस्था देखनेवाले राज्य के अधीन रहे किसी व्यक्ति को यह नहीं दी जायेगी। संभालने के लिये दी जायेगी। ओहदा रहेगा, सत्ता नहीं रहेगी। वतनदारी को रद्द कर दिया। उस समय के सरदार जागीरदारोंकी निजी सेनाएँ होती थी। शिवाजी महाराज ने यह पद्धति बदल दी व सेना को स्वराज्य के केन्द्रीय प्रशासन से वेतन देना प्रारम्भ कर सैनिको की व्यक्तिपर निष्ठाओंको राष्ट्रपर बनाया। उनके राज्य में सभी सैनिकों के अश्वों का स्वामित्व स्वराज्य के केन्द्रीय प्रशासन के पास था। गरीब किसानों को उनके जमीन का स्तर व फसल के उत्पादन के आधारपर राहत देनेवाली द्विस्तरीय वित्तीय करप्रणाली उन्होंने लागू की। तालाब, जलकूप खुदवाये, जंगल लगवाये, धर्मशालाएँ, मंदिर व रास्तोंका निर्माण करवाया।


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघाचे संस्थापक डॉ. केशव बळीराम हेडगेवार

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघाचे संस्थापक डॉ. केशव बळीराम हेडगेवार यांच्या स्मृतिदिनानिमित्ताने (२१ जून) त्यांच्या विचार-कार्याचे स्मरण – ‘अलौकिक नोहे लोकांप्रति’

२१ जून हा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघाचे संस्थापक डॉ. केशव बळीराम हेडगेवार यांचा तो स्मृतिदिन आहे. रा. स्व. संघाचे नाव आज केवळ देशातच नव्हे, तर आंतरराष्ट्रीय स्तरावरही परिचित झाले आहे. समाजाच्या सर्व क्षेत्रांत संघाचा विचार घेऊन अनेक संस्था देशभर कार्यरत आहेत.

हिंदू समाजाचे संघटन करून राष्ट्राला परमवैभवावर नेण्याचे ध्येय डॉ. हेडगेवारांनी समोर ठेवले होते. येथील हिंदू समाज इमारतीच्या आधारशीलेसारखा आहे, अशी त्यांना अनुभूती झाली होती. संघाचे काम प्रतिक्रियात्मक वा कोणाच्या विरोधासाठी त्यांनी निर्माण केले नाही. हे विधायक कार्य आहे असे ते संघाबद्दल म्हणत. जो-जो या देशाला पितृभूमी आणि पुण्यभूमी मानतो त्याला ते राष्ट्रीय म्हणत. त्यामुळे त्यांनी संघाचे नाव ‘हिंदू स्वयंसेवक संघ’ असे न ठेवता ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ असे ठेवले. हिंदुराष्ट्र हे वादातीत सत्य असून, भारतात एक जरी हिंदू शिल्लक राहिला तरी हे हिंदुराष्ट्र राहील, अशी त्यांची धारणा होती.

डॉ. हेडगेवारांच्या ‘हिंदुराष्ट्र’ संकल्पनेत एक महत्त्वाचा पैलू अध्याहृत होता. तो म्हणजे- ‘विचारसृष्टीतील स्वराज्य’! ही कल्पना मूळ मांडली ती श्रेष्ठ तत्त्वचिंतक कृष्णचंद्र भट्टाचार्य यांनी. सन १९३१ मध्ये भट्टाचार्य यांनी चंद्रनगर येथील भाषणात विचारसृष्टीतही स्वराज्य हवे या भूमिकेचे निरुपण केले. वस्तुत: त्यापूर्वीच्या आदल्याच दशकात डॉ. हेडगेवार व स्वा. सावरकर यांनी या भूमिकेला साकार केले होते. राजकीय क्षेत्रात एका व्यक्तीचे दुसऱ्या व्यक्तीवर जे वर्चस्व असते ते प्रकर्षाने जाणवते. परंतु एक संस्कृती दुसऱ्या संस्कृतीवर विचारसृष्टीच्या क्षेत्रातही वर्चस्व गाजवत असते आणि हे वर्चस्व अधिक परिणामकारक असते. मात्र ते आपल्याला जाणवत नाही. राजकीय क्षेत्रातील वर्चस्वाचा परिणाम मनुष्यमात्राच्या बहिर्जीवनावर होत असतो. परंतु विचारसृष्टीतल्या क्षेत्रातले एका संस्कृतीचे दुसऱ्या संस्कृतीवर होत असलेले आक्रमण मनुष्याच्या आंतर्जीवनावर होत असते, म्हणून ते जाणवत नाही. ब्रिटिशांनी हिंदूंचे जे अराष्ट्रीयीकरण केले ते डॉ. हेडगेवारांनी ओळखले होते. म्हणून रा. स्व. संघाच्या माध्यमातून भारतीयांची आपल्या देश, संस्कृती व इतिहासाशी नाळ जोडण्याचा त्यांनी प्रयत्न केला. जातपात, भाषा, प्रांत यांवर उठून भारतीयांचा देहस्वभाव बदलून एक-राष्ट्रीयत्वाची भावना त्यांना विकसित करावयाची होती.

म्हणून १९२५ साली नागपुरात डॉ. हेडगेवार यांनी रा. स्व. संघाची सुरुवात केली आणि बघता बघता संघ कामास व्यापक स्वरूप येत गेले. ही अद्भुत किमया व विशाल असे संघटन डॉक्टरांनी सुरू केलेल्या दैनंदिन शाखारूपी कार्यपद्धतीचाच आविष्कार आहे. संघाचे तृतीय सरसंघचालक बाळासाहेब देवरस- ‘संघाची कार्यपद्धती म्हणजे डॉ. हेडगेवारांच्या अलौकिक प्रतिभेची देणगी,’ असे नेहमी वर्णन करीत. डॉ. हेडगेवारांनी लोकसंघटनेचा महान मंत्र स्वयंसेवकांना दिला. आपल्या अनुपम अशा संघटन कौशल्याच्या व लोकसंग्रहाच्या आधारावर सरसंघचालकपदाच्या १५ वर्षांच्या कालावधीत देशव्यापी संघटन त्यांनी उभे केले.

डॉ. हेडगेवारांचा मूळ स्वभाव लोकसंग्रह करण्याचा होता. त्यामुळे विविध प्रकारची माणसे त्यांनी संघकामास जोडली. स्वयंसेवकांना उद्देशून ते नेहमी म्हणत, ‘संघ केवळ स्वयंसेवकांपुरता नाही, तर संघाबाहेरील लोकांसाठीही असून आपला प्रत्येक मित्र स्वयंसेवक असला पाहिजे आणि प्रत्येक स्वयंसेवक हा मित्र झाला पाहिजे.’ डॉक्टरांच्या संपर्कात आलेली व्यक्ती त्यांच्या व्यक्तिमत्त्वामुळे प्रभावित होत असे. डॉक्टरांचे केवळ संघातच नव्हे, तर संघबाह््य वर्तुळातही अनेकांशी घनिष्ठ संबंध होते.

नि:स्वार्थी व निरपेक्ष प्रेम, अकृत्रिम स्नेह, आत्मीयता व वाणीचे माधुर्य यांच्या आधारावरच डॉ. हेडगेवारांनी अनेकांची हृदये जिंकली. डॉक्टरांचा व्यवहार हा अतिशय स्नेहपूर्ण होता. ते नेहमी म्हणत की, ‘आपण सर्वजण एकाच संघटनेचे घटक आहोत. त्यामुळे कोणत्याही कारणाने आपण परस्परांवर रागावू शकत नाही. रागावणे हा शब्दच संघाच्या कोशात सापडता नये. या संघटनेतील जबाबदार व्यक्तींना एकमेकांशी आत्यंतिक प्रेमाने व आदराने वागता आलेच पाहिजे, हा संघाच्या संघटनेतील मूलभूत सिद्धान्त आहे.’ डॉक्टर या सिद्धान्ताप्रमाणे आयुष्यभर वागले. वास्तविक पाहता, हेडगेवार घराणे हे अतिशय कोपिष्ट व रागीट म्हणून प्रसिद्ध होते. परंतु लोकसंघटनेच्या आड येणाऱ्या प्रत्येक गोष्टीचा डॉ. हेडगेवारांनी जाणीवपूर्वक त्याग केला. आपल्या प्रत्यक्ष वागण्यात तसे परिवर्तन आणले. गोळवलकर गुरुजींनी डॉक्टरांच्या अनुपम संघटन कौशल्याबद्दल म्हटले होते की, ‘असंख्य माणसे गोळा करणे व त्यांच्यामधून उत्कृष्ट कार्यकर्ता तयार करत अशा प्रचंड कार्याची निर्मिती करताना डॉक्टरांना अनेक यातनांना तोंड द्यावे लागले; पण याचे दर्शन डॉक्टरांच्या व्यवहारात कधीच दिसत नसे.’ व्यक्तिगत स्नेहाला मतभिन्नतेचे ग्रहण लागू न देण्याची अद्भुत कला डॉक्टरांकडे होती. मतभेदातही प्रेम कमी न होऊ देण्याची शिकवण डॉक्टरांनी दिली आणि मतभेदातही कटुता न येऊ देणे याकडे त्यांचे सदैव लक्ष असे. डॉक्टरांच्या प्रत्यक्ष उपस्थितीत त्यांच्यावर अनेक अपमानास्पद प्रसंग, भाषणे/लेख येऊनसुद्धा डॉक्टरांनी आपल्या मनाचा समतोलपणा कधीच ढळू दिला नाही आणि म्हणूनच भिन्न स्वभावाच्या व्यक्तींना एका विचारात व एका सूत्रात गुंफण्याची किमया ते करू शकले. प्रत्येकाशी वागण्याची डॉक्टरांची समान पद्धत होती, कारण ‘सर्व समाज माझा’ या भूमिकेतून डॉक्टर काम करीत होते.

संपर्कात आलेल्या प्रत्येक स्वयंसेवकास डॉ. हेडगेवार समजून घेत असत व त्याच्या सुख-दु:खांशी समरस होत असत. त्याची विचारपूस करत असत. प्रत्येक स्वयंसेवक त्यांना प्रिय होता व प्रत्येकासच ते तळहातावरील फोडाप्रमाणे जपत. कोणीही कार्यकर्ता संघकामापासून तुटू नये याकडे त्यांचा कटाक्ष असे. गरजूंना त्यांनी आवाक्याबाहेर जाऊन अडचणीत मदत केली, स्वयंसेवकांना मानसिक आधार दिला.

स्वयंसेवकांमधील गुणांची पारख करून डॉक्टर त्यास नेहमी प्रोत्साहन देत. १९३६ मध्ये फैजपूर येथे काँग्रेसचे अधिवेशन भरले होते. या अधिवेशनात ध्वजारोहणप्रसंगी तिरंगा ध्वज वर जाताना अडकला. धुळे जिल्ह्यातील शिरपूरच्या किसनसिंह राजपूतने चपळाई दाखवून अडकलेला ध्वज सोडविला. केवळ तो संघ स्वयंसेवक म्हणून काँग्रेस कार्यकर्त्यांनी किसनसिंहचे तोंडदेखले कौतुक केले. डॉक्टरांना ही घटना समजली. ते शिरपूरला गेले. तेथील स्थानिक शाखेत जाऊन सार्वजनिक कार्यक्रमात किसनसिंह राजपूतचा चांदीचा पेला देऊन सत्कार केला. संघकार्याची व्याप्ती जशी वाढली तसे डॉक्टरांचा कार्यकर्त्यांशी होणारा पत्रव्यवहारही वाढला. मोजक्या शब्दांत भरपूर आशय आणि नेमका अर्थ सांगणारी त्यांची पत्रे असत. पत्रलेखनातून संघटन करण्याचा त्यांचा स्वभाव होता. नाना पालकरांनी डॉक्टरांच्या पत्रव्यवहाराविषयी लिहिले आहे की, ‘भयानक विरोधाला तोंड देऊन थकलेला कार्यकर्ता थबकला, की डॉक्टरांचे पत्र त्यास धीर देऊन प्रोत्साहित करी आणि कार्यकर्त्यांचा आत्मविश्वास व उत्साह द्विगुणित होई. पत्रातूनही डॉक्टरांचा हात प्रेमाने व ममतेने फिरे. डॉक्टरांच्या प्रत्येक पत्रावर ध्येयासक्ती दिसते, तर वैयक्तिक जीवनासंबंधी विरक्ती दिसते (हेडगेवार चरित्र, पृष्ठ ४२५, प्रकाशक : भारतीय विचार साधना).’ डॉक्टरांनी कार्य करताना आपण काही जगावेगळे करीत आहोत असा आभास कधीही उत्पन्न केला नाही. ‘अलौकिक नोहे लोकांप्रति’ या उक्तीच्या आधारे त्यांनी आयुष्यभर काम केले. समर्थ रामदास स्वामींचा ‘दासबोध’ आणि लोकमान्य टिळकांचे ‘गीतारहस्य’ यांतील विचारांचा त्यांच्यावर पगडा होता. या ग्रंथांचे ते बऱ्याचदा वाचन करीत. छत्रपती शिवाजी महाराज हे त्यांचे दैवत होते. भारताच्या इतिहासाबद्दल डॉ. हेडगेवार यांचे आकलन सावरकरांइतकेच सूक्ष्म होते.

समाजातील व्यक्ती-व्यक्तीवर सुसंस्कार करून गुणवान, चारित्र्यवान, देशभक्त व्यक्तींना एकत्र धरावे आणि त्यांचे संघटन बांधावे, असे ते म्हणत. डॉक्टरांना अशा व्यक्तींची संघटना अभिप्रेत होती, म्हणूनच त्यांनी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघासारखे देशव्यापी संघटन उभे केले. डॉक्टरांनी स्वयंसेवकांना व्यक्तिनिष्ठ जीवन जगावयास न शिकवता तत्त्वनिष्ठ व संघानुकूल जीवन जगावयास शिकवले. सार्वजनिक जीवनात ज्याला काम करायचे आहे, त्याला डॉ. हेडगेवारांचे जीवन पथदर्शी आहे.

चार वर्षांनी- २०२५ साली संघ आपली शताब्दी साजरी करेल. केवळ भारतच नव्हे, तर संपूर्ण विश्वात रा. स्व. संघाइतके सर्वात मोठे स्वयंसेवी संघटन कोणतेही नाही. एखाद्या संघटनेची स्थापना होऊन संस्थापकाच्या मृत्यूनंतरही ती संघटना सतत वर्धिष्णू होत जाणे, याचे संघ हे एकमेव उदाहरण म्हणता येईल. राष्ट्रोत्थानासाठी एक देशव्यापी संघटना डॉ. हेडगेवारांनी आपल्या अद्भुत अशा लोकसंग्राहक वृत्ती व संघटन कौशल्याच्या आधारे साकार करून दाखविली, हे त्यांचे असामान्यत्व आहे.

साभार – रवींद्र माधव साठे
(लेखक रामभाऊ म्हाळगी प्रबोधिनीचे महासंचालक आहेत.)


राष्ट्रवाद और देशभक्ति का तेजपुंज थे प पू डा. केशव बलिराम हेडगेवार जी।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक परम पूज्य डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार अपने सामने बचपन से ही एक उच्चतम ध्येय रखकर काम करते रहे. अठारह वर्ष लगातार विचार तथा तपश्चर्या करने के पश्चात् उन्होंने एक विचार-प्रणाली निश्चित कर विजयदशमी के दिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की।

हिंदू राष्ट्र को वैभव के शिखर पर पहुँचानेवाले इस महान् कार्य को उन्होंने केवल पाँच स्वयंसेवकों के साथ आरंभ किया, आज इनकी संख्या करोड़ों में है. संघ-कार्य का जैसे-जैसे विस्तारित हुआ, समाज में देशभक्ति, एकता की भावना, आत्मविश्वास और राष्ट्रीय गौरव बोध जैसे गुणों की वृद्धि हुई, यद्यपि अभी वे पर्याप्त मात्रा में आ गए नहीं कहा जा सकता, इसके लिए अभी और अधिक परिश्रम करना होगा. फिर भी ये तो ऐसे गुण हैं जिनसे संघ-कार्य का सीधा संबंध है, किंतु रोचक बात यह है कि संघ के परोक्ष प्रभाव से समाज में नैतिक परिवर्तन आता भी स्पष्ट देखा जा सकता है.

राष्ट्र-जीवन के विविध क्षेत्रों में स्वयंसेवकों ने जो कार्य प्रारंभ किए हैं उन्होंने तो उन-उन क्षेत्रों में न्यूनाधिक ही सही, विचार-क्रांति ला दी है. आज का दिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉक्टर हेडगेवार को समर्पित है जिन्होंने अपने अत्यल्प संसाधनों से ऐसे गुणश्रेष्ठ दीर्घकाय संघ का गठन कर दिया, जो रहती मानवता तक इसका संबल और पथ-दर्शक रहेगा. आपको बता दें कि आज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक और प्रथम सरसंघचालक डॉ केशव बलिराम हेडगेवार की पुण्यतिथि है. परमपूज्य डा. केशव राव बलीराम हेडगेवार का जन्म 1 अप्रैल 1889 को नागपुर के एक गरीब ब्राह्मण परिवार के बलिराम पन्त हेडगेवार के घर हुआ था. इनकी माता का नाम रेवतीबाई था. उनके दो बड़े भाई भी थे, जिनका नाम महादेव और सीताराम था.

पिता बलिराम वेद-शास्त्र के विद्वान थे एवं वैदिक कर्मकाण्ड (पण्डिताई) से परिवार का भरण-पोषण चलाते थे. केशव के सबसे बड़े भाई महादेव क्रान्तिकारी विचारों के थे. जिसका परिणाम यह हुआ कि वे डॉक्टरी पढ़ने के लिये कलकत्ता गये और वहाँ से उन्होंने कलकत्ता मेडिकल कॉलेज से प्रथम श्रेणी में डॉक्टरी की परीक्षा भी उत्तीर्ण की परन्तु घर वालों की इच्छा के विरुद्ध देश-सेवा के लिए नौकरी का प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया. डॉक्टरी करते करते ही उनकी तीव्र नेतृत्व प्रतिभा को भांप कर उन्हें हिन्दू महासभा बंगाल प्रदेश का उपाध्यक्ष मनोनीत किया गया. वह बचपन से ही क्रांतिकारी प्रवृति के थे और उन्हें भारत भूमि पर जबरन और कुछ गद्दारों के दम पर कब्ज़ा किये बैठे अंग्रेज शासको से घृणा थी.

अभी वंदनीय डा. केशव राव बलीराम हेडगेवार स्कूल में ही पढ़ते थे कि अंग्रेज इंस्पेक्टर के स्कूल में निरीक्षण के लिए आने पर केशव राव ने अपने कुछ सहपाठियों के साथ उनका “वन्दे मातरम” जयघोष से स्वागत किया जिस पर वह बिफर गया और उसके आदेश पर केशव राव को स्कूल से निकाल दिया गया. तब उन्होंने मैट्रिक तक की अपनी पढाई पूना के नेशनल स्कूल में पूरी की. ये शब्द उनके ही हैं कि – ‘हिंदू संस्कृति, हिंदुस्तान की धड़कन है. इसलिए ये साफ़ है कि अगर हिंदुस्तान की सुरक्षा करनी है तो पहले हमें हिंदू संस्कृति को संवारना होगा’ इसी में जोड़ते हुए बोले गए कि ‘ये याद रखा जाना ज़रूरी है कि ताक़त संगठन के ज़रिए आती है. इसलिए ये हर हिंदू का कर्तव्य है कि वो हिंदू समाज को मज़बूत बनाने के लिए हरसंभव कोशिश करे.’

डॉ० हेडगेवार ने यह स्पष्ट किया कि “हिन्दुत्व ही राष्ट्रीयत्व है.” हिन्दुओं ने ही अपने पुरुषार्थ के बल पर इस देश को ‘सोने की चिड़िया’ बनाया. जाति-पांति एवं छुआछूत के भेद का शिकार होकर असंगठित दुर्बल होने के कारण हिन्दू समाज को मुट्‌ठी भर लुटेरों के हाथों हार खानी पड़ी. हमारी मां-बहिनों को घोर अपमान सहना पड़ा और हमें गुलामी का अभिशाप. उन्होंने निर्भीक स्वर में हिन्दू राष्ट्र की घोषणा की. आज ही के दिन अर्थात 21 जून 1940 को शरीर छोड़ने से पूर्व श्री गुरुजी को सरसंघ चालक का दायित्व देकर देश और समाज के प्रति अपने कर्तव्य की पूर्ति की.

डॉ. साहब कहते थे कि राष्ट्र को सुदृढ़ बनाने के साथ-साथ हिन्दू समाज को संगठित, अनुशासित एवं शक्तिशाली बनाकर खड़े करना अत्यन्त आवश्यक है. हिन्दू समाज के स्वार्थी जीवन, छुआछूत, ऊंच-नीच की भावना, परस्पर सहयोग की भावना की कमी, स्थानीय नेताओं के संकुचित दृष्टिकोण को वे एक भयंकर बीमारी मानते थे. इन सब बुराइयों से दूर होकर देश के प्रत्येक व्यक्ति को चरित्र निर्माण और देश सेवा के लिए संगठित करना ही संघ-शाखा का उद्देश्य है. हिन्दुत्व के साथ-साथ देशाभिमान का स्वप्न लेकर आज देश-भर में इसकी शाखाएं लगती हैं, जिसमें सेवाव्रती लाखों स्वयंसेवक संगठन के कार्य में जुटे हैं. आज उन पावन व्यक्तित्व वंदनीय हेडगेवार जी की पुण्यतिथि पर उन्हें शत शत नमन।


परमपूज्य श्रीगुरुजी – माधव सदाशिव गोलवलकर

बात 1951 की है, पूज्य श्रीगुरु जी का आगमन प्रयाग हुआ,उनका कार्यक्रम एक कालेज में था। हमारे प्रान्त संघचालक माननीय बैरिस्टर साहब भी कार्यक्रम हेतु आए थे। मैं उस समय काशी में संघ के प्रचारक के नाते कार्य कर रहा था। श्री गुरुजी को कालेज तक ले जाने और वापस लाने का कार्य मुझे दिया गया था। जब लौटकर आए तो बैरिस्टर साहब ने कहा, ‘अशोक जी ! आप आज बहुत धीरे-धीरे कार चला कर ले गए।‘ श्रीगुरु जी ने कहा, पहुँचाया तो बिल्कुल ठीक समय पर।फिर बोले कम से कम अशोक ने कोई एक्सीडेन्ट तो नहीं किया। बैरिस्टर साहब बोले मैं भी जब कार से लम्बे रास्ते पर जाता हूँ तो दीखना बन्द होने लगता है। श्रीगुरु जी ने कहा वह ‘‘तन्द्रा‘‘ है, मैं जो कह रहा हूँ वह ‘‘तन्द्रा‘‘ नहीं है।
मैं सोचने लगा आँख खुली हो और दीखना बन्द हो जावे, यह तो समाधि की अवस्था है। प्रज्ञा स्थिर होने पर ही दीखना बन्द हो सकता है। मेरे लिए यह एक नई बात थी। श्रीगुरुजी एक आध्यात्मिक पुरुष हैं, यह तो प्रत्येक स्वयंसेवक जानता था किन्तु उनकी आध्यात्मिक उपलब्धि छात्रावस्था से ही स्पष्ट दिखाई देती थी। निश्चित ही पूर्व संस्कारों के साथ वे उसे लेकर आए थे। उसके लिए उन्हें कोई विशेष साधना शायद करने की आवश्यकता नहीं पड़ी। यह अपने जीवन का एक दृष्टान्त उन्होंने मुझे अपनी ‘जीवन लक्ष्य की दिशा-निर्देश‘ हेतु दिया था और यह पत्थर की लकीर की तरह मेरे भीतर तक अंकित हो गई। भारत माँ श्रीगुरुजी के लिए चैतन्यमयी माँ के रूप में नित्य हृदय में स्थित थी। उस पर हो रही और होनेवाली आपदा उनसे छिपी नहीं रह सकती थी। उसकी प्रत्यक्ष अनुभूति उन्हें होती थी।

गुलवणि महाराज से श्रीगुरु जी की अन्तरंगता
एक बार पुणे के संघ-शिक्षा-वर्ग में श्रीगुरुजी ने अचानक कहा कि श्री गुलवणि जी महाराज के यहाँ आज अपना निमन्त्रण है। श्री आबाजी थत्ते इस सोच में पड़े थे कि इस निमन्त्रण की उनको तो सूचना नहीं थी, कब आया ? किन्तु कुछ अधिकारियों के साथ वे श्री गुलवणि जी महाराज के यहाँ पहुँचे। प्रसाद परोसा जा रहा था और उसी समय गुलवणि महाराज ने कहा आप सब लोगों को यह रहस्य नहीं मालूम है कि यह निमन्त्रण श्रीगुरुजी को कब दिया गया ? श्री गुलवणि जी एक सिद्ध पुरुष थे। वे जब बताने लगे, तब श्रीगुरुजी ने उनको संकेत किया कि वे न बतावें किन्तु उन्होंने सबके सामने एक बड़ा रहस्य खोल दिया। उन्होंने कहा गुरुजी कहीं भी हों, हमारी उनकी मूकवार्ता हो जाती है और उसी में ही यह निमन्त्रण श्रीगुरुजी ने स्वीकार किया था। सबके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा। इन्ही श्री गुलवणि जी महाराज के शिष्य श्री तरानेकर जी थे जिनसे श्री दत्तोपंत जी ठेंगड़ी (अब स्वर्गीय) ने दीक्षा ली थी। यह विषय श्री भैयाजी कस्तूरे (अब स्वर्गीय) ने मुझे बताया। श्री कस्तूरे जी 24 वर्ष नर्मदा के क्षेत्र में घूमते रहे और 24 लाख गायत्री का जप किया। उनके छोटे भाई विष्णु जो बाद में प्रकाशानन्द हुए उन्होंने चित्रकूट के श्री अखण्डानन्द जी से साधना ग्रहण की। उनकी लौकिक शिक्षा भी उन्होंने पूर्ण कराई और आध्यात्मिक साधना भी उनको दी।

विहिप के प्रथम अधिवेशन की सफलता के आधार बने गुरुजी
विश्व हिन्दू परिषद के प्रथम अधिवेशन में श्रीगुरुजी पूरे समय उपस्थित रहे। उसमें सामाजिक अस्पृश्यता जैसी रूढि़यों को कालबाह्य कहकर उससे समाज को मुक्त करने की बात पर पूज्य श्री निरंजन देव जी तीर्थ क्रुद्ध हो गए और धर्मशास्त्र और मान्यताओं को कोई परिवर्तन नहीं कर सकता, इस पर गर्मागरम बहस छिड़ गई, लगा यह अधिवेशन असफल हो जावेगा। श्रीगुरुजी ने रात्रि में पूज्य निरंजनदेव जी से व्यक्तिगत चर्चा की और वे प्रसन्न होकर आए और गोरक्षा के लिए 7 नवम्बर, 1966 को एक बड़ा प्रदर्शन करने के लिए उन्होंने स्वयं को और पूरे श्रोताओं को शामिल होने का संकल्प कराया। यह सब पूज्य श्रीगुरुजी की कृपा से ही हुआ।
कोई ऊंचा-नीचा नहीं
1950 पुणे के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शिक्षा वर्ग का प्रसंग है। 1300 के आस-पास स्वयंसेवक थे। भोजन के समय जलेबी भी बनायी गई थी। उसके वितरण की अधिकारी वर्ग की देखरेख में योजना बनी। श्री मोरोपन्त पिंगले, श्री सीताराम पंत, अभ्यंकर आदि अन्य अधिकारी निरीक्षण कर रहे थे। संघ के द्वितीय संरसंघचालक (श्री गुरुजी) श्री माधव राव सदाशिव गोलवलकर उनके पीछे-पीछे थे। कई स्वयंसेवकों का नाम लेकर आग्रहपूर्णक उन्हें खिला रहे थे।
जब श्री गुरु जी सहित अधिकारी भोजन के लिये बैठे तो दूसरी पंक्ति में अधिकारी वर्ग भोजन के लिये बैठा। आठ-नौ स्वयंसेवक वितरण करने लगे तो एक स्वयंसेवक वितरण न करके, वैसे ही बैठा रहा। गुरुजी का ध्यान उसकी तरफ गया। भोजन शुरु होने के पूर्व ही वे उसके पास गए और कहा-तू कैसे बैठा है? वितरण करो।उस स्वयंसेवक को बहुत संकोच हो रहा था। जब उसने गुरुजी को बताया तो गुरूजी को बहुत खराब लगा। गुरूजी ने उसका हाथ पकड़ के जलेबी की थाली हाथ में दी। सर्वप्रथम अपनी थाली में परोसने को गुरु जी ने कहा, फिर सब स्वयंसेवकों को देने के लिये कहा। यह प्रसंग है छोटा परन्तु जीवन भर याद रहेगा, एक अत्यंत कठिन समस्या का अत्यंत सरल समाधान अपने आचरण से देने वाला।
आसन्न संकट को भाँप लेते थे श्रीगुरु जी
7 नवम्बर, 1966 का दिन बहुत बड़ी संख्या में सन्त व जनता भाग लेने के लिए दिल्ली आई। यह आश्चर्य हुआ कि सभी प्रमुख आ गए हैं परन्तु श्री गुरुजी क्यों अनुपस्थित हैं ? थोड़ी ही देर में इसका रहस्य खुल गया, गोहत्या के समर्थकों ने एक बड़ा षड्यंत्र रचा। संसद भवन से लगे जो भी वाहन खड़े थे उनको आग लगाकर इस आन्दोलन पर पुलिस बल द्वारा अश्रु गैस के गोले तथा रायफल की गोली चलाकर आए पूज्य महात्माओं को मारने का षडयंत्र बनाया गया था और उनके पहले शिकार श्रीगुरुजी को ही करने की योजना थी। उनके इस कार्यक्रम में भाग न लेने से उनकी यह योजना असफल हो गई। आने वाले संकट को श्रीगुरुजी पहले ही देख लेते थे।
जब माँ भगवती से प्रत्यक्ष साक्षात्कार हुआ
पूज्य निरंजनदेव जी तीर्थ के पूर्व गोवर्धन पीठ के शंकराचार्य पूज्य श्री भारती कृष्ण तीर्थ जी एक बार नागपुर प्रवचनों के लिए आए थे, श्रीगुरुजी उन्हें सुनने के लिए नित्य जाते थे। उन्हें लगा श्रीगुरुजी एक अच्छे श्रोता हैं अतः उनसे भेंट करने की इच्छा हुई। श्रीगुरुजी ने उन्हें कार्यालय आने को कहा। श्रीगुरुजी से अध्यात्म विषयक चर्चा होते होते उन्हें लगा कि श्रीगुरुजी की साधना उनसे बहुत आगे है। वे विस्मित होकर यह पूछ ही बैठे गुरुजी क्या आपने भगवान के दर्शन किए हैं ? श्रीगुरुजी कुछ बोले नहीं। उनके आग्रह पर श्री गुरुजी ने कहा आप वचन दें कि इसे किसी से आप कभी नहीं कहेंगे, तो मैं कुछ कह सकता हूँ।
वचन मिलने पर श्रीगुरुजी ने कहा कि संघ पर प्रतिबन्ध के समय जब मैं बैतूल कारागार में बन्द था, वहाँ मैंने करुण स्वर में भगवान से प्रार्थना की थी कि परमपूज्य श्री डाक्टर साहब ने संघ का भार मुझे सौंपा है परन्तु आज इसके असंख्य स्वयंसेवक कार्यकर्ता देश की विभिन्न जेलों में बन्द हैं, संघ शाखाएं बन्द हैं। क्या संघ की समाप्ति मेरे ही कार्यकाल में होगी ? तो वहाँ मुझे माँ भगवती के साक्षात् दर्शन हुए। उनका शुभाशीष प्राप्त हुआ। बैतूल के जेलर श्रीगुरुजी को यह बताने आए कि समाचार पत्रों को पढ़कर ऐसा लग रहा है कि केन्द्र सरकार संघ का प्रतिबन्ध न हटाकर और कठोर कार्रवाई करने वाली है। श्रीगुरुजी के मुख से निकला, मैं कल ही छूटने वाला हूँ, जेलर को आश्चर्य हुआ। रिलीज वारन्ट दूसरे दिन आ गए। पूज्य श्रीगुरुजी के शरीर छोड़ने के उपरान्त ही यह रहस्य खुल सका।
हिन्दू विश्व – अभिलेखासे साभार
परमपूज्य श्रीगुरुजी संस्मरण – अशोक सिंहल, अध्यक्ष-विश्व हिन्दू परिषद


पुण्यश्लोक अहिल्यादेवी होळकर
जन्म मे ३१ इ.स. १७२५ रोजी महाराष्ट्राच्या अहमदनगर जिल्ह्यातील जामखेड तालुक्यातील चौंडी या खेड्यात झाला. त्यांचे वडील माणकोजी शिंदे हे त्या गावचे पाटील होते. अहिल्यादेवी यांचे आजोळ उस्मानाबाद जिल्ह्यातील चोराखळी हे गांव होते. त्यांच्या मामांचे आडनाव मैंदाड होते. स्त्रीशिक्षण फारसे प्रचलित नसतानाही तिच्या वडिलांनी त्यांना लिहिण्यावाचण्यास शिकवले होते.

बाजीराव पेशव्यांचे एक सरदार मल्हारराव होळकर हे माळवा प्रांताचे जहागीरदार होते. ते पुण्यास जाताना चौंडीस थांबले होते. आख्यायिकेनुसार, ८ वर्षाच्या अहिल्यादेवींना, मल्हाररावांनी एका देवळात बघितले. मुलगी आवडल्यामुळे त्यांनी तिला, स्वतःचा मुलगा खंडेराव याची वधू म्हणून आणले.
मल्हारराव होळकरांच्या त्या सून होत. अहिल्यादेवींचे पती खंडेराव होळकर हे इ.स. १७५४ मध्ये कुम्हेरच्या लढाईत धारातीर्थी पडले. त्यांच्या मृत्यूनंतर सासरे मल्हाररावांनी अहिल्याबाईंना सती जाऊ दिले नाही. १२ वर्षांनंतर, मल्हारराव होळकर हेही मृत्यू पावले. त्यानंतर अहिल्याबाई मराठा साम्राज्याच्या माळवा प्रांताचा कारभार बघू लागल्या. त्या लढाईत अहिल्यादेवी स्वतः सैन्याचे नेतृत्व करीत होत्या. पुढे त्यांनी तुकोजीराव होळकर यांची सेनापती म्हणून नेमणूक केली.[ संदर्भ हवा ]
एका इंग्रजी लेखकाने अहिल्यादेवी होळकर, यांना भारताच्या “कॅथरीन द ग्रेट, एलिझाबेथ, मार्गारेट” म्हटले आहे.<ref>इंग्रजी लेखक लॉरेन्स यांनी अहिल्याबाई यांची तुलना रशियाची राणी कथेरीन, इंग्लंडची राणी एलिझाबेथ तसेच डेन्मार्कची राणी मार्गारेट यांच्याशी केली आहे.</ref> (इ.स. १७२५ – इ.स. १७९५, राज्यकालावधी इ.स. १७६७ – इ.स. १७९५) ही भारतातील, माळव्याच्या जहागीरदार असलेल्या होळकर घराण्याच्या ‘तत्त्वज्ञानी राणी’ म्हणून ओळखल्या जातात. त्यांनी नर्मदातीरी, इंदूरच्या दक्षिणेस असलेल्या महेश्वर या ठिकाणी आपली राजधानी हलविली. मल्हाररावांनी त्यांना प्रशासकीय व सैन्याच्या कामात पारंगत केलेल होते. त्या आधाराने अहिल्याबाईंनी इ.स. १७६६ ते इ.स. १७९५, म्हणजे त्यांच्या मृत्यूपर्यंत माळव्यावर राज्य केले.

अहिल्याबाई होळकर या उचित न्यायदानासाठी प्रसिद्ध होत्या.

राणी अहिल्यादेवी यांनी भारतभरात अनेक हिंदू मंदिरे व नदीघाट बांधले, किंवा त्यांचा जीर्णोद्धार केला; महेश्वर व इंदूर या गावांना सुंदर बनवले. त्या अनेक देवळांच्या आश्रयदात्या होत्या. त्यांनी अनेक तीर्थक्षेत्री धर्मशाळांचे बांधकाम केले. त्यांत द्वारका, काशी, उज्जैन, नाशिक व परळी वैजनाथ यांचा प्रामुख्याने समावेश आहे. वेरावळ येथील सोमनाथचे गझनीच्या महंमदाने ध्वस्त केलेले देऊळ बघून अहिल्यादेवींनी शेजारीच एक शंकराचे एक देऊळ बांधले. सोमनाथला जाणारे लोक या देवळालाही भेट देतात. अहिल्याबाईंना प्रजेस कल्याणकारी असे काम करण्याची आवड होती
इ.स. १७६५ मध्ये सत्तेसाठी झालेल्या एका लढाईदरम्यान लिहिलेल्या एका पत्रावरून मल्हाररावांचा अहिल्याबाईंच्या कर्तृत्वावर किती विश्वास होता हे दिसून येते.
“चंबळ पार करून ग्वाल्हेर येथे जावा. तेथे तुम्ही ४-५ दिवस मुकाम करू शकता.तुम्ही मोठे सैन्य ठेवू शकता व त्यांचे शस्त्रांसाठी योग्य तजवीज करा…..कूच करतांना,मार्गावर तुम्ही सुरक्षेसाठी चौक्या लावा.”
पूर्वीच शासक म्हणून तरबेज झाल्यामुळे, मल्हारराव व मुलाच्या मृत्यूनंतर, अहिल्यादेवींनी स्वतःलाच राज्यकारभार पाहू देण्याची अनुज्ञा द्यावी अशी पेशव्यांना विनंती केली. त्यांनी शासन करण्यास माळव्यात अनेकांचा विरोध होता, पण होळकरांचे सैन्य अहिल्याबाईंच्या नेतृत्वाखाली काम करण्यास उत्सुक होते. अहिल्यादेवी सैनिकी कवायतीत हत्तीच्या हौद्याच्या कोपऱ्यात चार धनुष्य आणि बाणांचे भाते ठेवत असत, असे म्हणतात.
पेशव्यांनी परवानगी दिल्यावर, ज्या माणसाने तिला विरोध केला होती त्यास चाकरीत घेऊन, तुकोजीराव होळकर (मल्हाररावांचा दत्तक पुत्र) यास सैन्याचा मुख्य करून, अहिल्यादेवी होळकरांनी पूर्ण दिमाखात माळव्यास प्रयाण केले. अहिल्यादेवींनी पडदा प्रथा कधीच पाळली नाही. त्या रोज जनतेचा दरबार भरवीत असत व लोकांची गाऱ्हाणी ऐकण्यास नेहमीच उपलब्ध असत. जरी राज्याची राजधानी ही नर्मदातीरावर असलेल्या महेश्वर येथे होती तरीही, इंदूर या खेड्याचा विकास करून त्याचे सुंदर मोठ्या शहरात रूपांतर करणे, हे अहिल्यादेवींनी केलेले फार मोठे काम होते. त्यांनी माळव्यात रस्ते व किल्ले बांधले, अनेक उत्सव भरवले, हिंदूमंदिरांमध्ये कायमस्वरूपी पूजा सुरू रहावी म्हणून अनेक दाने दिली. माळव्याबाहेरही त्यांनी मंदिरे, घाट, विहिरी, तलाव व धर्मशाळा बांधल्या.
भारतीय संस्कृती कोशात अहिल्यादेवी होळकरांनी केलेल्या बांधकामांची यादी आहे – काशी, गया, सोमनाथ,अयोध्या, मथुरा, हरिद्वार, कांची, अवंती, द्वारका, बद्रीकेदार, रामेश्वर व जगन्नाथपुरी वगैरे. अहिल्यादेवींस, सावकार, व्यापारी, शेतकरी इत्यादी आर्थिकदृष्ट्या सुदृढ झालेले बघून आनंद होत असे. परंतु त्यांनी त्यांच्यावर आपला अधिकार असल्याचे कधीच जाणवू दिले नाही. त्यांनी सर्व राज्यकारभार हा सुखी व धनाढ्य लोकांकडून नियमांतर्गत मिळालेल्या धनापासून चालविला होता, असे दिसते.
अहिल्यादेवींनी जनतेच्या/रयतेच्या काळजीपोटी अनेक गोष्टी केल्या. त्यांनी अनेक विधवांना पतीची मिळकत त्यांच्यापाशीच ठेवण्यात मदत केली. अहिल्यादेवींच्या राज्यात कोणीही विधवा मुलाला दत्तक घेऊ शकत असे. एकदा त्यांच्या एका मंत्र्याने लाच घेतल्याशिवाय दत्तक घेण्याच्या मंजुरीस नकार दिला, तेव्हा अहिल्यादेवींनी दत्तकविधानाचा कार्यक्रम स्वतः प्रायोजित करून, रीतसर कपडे व दागिन्यांचा आहेर दिला. अहिल्यादेवी होळकरांच्या स्मृतीस अभिवादन म्हणून, सन १९९६ मध्ये, इंदुरातील नागरिकांनी तिच्या नावाने एक पुरस्कार सुरू केला. तो, दरवर्षी, जनसेवेचे विशेष काम करणाऱ्यास दिला जातो. भारताच्या पंतप्रधानांनी पहिल्या वर्षी तो पुरस्कार नानाजी देशमुखांना दिला.
अहिल्याबाई होळकर यांच्या स्मरणार्थ, इंदूर येथील विश्वविद्यालयास त्यांचे नाव दिले आहे. तसेच त्यांचे नावाचे पुण्यश्लोक अहिल्यादेवी होळकर सोलापूर विद्यापीठ हे एक विद्यापीठ सोलापूरला आहे.
भिल्ल व गोंड या राज्याच्या सीमेवर असलेल्या जमातींमधील वाद अहिल्यादेवी सोडवू शकल्या नाहीत. तरीही, त्यांनी त्या लोकांना पहाडातील निरुपयोगी जमीन दिली आणि त्यांना, त्या क्षेत्रातून जाणाऱ्या सामानावर थोडा ‘कर’ घेण्याचा अधिकार दिला. याही बाबतीत, (आंग्ल लेखक) ‘माल्कम’ यांच्यानुसार, अहिल्यादेवींनी’ त्यांच्या सवयींवर लक्ष ठेवले’.
महेश्वर येथील अहिल्यादेवींची राजधानी ही जणू काव्य, संगीत, कला व उद्योग यांची संस्थाच होती. महाराष्ट्रातील प्रसिद्ध मराठी कवी मोरोपंत व शाहीर अनंतफंदी यांना व संस्कृत विद्वान खुशालीराम यांना अहिल्याबाईंनी आश्रय दिला. कारागरांना, मूर्तिकारांना व कलाकारांना त्यांच्या राजधानीत सन्मान व वेतन मिळत असे. त्यांनी महेश्वर शहरात एक कपड्याची गिरणीपण सुरू केली.
एकोणीसाव्या व विसाव्या शतकातील भारतीय, इंग्रजी व अमेरिकन इतिहासकार हे मान्य करतात की, अहिल्यादेवी होळकरांस माळवा व महाराष्ट्रात, त्या काळी व आताही, संताचा सन्मान दिला जातो. इतिहासाच्या कोणाही अभ्यासकास ते मत खोडून काढण्याजोगे आजवर काहीही सापडलेले नाही. राजकारणातील बारकावे व तत्व व्यावहारीक नीती नियम व सूत्रे आपल्या देशाची राजकीय, सामाजिक, भौगोलिक स्थिती, रणांगणावरील आखाडे व अडचणी आणि बारकावे समजून घेतले. मल्हारराव यांच्या गैरहजेरीत सर्व कारभार करण्यात त्या पारंगत झाल्या.
ज्या काळी दळणवळणाची साधने फारच कमी होती किवा म्ह्टले तर नव्हती अशी परस्थिती होती अश्या खडतर काळात त्यांनी भारतातील तिर्थक्षेत्रांच्या ठिकाणी व राज्यात मंदिरे धर्मशाळा तलाव, विहिरी, पाणपोई, घाट अशी अनेक समाज उपयोगी कामे केली. आज ही वास्तुशिल्पे व त्यांनी उभारलेली स्थापत्य कला मातोश्रीच्या भव्य कार्याची साक्ष देत उभी आहेत. वास्तुशिल्प व बांधकाम केल्यामुळे कारागिरांची कला जोपासून संकृतीचा वारसा तर जपलाच पण त्याच बरोबर गोरगरीब जनतेच्या हाताला काम मिळवून दिले. त्यांच्या कामगिरीचा हा दुहेरी बाणा निश्चीतच अभिमानास्पद आहे .

शेती व शेतकरी उद्धाराची कार्य;

शेतकरी सुखी तर जग सुखी या संकल्पनेतून शेतकऱ्यांच्या जाचक करातून मुक्त केले. अनेक ठिकाणी तलाव व विहिरी बांधल्या. शेतकऱ्यांना गोपालनाचे महत्त्व पटवून प्रजेला गाई देऊन मोठ्या प्रमाणात गोपालन घडवून आणले.

गुणग्राहता;

मातोश्रीची लोककल्याणाची कीर्ती ख्याती ऐकुन अनेक विद्वन लोक त्यांची भेट घेण्यास येत असत आणि नंतर त्या ठिकाणीच राहत असत. अनेक विषयाचे विद्वान, शास्त्री पंडीत, व्याकरणकार, कीर्तनकार, ज्योतिषी, पुजारी, वैद्य, हकीम यानाही त्या मुद्दाम बोलावून घेऊन त्यांना त्या राजाश्रय देत असत. महेश्वर नगरीत वास्तव करीत होते म्हणूनच महेश्वर नगरी त्याकाळी संस्कृती विद्वान व धर्माचे माहेरघर म्हणून नावारूपाला आली होती . ग्रंथ संपंदा- निर्मिती छापखाने नसल्याने त्या काळी धर्माचे तत्वज्ञान जाणून घेण्याकरिता हस्तलिखिते यावरच अवलंबून राहावे लागत होते. हस्तलिखिते लिहिणारे मोठ्या प्रमाणात रकमेची मागणी करत असत. ज्या प्रमाणे हिरा व रत्ने पारखणाऱ्या जवाहिऱ्याप्रमाणे त्या विद्द्येची महत्त्व जाणत असल्याने त्याच्या मागणीप्रमाणे रक्कम देऊन ग्रंथाची हस्तलिखिते तयार करून विद्वान विद्यार्थ्यांसाठी अनमोल ग्रंथसंपदा निर्माण करून जतन केली. शाळा काढून विद्याप्रसाराचे काम केले.

अंधश्रद्धा निवारण;

या काळात सती जाण्याची मोठी रूढी व परंपरा होती. सती गेल्याने पुण्य व न गेल्याने पाप असा समज समाजात रूढ होता. रामायण आणि महाभारत यामध्ये अनेक युद्ध होऊनही कोणी सती गेल्याचा उल्लेख नाहीत असे अनेक दाखले देऊन सती प्रथेला शास्त्राचा आधार नाही हे प्रजेला पटवून दिले. कालांतराने १८२९ साली राजाराम मोहन रॉय यांचा प्रयत्नामुळे सतीची अनिष्ट चाल कायद्याने बंद करण्यात आली यावरून अहिल्याबाई होळकर यांच्या दूरदृष्टतेची प्रचीती आपणास यते.

चोर व दरोडेखोर यांचे मत परिवर्तन;

त्या काळी प्रवास करणाऱ्या प्रवाशांना व प्रजेची चोर दरोडेखोर व भिल्ल लुटमार करीत असत अशा लुटारू लोकांना गायी, म्हशी आणि जमीनी दिल्या व त्यांचे मत परिवर्तन केले व ते लोक शेती करू लागले त्यामुळे त्यांचा उदरनिर्वाहाचा प्रश्न मिटला. भिल्ल लोकांना भिलकवाडी कर घेण्याची परवानगी दिली. एवढे करूनही प्रजेला त्रस्त करणाऱ्या या लोकांना त्यांनी तोफेच्या तोंडी देऊन एक प्रकारचा दरारा नर्माण केला.

न्यायप्रियता;

अहिल्याबाई होळकर यांच्या न्यायप्रियतेची ख्याती सर्व दूर पसरली होती. सर्वांना समान न्याय हा त्यांचा बाणा होता. त्यांच्या संस्थानचा सुभेदार तुकोजी होळकर यांच्या मुलाने प्रजेला त्रास दिला म्हणून त्याला तुरुंगात डांबले.


स्वा. विनायक दामोदर सावरकर
(28 मई 1883 – 26 फरवरी 1966)
भारत को अंग्रेजी दासता से मुक्ति दिलाने के लिए सशस्त्र क्रांति की जरूरत है, ऐसा विचार रखने वाले प्रखर देशभक्त, साहित्यिक और समाज सुधारक विनायक दामोदर सावरकर की आज (28 मई) जयंती, सावरकर जी को ‘स्वातन्त्र्य वीर’ इस उपाधि से गौरवान्वित किया गया। इनका जन्म नासिक जिले के भगूर गांव में हुआ। उनके बड़े भाई का नाम गणेश और छोटे भाई का नाम नारायण था। वीर सावरकर जी की पढ़ाई भगूर, नासिक और मुंबई में हुई। एलएलबी करने के पश्चात ‘बॅरिस्टर’ की पढ़ाई के लिए वे लंदन गए। सावरकर जी को बचपन से ही विविध विषयों की पुस्तक पढ़ने का शौक था। बचपन से वे कविता लिखा करते थे। उनकी भाषणकला भी बहुत ही अच्छी थी। समाचार पत्र पढ़ने की आदत से उनको देश-विदेश में क्या चल रहा है, उसका आंकलन वे करते थे।
1897 में पुणे में प्लेग का प्रकोप फैला। अंग्रेज सिपाहियों ने घर-घर जाकर जांच करते हुए जनता पर जो अत्याचार किए, उसका बदला लेने के लिए चाॅफेकर भाइयों ने जांच दल के प्रमुख और कमिश्नर रॅण्ड की गोली मार कर हत्या कर दी। अंग्रेजों ने दोनों भाइयों को पकड़कर उन्हें फांसी की सजा सुनाई। इस घटना से वीर सावरकर व्यथित हुए और क्रोधित भी हुए। उन्होंने देश को स्वतंत्रता दिलाने के लिए सशस्त्र युद्ध करने की शपथ ली। 1899 में उन्होंने ‘राष्ट्रभक्त समूह’ के नाम से एक गुप्त संगठन बनाया। साथ में जनता को संगठित कर आंदोलन करने के लिए जनवरी 1900 में ‘मित्रमेला’ की स्थापना की। शिव जयंती, गणेशोत्सव यात्रा के दौरान लोगों में जन-जागृृति हो इसके लिए उनके कवि मित्र गोविंद की कविताओं का उन्होंने उपयोग किया। इन कविताओं के माध्यम से हजारों युवक उनके जुड़ने लगे। 1904 में उन्होंने ‘मित्र मेला’ का नाम बदलकर ‘अभिनव भारत’ यह नाम रखा। इटली के प्रसिद्ध क्रांतिकारी जोसेफ मॅझिनी से वे काफी प्रभावित थे।
यह कार्य करते-करते वह लेख, कविता लिखते थे, जो अलग-अलग समाचार पत्रों, पत्रिकाओं में छपते थे। पुणे के फग्र्युसन काॅलेज में शिक्षा प्राप्त कर रहे थे तब उन्होंने विदेशी वस्त्रों की होली का कार्यक्रम किया। इस पर उनको दंडित किया गया और हाॅस्टल से बाहर निकाल दिया गया।
एलएलबी करने के पश्चात् लंदन में बॅरिस्टर की पढ़ाई के लिए वे 9 जून 1906 को भारत से रवाना हुए। लंदन में श्याम जी कृष्ण वर्मा नाम के जो क्रांतिकारी थे उनकी सावरकर जी को बहुत मदद मिली। लंदन में पढ़ाई करते हुए उन्होंने जो काम किए उसको 1) साहित्य निर्मिती 2) जनआंदोलन व 3) गुप्त क्रांति कार्य, इन तीन भागों में बांटना होगा। क्रांतिकारी जोसेफ मेझिनी का चरित्र (1907) उन्होंने लिखा। ‘1857 का भारतीय स्वातन्त्र्य समर’ इस ग्रंथ को भी उन्होंने लिखा। लेकिन वह पुलिस की नजरों में आ गया, उसकी छपाई नहीं हो पाई।
1857 की लड़ाई का एक व्यापक आधार था। ब्रिटिश साम्राज्य इससे दल गया था। लंदन में सावरकर जी के साथ सेनापति बापट उनके सहकारी थे। उन्होंने बम तैयार करने की जानकारी रशियन क्रांतिकारियों से प्राप्त कर ली थी। इस जानकारी को भारत में स्थित क्रांतिकारियों तक पहंुचा दी गयी थी। सावरकर जी ने कुछ बंदूकें भी गुप्त रूप से भारत में भेजी थी। ब्रिटिश सत्ता के विरोध में विश्व स्तर पर षडयन्त्र करने की योजना भी सावरकर जी के मन में थी।
सावरकर जी के अनेक कार्यक्रमों पर ब्रिटिश सत्ता की कड़ी नजर थी। उनके बड़े भाई बाबाराव सावरकर भी क्रांतिकारी थे। अंग्रेजों ने बाबाराव सावरकर पर राजद्रोह का मुकदमा लगाया और उनको 14 वर्षों की सजा सुनाई गई। उनकी सारी सम्पत्ति को भी जब्त करने का आदेश दिया गया। लंदन में अभिनव भारत के एक सदस्य मदनलाल धींगरा ने कर्जन वायली की गोली मारकर हत्या कर दी।
इस दरमियान नासिक के कलेक्टर जैक्शन की भी गोली मारकर हत्या कर दी गयी। इस हत्या के लिए जिस बंदूक का प्रयोग किया गया, वह बंदूक सावरकर जी ने भारत में भेजी थी। इस वजह से सावरकर जी के जो मित्र थे उनको पुलिस ने सताना शुरू किया। 13 मई 1910 को उनको गिरफ्तार किया गया। अधिक जांच के लिए उन्हें एक जहाज में बैठाकर भारत की ओर ले जाने का फैसला अंग्रेजों ने किया लेकिन जहाज से कूदकर वे मार्से बंदरगाह पहंुचे, यह फ्रांस में स्थित था। ब्रिटिश पुलिस ने उन्हें वहां जाकर फिर से गिरफ्तार किया। सावरकर जी को भारत में लाने के पश्चात उन पर दो गुनाहों की सजा सुनाई गयी। यह सजा 50 वर्ष की थी। उनकी सारी संपत्ति जब्त की गयी।
(24 दिसंबर 1910 व 30 जनवरी 1911)
सावरकर जी को अंदमान कारागार में 4 जुलाई 1911 को लाया गया। वहां पर उन्हें काफी कठोर काम कराए जाते थे। ऐसी परिस्थिति में भी उन्होंने ‘कमला’ नामक दीर्घकाव्य लिखा। अंदमान में जो अन्य कैदी थे, उनकी समस्याओं पर उन्होंने आवाज उठाई। ग्रंथाभ्यास की अनुमति मिलने पर उन्होंने अलग-अलग तत्वज्ञान की पुस्तकों को पढ़ा और अपने सहयोगी कैदी मित्रों को भी पढ़ने के लिए प्रेरित किया।
सावरकर जी हिंदी भाषा के अभिमानी थे। हिन्दी भाषा के प्रचार के लिए उन्होंने अंदमान में काम किया। वहां के कैदियों को वे पढ़ाते भी थे।
1921 में सावरकर जी को कांेकण के रत्नागिरी कारागार में रखा गया। वहां पर उन्होंने हिन्दुत्व (1925) और माझी जन्मठेप (1927) यह दो ग्रंथ लिखे। 1924 में दो शर्तों पर सावरकर जी को कारागार से मुक्त किया गया। पहली शर्त थी रत्नागिरी जिले में वह स्थानबद्ध रहेंगे और दूसरी शर्त थी पांच वर्षों तक राजनीति से दूर रहेंगे। लगभग साढ़े तेरह वर्ष सावरकर जी रत्नागिरी में थे लेकिन इन वर्षों में उन्होंने जो सामाजिक कार्य किए वह बहुत ही महत्वपूर्ण हैं-अस्पृश्यता निवारण, धर्मान्तरित हिंदुओं को फिर से हिन्दू धर्म में लेना, भाषाशुद्धि और लिपीशुद्धि इन क्षेत्रों में काफी काम किया। अछूतों को मंदिर में प्रवेश नहीं दिया जाता था, यह देखकर उन्होंने वहां के भागो जी सेठ कीर नाम के दानशूर व्यक्ति को पतित पावन मंदिर (1931) बांधने के लिए कहा, जिससे कि सभी हिन्दू इस मंदिर में प्रवेश कर पूजा कर सकें। हम सब एक हैं, यह संदेश लोगों को देकर, सहभोजन का आयोजन, महिलाओं के लिए हल्दी कुंकुम समारंभ, साथ में पढ़ना ऐसे अनेक कार्यक्रमों का आयोजन कर समाज को जोड़ने का बहुत बड़ा कार्य किया, उनको विनम्र अभिवादन !


देवर्षि नारद यांची जयंती – वैशाख कृष्ण प्रतिपदा.
ब्रम्हदेवांचे मानसपुत्र असलेले आणि त्यांच्याच वरदानानुसार देवर्षि नारद हे तीनही लोकांमध्ये म्हणजेच देवलोक , पृथ्वीलोक आणि पाताळ लोकांमध्ये मुक्त संचार करीत असल्याने नारदमुनी देव , संत-महात्मे ,इंद्रादी शासक व जनमानसांशी थेट संवाद करीत असत. ते देवांना जेवढे प्रिय होते तेवढेच ते राक्षस कुळांमध्येही प्रिय होते. पृथ्वी आणि पाताळ लोकांतील माहीती देवांपर्यंत पोहोचवण्याचे काम देवर्षि नारद करीत असत. ब्रम्हदेवांचे मानसपुत्र असले तरी नारदमुनी हे श्रीविष्णूंचे परमभक्त होते. नारायण-नारायण या जयघोषानेच त्यांच्या आगमनाची सूचना ही सर्वांनाच प्राप्त होत असे. नारदमुनींनी ज्योतिष विज्ञानाच्या व्यावहारिक वापराविषयी खगोलीय परिणाम विशद करुन रचना स्पष्ट केल्या आहेत. सर्व विषयात पारंगत असलेले नारदमुनी संगीताचे महागुरु असून वीणा हे त्यांचे प्रिय वाद्य आहे. नारदमुनींनी नारद पुराणाची रचना केली आहे. किर्तन परंपरेत नारदीय कीर्तनाची वेगळी परंपरा असून ती आजही अस्तित्वात असल्याचे पहावयास मिळते. साभार – जग्गनाथ लडकत


जगत गुरु श्री शंकराचार्य
उनका जन्म 788 ई. में केरल के एर्नाकुलम जिले के कालडी गांव में शिव गुरु और आर्यम्बा के पुत्र के रूप में हुआ था। बचपन में ही उनके पिता की मृत्यु हो गई थी और शंकर का लालन-पालन उनकी माता ने किया था। चूंकि उनके पिता की कम उम्र में मृत्यु हो गई थी, शंकर अपने पिता के प्यार को महसूस नहीं कर सके। शंकर, जो एक असाधारण बुद्धिजीवी थे, वेदों में असाधारण रूप से पारंगत हो गए। मां के दिल ने उन्हें अपने इकलौते बेटे और मासूम बेटे की जुदाई को बर्दाश्त नहीं करने दिया। घर के पास किनारे पर अपनी मां के साथ नहाते समय एक मगरमच्छ ने शंकर का पैर पकड़ लिया।अपने बेटे की हालत देखकर मां जोर-जोर से रोने लगी। अच्छे विश्वास में शंकर ने अपनी माता से कहा कि यदि उन्होंने मुझे साधु बनने दिया तो मगरमच्छ चला जाएगा। इतिहास यह है कि मगरमच्छ को उसकी मां ने अनिच्छा से पकड़ा था। इसलिए उसने अपनी माँ के आशीर्वाद से घर छोड़ दिया। जब उसकी माँ ने मुझे देखने की लालसा की, तो वह अपने जीवन या भूमि को पूरा करने के लिए इस आश्वासन के साथ निकल पड़ा कि मैं उसके साथ रहूँगा। यह एक विजयी यात्रा थी। शंकर ने गोविंदा भागवतपादर की शिष्यता स्वीकार की । प्रज्ञानं ब्रह्म तत्त्वमसि – अहम आत्मा ब्रह्म – अहम ब्रह्मास्मि ये चार महान श्लोक गुरुदेव से प्राप्त हुए थे। शंकर को भगवतपदार द्वारा नियुक्त किया गया था।वस्तुनिष्ठ तर्कों से भ्रांतियों का खालीपन चकनाचूर हो गया।

उन्होंने जोर देकर कहा कि ब्रह्मांड में सब कुछ भगवान का हिस्सा है। अद्वैत विचारधारा की जड़ें भारतीय धरती में जड़ें जमाने के लिए एक लंबी यात्रा शुरू हुईं। दक्षिण में चिदंबरम से लेकर उत्तर में कश्मीर तक युवा साधु केदारनाथ, द्वारका और रामेश्वरम गए। अनेक महान विद्वान विवादों में पराजित हुए। यह एक नए युग की विजयी यात्रा थी ।शुरुआत उस भावना को फिर से हासिल करने की थी जिसे भारत खो रहा था। उनका दृढ़ मत था कि ब्रह्म ही एकमात्र सत्य और उसके अन्य सभी रूप हैं।श्रीसंत वर्णन करने के लिए तैयार थे। इसने समाज के एकीकरण में बहुत बड़ा योगदान दिया है ।

श्री शंकरा का विचार था कि ब्रह्मज्ञान का दावा शूद्रों और महिलाओं द्वारा समान रूप से किया जाता था। महाभारत में विदुर, उपनिषदों में धर्मव्याधन और वाचक नवी के उदाहरणों से हर कोई ब्रह्मज्ञान प्राप्त कर सकता है।. वेदोपनिषदों ने स्वयं निचली जातियों और महिलाओं के अधिकारों के लिए रूढ़िवादियों को उद्धृत किया। श्रीशंकराचार्यस्वामी ने बत्तीस साल की उम्र में बहुत कम उम्र में समाधि प्राप्त कर ली थी। इस छोटी उम्र के दौरान उनके योगदानों में से एक चार मठों की स्थापना थी जो राष्ट्र की एकता को हमेशा के लिए कायम रखने में सहायक थे। पूर्व में जगन्नाथपुरी में गोवर्धन मठ, पश्चिम में द्वारका में शारदा मठ, दक्षिण में श्रृंगेरी मठ और उत्तर बद्रीनाथ में ज्योतिर मठ। यह अभी भी भारत में राष्ट्रीय एकता के प्रतिबिंब के रूप में खड़ा है। श्री शंकराचार्य की लेखन शैली अद्वितीय थी। भगवद गीता, उपनिषद और ब्रह्म सूत्र पर भाष्य बहुत धन्यवाद हैं। इसमें गरीबी का सामना कर रही एक मां के दिल का दर्द पहली बार महसूस किया गया था। उस महान योगी के मन में बनी झुंझलाहट दिल के दर्द में जब बदल गई, तो कनकधारा के धन्यवाद से उस शिक्षक के दृश्य से जो झुंझलाहट निकली, वह सामने आई। आचार्य श्रीसंत एक महान व्यक्ति हैं जिन्होंने दुनिया को सिखाया कि वैदिक संस्कृति में व्याप्त आध्यात्मिक और सामाजिक सार राष्ट्रीय एकता और सामाजिक समानता का एकमात्र मूल कारण है।उस महात्मा के यह दर्शन अवधि यथावत रहेगी। उस बुद्धिमान योगी श्री शंकर जयंती के द्वारा खोले गए विचार, हम पर और अधिक प्रकाश डालने का अवसर बनें।

साभार – वी. मोहनन, प्रांत उपाध्यक्ष, विश्व हिंदू परिषद, केरल


श्री नृसिंह अवतार हा विष्णूच्या दशावतारांपैकी चौथा अवतार असून हिरण्यकश्यपू या राक्षसाच्या नाशासाठी देवांच्या विनंतीवरुन विष्णूंनी हा अवतार घेतला. भक्त प्रल्हादाची निस्सीम विष्णू भक्ती आणि हिरण्यकश्यपूचा वध ही कथा सर्वश्रुतच आहे. हिरण्याक्ष व हिरण्यकश्यपू हे दोघे ( दानव ) भाऊ होते. त्यांच्या क्रूरतेमुळे सर्व देवता व पृथ्वीवरील सर्व जीव त्रासून गेले होते. पृथ्वीच्या उद्धारासाठी भगवान विष्णूंनी हिरण्याक्षाचा वराह अवतार ( दशावतारापैकी तिसरा अवतार ) घेऊन वध केला..
ब्रम्हदेवांकडून मिळालेल्या वराच्या सामर्थ्याने हिरण्यकश्यपूने तिन्ही लोकांवर विजय प्राप्त केला. त्याच्या या हाहाकारामुळे सर्व देव त्रस्त झाले आणि त्यांनी भगवान विष्णूंकडे धाव घेतली तेव्हा मीच त्याचा वध करणार आहे आणि ज्यावेळेस हिरण्यकश्यपू त्याच्या प्रल्हाद नामक पुत्राचा छळ करेल त्यावेळेस त्याचा विनाश हा निश्चित होईल असे सांगीतले. आणि ज्यावेळी श्री हरी विष्णूंनी नृसिंहाचे रुप घेतले ते फार भयानक होते. धड मनुष्याचे व तोंड सिंहाचे होते. हिरण्यकश्यपूला गदेसह वर उचलला आणि संध्याकाळच्या वेळी दारामध्ये उंबऱ्यावर बसून त्याला आपल्या मांडीवर उताणा पाडून नखांनी त्याचे हृदय विदीर्ण करुन मारुन टाकले. तद्नंतर प्रल्हादाने नृसिंहाना शांत होण्याची विनंती केली आणि सांगीतले हे नृसिंहा भयनिवृत्तीसाठी सर्व लोक ह्या नृसिंह अवताराचे स्मरण करतील


जनक नन्दिनी – जानकी

“सिया राम मय सब जग जानी,
कर हुँ प्रणाम जोड जुग पानी” ।
संपूर्ण विश्व मे सिता व रामजी का दर्शन करनेवाले भारतीय संस्कृति को विश्व नमन करता है । यहाॅ हम भारत की आराध्या माता सीता से जुडे कुछ तथ्यों को सम सामायिक परि दृश्य मे जानने का प्रयास करेंगे ।
जनक नंदिनी सीता से जुड़ी विभिन्न कथाऍं, प्रसंग, काव्य, ग्रंथ, उपनिषद्, पुराण आदि साहित्य स्त्रोतों का अवलोकन करने से स्पष्ट सिद्ध होता हैं कि श्री राम व माता सीता अभिन्न तत्व हैं ।
गिरा अरथ जल बिची सम, कहियत भिन्न न भिन्न ।
सांसारिक दृष्टि से अवलोकन करे तो भूमिपुत्रि बाल्य- काल में ही शिवधनुष उठाकर अपनी शक्ति का परिचय देने वाली धैर्यशील, स्थिरचित्त, वन में तपस्विनी, ममतामयी नारी हैं ।
सीतोपनिषद् में माता सीता को शक्ति स्वरूपा बताया गया हैं, इस शक्तीस्वरुप में प्रथम वे शब्दब्रह्ममयी शक्ति हैं, द्वितीय में राजा जनक के हल के अग्रभाग से उत्पन्न स्वरुप में हैं, उनका तीसरा स्वरुप अव्यक्त स्वरुपा शक्ति का हैं । इन सीता माता की कृपा से ही श्रीराम सौभाग्य शाली बनते हैं ।
ऋग्वेद में ‘सीता’ शब्द को भूमि पर हल से अंकित रेखा बताया गया है इसके अनुसार उन्हे कृषि की अधिष्ठात्री देवी का स्वरुप या भूमिजा स्वीकार किया गया । वैदिक ऋषि व मिथिला नरेश जनक की पुत्री के स्वरुप में जानकी, वैदेही जाना गया । स्कंदपुराण में सीता को ब्रह्मविद्या कहा गया है ।
शौनकीय तंत्र के अनुसार सीताजी इच्छाशक्ति, क्रियाशक्ति, साक्षात शक्ति इन तीनो स्वरुपो में प्रकट होने वाली आदिशक्ति भगवती हैं । श्रीराम की सत्ता है, शक्ति है माता सीता । श्रीराम त्रिगुणातीत हैं, तदापि जगत में मर्यादा की स्थापना हेतु कर्म बद्ध हैं । सीतामाता भूमि पुत्री हैं अत: उनमें भूमि का गुण सहनशीलता है । कष्ट सहन कर व प्रतिफल मे जन साधारण को कुछ न कुछ प्रदान करती है । सीता जी भूमि पुत्री है अत: वे क्षमा के गुण से भूषित है विभिन्न प्रसंगों में उनके इस गुण को समझा जा सकता है । लंका विजय के पश्चात हनुमान माता सीता से निवेदन करते है, माते ! आपको जब बंधन मे रखा गया था तो राक्षस नारियों ने आपको बहुविध त्रास दिये, उन्हे कठोर दंड देने की आज्ञा आप मुझें दे । सिता जी की उदारता देखिये, वे कहती है, पुत्र रावण ने उन्हे यह आदेश दिया था, उनका कर्तव्य था,
‘इमां तु शीलसंपन्नां द्रष्टुमिच्छति राघव:’
हनुमान सीता माता के शील संपन्न स्वरुप को देख कर मन में विचार करते है यही वह शील संपन्न स्वरुप है जिसे राघव देखना चाहते है । जनकनन्दिनी के चारित्रिक गुणों के मूलतत्त्व हैं – पवित्रता, शुद्धता व दिव्यता । जनकनन्दिनी के इन्ही गुणों को प्रकट करता हुआ उनका संवाद रावण से है –
‘धिक् ते चारित्रमीदृशम्’ ऐसे तेरे चरित्र को धिक्कार है ।
यह अग्निशिखा सीता की प्रज्वलित वाणी का उद्घोष है । तप और पतिव्रत का तेज है जनकनन्दिनी के कठोर वचन उनके सतीत्व की गरिमा, नारीजाति के सम्मान को प्रकट करतें हैं । सीता, रावण जैसे त्रैलोक्यविजेता और शक्तिशाली अपहर्ता को धिक्कारते हुए भी निडर है यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि वह रावण सिता जी को दृष्टी भर के देखने मे भी असमर्थ अनुभव करता है ।
ऐसी साध्वी माता भगवती स्वरुपा सीता प्रत्येक काल एवं स्थान पर आदर्श हैं, प्रेरक हैं । वे स्वयम् श्रीराम को अपना स्वरुप बताते हुए स्वाभिमान पूर्ण वचन कहती है – ‘
‘अपदेशो मे जनकान्नोत्पत्तिर्वसुधातलात् । मम वृत्तं चं वृत्तज्ञ बहु ते न पुरस्कृतम् ।।’
अर्थात ‘सदाचार के मर्म को जानने वाले देवता ! राजा जनक की यज्ञभूमि से प्रकट होने के कारण ही मुझे जानकी कहा जाता है । वास्तव मे मेरी उत्पत्ति जनक से नही हुई है । मै भूतल से प्रकट हुई हूँ, अर्थात साधारण मानव से विलक्षण हूँ, दिव्य हूँ, उसी प्रकार मेरा आचरण भी अलौकिक एवं दिव्य हैं, मुझ में चरित्र बल विद्यमान है, किंतु आपने मेरी इन विशिष्टताओं को महत्व नही दिया।’
मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम लोक-मान्यताओं और नृप के अनुरुप आचरण की मर्यादा मे बॅंध कर सिता की अग्निपरिक्षा लेते हैं ।
अपनी परम्पराओं के अनुरूप आचरण करने की शिक्षा हमे सीता जी के चरित्र से अनेक प्रसंगों से मिलती है । अत्रि ऋषी की पत्नी अनसूया जी एवं सिता जी का एक प्रसंग उल्लेख किया जा सकता है । अनसूया की कहती हैं, हे पुत्री तुमने चौदाह वर्ष का वनवास स्वीकार कर पतिव्रत धर्म की पालना कि है, मेरी इच्छा है मै तुम्हे कुछ दूॅ तुम्हारी जो इच्छा हो माॅग लो । सिताजी उत्तर देती है, माते ! मै क्षत्रिय कन्या हूॅं, मैं वर नही माँग सकती, क्षत्रिय का हाथ सदैव दान देता हैं, ग्रहण करने के लिए नीचे नही आता । स्वयं की परंपरा की रक्षा का संदेश, वर्तमान जीवन के लिये पाथेय है ।
सीता जी के चरित्र के गुणों का आख्यान करना कठीण है, आत्मबल, वाणी का ओज प्रकट करने वाले एक प्रसंग का उल्लेख करने का लोभ संवरण नही किया जा रहा है । रावण सीता जी को वश मे करने के अनेक उपाय कर हताश हो जाता है । उसका एक मंत्री सजीव आकृति बनाने मे सिद्धहस्त होता है वह सुझाव देता है कि श्रीराम की मुखाकृती बनाकर सीता जी को इस संदेश के साथ भेजें कि श्री राम युद्ध मे मृत्यु को प्राप्त हुए उनका कटा सिर इस का प्रमाण है, रावण ऐसा ही करता है, सीता जी सावधानी पूर्वक मुख का निरीक्षण करती है नेत्र, केश सब सजीव रामरुप तुल्य है । निराश रावण से कहती है तात ये मेरे स्वामी का सिर है, मेरे पिता जनक तो बहुत दूर है, आप मेरे पिता तुल्य है, मेरे स्वामी के साथ मेरे जाने का प्रबंध करे । निष्ठुर रावण लज्जित होकर पराजित सा महल चला जाता है । यह है भारतीय नारी का आत्मबल, दुष्ट को भी हरा देने वाला ।
सीता त्रिकारात्मक है ऐसा सीतोपनिषद् में उल्लेख है सकार- सत्य, अमृत और प्राप्ति नाम की सिद्धी, बुद्धी की अधिष्ठात्री देवी हैं । तकार – महालक्ष्मी रुप हैं इससे ही लीला का विस्तार होता है । ईकार – माया रुप हैं, ब्रह्म के साथ संबंध बनता है ।
विनय पत्रिका मे तुलसीदासजी भी माता सीता से प्रार्थना करते हैं कि कभी श्रीराम से मेरी बात कहिये, ‘कबहुक अम्ब अवसर पर पाई’ श्रीराम की कृपा प्राप्त करने के लिए भी माता सीता ही मार्ग हैं ।
“सिय सोभा नहीं जाई बरवानी ।
जगदम्बिका रूप गुण रवानी ।।
उपमा सकल मोहि लघु लागी ।
प्राकृत नारि अंग अनुरागी ।।”
सीता जगत् जननी हैं, उनकी उपमा लौकिक स्त्रीयों को दी जाने वाली उपमाओं से नही दी जा सकती । श्रीराम की शक्ति स्वरूपा माता सीता स्त्रियों के लिए आदर्श प्रस्तुत करती हैं । सीता राम की अनुगामिनी हैं , वन गमन के प्रसंग मे कहती है –
जिय बिनु देह नदी बिनु वारी ।
तैसिअ नाथ पुरुष बिनु नारी ॥
तुलसीदास कृत मानस में उपर्युक्त भाव है तो वाल्मिकी कृत रामायण में सिता कहती है, हे राम! मैं आपका भार नही बनूँगी, कुश – कंटक को हटाती हुई आगे-आगे चलूंगी ।
अग्रवस्ते गमिष्यामि, मृद्नन्ती कुशकन्टकान्
जनकनन्दिनी सीता जी का पावन चरित्र अनुकरणीय है क्योंकि यह नीति और शिक्षा का भंडार है । तेजस्वी, पराक्रमी राजा की पुत्री, प्रतापी लोकप्रिय राजा की पुत्रवधू को जनसाधारण मात अम्बे कहकर सम्बोधित करता है । जब तक इस धरा पर सूर्य व चन्द्र का अस्तित्व है, सीता जी के अद्वितीय अलौकिक चरित्र के कारण विश्व पटल पर भारत भू का मस्तक उन्नत रहेगा । साभार – डॉ रजनी शर्मा, जयपूर प्रांत बौद्धिक प्रमुख, राष्ट्रसेविका समिती


Jagadguru Shankaracharya
Jagatguru Sankaracharya was born to Sivaguru and Aryamba in AD 788 in Kaladi in Kerala. In his childhood itself he lost his father. He grew up under his mother’s care. As an extra-ordinarily intelligent boy, he gained great mastery in vedas and upanishads. After completing his education at the age of seven, one day he presented his wish to renounce this world before his mother. She couldn’t agree to the idea of leaving her only son. Before long, while taking bath with his mother in the nearby river, a crocodile caught on one of his legs. Seeing this, his mother panicked and screamed. An unperturbed smiling Sankara told his mother that if she gave him permission for ‘sanyasa’, the crocodile would leave the hold. Finding no other way, half-heartedly the mom gave him permission. And the crocodile released him, says the legend. Thus, with his mother’s permission he left home. Giving her his word that whenever she wished to see him, he would reach her, he set out to fulfil his life mission. That was the beginning of a victorious, intellectual world conquering journey. Sankara became a disciple of Govinda Bhagavadpada. After getting ‘sanyasa deeksha’ from him, he travelled the length and breadth of Bharat, defeating master debaters of different schools of philosophy. Through sensible and factual arguments and points, he exposed the meaninglessness of many deep-rooted unjustifiable, wrong practices in the society. He upheld that everything in the visible world is a manifestation of the invisible ‘brahma tattva’. To make this ‘advaita ‘ philosophy spread its roots all over Bharat, he started a long journey. From Chidambaram in the south to Kashmir in the north and from there to Kedarnath, Dwaraka and Rameswaram that young sanyasin travelled on foot. He defeated several great scholars in ‘tarka’ (philosophical debate) and brought the age old vedic dharma back to its prime. It was a victorious journey; it was the beginning of a new era. Bharat was regaining its waning spiritual strength and grace. To eliminate differences and clashes among varied Sanatani sects who worshipped ‘Eswara’ in different forms, he formulated a new worship system known as ‘panchaayatana pooja’ . His generous concept accepted Shri Buddha as the ninth incarnation of Vishnu. He was propagating the spiritual truth that nothing and no one is to be hated or kept apart because the ‘athma satta’ in all things is the same. These integrating revolutionary measures have contributed greatly in the unification of the ancient Indian society.
According to Sankara women and ‘sudras’ have equal rights with all others in practising and attaining ‘brahmajnana’.He expounded that anyone from any caste with dedication can succeed in achieving ‘brahmajnana’, showing the examples of Vidura and Dharmavyadha in Mahabharata and Vachaghnavi in upanishad. Sankara’s travels, literary works and super human efforts to raise Sanatana Dharma from decadence, purify, strengthen, and protect it and carry forward its human values to the wider populace will continue to influence Bharat as phenomenal monuments that time cannot ever wipe out.
At an early age of 32, his soul left the body while in ‘samadhi’. Within this short period of life, one of his contributions was the founding of the four mutts which served in strengthening national unity in the following years. Govardhan mutt of Puri, west Sarada Mutt of Dwaraka, south Sringeri Mutt, north Jyotir Mutt of Badarinath still serves as historical symbols of unity that India enjoys.
Sankara’s creative ability incomparable. He wrote countless stotras and interpretations to Bhagavat Geeta, Upanishads and Brahma sutra. Sankara is the great master who taught the world that the philosophical and spiritual essence that overflows from the vedic culture is the panacea for social inequality and endless wars. His philosophy and views will continue to inspire the world in all the ages to come.
Let this Sankara Jayanthi be an occasion for that ‘jnaana jyoti’ to shower more light in to our lives!